नदी के बीच बसे मंदिर: जहां चारों तरफ बहती है नदी और बीच में विराजते हैं भगवान
द्वीप पर बसे मंदिरों तक पहुंचना भी किसी रोमांच से कम नहीं

भारत में मंदिर केवल पहाड़ों, जंगलों और शहरों में ही नहीं हैं। देश में कई ऐसे प्राचीन मंदिर भी हैं, जो नदी के बीच बने द्वीपों या नदी से घिरे भू-भाग पर स्थित हैं। इन मंदिरों तक पहुंचने के लिए कहीं नाव का सहारा लेना पड़ता है तो कहीं नदी की धाराओं के बीच बने पुल से जाना होता है। इनकी धार्मिक मान्यताओं के साथ इनका भूगोल और इतिहास भी बेहद दिलचस्प है।
इनमें असम का उमानंद मंदिर, कर्नाटक का श्रीरंगनाथस्वामी मंदिर और ओडिशा का लंकेश्वरी मंदिर खास तौर पर उल्लेखनीय हैं। कुछ मंदिरों से जुड़ी कथाएं धार्मिक परंपराओं का हिस्सा हैं, जबकि उनका नदी के बीच होना भौगोलिक तथ्य है।
ब्रह्मपुत्र के बीच उमानंद मंदिर
असम के गुवाहाटी में ब्रह्मपुत्र नदी के बीच स्थित उमानंद द्वीप पर भगवान शिव का प्रसिद्ध उमानंद मंदिर है। असम पर्यटन विभाग के अनुसार यह नदी के बीच स्थित एक छोटा नदी-द्वीप है और यहां मंदिर तक पहुंचने के लिए नाव या फेरी का सहारा लिया जाता है।
मंदिर से जुड़ी धार्मिक कथा भगवान शिव और कामदेव से संबंधित है। मान्यता है कि शिव की तपस्या भंग करने के प्रयास में कामदेव उनके क्रोध का शिकार हुए और भस्म हो गए। इसी वजह से इस स्थान को धार्मिक रूप से विशेष महत्व मिला।
उमानंद मंदिर को अहोम काल से भी जोड़ा जाता है। असम पर्यटन के अनुसार मंदिर का निर्माण अहोम राजा गदाधर के समय हुआ था। शिवरात्रि के दौरान यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
कावेरी के द्वीप पर रंगनाथस्वामी मंदिर
कर्नाटक का श्रीरंगपट्टनम खुद कावेरी नदी से बने द्वीप पर स्थित है। इसी द्वीप पर भगवान विष्णु को समर्पित श्री रंगनाथस्वामी मंदिर है। कर्नाटक पर्यटन के अनुसार मंदिर को दक्षिण भारत के प्रमुख वैष्णव तीर्थों में गिना जाता है और यह पंचरंग क्षेत्र के मंदिरों में शामिल है।
गर्भगृह में भगवान विष्णु को शेषनाग की शैया पर लेटी हुई मुद्रा में दर्शाया गया है। मंदिर की वास्तुकला भी इसकी बड़ी पहचान है।
यहां नदी केवल मंदिर की पृष्ठभूमि नहीं है, बल्कि पूरे श्रीरंगपट्टनम के भूगोल का हिस्सा है। कावेरी की धाराओं ने इस स्थान को प्राकृतिक द्वीप का स्वरूप दिया है।
महानदी के बीच लंकेश्वरी मंदिर
ओडिशा के सोनपुर क्षेत्र में स्थित लंकेश्वरी मंदिर भी नदी और आस्था के अनोखे मेल के लिए जाना जाता है। ओडिशा पर्यटन की धार्मिक स्थलों की सूची में लंकेश्वरी मंदिर को प्रमुख धार्मिक स्थल के रूप में शामिल किया गया है।
इस मंदिर की खासियत इसका नदी क्षेत्र से जुड़ा भौगोलिक स्थान है। बरसात और नदी का जलस्तर बढ़ने के दौरान आसपास का दृश्य पूरी तरह बदल जाता है। यही वजह है कि मंदिर की यात्रा सामान्य मंदिरों से अलग अनुभव देती है।
नदी और मंदिर का रिश्ता
भारतीय धार्मिक परंपरा में नदियों को पवित्र माना गया है। गंगा, यमुना, नर्मदा, गोदावरी, कावेरी और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों के किनारे हजारों धार्मिक स्थल विकसित हुए।
नदी के बीच स्थित मंदिर इस परंपरा का अलग रूप दिखाते हैं। यहां नदी मंदिर को चारों तरफ से घेरती है, जिससे धार्मिक स्थल का प्राकृतिक परिवेश और भी विशिष्ट दिखाई देता है।
उमानंद में नाव से शुरू होती है तीर्थ यात्रा
