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भारत के अनोखे दुर्गा पूजा पंडाल: कहीं हवा महल तो कहीं रामायण, कहीं अखबार तो कहीं परी लोक

दुर्गा पूजा में पंडाल अब केवल पूजा का स्थान नहीं, बल्कि कला, स्थापत्य, लोकसंस्कृति और कल्पना की ऐसी दुनिया बन चुके हैं जहां हर साल बदलती है एक नई कहानी

शारदीय नवरात्र करीब आते ही देश में दुर्गा पूजा की तैयारियां तेज हो गई हैं। खासकर पश्चिम बंगाल, झारखंड, ओडिशा, वाराणसी और दिल्ली में पंडालों का निर्माण जोर पकड़ चुका है। बांस, कपड़े, लकड़ी, मिट्टी, प्लाइवुड और पर्यावरण अनुकूल सामग्री से कलाकार ऐसी अस्थायी संरचनाएं तैयार कर रहे हैं, जिन्हें देखकर कई बार यह समझना मुश्किल हो जाता है कि सामने कोई पंडाल है या किसी ऐतिहासिक इमारत की प्रतिकृति।

दुर्गा पूजा की सबसे बड़ी खूबी यही है कि हर साल पंडाल एक नई कहानी लेकर आते हैं। कहीं राजस्थान का किला दिखाई देता है तो कहीं किसी प्रसिद्ध मंदिर की वास्तुकला। कोई पंडाल किसी नदी, लोककला या सामाजिक विषय पर आधारित होता है तो कोई फिल्म, साहित्य और इतिहास को अपनी थीम बना लेता है।

2026 में कोलकाता के कई बड़े पंडालों ने अपनी थीम सार्वजनिक कर दी है। स्रीभूमि स्पोर्टिंग क्लब हवा महल की प्रतिकृति तैयार कर रहा है, संतोष मित्र स्क्वायर ‘वंदे मातरम्’ को विषय बना रहा है और समाज सेबी संघ महानायक उत्तम कुमार को अपनी थीम में जगह दे रहा है।

आइए जानते हैं भारत के ऐसे चर्चित पंडालों के बारे में, जिनकी अपनी अलग पहचान है।

स्रीभूमि स्पोर्टिंग क्लब, कोलकाता: इस बार दिखेगा जयपुर का हवा महल

कोलकाता का स्रीभूमि स्पोर्टिंग क्लब थीम आधारित भव्य पंडालों के लिए देशभर में चर्चित है। यहां हर साल पंडाल का आकार और डिजाइन लोगों के आकर्षण का केंद्र बनता है।

2026 में यहां जयपुर के हवा महल की प्रतिकृति तैयार की जा रही है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार पंडाल के अग्रभाग में हवा महल की तरह 953 खिड़कियों वाला डिजाइन तैयार किया जा रहा है। लाल और गुलाबी रंग की वास्तुकला इसे राजस्थान के प्रसिद्ध स्मारक जैसा रूप देगी।

हवा महल की वास्तुकला को दुर्गा पूजा के माहौल से जोड़ना अपने आप में दिलचस्प प्रयोग है। यानी इस बार कोलकाता पहुंचने वाले श्रद्धालुओं को बंगाल में राजस्थान की स्थापत्य कला की झलक मिलेगी।


संतोष मित्र स्क्वायर: ‘वंदे मातरम्’ की कहानी

कोलकाता का संतोष मित्र स्क्वायर हर साल अपनी भव्य थीम के कारण सुर्खियों में रहता है।

2026 में इसकी थीम ‘Sanatani Chetanay Vande Mataram’ रखी गई है। यह थीम बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के गीत ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे होने के संदर्भ से जुड़ी है। पंडाल में प्रकाश, ध्वनि और विभिन्न कलात्मक इंस्टॉलेशन के जरिए इसकी कहानी प्रस्तुत करने की योजना है।

