शरद पवार से परवेश वर्मा तक: जब एक थप्पड़ ने छेड़ दी सियासी बहस
कभी महंगाई का गुस्सा, कभी चुनावी विवाद तो कभी सड़क निरीक्षण के दौरान टकराव... नेताओं पर हुए थप्पड़ों ने कई बार राजनीति को नई बहस दे दी

राजनीति में भाषण, नारे और आरोप-प्रत्यारोप आम बात हैं, लेकिन जब किसी नेता पर सार्वजनिक जगह पर हाथ उठता है तो मामला अचानक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन जाता है। भारत की राजनीति में पिछले डेढ़ दशक के दौरान कई ऐसी घटनाएं सामने आईं, जिनमें नेताओं को सार्वजनिक कार्यक्रम, चुनाव प्रचार या निरीक्षण के दौरान थप्पड़ मारा गया। कई मामलों में हमलावर ने अपनी नाराजगी को वजह बताया तो राजनीतिक दलों ने इसे सुरक्षा और लोकतांत्रिक मर्यादा से जोड़कर देखा।
दिलचस्प बात यह है कि इन घटनाओं में कुछ हमले चुनावी माहौल में हुए और कुछ गैर-चुनावी कार्यक्रमों में। कुछ मामलों में हमलावर ने पहले माला पहनाई और फिर हमला किया। यही वजह है कि सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठे।
1. 2011 में शरद पवार को पड़ा थप्पड़
24 नवंबर 2011 को तत्कालीन केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार को दिल्ली के एनडीएमसी सेंटर में एक कार्यक्रम से निकलते समय हरविंदर सिंह ने थप्पड़ मार दिया था। रिपोर्टों के मुताबिक हमलावर महंगाई और राजनीतिक व्यवस्था से नाराज था। घटना के बाद प्रधानमंत्री समेत कई नेताओं ने हमले की निंदा की।
यह घटना इसलिए भी चर्चा में रही क्योंकि हमलावर ने हमला करने के बाद राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ नारे लगाए थे। इसके बाद सार्वजनिक कार्यक्रमों में नेताओं की सुरक्षा पर सवाल उठे।
2. 2014 में चार दिन के भीतर दो बार निशाने पर आए केजरीवाल
अरविंद केजरीवाल के राजनीतिक जीवन में सार्वजनिक हमलों की घटनाएं कई बार सामने आईं। अप्रैल 2014 में लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान चार दिन के भीतर उन पर दो बार थप्पड़ मारे गए।
पहली घटना दक्षिणी दिल्ली के दक्षिणपुरी इलाके में हुई, जहां खुले वाहन में प्रचार कर रहे केजरीवाल पर एक व्यक्ति ने हमला किया।
इसके कुछ ही दिन बाद सुल्तानपुरी में रोड शो के दौरान एक ऑटो चालक ने पहले उन्हें माला पहनाई और फिर थप्पड़ मार दिया। इस हमले के बाद केजरीवाल की आंख के आसपास सूजन की खबर सामने आई थी। हमलावर ने ऑटो चालकों से किए गए वादे पूरे नहीं होने को लेकर नाराजगी जताई थी।
चार दिन में दो हमलों ने उस समय दिल्ली की राजनीति में सुरक्षा और राजनीतिक नाराजगी को लेकर खूब चर्चा पैदा की।
3. 2019 में फिर केजरीवाल पर हमला
मई 2019 में लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान एक रोड शो में अरविंद केजरीवाल को एक व्यक्ति ने थप्पड़ मार दिया। केजरीवाल खुले वाहन पर सवार थे और आरोपी वाहन पर चढ़कर उनके पास पहुंचा था।
पुलिस के अनुसार आरोपी ने राजनीतिक नेताओं के व्यवहार से असंतुष्ट होने की बात कही थी। बाद में उसने घटना पर अफसोस भी जताया।
इस घटना के बाद चुनावी सभाओं में नेताओं की सुरक्षा को लेकर फिर सवाल उठे। सोशल मीडिया पर भी घटना का वीडियो तेजी से फैला।
4. 2024 में कन्हैया कुमार पर हमला
लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान उत्तर-पूर्वी दिल्ली से कांग्रेस उम्मीदवार कन्हैया कुमार पर हमला हुआ। 17 मई 2024 को न्यू उस्मानपुर इलाके में एक व्यक्ति ने माला पहनाने के बहाने उनके पास पहुंचकर थप्पड़ मारा और उनके ऊपर स्याही भी फेंकी गई।
