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नौगढ़ के जंगलों की अनसुनी कहानी, जहां पहाड़ों के बीच आज भी सांस लेता है सदियों पुराना जंगल

चंद्रप्रभा के घने जंगल, कैमूर की पहाड़ियां, गुफाएं, झरने और वन्यजीवों की दुनिया; चंदौली का नौगढ़ सिर्फ हरियाली नहीं, बल्कि प्रकृति, इतिहास और लोकजीवन का अनोखा संगम है

वाराणसी से करीब 70 किलोमीटर दूर चंदौली का नौगढ़ इलाका पहली नजर में जितना शांत दिखाई देता है, उसके भीतर की दुनिया उतनी ही दिलचस्प है। यहां सड़क खत्म होते ही जंगल का विस्तार शुरू हो जाता है। पहाड़ियों के बीच घुमावदार रास्ते, चट्टानों से गिरता पानी, पेड़ों से ढकी ढलानें और दूर तक पसरी हरियाली इस इलाके को बाकी मैदानी हिस्सों से अलग पहचान देती है।

नौगढ़ और चकिया के बीच फैला चंद्रप्रभा वन्यजीव अभयारण्य इसी प्राकृतिक संसार का महत्वपूर्ण हिस्सा है। भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण के अनुसार अभयारण्य करीब 78 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है और इसका विस्तार चकिया तथा नौगढ़ क्षेत्र के बीच है। इसे 1957 में अभयारण्य के रूप में मान्यता मिली थी। यह उत्तर प्रदेश का पहला घोषित वन्यजीव अभयारण्य भी बताया गया है।

पहाड़ों के बीच बसा है नौगढ़ का जंगल

चंदौली का दक्षिणी हिस्सा भौगोलिक रूप से मैदानी क्षेत्र से बिल्कुल अलग है। यहां चकिया का पठारी इलाका पहाड़ी भूभाग का रूप ले लेता है। जिला प्रशासन के अनुसार चकिया पठार क्षेत्र में पहाड़ियां और ऊंच-नीची धरातलीय संरचना देखने को मिलती है।

इसी पहाड़ी भूगोल के कारण नौगढ़ का जंगल कई जगहों पर सामान्य जंगल से अलग दिखाई देता है। कहीं चट्टानें अचानक ऊंची हो जाती हैं तो कहीं गहरी घाटियां रास्ता रोकती हैं। बरसात में यही चट्टानें पानी की धाराओं और झरनों में बदल जाती हैं।

भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण की रिपोर्ट के मुताबिक चंद्रप्रभा अभयारण्य कैमूर क्षेत्र की पहाड़ियों से जुड़े भूभाग में स्थित है। यहां जंगल, नदी, पहाड़ और झरने मिलकर अलग तरह का प्राकृतिक परिदृश्य बनाते हैं।

जंगल का इतिहास शेरों से भी जुड़ा है

आज नौगढ़ के जंगलों की पहचान हिरन, तेंदुआ, पक्षियों और झरनों से होती है, लेकिन कभी इसकी चर्चा एशियाई शेरों के कारण होती थी।

चंद्रप्रभा वन्यजीव अभयारण्य की स्थापना 1957 में हुई थी और इसे एशियाई शेरों के संरक्षण के लिए विकसित किया गया था। भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण के दस्तावेज में भी उल्लेख है कि यह क्षेत्र 1957 से 1970 के बीच एशियाई शेरों के लिए प्रसिद्ध रहा।

आज यहां शेर नहीं हैं, लेकिन जंगल का वन्यजीवन अब भी विविध है। भारत सरकार के पर्यटन पोर्टल के अनुसार अभयारण्य में तेंदुआ, लकड़बग्घा, भेड़िया, जंगली सूअर, नीलगाय, सांभर, चिंकारा, चीतल सहित कई वन्यजीव पाए जाते हैं। पक्षियों की भी 150 से अधिक प्रजातियों का उल्लेख मिलता है।

राजदरी-देवदरी ने जंगल को दी अलग पहचान

नौगढ़ के जंगलों की कहानी राजदरी और देवदरी के बिना अधूरी है।

घने जंगल के बीच चट्टानों से गिरता राजदरी का पानी बरसात में अपना अलग ही रूप दिखाता है। ऊंची चट्टानों से नीचे गिरती पानी की धार और चारों तरफ फैली हरियाली यहां आने वालों को कुछ देर रुकने पर मजबूर कर देती है।