इस पंडाल की खासियत यह है कि यहां पंडाल को केवल बाहरी सजावट नहीं माना जाता। अंदर जाने पर दर्शक को थीम की पूरी कहानी अनुभव कराने की कोशिश की जाती है।


समाज सेबी संघ: 208 फिल्मों वाले उत्तम कुमार

इस बार कोलकाता के समाज सेबी संघ का पंडाल सिनेमा प्रेमियों को आकर्षित कर सकता है।

2026 की थीम महानायक उत्तम कुमार पर आधारित है। उनकी जन्मशती के अवसर पर पंडाल में उनकी 208 फिल्मों के पोस्टरों को कोलाज के रूप में प्रस्तुत करने की योजना है। इसके साथ संगीत और दृश्य प्रस्तुति के माध्यम से उनके फिल्मी सफर को सामने लाने की तैयारी है।

दुर्गा पूजा पंडाल में बंगाली सिनेमा के इतने बड़े कलाकार की पूरी फिल्मी यात्रा को समेटना इसे धार्मिक आयोजन के साथ-साथ सांस्कृतिक स्मृति का केंद्र भी बनाता है।


अलीपुर सर्वजनिन: पंडाल में दिखाई देगी पूरी रामायण

कोलकाता के अलीपुर सर्वजनिन की 2026 की थीम ‘रामायण: एन एपिक वुवन इन टाइम’ है।

इसमें राम के वनवास से लेकर सीता हरण, युद्ध और राम द्वारा देवी दुर्गा की पूजा से जुड़े प्रसंगों को पंडाल की कलात्मक संरचना में पिरोने की योजना है।

इस पंडाल की खासियत यह है कि यहां दुर्गा पूजा और रामायण की कथा को एक ही दृश्य संसार में जोड़ा जा रहा है। दर्शक के लिए यह एक धार्मिक कथा के भीतर दूसरी कथा को देखने जैसा अनुभव होगा।


एकडालिया एवरग्रीन: इस बार सोमनाथ मंदिर की झलक

दक्षिण कोलकाता का एकडालिया एवरग्रीन लंबे समय से भव्य पंडालों के लिए जाना जाता है।

2026 में यहां सोमनाथ मंदिर से प्रेरित पंडाल बनाया जा रहा है। पंडाल की वास्तुकला में मंदिर शैली को प्रमुखता देने की तैयारी है।

इस तरह बंगाल की दुर्गा पूजा में गुजरात के प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग मंदिर की वास्तुकला दिखाई देगी। यह उन पंडालों का उदाहरण है जो भारत के अलग-अलग हिस्सों की सांस्कृतिक विरासत को एक अस्थायी संरचना में सामने लाते हैं।


कुम्हारटोली पार्क: मूर्तिकारों की धरती पर गंगा की कहानी

कोलकाता का कुम्हारटोली वैसे ही दुर्गा प्रतिमाओं के लिए प्रसिद्ध है। देश-विदेश तक जाने वाली हजारों प्रतिमाओं का निर्माण यहां के कलाकार करते हैं।

2026 में कुम्हारटोली पार्क की थीम ‘ओ गंगा तुमी बोइछो केनो’ यानी गंगा नदी को केंद्र में रखती है।

इस थीम का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि पंडाल उसी इलाके में बन रहा है जहां पीढ़ियों से मिट्टी की प्रतिमाएं तैयार होती हैं। यानी मूर्ति कला की बस्ती में नदी और मिट्टी की कहानी एक साथ दिखाई देगी।


सूरूचि संघ: हर साल भारत की लोकसंस्कृति का नया रंग

न्यू अलीपुर का सूरूचि संघ अपने पंडालों में देश के अलग-अलग हिस्सों की लोककला और संस्कृति को जगह देने के लिए जाना जाता है।

2026 की थीम ‘उत्सो’ बताई गई है। पंडाल की अवधारणा और कलात्मक प्रस्तुति को लेकर यहां हर साल दर्शकों में विशेष उत्सुकता रहती है।