पुलिस के अनुसार घटना के संबंध में शिकायत मिली और कार्रवाई शुरू की गई। राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी सामने आए। कांग्रेस की ओर से हमले को लेकर राजनीतिक विरोधियों पर आरोप लगाए गए, जबकि भाजपा की ओर से इन आरोपों को खारिज किया गया।
इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया कि चुनावी प्रचार के दौरान नेताओं तक आम लोगों की पहुंच कितनी आसानी से हो जाती है।
5. कंगना रनौत थप्पड़ कांड ने देशभर में छेड़ी बहस
6 जून 2024 को चंडीगढ़ एयरपोर्ट पर भाजपा सांसद कंगना रनौत ने आरोप लगाया कि सीआईएसएफ की एक महिला कांस्टेबल ने उन्हें थप्पड़ मारा। घटना के बाद सुरक्षा व्यवस्था, किसान आंदोलन से जुड़े पुराने बयान और सुरक्षा बलों के आचरण को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आईं।
महिला कांस्टेबल ने कथित तौर पर किसान आंदोलन से जुड़े कंगना के पुराने बयान को लेकर नाराजगी जताई थी। घटना के बाद उनके खिलाफ जांच और कानूनी कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू हुई।
इस मामले ने खास तौर पर इसलिए व्यापक बहस पैदा की क्योंकि इसमें एक नवनिर्वाचित सांसद और सुरक्षा बल की महिला कर्मचारी दोनों पक्ष चर्चा के केंद्र में आ गए।
6. 2025 में स्वागत के दौरान स्वामी प्रसाद मौर्य को थप्पड़
अगस्त 2025 में उत्तर प्रदेश के रायबरेली में पूर्व मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य के स्वागत कार्यक्रम के दौरान एक व्यक्ति ने माला पहनाने के दौरान उनके सिर पर थप्पड़ मार दिया।
घटना के बाद वहां मौजूद समर्थकों ने आरोपी युवकों को पकड़ लिया और उनकी पिटाई की। पुलिस ने दोनों को भीड़ से छुड़ाया। पुलिस अधिकारी के अनुसार मौर्य को चोट नहीं आई थी।
इस घटना में भी वही तरीका दिखाई दिया जो कई दूसरे मामलों में सामने आया था—स्वागत के बहाने नेता के बेहद करीब पहुंचना और अचानक हमला करना।
7. 2026 में परवेश वर्मा और सड़क निरीक्षण का विवाद
सितंबर 2026 में दिल्ली के लोक निर्माण विभाग के मंत्री परवेश वर्मा से जुड़ा थप्पड़ विवाद सामने आया। पश्चिमी दिल्ली के तिलक नगर इलाके में सड़क निरीक्षण के दौरान एक युवक मंत्री का वीडियो बना रहा था। वायरल वीडियो में वर्मा युवक का मोबाइल नीचे करते और उसके बाद उसे थप्पड़ मारते दिखाई देते हैं।
वर्मा ने बाद में अपने पक्ष में कहा कि मौके पर मौजूद एक व्यक्ति ने उनके परिवार के बारे में अपशब्द कहे थे और गुस्से में उन्होंने प्रतिक्रिया दी। दूसरी ओर, आम आदमी पार्टी के नेताओं ने घटना को लेकर कार्रवाई की मांग की। दिल्ली पुलिस को दोनों पक्षों की शिकायतें मिलने की बात सामने आई और पुलिस ने घटनाक्रम की जांच शुरू की।
इस मामले ने दिल्ली में सड़क निर्माण और राजनीतिक टकराव के बीच सोशल मीडिया पर वीडियो रिकॉर्डिंग को लेकर भी नई बहस छेड़ दी।
8. थप्पड़ के साथ जूते-स्याही की घटनाएं भी कम नहीं
भारतीय राजनीति में सार्वजनिक नेताओं पर हमले केवल थप्पड़ तक सीमित नहीं रहे। कई नेताओं पर जूते, स्याही, अंडे या दूसरी चीजें फेंकने की घटनाएं भी सामने आई हैं।
2009 में तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम की प्रेस कॉन्फ्रेंस में पत्रकार जर्नैल सिंह ने उनकी ओर जूता फेंका था। इसके बाद राजनीतिक कार्यक्रमों में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर चर्चा तेज हुई।
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, राहुल गांधी, प्रकाश सिंह बादल और दूसरे नेताओं को भी अलग-अलग मौकों पर जूते फेंके जाने जैसी घटनाओं का सामना करना पड़ा। भारतीय राजनीति में इन घटनाओं को सार्वजनिक असहमति जताने के आक्रामक तरीकों के उदाहरण के तौर पर रिपोर्ट किया गया है।
आखिर क्यों बार-बार सामने आते हैं ऐसे मामले?
