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गोलकुंडा किले की ‘एक ताली’ का रहस्य, जो एक किलोमीटर दूर तक सुनाई देती है

हैदराबाद का गोलकुंडा किला सिर्फ पत्थरों से बनी एक ऐतिहासिक इमारत नहीं, बल्कि मध्यकालीन भारत की अद्भुत वास्तुकला और ध्वनि-विज्ञान का जीवंत उदाहरण है। किले के प्रवेश द्वार पर बजाई गई ताली की आवाज दूर पहाड़ी पर बने बाला हिसार तक पहुंचने की कहानी आज भी पर्यटकों को रोमांचित करती है।

बिना माइक के बना था ‘साउंड सिस्टम’

तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में स्थित गोलकुंडा किला कुतुब शाही दौर की शानदार स्थापत्य कला का प्रमाण है। किले की सबसे दिलचस्प विशेषताओं में इसकी ध्वनि व्यवस्था शामिल है। माना जाता है कि किले के प्रवेश द्वार के नीचे खास स्थान पर ताली बजाने पर उसकी आवाज ऊपर स्थित बाला हिसार क्षेत्र तक सुनाई देती थी।

यह दूरी करीब एक किलोमीटर बताई जाती है और बाला हिसार किले के ऊंचे हिस्से में स्थित है। यही वजह है कि गोलकुंडा की यह व्यवस्था आज भी लोगों के लिए कौतूहल का विषय बनी हुई है।

नीचे ताली, ऊपर गूँज: ध्वनि का सफर

गोलकुंडा किले का व्यापक दृश्य फोटो क्रेडिट: Wikimedia Commons

​किले की सुरक्षा व्यवस्था को इस तरह डिजाइन किया गया था कि निचले हिस्से में होने वाली किसी भी हलचल की खबर पलक झपकते ही शीर्ष पर बैठे शासक तक पहुँच जाए।

  • प्रारंभिक स्थान (Clapping Point): किले का मुख्य प्रवेश द्वार, जिसे ‘फतेह दरवाजा’ या ‘बाला हिसार दरवाजा’ कहा जाता है। इसके मुख्य गुंबद के ठीक केंद्र में एक खास Sound Origin Spot चिह्नित है, जहाँ ताली बजाने पर खास ध्वनि तरंगें उत्पन्न होती हैं।
  • अंतिम स्थान (Listening Point): मुख्य द्वार से लगभग 400 फीट ऊपर और एक किलोमीटर दूर पहाड़ी की चोटी पर स्थित ‘बाला हिसार पैवेलियन’ (दरबार)। यहाँ बैठा राजा या संतरी नीचे द्वार पर बजाई गई ताली को बिना किसी रुकावट के साफ सुन सकता है। 
  •  इंजीनियरिंग और वास्तुकला का रहस्य​कुतुब शाही राजवंश के शिल्पकारों ने बिना किसी आधुनिक उपकरण के ध्वनि को इतनी दूरी तक पहुँचाने के लिए भौतिकी और वास्तुकला के बेहतरीन सिद्धांतों का उपयोग किया था:
    • विशेष मेहराब (Fluted Arches): किले की छतों और गलियारों की दीवारों में हीरे और त्रिकोण के आकार के नक्काशीदार मेहराब बनाए गए हैं। ये मेहराब ध्वनि तरंगों को हवा में बिखरने नहीं देते, बल्कि उन्हें टकराकर (Reflect) एक निश्चित दिशा में आगे भेजते हैं।
    • सामग्री का अनूठा चयन: निर्माण में मिट्टी, चूने के लेप और ग्रेनाइट पत्थरों के विशेष मिश्रण का प्रयोग किया गया था। यह मिश्रण ध्वनि को अवशोषित (Absorb) करने के बजाय उसमें गूँज (Reverberate) पैदा करता है, जिससे आवाज बिना कमजोर हुए दूर तक जाती है।
    • पाइप प्रणाली (Whispering Galleries): दीवारों के भीतर खोखली पाइप संरचनाएँ और संकरे रास्ते बनाए गए हैं। इनकी मदद से अत्यंत धीमी आवाज में फुसफुसाकर (Whisper) कहे गए गुप्त संदेश भी एक कक्ष से दूसरे कक्ष तक आसानी से पहुँच जाते थे।