सूरूचि संघ की खासियत यह है कि यहां पंडाल को केवल भव्य बनाने के बजाय लोककला, शिल्प और क्षेत्रीय संस्कृति को डिजाइन का हिस्सा बनाने की कोशिश की जाती है।


बागबाजार सर्वजनिन: जब कोई थीम ही नहीं होती

दुर्गा पूजा की दुनिया में यह पंडाल एक अलग कारण से खास है।

कोलकाता का बागबाजार सर्वजनिन आधुनिक थीम की दौड़ से दूर अपनी पारंपरिक शैली को बनाए रखने के लिए प्रसिद्ध है। यहां एकचाला प्रतिमा यानी देवी और उनके चारों ओर मौजूद पारंपरिक प्रतिमाओं को एक ही संरचना में रखने की शैली देखने को मिलती है।

2026 में भी यहां का आकर्षण आधुनिक थीम नहीं बल्कि पारंपरिक पूजा और प्रतिमा शैली है।

यही विरोधाभास इसे दूसरे पंडालों से अलग बनाता है। जहां दूसरे पंडाल हर साल नई कहानी खोजते हैं, वहीं बागबाजार अपनी पुरानी पहचान को ही सबसे बड़ी खासियत मानता है।


कॉलेज स्क्वायर: पानी में दिखाई देता पंडाल

कोलकाता के कॉलेज स्क्वायर की सबसे बड़ी खूबसूरती इसकी झील के किनारे मौजूदगी है।

रात में जब पंडाल और आसपास की रोशनी झील में प्रतिबिंबित होती है तो एक ही पंडाल पानी में दोहरा दिखाई देता है। यही दृश्य इसे फोटोग्राफरों और पर्यटकों के बीच बेहद लोकप्रिय बनाता है।

यहां की पूजा की शुरुआत 1948 से जुड़ी है। इसलिए कॉलेज स्क्वायर में आधुनिक रोशनी और पुरानी पूजा परंपरा का अनोखा मेल देखने को मिलता है।

2026 के लिए यहां अंतिम थीम को लेकर अलग-अलग जानकारी सामने आ रही है, इसलिए फिलहाल इसकी पहचान रोशनी और पानी में पड़ने वाले प्रतिबिंब के रूप में करना ज्यादा सुरक्षित है।


चेतला अग्रणी: थीम को कहानी में बदलने की कला

दक्षिण कोलकाता का चेतला अग्रणी उन पंडालों में शामिल है जहां डिजाइन को केवल सजावट नहीं माना जाता।

यहां कलाकार पंडाल की संरचना, मूर्ति, रोशनी और आसपास के दृश्य को एक ही विचार से जोड़ते हैं। 2026 की अंतिम थीम सार्वजनिक रूप से स्पष्ट होने से पहले इसके बारे में अनुमान लगाना उचित नहीं होगा, लेकिन यह लंबे समय से कोलकाता की चर्चित थीम पूजाओं में शामिल रहा है।

यही वजह है कि यहां पहुंचने वाला दर्शक केवल देवी की प्रतिमा नहीं देखता, बल्कि पंडाल की पूरी कलात्मक संरचना को समझने की कोशिश करता है।


चंदननगर की रोशनी से जुड़ी दिल्ली की सीआर पार्क पूजा

कोलकाता के बाहर दिल्ली का चित्तरंजन पार्क यानी सीआर पार्क दुर्गा पूजा का बड़ा केंद्र है। यहां एक ही इलाके में कई बड़े पंडाल लगाए जाते हैं।

सीआर पार्क की खासियत केवल मूर्तियां नहीं बल्कि बंगाली संस्कृति, ढाक, सांस्कृतिक कार्यक्रम, भोजन और थीम पंडालों का पूरा माहौल है। यहां के कुछ पंडालों में चंदननगर शैली की सजावटी रोशनी भी खास आकर्षण रही है।

2025 में सीआर पार्क के तीन प्रमुख पंडालों—मेला ग्राउंड, कोऑपरेटिव ग्राउंड और बी-ब्लॉक—ने अपनी स्वर्ण जयंती मनाई थी।

