शेषन से ज्ञानेश कुमार तक: मुख्य चुनाव आयुक्तों के दौर में कितनी बार उठे चुनावी सवाल, विरोध और निष्पक्षता पर बहस?
कभी आयोग की शक्तियों पर टकराव, कभी EVM पर सवाल तो अब मतदाता सूची और SIR को लेकर विवाद; जानिए 26 मुख्य चुनाव आयुक्तों के दौर में कब-कब चुनाव आयोग की निष्पक्षता चर्चा में आई

भारत में चुनाव आयोग की कहानी सिर्फ चुनाव कराने की कहानी नहीं है। सात दशक से अधिक की इस यात्रा में आयोग को कभी चुनाव कार्यक्रम को लेकर राजनीतिक विरोध झेलना पड़ा, कभी उसकी शक्तियों पर सवाल उठे, कभी किसी चुनाव आयुक्त की निष्पक्षता पर आरोप लगे और बाद के वर्षों में EVM, VVPAT तथा मतदाता सूची को लेकर राजनीतिक विवाद सामने आए।
लेकिन एक बात शुरुआत में साफ करना जरूरी है—हर विवाद को “वोट चोरी” कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा। अलग-अलग दौर में लगाए गए आरोपों की प्रकृति अलग रही है और कई आरोपों को संबंधित संस्थाओं या अदालतों ने स्वीकार नहीं किया। इसलिए 1950 से 2026 तक की इस कहानी को आरोप, विरोध, न्यायिक कार्रवाई और उसके परिणाम के साथ समझना जरूरी है।
भारतीय चुनाव आयोग के आधिकारिक रिकॉर्ड में अब तक 26 मुख्य चुनाव आयुक्तों के नाम दर्ज हैं। वर्तमान CEC ज्ञानेश कुमार 26वें हैं।
1. सुकुमार सेन से शुरू हुई चुनाव आयोग की यात्रा
भारत के पहले मुख्य चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन ने 21 मार्च 1950 को पद संभाला। उनके नेतृत्व में देश ने 1951-52 में पहला आम चुनाव कराया। इसके बाद 1957 का आम चुनाव भी उनके कार्यकाल में हुआ।
उस समय भारत में आज जैसी चुनावी तकनीक, सोशल मीडिया और मतदाता सूची को लेकर राष्ट्रीय स्तर के विवाद नहीं थे। सेन के बाद केवीके सुंदरम, एसपी सेन वर्मा, नागेंद्र सिंह, टी. स्वामीनाथन, एसएल शकधर और आरके त्रिवेदी जैसे CEC आए।
इन शुरुआती दशकों में चुनाव आयोग के सामने प्रशासनिक और चुनाव संचालन की बड़ी चुनौतियां थीं, लेकिन वर्तमान दौर की तरह किसी CEC के खिलाफ “वोट चोरी” जैसी राजनीतिक मुहिम दिखाई नहीं देती।
2. 1980 के दशक तक विवादों का स्वरूप अलग था
आरवीएस पेरी शास्त्री, वीएस रामादेवी और उनके पहले के CEC भी ऐसे समय में आयोग का नेतृत्व कर रहे थे जब चुनाव प्रक्रिया काफी हद तक कागजी थी।
1989-90 के आसपास भारतीय राजनीति तेजी से बदल रही थी। इसी दौर के बाद चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर राजनीतिक टकराव अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा।
और फिर आया वह दौर जिसने भारत के चुनाव आयोग की सार्वजनिक छवि ही बदल दी।
3. टीएन शेषन: जब CEC का पद राजनीतिक बहस के केंद्र में आया
टीएन शेषन का कार्यकाल : 12 दिसंबर 1990 से 11 दिसंबर 1996
भारतीय चुनावी इतिहास में टीएन शेषन का नाम एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जाता है। उन्होंने चुनाव आचार संहिता, बूथ कैप्चरिंग, धनबल और चुनावी अनियमितताओं के खिलाफ आयोग की शक्तियों का आक्रामक इस्तेमाल किया।