राजदरी से आगे देवदरी जलप्रपात है। दोनों जलप्रपात चंद्रप्रभा वन्यजीव अभयारण्य के भीतर स्थित हैं। जिला प्रशासन भी दोनों को अभयारण्य के प्रमुख आकर्षणों में शामिल करता है।

भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण से जुड़े दस्तावेजों में राजदरी और देवदरी को क्षेत्र के प्रमुख प्राकृतिक स्थलों के रूप में दर्ज किया गया है। एक अध्ययन के अनुसार देवदरी, राजदरी के बहाव की दिशा में करीब 500 मीटर नीचे स्थित है।

बरसात में बदल जाता है पूरा जंगल

नौगढ़ के जंगल का सबसे आकर्षक रूप बारिश के बाद दिखाई देता है। सूखी और धूल भरी गर्मियों के बाद पहाड़ियों पर हरियाली की चादर बिछ जाती है। छोटी-छोटी जलधाराएं सक्रिय हो जाती हैं और चट्टानों के बीच से पानी बहने लगता है।

चंद्रप्रभा नदी भी इसी प्राकृतिक तंत्र का हिस्सा है। नदी और उसकी सहायक धाराएं जंगल के भूगोल को आकार देती हैं। जिला प्रशासन के अनुसार चंद्रप्रभा और कर्मनाशा क्षेत्र की प्रमुख नदियों में हैं।

बारिश के दौरान जंगल में धुंध और बादलों का असर भी दिखाई देता है। ऊंची पहाड़ियों पर छाए बादल और नीचे बहता पानी इस इलाके को किसी फिल्मी दृश्य जैसा बना देते हैं।

यहां जंगल सिर्फ पेड़ों का नाम नहीं

नौगढ़ के जंगल की खासियत केवल पेड़ों की संख्या नहीं है। यहां अलग-अलग तरह की वनस्पतियां, झाड़ियां, घास और औषधीय पौधों की मौजूदगी इस पारिस्थितिकी तंत्र को समृद्ध बनाती है।

भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण ने चंद्रप्रभा वन्यजीव अभयारण्य की वनस्पतियों पर अलग अध्ययन प्रकाशित किया है। रिपोर्ट में अभयारण्य को समृद्ध वनस्पति वाला क्षेत्र बताया गया है।

जंगल की यह हरियाली केवल पर्यटकों के लिए खूबसूरत दृश्य नहीं है। यही वन्यजीवों को भोजन, छिपने की जगह और आवास उपलब्ध कराती है।

गुफाओं और चट्टानों में छिपा अतीत

नौगढ़-चंद्रप्रभा क्षेत्र का एक और आकर्षण इसकी चट्टानी संरचनाएं और गुफाएं हैं। भारत सरकार के पर्यटन पोर्टल के अनुसार अभयारण्य में प्राचीन गुफाएं और शैलाश्रय भी मौजूद हैं। कुछ स्थानों पर प्रागैतिहासिक शैलचित्रों का भी उल्लेख किया गया है।

यही वजह है कि यहां की यात्रा केवल जंगल घूमने तक सीमित नहीं रहती। प्रकृति के साथ इतिहास और पुरातत्व की झलक भी मिलती है।

जंगल के बीच मौजूद इन चट्टानी संरचनाओं को देखकर यह समझ आता है कि हजारों साल पहले भी मनुष्य इन पहाड़ी और वन क्षेत्रों तक पहुंचता रहा होगा।

लोककथाओं ने भी बनाया रहस्यमयी

नौगढ़ और आसपास के जंगलों को लेकर स्थानीय स्तर पर कई कहानियां सुनने को मिलती हैं। पहाड़ों, गुफाओं, पुराने रास्तों और वीरान इलाकों से जुड़ी लोककथाएं पीढ़ियों से लोगों की बातचीत का हिस्सा रही हैं।

ऐसी कहानियां जंगल को रहस्यमयी रूप जरूर देती हैं, लेकिन हर लोककथा को ऐतिहासिक तथ्य मानना सही नहीं होगा।