2026 में भी सीआर पार्क में 10 से अधिक पंडालों का बड़ा पूजा सर्किट तैयार है।


रांची का चुटिया नव युवक संघ: परी लोक की सुनहरी दुनिया

झारखंड की राजधानी रांची में भी थीम आधारित दुर्गा पूजा का आकर्षण तेजी से बढ़ा है।

2026 में चुटिया नव युवक संघ ‘परी लोक’ की थीम पर पंडाल तैयार कर रहा है। लगभग 40 फीट ऊंचे पंडाल में पुराने समय की कल्पनात्मक दुनिया को दिखाने की तैयारी है। पालकी, बैलगाड़ी और हाथी जैसे मॉडल भी सजावट का हिस्सा होंगे।

यह पंडाल बच्चों के साथ-साथ परिवारों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बन सकता है, क्योंकि इसकी कल्पना किसी कहानी की परी दुनिया जैसी रखी गई है।


रांची का भारतीय नव युवक संघ: मंदिर जैसा पंडाल

रांची के अपर बाजार में भारतीय नव युवक संघ का पंडाल भी इस बार खास चर्चा में है।

करीब 40 कारीगर पश्चिम बंगाल के पुरुलिया से पहुंचकर निर्माण कार्य में लगे हैं। 2026 में यहां एक बड़े मंदिर की प्रतिकृति तैयार की जा रही है।

इससे यह भी पता चलता है कि दुर्गा पूजा पंडाल केवल स्थानीय कलाकारों का काम नहीं रह गए हैं। बंगाल और झारखंड के बीच कलाकारों का एक सांस्कृतिक नेटवर्क भी विकसित हो चुका है।


रांची का चंद्रशेखर आजाद पूजा पंडाल: द्वारका नगरी का रूप

अल्बर्ट एक्का चौक के पास चंद्रशेखर आजाद पूजा पंडाल में 2026 की थीम द्वारका नगरी रखी गई है।

पंडाल निर्माण में पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर से आए करीब 60 कारीगर काम कर रहे हैं। निर्माण की अनुमानित लागत कम से कम पांच लाख रुपये बताई गई है।

दुर्गा पूजा के पंडाल में भगवान कृष्ण की द्वारका नगरी को प्रस्तुत करना भी भारतीय धार्मिक कथाओं और स्थापत्य कल्पना को जोड़ने का उदाहरण है।


मुंबई का बॉम्बे दुर्गाबाड़ी: भव्यता से ज्यादा परंपरा

मुंबई में दुर्गा पूजा का रूप कोलकाता से अलग दिखाई देता है। यहां देश के अलग-अलग हिस्सों से आए बंगाली परिवारों और समुदायों ने अपनी पूजा परंपराओं को जीवित रखा है।

बॉम्बे दुर्गाबाड़ी समिति अपनी शांत, पारंपरिक और धार्मिक वातावरण वाली पूजा के लिए जानी जाती है। इसे भारत के चर्चित दुर्गा पूजा स्थलों की सूची में भी शामिल किया जाता है।

मुंबई का यह उदाहरण बताता है कि दुर्गा पूजा की पहचान केवल विशाल पंडालों और ऊंची संरचनाओं में नहीं है। कहीं इसका आकर्षण सादगी, पारिवारिक परंपरा और धार्मिक वातावरण भी होता है।


एक पंडाल बनाने में लगते हैं कई महीने

दुर्गा पूजा के पंडाल को देखकर भले ही वह कुछ दिनों का अस्थायी ढांचा लगे, लेकिन इसके पीछे महीनों की मेहनत होती है।

डिजाइन तैयार करने से लेकर बांस का ढांचा खड़ा करने, मिट्टी और कपड़े से आकार देने, पेंटिंग, विद्युत सजावट और अंतिम फिनिशिंग तक कई स्तरों पर कलाकार काम करते हैं।