वास्तुकला में छिपा ध्वनि का विज्ञान

ताली वाले प्रवेश द्वार के लिए — बाला हिसार गेट फोटो क्रेडिट: Wikimedia Commons

गोलकुंडा की इस विशेषता के पीछे किले की बनावट को महत्वपूर्ण माना जाता है। विशाल पत्थर की दीवारें, मेहराब, गुंबद और गलियारे ध्वनि के प्रसार को प्रभावित करते हैं। वास्तुकारों ने इमारत की संरचना ऐसी बनाई थी कि आवाज कई स्थानों पर टकराकर गूंज पैदा करे।

किले के कुछ हिस्सों में बने घुमावदार रास्ते और मेहराबदार संरचनाएं ध्वनि को एक दिशा से दूसरी दिशा तक पहुंचाने में मदद करती हैं। यही कारण है कि सामान्य आवाज की तुलना में ताली की तेज और स्पष्ट ध्वनि यहां ज्यादा प्रभावशाली ढंग से सुनाई देती है।

हालांकि, गोलकुंडा की ध्वनि व्यवस्था से जुड़ी कई लोकप्रिय बातें आज लोककथाओं और पर्यटन विवरणों का हिस्सा हैं। इसलिए हर दावे को आधुनिक वैज्ञानिक परीक्षण से प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य मानना उचित नहीं होगा।

सुरक्षा के लिए उपयोगी रहा होगा यह तंत्र

गोलकुंडा किले के ऊंचे हिस्से से दिखाई देता बाला हिसार गेट और आसपास का किला परिसर। फोटो क्रेडिट: Wikimedia Commons (Rajashree Talukdar)

मध्यकाल में आज की तरह मोबाइल फोन, वायरलेस सेट या इलेक्ट्रॉनिक अलार्म नहीं थे। ऐसे में किलों में संदेश पहुंचाने के लिए सैनिकों, मशालों, झंडों और ध्वनि संकेतों का इस्तेमाल किया जाता था।

गोलकुंडा जैसे विशाल और ऊंचाई वाले किले में तेज आवाज या विशेष संकेत का उपयोग सुरक्षाकर्मियों को सतर्क करने में बेहद उपयोगी रहा होगा। नीचे के हिस्से में किसी संदिग्ध गतिविधि या खतरे की जानकारी ऊपर तैनात सैनिकों तक पहुंचाने के लिए ऐसी ध्वनि-व्यवस्था मददगार थी।

सिर्फ सुरक्षा नहीं, वास्तुकला की अद्भुत समझ

गोलकुंडा की खासियत केवल इतनी नहीं कि यहां ताली की आवाज दूर तक सुनाई देती है। असली आकर्षण यह है कि सदियों पहले किले का निर्माण करते समय वास्तुकारों को ध्वनि के व्यवहार की व्यावहारिक समझ थी।

पत्थर की सतह से ध्वनि का परावर्तन, गुंबदों में गूंज और खुले तथा बंद स्थानों का संतुलन—इन सभी का प्रभाव किले की ध्वनि पर पड़ता है। आधुनिक भाषा में कहें तो यह वास्तुकला और ध्वनि-विज्ञान के मेल का एक शानदार उदाहरण है।

आज भी पर्यटकों को हैरान करती है ‘एक ताली’

गोलकुंडा घूमने आने वाले पर्यटकों के लिए फतेह दरवाजा के नीचे ताली बजाना एक खास अनुभव है। जब ताली की आवाज किले की दीवारों और गुंबदों से टकराकर गूंजती है तो कुछ पल के लिए ऐसा लगता है जैसे सदियों पुराना कोई संदेश आज भी पत्थरों के बीच जीवित हो।

गोलकुंडा की यह ध्वनि व्यवस्था हमें याद दिलाती है कि ऐतिहासिक इमारतें केवल राजाओं और युद्धों की कहानियां नहीं कहतीं। उनकी दीवारों में गणित, भौतिकी, वास्तुकला और तत्कालीन तकनीकी समझ भी छिपी होती है।

एक छोटी-सी ताली और करीब एक किलोमीटर दूर तक उसका पहुंचता असर—गोलकुंडा किले की यही खूबी इसे भारत की सबसे दिलचस्प ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल करती है।

जमुना दयाल

जमुना दयाल वाराणसी के निवासी हैं और उन्हें हिंदी समाचार मीडिया में 10 से अधिक वर्षों का गहन रिपोर्टिंग अनुभव है। उन्होंने अमर उजाला और दैनिक जागरण जैसे देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में जिला रिपोर्टर के रूप में कार्य करते हुए खेल, शिक्षा, राजनीति, कृषि तथा सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता से कवर किया है। शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से जनसंचार में परास्नातक (MJMC) की डिग्री प्राप्त की है और यूजीसी नेट (UGC NET) परीक्षा उत्तीर्ण की है।

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