उनकी कार्यशैली को लेकर राजनीतिक दलों के साथ टकराव हुआ। विवाद इतना बढ़ा कि चुनाव आयोग की संरचना और CEC तथा अन्य चुनाव आयुक्तों की शक्तियों का प्रश्न सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।
टीएन शेषन बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बहुसदस्यीय चुनाव आयोग और CEC तथा अन्य चुनाव आयुक्तों के अधिकारों से जुड़े महत्वपूर्ण सवालों पर फैसला दिया।
यानी शेषन के दौर का मूल विवाद “वोट चोरी” नहीं बल्कि चुनाव आयोग की संवैधानिक शक्ति और उसके इस्तेमाल को लेकर था।
4. लिंगदोह और गुजरात चुनाव: चुनाव कब होंगे, यह भी बना विवाद
जेएम लिंगदोह : 14 जून 2001 से 7 फरवरी 2004
2002 में गुजरात विधानसभा चुनावों को लेकर चुनाव आयोग और तत्कालीन गुजरात सरकार के बीच बड़ा मतभेद हुआ।
राज्य सरकार जल्द चुनाव चाहती थी, जबकि आयोग ने परिस्थितियों का आकलन करते हुए तत्काल चुनाव कराने का फैसला नहीं किया। मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया।
यह विवाद इस बात का उदाहरण था कि चुनाव की तारीख तय करने की संवैधानिक शक्ति किस तरह राजनीतिक टकराव का विषय बन सकती है।
यहां भी आरोप “वोट चोरी” का नहीं था।
5. गोपालस्वामी बनाम चावला: आयोग के भीतर ही उठे सवाल
एन. गोपालस्वामी : 30 जून 2006 से 20 अप्रैल 2009
यह चुनाव आयोग के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण आंतरिक विवादों में से एक था।
तत्कालीन CEC एन. गोपालस्वामी ने 2009 में राष्ट्रपति को अपने साथी चुनाव आयुक्त नवीन चावला को हटाने की सिफारिश भेजी।
गोपालस्वामी की 93 पन्नों की रिपोर्ट में चावला पर राजनीतिक पक्षपात सहित कई आरोप लगाए गए थे। रिपोर्ट में आरोप था कि उनके आचरण से राजनीतिक निष्पक्षता को लेकर गंभीर सवाल पैदा होते हैं।
मामला सरकार तक पहुंचा
यह विवाद राष्ट्रपति और केंद्र सरकार तक पहुंचा, लेकिन सरकार ने गोपालस्वामी की सिफारिश स्वीकार नहीं की।
इसके बाद अप्रैल 2009 में नवीन चावला CEC बने।
यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां एक CEC ने अपने ही साथी चुनाव आयुक्त की निष्पक्षता पर सवाल उठाया था।
6. नवीन चावला: आरोपों के बीच CEC बने
नवीन चावला : 21 अप्रैल 2009 से 29 जुलाई 2010
चावला के खिलाफ राजनीतिक पक्षपात के आरोप उनके CEC बनने से पहले ही उठ चुके थे।
भाजपा और एनडीए के सांसदों ने उन्हें हटाने की मांग की थी। बाद में CEC गोपालस्वामी ने भी राष्ट्रपति को उनके खिलाफ सिफारिश भेजी।
लेकिन सरकार ने सिफारिश स्वीकार नहीं की और चावला CEC बने।
यह मामला दिखाता है कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर राजनीतिक विवाद नया नहीं है।
7. 2017 के बाद EVM ने बदल दिया चुनावी विवाद का केंद्र
नसीम जैदी : 19 अप्रैल 2015 से 5 जुलाई 2017
2017 के विधानसभा चुनावों के बाद EVM की विश्वसनीयता को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हुआ।
कुछ दलों ने EVM में छेड़छाड़ के आरोप लगाए और चुनाव आयोग से बैलेट पेपर की व्यवस्था पर लौटने की मांग की।
चुनाव आयोग ने EVM की सुरक्षा व्यवस्था और प्रक्रिया का बचाव किया।
यहां से चुनावी विवाद का एक नया विषय सामने आया—क्या मतदान मशीन पर भरोसा किया जा सकता है?
