सिंधुताई सपकाल: जिसके पास खुद का घर नहीं था, वही बन गईं हजारों अनाथ बच्चों की ‘माई’
बचपन का अभाव, कम उम्र में विवाह, फिर गर्भवती अवस्था में पति का अत्याचार और दर-दर भटकने की मजबूरी... लेकिन इन सब कठिनाइयों के बीच भी जिस महिला ने हार नहीं मानी, उसने आगे चलकर बेसहारा बच्चों के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया।
भारत में ऐसे असाधारण व्यक्तित्वों की कमी नहीं है, जिन्होंने अपने निजी दुखों और त्रासदियों को अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया। पद्मश्री सिंधुताई सपकाल की कहानी भी एक ऐसी ही अमर और अनुकरणीय मिसाल है। जिस महिला के पास कभी अपने और अपनी नवजात बेटी के लिए सिर छिपाने को छत तक नहीं थी, उसने आगे चलकर हजारों लावारिस और बेसहारा बच्चों को घर, भोजन, शिक्षा और एक भरे-पूरे परिवार का एहसास दिया।
उन्हें पूरा देश और उनके बच्चे प्यार से ‘माई’ (मां) और ‘अनाथों की मां’ के नाम से जानते हैं। विभिन्न संस्थागत स्रोतों और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने अपने पूरे जीवनकाल में 1,200 से लेकर 2,100 से अधिक बच्चों का पालन-पोषण, शिक्षा और पुनर्वास किया। हालांकि अलग-अलग स्रोतों में यह संख्या भिन्न मिलती है, इसलिए उन्हें किसी एक निश्चित आंकड़े में बांधने के बजाय ‘हजारों बच्चों की माई’ के रूप में याद रखना सबसे सटीक है।
अभावों और सामाजिक भेदभाव में बीता बचपन

सिंधुताई का जन्म महाराष्ट्र के वर्धा जिले के छोटे से गांव पिंपरी मेघे में हुआ था। उनके पिता एक साधारण पशुपालक थे। परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी और उस दौर के सामाजिक ताने-बाने में लड़कियों की पढ़ाई-लिखाई को कोई तवज्जो नहीं दी जाती थी। इन प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद, सिंधुताई के भीतर पढ़ने की तीव्र ललक थी, लेकिन वह औपचारिक रूप से केवल चौथी कक्षा तक ही पढ़ाई कर सकीं।
बचपन में उन्हें अनचाही बच्ची मानकर अक्सर ‘चिंधी’ (फटे-पुराने कपड़े का टुकड़ा) नाम से पुकारा जाता था। उनका बचपन अभावों, उपेक्षा और भेदभाव के बीच बीता। इसके बाद बहुत ही कम उम्र में उनका विवाह श्रीहरि सपकाल नामक व्यक्ति से कर दिया गया। शादी के बाद उनका जीवन आसान होने के बजाय और अधिक प्रताड़ना से भर गया, जहां उन्हें आए दिन शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा।
गर्भावस्था में घर से बेदखली और अस्तित्व की लड़ाई
सिंधुताई के जीवन का सबसे भयानक और दर्दनाक मोड़ तब आया जब वह पूर्ण गर्भावस्था में थीं। स्थानीय विवादों और पारिवारिक कलह के कारण उन्हें पति के घर से बाहर निकाल दिया गया। उस विषम परिस्थिति में उनके पास न तो कोई पैसा था, न रहने का ठिकाना, और न ही कोई ऐसा अपना जो उन्हें सहारा दे सके।
अत्यंत विकट और दर्दनाक परिस्थितियों के बीच उन्होंने एक तबेल में अपनी बेटी को जन्म दिया। इसके बाद अपने और अपनी नवजात बच्ची के अस्तित्व को बचाने के लिए उन्होंने रेलवे स्टेशनों, श्मशान घाटों और सार्वजनिक स्थानों पर रातें गुजारीं। भूख मिटाने के लिए उन्हें भीख तक मांगनी पड़ी और रेलवे स्टेशनों पर ट्रेन के डिब्बों में गाना गाकर पेट पालना पड़ा। लेकिन यही वह दौर था जिसने उनके भीतर उन तमाम अनाथ बच्चों के प्रति संवेदना और वात्सल्य की लौ जला दी, जिन्हें समाज छोड़ देता है।
रेलवे स्टेशन की वह एक घटना, जिसने बदल दी जीवन की दिशा
कहा जाता है कि एक दिन रेलवे स्टेशन पर भूख-प्यास से तड़पते एक बेसहारा बुजुर्ग को देखकर सिंधुताई का दिल पसीज गया। उन्होंने अपनी तंगहाली के बावजूद अपनी रोटी में से हिस्सा निकालकर उस बुजुर्ग की मदद की। इस छोटी सी घटना ने उनके सोचने का नज़रिया पूरी तरह बदल दिया।
उन्होंने महसूस किया कि दुनिया में दुख उनसे भी कई गुना ज्यादा है। यहीं से सिंधुताई का जीवन-उद्देश्य बदल गया। अब वह सिर्फ अपनी बेटी ममता के लिए संघर्ष करने वाली एक मजबूर महिला नहीं रहीं, बल्कि उन्होंने ठान लिया कि वह हर उस अनाथ और बेसहारा बच्चे की ढाल बनेंगी जिसकी इस दुनिया में कोई सुध लेने वाला नहीं है।
त्याग की अनूठी मिसाल: सगी बेटी का समर्पण