उमानंद मंदिर की यात्रा अपने आप में अलग अनुभव है। श्रद्धालु पहले ब्रह्मपुत्र के किनारे पहुंचते हैं और फिर नाव से नदी पार करके द्वीप तक जाते हैं। असम पर्यटन भी मंदिर तक पहुंचने के लिए फेरी सेवा का उल्लेख करता है।
नदी के बीच से दिखाई देता मंदिर और उसके पीछे फैला गुवाहाटी का दृश्य इस यात्रा को सामान्य मंदिर दर्शन से अलग बनाता है।
श्रीरंगपट्टनम में नदी ने रचा धार्मिक भूगोल
श्रीरंगपट्टनम की पहचान ही नदी-द्वीप से जुड़ी है। कावेरी की धाराओं से घिरे इस क्षेत्र में मंदिर, किला और ऐतिहासिक स्मारक एक साथ दिखाई देते हैं। कर्नाटक पर्यटन इसे कावेरी से बने द्वीप पर स्थित ऐतिहासिक नगर बताता है।
यानी यहां मंदिर को नदी से अलग करके देखना मुश्किल है। नदी ही इस पूरे क्षेत्र के प्राकृतिक स्वरूप का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
धार्मिक कथा और भौगोलिक तथ्य में अंतर
इन मंदिरों से जुड़ी कई कथाएं पीढ़ियों से सुनाई जाती रही हैं। उदाहरण के लिए उमानंद मंदिर में शिव और कामदेव से जुड़ी कथा धार्मिक मान्यता का हिस्सा है। वहीं मंदिर का ब्रह्मपुत्र के बीच द्वीप पर स्थित होना एक भौगोलिक तथ्य है।
इसलिए ऐसे विषयों पर लिखते समय मान्यता और प्रमाणित तथ्य को अलग-अलग रखना जरूरी है।
नदी के साथ बदलता है मंदिर का दृश्य
नदी के बीच या नदी-द्वीप पर स्थित मंदिरों का वातावरण मौसम के साथ बदलता रहता है। मानसून में नदी का जलस्तर बढ़ने पर द्वीपों और आसपास के रास्तों का स्वरूप बदल सकता है।
कावेरी से घिरे श्रीरंगपट्टनम में भी मानसून के दौरान नदी अपने अधिक प्रभावशाली रूप में दिखाई देती है।
यही प्राकृतिक बदलाव इन मंदिरों को साल के अलग-अलग समय में अलग रूप देता है।
नदी-द्वीपों पर सिर्फ मंदिर ही नहीं
असम का उदाहरण बताता है कि नदी-द्वीप धार्मिक और सांस्कृतिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण हो सकते हैं। ब्रह्मपुत्र का माजुली द्वीप भी असम की नव-वैष्णव संस्कृति और सत्र परंपरा का प्रमुख केंद्र रहा है। असम पर्यटन के अनुसार माजुली पिछले करीब पांच सौ वर्षों से असमिया संस्कृति और सत्र परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।
इससे पता चलता है कि नदी के बीच बनी जमीनें केवल भौगोलिक संरचनाएं नहीं रहीं, बल्कि समय के साथ धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र भी बनीं।
इन मंदिरों की सबसे बड़ी खासियत क्या है?
इन मंदिरों की खासियत किसी एक रहस्य में नहीं, बल्कि प्रकृति, इतिहास और आस्था के एक साथ दिखाई देने में है।
कहीं ब्रह्मपुत्र के बीच शिव मंदिर है, कहीं कावेरी के द्वीप पर विष्णु का धाम और कहीं महानदी के नदी क्षेत्र में देवी का मंदिर। इन जगहों पर पहुंचने की यात्रा भी मंदिर की कहानी का हिस्सा बन जाती है।
नदी के बीच आस्था के ये केंद्र क्यों खास हैं?
भारत के इन मंदिरों को देखने पर समझ आता है कि प्राचीन समय में धार्मिक स्थल और प्राकृतिक परिवेश एक-दूसरे से कितने करीब थे। नदी ने जहां इन स्थानों को अलग भौगोलिक पहचान दी, वहीं धार्मिक परंपराओं ने उन्हें सांस्कृतिक महत्व दिया।
उमानंद, श्रीरंगपट्टनम और लंकेश्वरी जैसे मंदिर इस बात के उदाहरण हैं कि भारत में आस्था केवल मंदिर की दीवारों तक सीमित नहीं है। कई बार पूरा नदी-द्वीप ही मंदिर की कहानी का हिस्सा बन जाता है।