हालांकि EVM में छेड़छाड़ के राजनीतिक आरोपों को “वोट चोरी साबित” होने के रूप में पेश करना सही नहीं होगा।
8. एके ज्योति और ओपी रावत के दौर में भी EVM बहस जारी
एके ज्योति : जुलाई 2017–जनवरी 2018
ओपी रावत : जनवरी–दिसंबर 2018
इन कार्यकालों में भी EVM और VVPAT को लेकर राजनीतिक चर्चा जारी रही।
ओपी रावत के समय चुनावी अनियमितताओं की शिकायतों की निगरानी के लिए तकनीकी माध्यमों का इस्तेमाल भी बढ़ा। शिकायतों और कथित चुनावी कदाचार को लेकर आयोग के स्तर पर कार्रवाई की प्रक्रिया चलती रही।
लेकिन शिकायतों की संख्या को CEC द्वारा चुनाव में हेरफेर का प्रमाण मानना सही नहीं होगा।
9. सुनील अरोड़ा के समय आयोग के भीतर खुली असहमति
सुनील अरोड़ा : दिसंबर 2018 से अप्रैल 2021
2019 लोकसभा चुनाव के दौरान चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से जुड़े आचार संहिता मामलों में आयोग के बहुमत के फैसलों से असहमति जताई।
यह विवाद इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि सवाल बाहर से नहीं, आयोग के भीतर से उठे थे।
लवासा चाहते थे कि उनकी असहमति भी आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज हो। इस मुद्दे ने चुनाव आयोग की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया और पारदर्शिता पर बहस छेड़ी।
10. सुशील चंद्र के समय PMO बैठक पर सवाल
सुशील चंद्र : अप्रैल 2021 से मई 2022
2021 में चुनाव आयोग और सरकार के बीच बातचीत को लेकर भी बहस हुई।
PMO से जुड़े एक संवाद को लेकर पूर्व CEC समेत कुछ पूर्व चुनाव आयुक्तों ने आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता की धारणा पर चिंता जताई। हालांकि पूर्व CEC एन. गोपालस्वामी ने उस संवाद में समस्या नहीं मानी।
यह घटना बताती है कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता केवल चुनाव के दिन की प्रक्रिया से नहीं, बल्कि सरकार और आयोग के बीच संस्थागत दूरी से भी जुड़ी है।
11. राजीव कुमार के समय EVM से मतदाता सूची तक सवाल

राजीव कुमार : 15 मई 2022 से 18 फरवरी 2025
राजीव कुमार के कार्यकाल में 2024 लोकसभा चुनाव हुआ।
इस दौरान विपक्षी दलों ने EVM, VVPAT, मतदान प्रतिशत, मतदाता सूची और चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठाए।
चुनाव आयोग ने इन आरोपों का विरोध किया और चुनावी प्रक्रिया को निर्धारित नियमों के अनुरूप बताया।
इस दौर में एक बड़ा बदलाव यह रहा कि चुनावी विवाद अब केवल मतदान मशीन तक सीमित नहीं रहा। मतदाता सूची और मतदान प्रतिशत का डेटा भी राजनीतिक बहस का बड़ा हिस्सा बन गया।
12. ज्ञानेश कुमार के दौर में “वोट चोरी” सीधे राजनीतिक अभियान बना
ज्ञानेश कुमार : 19 फरवरी 2025 से वर्तमान
ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल में चुनाव आयोग को लेकर विवाद एक नए स्तर पर पहुंचा।