रांची में इस साल पश्चिम बंगाल के पुरुलिया और मेदिनीपुर से आए दर्जनों कलाकार पंडाल निर्माण में लगे हैं। कलाकार कई सप्ताह तक पूजा स्थल पर ही रहकर दिन-रात काम कर रहे हैं।

कोलकाता में भी पंडाल निर्माण की कला अपने आप में एक बड़ा शिल्प उद्योग बन चुकी है।


2026 में पंडालों की थीम क्यों बन रही हैं खास

इस साल की थीमों पर नजर डालें तो एक दिलचस्प बदलाव दिखाई देता है।

हवा महल, सोमनाथ मंदिर और द्वारका नगरी जैसे विषय भारतीय स्थापत्य और धार्मिक विरासत की ओर लौटते हैं। वहीं उत्तम कुमार, गंगा, रामायण और वंदे मातरम् जैसे विषय इतिहास, संस्कृति और सामूहिक स्मृति को सामने लाते हैं।

दूसरी तरफ रांची का परी लोक जैसा पंडाल कल्पना की दुनिया तैयार कर रहा है।

यानी 2026 के पंडालों में एक साथ इतिहास, धर्म, सिनेमा, साहित्य, स्थापत्य, लोककला और कल्पना दिखाई दे रही है।


पंडाल अब बन चुके हैं पर्यटन का हिस्सा

दुर्गा पूजा के दौरान कोलकाता आने वाले लोगों के लिए पंडाल देखना अपने आप में एक यात्रा बन गया है। इसे आम तौर पर पंडाल हॉपिंग कहा जाता है।

लोग एक रात में कई पंडाल देखने की योजना बनाते हैं। उत्तर कोलकाता में बागबाजार और कुम्हारटोली से लेकर मध्य कोलकाता के कॉलेज स्क्वायर और संतोष मित्र स्क्वायर तक तथा दक्षिण कोलकाता में एकडालिया, सूरूचि संघ और चेतला अग्रणी तक अलग-अलग सर्किट बनाए जाते हैं।

दिल्ली के सीआर पार्क में भी इसी तरह कई पंडाल एक-दूसरे के नजदीक होने के कारण पूरा इलाका दुर्गा पूजा के दौरान एक बड़े सांस्कृतिक परिसर में बदल जाता है।


काशी के पंडाल भी नहीं पीछे: अंकोरवाट से केदारनाथ तक दिखेगा भव्य संसार

हथुआ मार्केट, चेतगंज—अंकोरवाट मंदिर जैसा पंडाल
Hathua Market, Near Arya Mahila College स्थित प्रीमियर ब्वॉयज क्लब इस बार कंबोडिया के अंकोरवाट मंदिर की अनुकृति बना रहा है। पंडाल करीब 60 फीट ऊंचा और 55 फीट चौड़ा होगा तथा इसमें तीन शिखर होंगे। प्रवेश द्वार पर छह-छह फीट के दो शेर बनाए जाएंगे। पंडाल में लाइट एंड साउंड शो भी आकर्षण रहेगा। खास बात यह है कि करीब 30 साल बाद यहां इलेक्ट्रॉनिक प्रतिमा की जगह फिर से पारंपरिक ओरिएंटल शैली की दुर्गा प्रतिमा स्थापित की जाएगी।

अर्दली बाजार—केदारनाथ धाम की थीम
Durga Puja Pandal Park के आसपास के क्षेत्र में न्यू डी-लाइट क्लब की ओर से केदारनाथ धाम की थीम पर पंडाल तैयार किया जा रहा है। खास बात यह होगी कि प्रवेश करते समय श्रद्धालु मां दुर्गा के दर्शन करेंगे और वापसी मार्ग में बाबा भोलेनाथ के दर्शन होंगे। सुरक्षा के लिए करीब एक दर्जन सीसीटीवी कैमरे लगाए जा रहे हैं।

