B.Tech पास युवा के फैसले ने बदला 125 परिवारों का नसीब: ‘नंदसदन गौशाला’ का गोबर पाइपलाइन से रसोई तक पहुंचा रहा सस्ती और स्वच्छ गैस
चंदौली (उत्तर प्रदेश): चंदौली जिले का एकौनी गांव ग्रामीण भारत में ऊर्जा आत्मनिर्भरता और पर्यावरण संरक्षण की एक बेहतरीन मिसाल पेश कर रहा है। यहां के लगभग 125 परिवारों (500-600 की आबादी) की रसोई में रोज सुबह और शाम पाइपलाइन के जरिए बायोगैस पहुंच रही है।
खास बात यह है कि ग्रामीणों को एलपीजी सिलेंडर के मुकाबले आधी से भी कम कीमत में निर्बाध गैस मिल रही है। इस अनूठी और सफल पहल के पीछे गांव के ही एक युवा इंजीनियर की सोच और कड़ी मेहनत है।
B.Tech की नौकरी छोड़ी, संभाली पिता की ‘नंदसदन गौशाला’
भोपाल एनआईटी से बी.टेक (वास्तुकला) की पढ़ाई पूरी करने के बाद जब युवाओं की पहली पसंद कॉर्पोरेट नौकरियां होती हैं, तब चंद्र प्रकाश सिंह ने अपने गांव लौटने का फैसला किया। गांव में उनके पिता की ‘नंदसदन गौशाला’ थी, जहां उस समय करीब 50 गाय थीं। चंद्र प्रकाश ने इस गौशाला का विस्तार किया और मवेशियों की संख्या बढ़ाकर 200 तक पहुंचा दी।
गौशाला बड़ी हुई तो सबसे बड़ी चुनौती सामने आई—रोजाना निकलने वाले लगभग 3,000 किलो गोबर का प्रबंधन (Waste Management)।
“इतना सारा गोबर कहां ले जाएं, इसका क्या करें? हमने वर्मीकंपोस्ट (केंचुआ खाद) बनाकर देखा, लेकिन जब रिसर्च की तो समझ आया कि बायोगैस से हम गांव को एक बड़ा और सीधा फायदा दे सकते हैं।” — चंद्र प्रकाश सिंह (संस्थापक, नंदसदन बायोगैस मॉडल)
टाटा और SAAF Energy का मिला साथ, बिछी गैस पाइपलाइन
अपनी इसी सोच को धरातल पर उतारने के लिए चंद्र प्रकाश ने स्वच्छ ऊर्जा तकनीक क्षेत्र में काम करने वाली कंपनी SAAF Energy और TATA से संपर्क किया। वर्ष 2021 में 350 क्यूबिक मीटर क्षमता वाले विशाल बायोगैस प्लांट का निर्माण शुरू हुआ और 2022 से गांव में निरंतर गैस आपूर्ति चालू कर दी गई।
बायोगैस प्लांट की मुख्य विशेषताएं:
- क्षमता और उत्पादन: 200 गोवंशों के 3,000 किलो गोबर से रोजाना लगभग 100 क्यूबिक मीटर बायोगैस तैयार होती है।
- पाइपलाइन और मीटर: गांव के 125 से ज्यादा घरों तक सीधे अंडरग्राउंड पाइपलाइन पहुंचाई गई है और हर घर में गैस मीटर लगाए गए हैं।
- सप्लाई का समय: रोज सुबह 3 घंटे (7 से 10) और शाम 3 घंटे नियत समय पर गैस की सप्लाई की जाती है, जो एक परिवार के भोजन पकाने के लिए पर्याप्त है।
- बेहतरीन प्रेशर: बायोगैस का प्रेशर इतना अच्छा है कि घरों की दूसरी मंजिल की रसोई में भी चूल्हा बिना किसी रुकावट के चलता है।
एलपीजी से आधी कीमत पर रसोई गैस
इस प्रोजेक्ट का सबसे बड़ा आकर्षण इसका आर्थिक पक्ष है। एलपीजी सिलेंडर के महंगे दामों की तुलना में एकौनी गांव के लोगों को महीने भर बायोगैस इस्तेमाल करने का खर्च मात्र 400 से 500 रुपये आता है।
“हमें समय पर सुबह-शाम गैस मिल जाती है। एलपीजी के मुकाबले खर्च आधा आता है, जिससे हमारे घरेलू बजट पर कोई बोझ नहीं पड़ता। अब हमें सिलेंडर खत्म होने या बुकिंग की चिंता नहीं रहती।” — भारती सिंह (स्थानीय गृहिणी, एकौनी गांव)
पर्यावरण सुरक्षा के साथ किसानों को ‘जैविक खाद’
चंद्र प्रकाश सिंह का यह बायोगैस मॉडल केवल गैस आपूर्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने गांव की पूरी अर्थव्यवस्था को एक सर्कुलर इकोनॉमी (Circular Economy) का रूप दे दिया है।
- गाँव की स्वच्छता: गोबर का सही इस्तेमाल होने से गांव की गलियां और गौशाला पूरी तरह साफ रहती हैं।
- जैविक खाद (Organic Fertilizer): गैस बनने के बाद जो स्लरी (अवशेष) बचती है, उससे प्रतिदिन लगभग एक ट्रैक्टर जैविक खाद तैयार होती है।
- कम लागत में खेती: इस खाद को आसपास के किसानों को सस्ते दामों पर बेचा जाता है, जिससे खेतों की उर्वरता बढ़ रही है और रासायनिक खादों पर किसानों की निर्भरता कम हो रही है।
आत्मनिर्भरता की राह दिखाता एकौनी मॉडल
चंदौली के एकौनी गांव ने साबित कर दिया है कि स्थानीय संसाधनों और आधुनिक तकनीक का सही तालमेल बिठाकर ग्रामीण जीवन को कितना सुलभ और आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है। आज चंद्र प्रकाश सिंह का ‘नंदसदन बायोगैस मॉडल’ आसपास के गांवों और देश के अन्य युवाओं के लिए प्रेरणा का केंद्र बना हुआ है।
मैं वाराणसी का रहने वाला हूँ। मुझे हिंदी समाचार मीडिया में 9 से अधिक वर्षों का रिपोर्टिंग का व्यावहारिक अनुभव है। मैंने अमर उजाला और दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में जिला रिपोर्टर के रूप में कार्य करते हुए खेल, शिक्षा, राजनीति, कृषि और सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता से कवर किया है। मैंने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से मास कम्यूनिकेशन (MJMC) की डिग्री ली है और UGC NET उत्तीर्ण किया है।