विपक्षी दलों ने मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं को “वोट चोरी” की संज्ञा दी। यह आरोप खास तौर पर मतदाता सूची में नाम जोड़ने-हटाने और Special Intensive Revision यानी SIR से जुड़ा।
सितंबर 2026 में द इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच में दावा किया गया कि चुनाव आयोग के दो आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर रिकॉर्ड में आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट में Form 6, मतदाताओं के नाम हटाने-पुनः जोड़ने और मतदाता डेटाबेस के केंद्रीकरण जैसे मुद्दों का उल्लेख किया गया।
13. चुनाव आयोग का जवाब भी उतना ही महत्वपूर्ण
इस पूरे विवाद में आयोग का पक्ष भी दर्ज करना जरूरी है।
23 सितंबर 2026 को चुनाव आयोग ने इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अलग-अलग राय और टिप्पणियां किसी भी संस्थान की निर्णय प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा हैं।
आयोग ने कहा कि पिछले एक साल में उसके फैसले पूरे आयोग के सर्वसम्मत निर्णय रहे हैं और केवल कुछ आंतरिक टिप्पणियों को सामने रखने से पूरी प्रक्रिया का एक ही पक्ष दिखाई देता है।
इसलिए 14 आपत्तियों की खबर को सीधे “चुनाव आयोग में टूट” या “वोट चोरी साबित” होने के रूप में पेश करना भी सावधानी के बिना सही नहीं होगा।
14. विरोध सड़क से संसद तक पहुंचा
सितंबर 2026 में विपक्षी दलों ने CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध तेज किया।
विपक्ष ने तीन प्रमुख मांगें रखीं—
- CEC ज्ञानेश कुमार को हटाया जाए।
- चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली की स्वतंत्र जांच हो।
- SIR प्रक्रिया पर रोक लगाने पर विचार किया जाए।
इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार 24 सितंबर 2026 को विपक्षी दलों ने संसद के दोनों सदनों में ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए नया प्रस्ताव लाने की तैयारी की बात कही।
AAP और वाम दलों ने भी “वोट चोरी” के आरोप दोहराए। ये राजनीतिक दलों के आरोप और मांगें हैं, न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्य नहीं।
15. सुप्रीम कोर्ट में भी पहुंचा विवाद
SIR और मतदाता सूची से जुड़े मामलों पर अदालतों में भी सुनवाई हुई है।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। किसी मामले का सुप्रीम कोर्ट में पहुंचना यह साबित नहीं करता कि चुनाव आयोग या CEC दोषी पाया गया है।
अदालत में पहुंचने का मतलब है कि किसी निर्णय, प्रक्रिया या अधिकार को न्यायिक जांच के सामने चुनौती दी गई है। अंतिम न्यायिक निष्कर्ष अलग विषय है।
16. ज्ञानेश कुमार से पहले भी CEC का हुआ विरोध
शेषन के खिलाफ राजनीतिक विरोध मुख्यतः उनकी शक्तियों और कार्यशैली को लेकर था।
लिंगदोह के समय गुजरात में चुनाव की तारीख को लेकर विवाद हुआ।
गोपालस्वामी-चावला प्रकरण में आयोग के भीतर राजनीतिक निष्पक्षता को लेकर गंभीर आरोप लगे।
2017 के बाद EVM चुनावी बहस का केंद्र बनी।
2019 में आयोग के भीतर ही असहमति सार्वजनिक हुई।