इन घटनाओं की वजह हर मामले में अलग रही। किसी हमलावर ने महंगाई को कारण बताया, किसी ने नेता के कथित वादों को लेकर नाराजगी जताई तो कुछ घटनाएं चुनावी या स्थानीय राजनीतिक विवाद के बीच हुईं।
लेकिन एक बात कई घटनाओं में समान दिखती है—हमलावर नेता के बेहद करीब पहुंचने में सफल रहा। माला पहनाने, अभिवादन करने या भीड़ में शामिल होने के दौरान सुरक्षा घेरा कई बार कमजोर पड़ता दिखाई दिया।
यही कारण है कि हर ऐसी घटना के बाद राजनीतिक बहस सिर्फ हमले तक सीमित नहीं रहती। सवाल उठता है कि जनप्रतिनिधियों और आम जनता के बीच संपर्क कितना खुला रहे और सुरक्षा व्यवस्था किस तरह संतुलित की जाए।
थप्पड़ से बड़ा हो जाता है राजनीतिक संदेश
किसी नेता पर सार्वजनिक हमला कुछ सेकंड की घटना होता है, लेकिन उसका राजनीतिक असर कई दिनों तक चल सकता है। घटना के बाद राजनीतिक दल अपने-अपने नजरिये से इसे पेश करते हैं। कोई इसे जनता के गुस्से का संकेत बताता है तो कोई लोकतांत्रिक मर्यादा पर हमला।
सोशल मीडिया ने इन घटनाओं का असर और बढ़ा दिया है। पहले ऐसी घटना की खबर अगले दिन अखबारों में आती थी, लेकिन अब वीडियो कुछ मिनटों में लाखों लोगों तक पहुंच जाता है। इससे राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी तेजी से सामने आती हैं।
माला से थप्पड़ तक… एक अजीब समानता
शरद पवार, केजरीवाल, कन्हैया कुमार और स्वामी प्रसाद मौर्य से जुड़े मामलों में एक दिलचस्प समानता दिखती है—हमलावरों में से कुछ नेता के पास सामान्य तरीके से पहुंचे थे। कहीं माला पहनाने का बहाना था तो कहीं रोड शो के दौरान भीड़ का हिस्सा बनकर नजदीक पहुंचना।
यही वजह है कि नेताओं की सुरक्षा में सिर्फ हथियार या बैरिकेड ही नहीं, बल्कि भीड़ के व्यवहार और व्यक्ति की गतिविधि पर नजर रखना भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
थप्पड़ कांडों की कहानी क्या बताती है?
भारत की लोकतांत्रिक राजनीति में विरोध के कई तरीके हैं—बहस, प्रदर्शन, नारे, चुनाव और सार्वजनिक सवाल। लेकिन जब विरोध शारीरिक हमले में बदल जाता है तो मामला राजनीतिक असहमति से आगे बढ़कर सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था का विषय बन जाता है।
2011 के शरद पवार मामले से लेकर 2026 के परवेश वर्मा विवाद तक की घटनाएं अलग-अलग परिस्थितियों में हुईं। इनमें हमलावरों के बताए कारण भी अलग रहे और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी। इसलिए इन सभी घटनाओं को एक ही कारण या एक ही राजनीतिक प्रवृत्ति से जोड़ना उचित नहीं होगा।
फिर भी, इन घटनाओं ने बार-बार एक सवाल जरूर खड़ा किया है—राजनेताओं और जनता के बीच खुला संपर्क लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन उस संपर्क में सुरक्षा और सार्वजनिक मर्यादा की सीमा कहां तय हो?
यही सवाल हर नए ‘थप्पड़ कांड’ के बाद फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आ जाता है।



