उम्र की दीवार तोड़कर मंजिल तक पहुंचे ये भारतीय: 59 में शिक्षक, 71 में CA और 89 में मैराथन
किसी ने 27 साल तक सरकारी नौकरी का सपना नहीं छोड़ा, किसी ने रिटायरमेंट के बाद किताबें उठाईं तो किसी ने 89 की उम्र में दौड़ना शुरू किया
समाज अक्सर जिंदगी के लिए एक तय समय मान लेता है। पढ़ाई की उम्र अलग, नौकरी की उम्र अलग और रिटायरमेंट के बाद आराम की उम्र अलग। लेकिन भारत में ऐसे कई लोग हुए हैं, जिन्होंने इस सोच को अपनी जिंदगी से चुनौती दी। किसी ने 50 की उम्र के बाद पढ़ाई शुरू की, किसी ने 70 के पार नया कारोबार खड़ा किया और किसी ने 89 साल की उम्र में पहली बार मैराथन दौड़ने का फैसला किया।
हाल में उत्तर प्रदेश के बागपत के विजय कुमार शर्मा की कहानी सामने आई है। उन्होंने 1999 में सरकारी शिक्षक बनने का सपना देखा था। भर्ती परीक्षाओं में बार-बार कोशिश की, लिखित परीक्षा कई बार पास की, लेकिन चयन नहीं हुआ। करीब 27 साल बाद 59 वर्ष की उम्र में उनका सपना पूरा हुआ। अब वह संस्कृत शिक्षक के रूप में नई पारी शुरू करने जा रहे हैं।
विजय की कहानी अकेली नहीं है। देश में ऐसे कई उदाहरण हैं, जो बताते हैं कि देर से मिली सफलता का मतलब छोटी सफलता नहीं होता।
1. 27 साल इंतजार के बाद 59 की उम्र में शिक्षक बने विजय कुमार
बागपत के बड़वाड़ गांव निवासी विजय कुमार शर्मा ने वर्ष 1999 में सरकारी शिक्षक बनने की कोशिश शुरू की थी। वह लगातार शिक्षक भर्ती परीक्षाओं में शामिल होते रहे।
रिपोर्टों के मुताबिक उन्होंने टीजीटी भर्ती की लिखित परीक्षा छह बार पास की, लेकिन इंटरव्यू में चयन नहीं हो पाया। कुल मिलाकर उन्हें कई बार इंटरव्यू के लिए बुलाया गया, मगर नौकरी हाथ नहीं लगी।
इस दौरान वह निजी स्कूल में पढ़ाते रहे। यानी शिक्षक बनने का सपना उनके लिए सिर्फ परीक्षा पास करने तक सीमित नहीं था, वह लंबे समय से पढ़ाने के काम से जुड़े भी रहे।
2026 में 292 संस्कृत शिक्षक पदों की भर्ती में उन्होंने फिर परीक्षा दी और इस बार चयन हो गया। खास बात यह रही कि इस भर्ती प्रक्रिया में इंटरव्यू नहीं था। 59 वर्ष और सात महीने की उम्र में वह शामली के ऐलम इंटर कॉलेज में संस्कृत पढ़ाने जा रहे हैं।
और कहानी यहीं और खास हो जाती है। विजय की बेटी ममता ने भी इसी भर्ती परीक्षा में सफलता हासिल की है, हालांकि उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार उनका नाम प्रतीक्षा सूची में है। विजय को नियुक्ति पत्र लखनऊ में एक कार्यक्रम में मिला।
27 साल की कोशिश का यह अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है।
2. 71 साल में CA बने ताराचंद अग्रवाल

राजस्थान के ताराचंद अग्रवाल की कहानी उन लोगों के लिए खास है जिन्हें लगता है कि पढ़ाई सिर्फ नौकरी पाने की उम्र तक ही की जा सकती है।
बैंक से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने चार्टर्ड अकाउंटेंसी की पढ़ाई शुरू की। 71 वर्ष की उम्र में उन्होंने CA फाइनल परीक्षा पास की। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने 2021 में CA कोर्स में पंजीकरण कराया था। फाउंडेशन और इंटरमीडिएट परीक्षा पास करने के बाद मई 2024 की फाइनल परीक्षा में उन्हें सफलता नहीं मिली। स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों के बावजूद उन्होंने तैयारी जारी रखी और मई 2025 में CA फाइनल पास किया।
उनकी तैयारी भी सामान्य नहीं थी। रिपोर्ट के अनुसार वह रोजाना कई घंटे पढ़ते थे और लिखने का अभ्यास करते थे।
जहां अधिकतर लोग रिटायरमेंट के बाद पढ़ाई को पीछे छोड़ देते हैं, वहीं अग्रवाल ने उसी समय एक कठिन पेशेवर परीक्षा की तैयारी शुरू की।