और अब ज्ञानेश कुमार के दौर में मतदाता सूची, SIR और “वोट चोरी” राजनीतिक विवाद का केंद्र हैं।
एक नजर में 26 CEC और प्रमुख विवाद
| CEC | प्रमुख सार्वजनिक विवाद/बहस |
|---|---|
| सुकुमार सेन | कोई बड़ा व्यक्तिगत विवाद दर्ज नहीं |
| केवीके सुंदरम | कोई बड़ा व्यक्तिगत विवाद दर्ज नहीं |
| एसपी सेन वर्मा | कोई बड़ा व्यक्तिगत विवाद दर्ज नहीं |
| नागेंद्र सिंह | कोई बड़ा व्यक्तिगत विवाद दर्ज नहीं |
| टी. स्वामीनाथन | आपातकाल का दौर, लेकिन व्यक्तिगत “वोट चोरी” विवाद नहीं |
| एसएल शकधर | कोई बड़ा व्यक्तिगत विवाद दर्ज नहीं |
| आरके त्रिवेदी | कोई बड़ा व्यक्तिगत विवाद दर्ज नहीं |
| आरवीएस पेरी शास्त्री | कोई बड़ा व्यक्तिगत विवाद दर्ज नहीं |
| वीएस रामादेवी | बहुत छोटा कार्यकाल, कोई प्रमुख विवाद नहीं |
| टीएन शेषन | आयोग की शक्ति और राजनीतिक टकराव |
| एमएस गिल | कोई बड़ा व्यक्तिगत विवाद नहीं |
| जेएम लिंगदोह | गुजरात चुनाव की तारीख पर विवाद |
| टीएस कृष्णमूर्ति | कोई बड़ा व्यक्तिगत विवाद नहीं |
| बीबी टंडन | चावला विवाद का दौर |
| एन. गोपालस्वामी | चावला को हटाने की सिफारिश |
| नवीन चावला | राजनीतिक पक्षपात के आरोप |
| एसवाई कुरैशी | कोई बड़ा व्यक्तिगत विवाद नहीं |
| वीएस संपत | कोई बड़ा व्यक्तिगत विवाद नहीं |
| एचएस ब्रह्मा | कोई बड़ा विवाद नहीं |
| नसीम जैदी | EVM विवाद |
| एके ज्योति | EVM/VVPAT बहस |
| ओपी रावत | चुनावी शिकायतें और EVM बहस |
| सुनील अरोड़ा | लवासा की असहमति |
| सुशील चंद्र | कोविड चुनाव और PMO संवाद विवाद |
| राजीव कुमार | EVM, VVPAT और मतदाता सूची पर सवाल |
| ज्ञानेश कुमार | SIR, मतदाता सूची और “वोट चोरी” के राजनीतिक आरोप |
CEC के नाम और कार्यकाल चुनाव आयोग के आधिकारिक रिकॉर्ड से लिए गए हैं।
आरोपों का इतिहास लंबा है, लेकिन “वोट चोरी” की परिभाषा नई राजनीतिक बहस है
1950 से 2026 तक चुनाव आयोग के इतिहास को देखें तो यह कहना सही नहीं होगा कि हर मुख्य चुनाव आयुक्त पर चुनाव में हेरफेर का आरोप लगा।
वास्तव में शुरुआती कई CEC बिना बड़े व्यक्तिगत विवाद के अपना कार्यकाल पूरा करते रहे। बाद में विवादों की प्रकृति बदलती गई—पहले आयोग की शक्तियां, फिर राजनीतिक निष्पक्षता, फिर EVM और अब मतदाता सूची तथा SIR।
ज्ञानेश कुमार के मामले में विवाद की खासियत यह है कि “वोट चोरी” अब विपक्षी राजनीतिक अभियान का प्रमुख शब्द बन चुका है और मामला CEC को हटाने की संसदीय मांग तक पहुंच गया है। सितंबर 2026 में दो चुनाव आयुक्तों की कथित असहमतियों की रिपोर्ट ने इस बहस को और तीखा किया है। वहीं चुनाव आयोग का कहना है कि उसके निर्णय पूर्ण आयोग के सर्वसम्मत फैसले हैं।
इसलिए इतिहास का तथ्यात्मक निष्कर्ष यह है कि चुनाव आयोग पर राजनीतिक दबाव और उसकी निष्पक्षता पर सवाल कोई नई घटना नहीं है; नया यह है कि आज विवाद का केंद्र मतदाता सूची और “वोट चोरी” जैसे आरोपों तक पहुंच गया है।