जब सिंधुताई ने अनाथ बच्चों को अपनाना शुरू किया, तो उन्हें एक बड़ा डर सताया। उन्हें लगा कि यदि उनकी सगी बेटी ममता उनके साथ रहेगी, तो शायद आश्रम के अनाथ बच्चों को यह महसूस हो सकता है कि ‘माई’ अपनी सगी बेटी से ज्यादा प्यार करती हैं। निष्पक्षता और निस्वार्थ प्रेम बनाए रखने के लिए उन्होंने अपनी सगी बेटी ममता को पुणे के श्रीमंत दगडूशेठ हलवाई ट्रस्ट से जुड़े संस्थान को सौंप दिया। बाद में ममता ने भी बड़ी होकर अपनी मां के पदचिन्हों पर चलते हुए समाज सेवा का मार्ग चुना।
भीख मांगकर अनाथों का पेट पाला, बनाया एक बड़ा परिवार

शुरुआत में जब सिंधुताई ने अनाथ बच्चों को अपने साथ रखना शुरू किया, तो उनके पास न तो कोई पंजीकृत संस्था थी, न ही कोई सरकारी अनुदान या आय का साधन। बच्चों को भोजन कराने के लिए वह सड़कों और स्टेशनों पर लोगों के सामने हाथ फैलाती थीं। लेकिन वह भीख अपने लिए नहीं, बल्कि अपने उन बच्चों की भूख मिटाने के लिए मांगती थीं।
सिंधुताई ने इन बच्चों को सिर्फ ‘आश्रय’ नहीं दिया, बल्कि उन्हें अपना परिवार माना। बच्चे उन्हें ‘माई’ कहते थे। उन्होंने बच्चों को पढ़ाया-लिखाया, उन्हें आत्मनिर्भर बनाया, उनकी शादियां कराईं और उन्हें समाज में सम्मानजनक स्थान दिलाया। उनके संरक्षण में पले-बढ़े बच्चे आगे चलकर डॉक्टर, वकील, इंजीनियर, शिक्षक और समाजसेवी बने।
स्थापित प्रमुख आश्रम और सामाजिक योगदान

दानदाताओं और समाज से मिले सहयोग के बल पर उन्होंने महाराष्ट्र के विभिन्न जिलों में कई आश्रमों और छात्रावासों की नींव रखी:
| संस्था / आश्रम का नाम | स्थान / कार्यक्षेत्र | मुख्य उद्देश्य |
| ममता बाल सदन | कुंभारे वलण (पुणे) | अनाथ व बेसहारा बच्चों का पालन-पोषण एवं सर्वांगीण विकास |
| सावित्रीबाई फुले गर्ल्स हॉस्टल | चिखलदरा (अमरावती) | ग्रामीण व गरीब लड़कियों के लिए आवास एवं शिक्षा सुविधा |
| गोकुल बाल आश्रम | महाराष्ट्र | छोटे बच्चों की देखरेख और प्राथमिक शिक्षा |
| आदिवासी पुनर्वास कार्य | 84 आदिवासी गांव | विस्थापित आदिवासियों के अधिकार, जमीन और मुआवजे की लड़ाई |
पति को क्षमा और ‘सबसे बड़े बेटे’ का दर्जा
सिंधुताई के महान व्यक्तित्व का सबसे भावुक पहलू उनका अपने पति के प्रति दृष्टिकोण था। जिस पति ने उन्हें गर्भावस्था में प्रताड़ित करके घर से निकाला था, वही पति जब अपने वृद्धावस्था में असहाय होकर उनके पास लौटा, तो सिंधुताई ने कोई कटुता नहीं दिखाई। उन्होंने अपने पूर्व पति को सहर्ष माफ कर दिया और अपने आश्रम में रहने की जगह दी। वह मजाकिया लेकिन बेहद भावुक अंदाज में कहती थीं— “अब ये मेरे पति नहीं, बल्कि मेरे सबसे बड़े बेटे हैं!”
सम्मान और पुरस्कारों की लंबी फेहरिस्त

सिंधुताई के अभूतपूर्व सामाजिक कार्यों की गूंज देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी सुनाई दी। उन्हें उनके जीवनकाल में 700 से 900 से अधिक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिले:
- पद्मश्री (2021): सामाजिक कार्य के क्षेत्र में भारत सरकार का प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान।
- नारी शक्ति पुरस्कार (2017): महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा।
- मदर टेरेसा अवॉर्ड: सामाजिक न्याय और मानवीय सेवाओं के लिए।
- अहिल्याबाई होलकर पुरस्कार: महाराष्ट्र सरकार द्वारा प्रदत्त।
वर्ष 2010 में उनके संघर्षमयी जीवन पर प्रसिद्ध निर्देशक अनंत महादेवन ने मराठी फिल्म ‘मी सिंधुताई सपकाल’ बनाई, जिसे 54वें लंदन फिल्म फेस्टिवल में सराहा गया।
अलविदा माई: एक कभी न मिटने वाली विरासत
4 जनवरी 2022 को 73 वर्ष की आयु में पुणे में सिंधुताई सपकाल का निधन हो गया। भले ही माई शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके द्वारा स्थापित संस्थाएं, उनके हजारों सफल बच्चे और उनका करुणा से भरा संदेश हमेशा जीवित रहेगा। सिंधुताई की जीवन गाथा यह सिखाती है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी विषम क्यों न हों, यदि इंसान के मन में दूसरों के दुख हरने की तड़प हो, तो वह अकेला व्यक्ति भी इतिहास रच सकता है।