पांडेयपुर—आदियोगी की थीम
काशी शारदीय उत्सव समिति इस बार आदियोगी की थीम पर पंडाल तैयार कर रही है। मुख्य द्वार पर करीब 30 फीट ऊंची आदियोगी शिव की प्रतिमा होगी, जबकि भीतर महिषासुर का वध करते हुए करीब 15 फीट ऊंची दुर्गा प्रतिमा स्थापित की जाएगी। पंडाल करीब 40 फीट ऊंचा होगा।

शिवपुर मिनी स्टेडियम—केदारनाथ शैली
शिवपुर के मिनी स्टेडियम में भी इस बार केदारनाथ मंदिर की तर्ज पर पंडाल तैयार किया जा रहा है। इससे वाराणसी में इस वर्ष मंदिर आधारित थीमों की खास मौजूदगी दिखाई दे रही है।

यही दुर्गा पूजा पंडालों की सबसे बड़ी खूबी है—ये अस्थायी होते हैं, लेकिन इनकी कला और यादें लंबे समय तक बनी रहती हैं।

मिट्टी की प्रतिमा से लेकर डिजिटल कला तक

दुर्गा पूजा के पंडालों में समय के साथ काफी बदलाव आया है। पहले बांस, कपड़े, मिट्टी और पारंपरिक सजावट प्रमुख हुआ करती थी। अब कलाकार इनके साथ धातु, फाइबर, रिसाइकिल सामग्री, प्रकाश तकनीक और डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल भी कर रहे हैं।

लेकिन इस बदलाव के बावजूद कई समितियां पारंपरिक प्रतिमा और पूजा पद्धति को बनाए रखती हैं।

यही कारण है कि एक ही शहर में एक तरफ अत्याधुनिक थीम पंडाल दिखाई देता है तो कुछ दूरी पर सदियों पुरानी शैली में देवी की प्रतिमा स्थापित होती है।

एक नजर में अनोखे पंडाल

क्रमपंडालस्थानखास आकर्षण/2026 थीम
1स्रीभूमि स्पोर्टिंग क्लबकोलकाताहवा महल
2संतोष मित्र स्क्वायरकोलकातावंदे मातरम्
3समाज सेबी संघकोलकाताउत्तम कुमार की 208 फिल्मों का कोलाज
4अलीपुर सर्वजनिनकोलकातारामायण
5एकडालिया एवरग्रीनकोलकातासोमनाथ मंदिर
6कुम्हारटोली पार्ककोलकातागंगा
7सूरूचि संघकोलकाता‘उत्सो’
8बागबाजार सर्वजनिनकोलकातापारंपरिक एकचाला शैली
9कॉलेज स्क्वायरकोलकाताझील में रोशनी का प्रतिबिंब
10चेतला अग्रणीकोलकाताचर्चित थीम पूजा
11सीआर पार्कदिल्लीअनेक बड़े थीम पंडाल
12चुटिया नव युवक संघरांचीपरी लोक
13भारतीय नव युवक संघरांचीमंदिर की प्रतिकृति
14चंद्रशेखर आजाद पूजारांचीद्वारका नगरी
15बॉम्बे दुर्गाबाड़ीमुंबईपारंपरिक पूजा और शांत वातावरण

नोट: 2026 के कई पंडालों का निर्माण अभी जारी है और कुछ समितियों ने अंतिम डिजाइन या पूरी सजावट सार्वजनिक नहीं की है। इसलिए जहां अंतिम थीम घोषित नहीं हुई है, वहां उसे घोषित थीम के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है।

जमुना दयाल

जमुना दयाल वाराणसी के निवासी हैं और उन्हें हिंदी समाचार मीडिया में 10 से अधिक वर्षों का गहन रिपोर्टिंग अनुभव है। उन्होंने अमर उजाला और दैनिक जागरण जैसे देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में जिला रिपोर्टर के रूप में कार्य करते हुए खेल, शिक्षा, राजनीति, कृषि तथा सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता से कवर किया है। शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से जनसंचार में परास्नातक (MJMC) की डिग्री प्राप्त की है और यूजीसी नेट (UGC NET) परीक्षा उत्तीर्ण की है।

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