असल रहस्य जंगल की प्राकृतिक संरचना में ही काफी है। घने पेड़ों के बीच अचानक रास्ता गायब होना, पहाड़ी मोड़ के बाद सामने आ जाना, दूर से आती किसी जंगली जानवर की आवाज और बारिश के बाद बदलता भूगोल किसी भी व्यक्ति को रोमांचित कर सकता है।

जंगल के बीच बसा है लोकजीवन

चंद्रप्रभा क्षेत्र में जंगल से जुड़े स्थानीय समुदायों का जीवन भी इस प्राकृतिक कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

भारत सरकार के पर्यटन पोर्टल के अनुसार अभयारण्य क्षेत्र में स्थानीय आदिवासी समुदाय की मौजूदगी है और उनकी पारंपरिक संस्कृति में नृत्य-संगीत की महत्वपूर्ण भूमिका है।

जंगल इन समुदायों के लिए केवल घूमने की जगह नहीं है। उनकी आजीविका, परंपराओं और स्थानीय ज्ञान का एक हिस्सा जंगल से जुड़ा रहा है।

यहां खामोशी भी सुनाई देती है

नौगढ़ के जंगल की एक खास पहचान इसकी शांति है। शहरों के लगातार शोर से दूर यहां पहुंचने के बाद सबसे पहले आवाजों का अंतर महसूस होता है।

पेड़ों के बीच पक्षियों की आवाज, पत्तियों की सरसराहट, दूर बहते पानी की ध्वनि और कभी-कभी किसी वन्यजीव की आवाज वातावरण को अलग बना देती है।

इसी खामोशी की वजह से राजदरी-देवदरी और चंद्रप्रभा का क्षेत्र लोगों को आकर्षित करता है। चंदौली जिला प्रशासन भी इस क्षेत्र को शांत और प्राकृतिक वातावरण वाला पर्यटन स्थल बताता है।

नौगढ़ के जंगल की सबसे बड़ी कहानी

नौगढ़ की असली कहानी किसी रहस्यमयी घटना में नहीं, बल्कि प्रकृति के उस संतुलन में है जो पहाड़, जंगल, नदी और वन्यजीवों को एक साथ जोड़ता है।

एक तरफ कैमूर क्षेत्र की पहाड़ियां हैं। दूसरी तरफ घना वन है। बीच से नदी और जलधाराएं गुजरती हैं। इन्हीं के बीच राजदरी और देवदरी जैसे जलप्रपात हैं।

1957 में संरक्षण के उद्देश्य से स्थापित चंद्रप्रभा अभयारण्य का इतिहास शेरों से जुड़ा रहा। आज इसकी पहचान अलग-अलग वन्यजीवों, पक्षियों, वनस्पतियों, गुफाओं और जलप्रपातों से है।

यानी नौगढ़ का जंगल समय के साथ बदला जरूर है, लेकिन उसकी प्राकृतिक आत्मा आज भी कायम है।

बदलते समय में जंगल के सामने चुनौती

पर्यटन बढ़ने के साथ जंगलों पर दबाव भी बढ़ सकता है। प्लास्टिक कचरा, तेज आवाज, अनियंत्रित आवाजाही और वन्यजीवों के करीब जाने की कोशिश प्राकृतिक व्यवस्था को प्रभावित कर सकती है।

जंगल में शोर न करना, कचरा न फैलाना, वन्यजीवों को खाना न देना और निर्धारित रास्तों से ही घूमना इस क्षेत्र की प्रकृति को सुरक्षित रखने में मदद कर सकता है।

शायद यही नौगढ़ के जंगल की सबसे बड़ी अनसुनी कहानी है—यह जंगल आज भी अपने बारे में बहुत कुछ कह रहा है, बस उसे सुनने के लिए शहर का शोर पीछे छोड़ना पड़ता है।

जमुना दयाल

जमुना दयाल वाराणसी के निवासी हैं और उन्हें हिंदी समाचार मीडिया में 10 से अधिक वर्षों का गहन रिपोर्टिंग अनुभव है। उन्होंने अमर उजाला और दैनिक जागरण जैसे देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में जिला रिपोर्टर के रूप में कार्य करते हुए खेल, शिक्षा, राजनीति, कृषि तथा सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता से कवर किया है। शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से जनसंचार में परास्नातक (MJMC) की डिग्री प्राप्त की है और यूजीसी नेट (UGC NET) परीक्षा उत्तीर्ण की है।

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