3. 89 साल की उम्र में दौड़ना शुरू किया फौजा सिंह ने

अगर देर से शुरुआत की मिसाल खोजी जाए तो फौजा सिंह का नाम सबसे अलग दिखाई देता है।
भारत में जन्मे फौजा सिंह ने 89 साल की उम्र में लंबी दूरी की दौड़ शुरू की। एक टीवी कार्यक्रम में मैराथन देखते हुए उनके मन में भी दौड़ने का विचार आया और उन्होंने इसे आजमाने का फैसला किया। वर्ष 2000 में उन्होंने 89 वर्ष की उम्र में लंदन मैराथन पूरी की।
इसके बाद दौड़ उनकी पहचान बन गई। उन्होंने अपने करियर में नौ फुल मैराथन पूरी कीं और 100 वर्ष की उम्र में भी फुल मैराथन पूरी की।
फौजा सिंह का निधन 2025 में 114 वर्ष की उम्र में हुआ। उनकी कहानी इस मायने में असाधारण है कि जिस उम्र में ज्यादातर लोग शारीरिक गतिविधियां कम कर देते हैं, उन्होंने उसी उम्र में लंबी दूरी की दौड़ को अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाया।
4. 70 की उम्र में शौक को कारोबार में बदला चंद्रप्रभा परिहार ने

चंद्रप्रभा परिहार की कहानी बताती है कि पुराना शौक भी जिंदगी के बहुत बाद में नया रास्ता बन सकता है।
उन्होंने बचपन में क्रोशिया का काम सीखा था, लेकिन परिवार और जीवन की जिम्मेदारियों के बीच यह शौक पीछे छूट गया। बाद में 70 के आसपास उन्होंने फिर से क्रोशिया का काम शुरू किया और इसे कारोबार में बदल दिया।
उनका ब्रांड Nayher 2022 में शुरू हुआ। रिपोर्टों के अनुसार यह काम आगे बढ़ा और इससे दूसरी महिलाओं को भी रोजगार का अवसर मिला।
2026 की एक रिपोर्ट के मुताबिक 73 वर्ष की उम्र में भी वह इस काम से जुड़ी हुई थीं और कई महिला कारीगरों के साथ काम कर रही थीं।
यह कहानी नौकरी या प्रतियोगी परीक्षा जीतने की नहीं है। यह उस उम्र में अपनी रचनात्मकता को नया जीवन देने की कहानी है, जब आमतौर पर लोग सक्रिय करियर से दूर हो जाते हैं।
5. 96 साल की उम्र में परीक्षा में 98 अंक लाने वालीं कार्यायनी अम्मा
केरल की कार्यायनी अम्मा ने 96 वर्ष की उम्र में साक्षरता परीक्षा देकर पूरे देश का ध्यान खींचा।
उन्होंने स्कूल में नियमित शिक्षा नहीं ली थी। बाद में केरल के साक्षरता अभियान के तहत पढ़ाई शुरू की। 2018 में उन्होंने ‘अक्षरलक्षम्’ परीक्षा दी और 100 में 98 अंक हासिल किए। वह परीक्षा में शामिल हजारों अभ्यर्थियों में सबसे ज्यादा अंक पाने वाली उम्मीदवार बनीं।
यह सिर्फ एक परीक्षा का परिणाम नहीं था। यह उस उम्र में किताब और कॉपी उठाने की कहानी थी, जब कई लोग मान लेते हैं कि पढ़ाई का समय निकल चुका है।
उनकी कहानी ने केरल के वयस्क साक्षरता अभियान को भी राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में ला दिया।
6. 105 साल की उम्र में पढ़ाई की परीक्षा देने पहुंचीं भागीरथी अम्मा
कार्यायनी अम्मा से प्रेरणा लेने वाली दूसरी असाधारण कहानी केरल की भागीरथी अम्मा की है।
105 वर्ष की उम्र में उन्होंने औपचारिक शिक्षा कार्यक्रम के तहत चौथी कक्षा की समकक्ष साक्षरता परीक्षा के तीन पेपर दिए। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार वह उस समय केरल की सबसे बुजुर्ग परीक्षा अभ्यर्थियों में थीं।
उनकी कहानी में सबसे महत्वपूर्ण बात उम्र नहीं, सीखने की इच्छा थी।
जिंदगी का बड़ा हिस्सा परिवार और जिम्मेदारियों में बिताने के बाद उन्होंने पढ़ाई का वह रास्ता चुना जो उनके बचपन में अधूरा रह गया था।
7. 60 की उम्र में दौड़ना शुरू करने वाली किशोरी कुडेचा
मुंबई की किशोरी कुडेचा ने 60 वर्ष की उम्र में दौड़ना शुरू किया। वह बचपन से एथलीट नहीं थीं और न ही युवावस्था में उन्होंने मैराथन दौड़ी थी।
2026 की रिपोर्ट के अनुसार 69 वर्ष की उम्र तक वह 42 किलोमीटर की फुल मैराथन और 50 किलोमीटर की अल्ट्रामैराथन पूरी कर चुकी थीं। उनके नाम 45 से अधिक पोडियम फिनिश भी दर्ज हैं।
यानी जिस उम्र में उन्होंने दौड़ना शुरू किया, वही उम्र उनके लिए खेल की शुरुआत बन गई।
यह कहानी खास तौर पर इसलिए अलग है क्योंकि यहां सफलता किसी पुराने अधूरे करियर को पूरा करने से नहीं, बल्कि जीवन के बिल्कुल नए अध्याय से आई।
8. 46 की उम्र में वकील बनीं एम. अंबिका
केरल की एम. अंबिका की कहानी पढ़ाई में देर से लौटने की मिसाल है।
उन्होंने 1994 में 10वीं की परीक्षा दी थी, लेकिन पास नहीं कर पाईं। इसके बाद पारिवारिक जीवन और बच्चों की जिम्मेदारियों के बीच पढ़ाई पीछे छूट गई।
बाद में उन्होंने राज्य के सतत शिक्षा कार्यक्रम के माध्यम से दोबारा पढ़ाई शुरू की। 2009 में 10वीं की समकक्ष परीक्षा और 2018 में 12वीं की समकक्ष परीक्षा पूरी की। इसके बाद 2019 में पांच वर्षीय एलएलबी पाठ्यक्रम में दाखिला लिया।
46 वर्ष की उम्र में उन्होंने कानून की डिग्री हासिल की और 2025 में केरल बार काउंसिल में अधिवक्ता के रूप में पंजीकरण कराया।
जिस परीक्षा में कभी असफलता मिली थी, उसी शिक्षा की राह से वह आगे चलकर कानून के पेशे तक पहुंचीं।
9. रिटायरमेंट के बाद 58 साल की रीना राफेल ने फिर कॉलेज का रुख किया
केरल की रीना राफेल ने सरकारी सेवा से सेवानिवृत्ति के बाद पढ़ाई शुरू करने का फैसला किया।
58 वर्ष की उम्र में उन्होंने महाराजा कॉलेज में दर्शनशास्त्र विषय के साथ स्नातकोत्तर पढ़ाई शुरू की। रिपोर्ट के अनुसार वह पहले पंचायत सचिव के रूप में काम कर चुकी थीं और सेवानिवृत्ति के बाद अपने पुराने शैक्षणिक सपने को पूरा करने के लिए कॉलेज लौटीं।
उनकी कहानी बताती है कि डिग्री और नौकरी का रिश्ता खत्म होने के बाद भी शिक्षा का रिश्ता खत्म नहीं होता।
उम्र बढ़ी, लेकिन सपनों की तारीख नहीं
इन सभी कहानियों में एक समान बात दिखाई देती है—सफलता का समय अलग-अलग था।
विजय कुमार शर्मा ने 27 साल तक सरकारी शिक्षक बनने की कोशिश की। ताराचंद अग्रवाल ने सेवानिवृत्ति के बाद CA बनने की पढ़ाई शुरू की। फौजा सिंह ने 89 वर्ष में मैराथन शुरू की। किशोरी कुडेचा ने 60 की उम्र में दौड़ना शुरू किया। एम. अंबिका ने असफलता के वर्षों बाद कानून की पढ़ाई पूरी की।
इनमें किसी की कहानी रातोंरात सफलता की नहीं है। हर कहानी में एक लंबा इंतजार, असफलता, उम्र, जिम्मेदारी या कठिन परिस्थिति मौजूद है।
सपने की कोई एक्सपायरी डेट नहीं
विजय कुमार शर्मा जब पहली बार शिक्षक बनने के लिए परीक्षा दे रहे थे, तब आज की पीढ़ी के कई युवा पैदा भी नहीं हुए थे। 27 साल बाद उन्हें नियुक्ति पत्र मिला।
फौजा सिंह ने 89 की उम्र में मैराथन की शुरुआत की।
कार्यायनी अम्मा ने 96 की उम्र में परीक्षा में 98 अंक हासिल किए।
भागीरथी अम्मा 105 की उम्र में परीक्षा देने पहुंचीं।
इन आंकड़ों को देखकर उम्र बड़ी लग सकती है, लेकिन इनकी कहानियों में एक चीज छोटी नहीं हुई—सीखने, कोशिश करने और आगे बढ़ने की इच्छा।
शायद इसी वजह से इन कहानियों का सबसे बड़ा संदेश यह नहीं है कि हर व्यक्ति को किसी निश्चित उम्र में कोई बड़ा रिकॉर्ड बनाना चाहिए। संदेश इतना भर है कि जिंदगी में किसी सपने को पूरा करने के लिए कोई एक तय उम्र नहीं होती।
किसी के लिए मंजिल 30 में आती है, किसी के लिए 50 में और किसी के लिए 70 या 90 के बाद।
देर हो सकती है, लेकिन अगर कोशिश जारी है तो कहानी खत्म नहीं हुई है।



