एक करोड़ में एक कम: त्रिपुरा के उनाकोटी में चट्टानों पर उकेरी गईं हजारों आकृतियों का रहस्य
किसने और कब बनाई इतनी विशाल शिलाकृतियां, सवाल आज भी कायम

घने जंगल और पहाड़ियों के बीच मौजूद उनाकोटी सिर्फ धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि विशाल चट्टानों पर उकेरी गई कला का अद्भुत संसार है। यहां भगवान शिव की विशाल आकृति समेत हजारों शिलाचित्र और मूर्तियां दिखाई देती हैं। नाम से जुड़ी लोककथा कहती है कि यहां एक करोड़ से एक कम देवी-देवताओं की मूर्तियां बनाई गई थी
त्रिपुरा के उत्तर-पूर्वी हिस्से में घने जंगलों और पहाड़ियों के बीच स्थित उनाकोटी भारत के उन पुरातात्विक स्थलों में शामिल है, जहां प्रकृति और मानव कला का अद्भुत मेल दिखाई देता है। यहां विशाल चट्टानों को काटकर बनाई गई मूर्तियां और उभरी हुई आकृतियां देखकर सहज ही सवाल उठता है कि आखिर सदियों पहले इतने बड़े पैमाने पर यह काम कैसे किया गया होगा।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने उनाकोटी को प्राचीन शैव तीर्थ के रूप में दर्ज किया है। विशाल चट्टानी आकृतियों के कारण इसे मानव रचनात्मक प्रतिभा का महत्वपूर्ण उदाहरण माना गया है। यह स्थल यूनेस्को की संभावित विश्व धरोहर सूची में भी शामिल किया गया है।
क्यों पड़ा नाम ‘उनाकोटी’?
‘उनाकोटी’ का अर्थ है—एक करोड़ से एक कम यानी 99,99,999।
इस नाम के पीछे एक प्रसिद्ध लोककथा है। कहा जाता है कि भगवान शिव एक रात एक करोड़ देवी-देवताओं को लेकर काशी की ओर जा रहे थे। रास्ते में उन्होंने त्रिपुरा के इस पहाड़ी क्षेत्र में रात बिताने का निर्णय लिया और सभी देवी-देवताओं से सूर्योदय से पहले उठकर यात्रा शुरू करने को कहा।
सुबह भगवान शिव तो उठ गए, लेकिन बाकी देवी-देवता नहीं उठे। शिव अकेले ही काशी की ओर निकल पड़े। लोकविश्वास के अनुसार, इसी कारण यहां एक करोड़ से एक कम देवी-देवताओं की आकृतियां रह गईं और स्थान का नाम उनाकोटी पड़ गया।
हालांकि यह कथा धार्मिक और लोकपरंपरा का हिस्सा है। मूर्तियों की वास्तविक संख्या को लेकर ‘एक करोड़ से एक कम’ का आंकड़ा ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित संख्या नहीं माना जाता।
चट्टान पर उकेरे गए विशाल भगवान शिव
उनाकोटी की सबसे आकर्षक पहचान यहां चट्टान पर उकेरी गई विशाल शिव आकृति है। इसे स्थानीय रूप से उनाकोटिश्वर काल भैरव से भी जोड़ा जाता है।
विशाल चेहरे पर जटाएं, आभूषण और चेहरे की प्रभावशाली बनावट इसे दूर से ही अलग पहचान देती है। इसके आसपास भी कई देवी-देवताओं और धार्मिक आकृतियों के शिलाचित्र दिखाई देते हैं।
इन आकृतियों की खासियत यह है कि कलाकारों ने अलग-अलग चट्टानों को ही अपनी कैनवास बनाया। कहीं आकृतियां चट्टान से उभरी हुई हैं तो कहीं सीधे पत्थर की सतह पर नक्काशी दिखाई देती है।
जंगल के बीच बना ‘पत्थरों का संग्रहालय’
उनाकोटी को किसी पारंपरिक मंदिर परिसर की तरह समझना अधूरा होगा। यहां पहाड़, चट्टान, झरने और जंगल स्वयं इस प्राचीन कला के हिस्से बन जाते हैं।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अनुसार, यह स्थल विशाल चट्टानी गैलरी जैसा दिखाई देता है, जिसमें ऊंची उभरी हुई आकृतियां और शिलाचित्र मौजूद हैं।
यही कारण है कि उनाकोटी पहुंचने वाला पर्यटक किसी एक मंदिर के दर्शन नहीं करता, बल्कि जंगल के बीच फैली एक विशाल प्राचीन शिल्प-गैलरी को देखता है।
किसने बनाईं ये मूर्तियां?
उनाकोटी की सबसे बड़ी पहेलियों में से एक इसके शिल्पकारों और निर्माण की सटीक अवधि से जुड़ी है। यहां मौजूद कला की शैली को लेकर इतिहास और पुरातत्व में अलग-अलग व्याख्याएं मिलती हैं।
स्थल की धार्मिक पहचान मुख्य रूप से शैव परंपरा से जुड़ी है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण भी इसे प्राचीन शैव तीर्थ बताता है।
लेकिन इन विशाल आकृतियों को किस कलाकार या समूह ने किस समय और किन तकनीकों से बनाया, इसका पूरी तरह स्पष्ट उत्तर आज भी रहस्य का हिस्सा है।
इतनी बड़ी मूर्तियां कैसे बनाई गई होंगी?
आज मशीनों की मदद से पत्थर काटना अपेक्षाकृत आसान है, लेकिन सदियों पहले विशाल चट्टानों पर इतनी बड़ी आकृतियां तैयार करना बेहद कठिन काम रहा होगा।
चट्टान की सतह को काटकर चेहरे, मुकुट, आभूषण और शरीर के दूसरे हिस्सों को उभारने के लिए कलाकारों को लंबे समय तक काम करना पड़ा होगा। यही तकनीकी चुनौती उनाकोटी को और खास बनाती है।
सिर्फ धार्मिक स्थल नहीं, कला की विरासत
उनाकोटी की अहमियत केवल धार्मिक मान्यताओं तक सीमित नहीं है। यहां मौजूद चट्टानी कला पूर्वोत्तर भारत की प्राचीन सांस्कृतिक परंपराओं और शिल्पकौशल की झलक भी देती है।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इसे अपनी संभावित विश्व धरोहर सूची में शामिल स्थलों में रखा है और इसके महत्व को मानव रचनात्मक प्रतिभा से जोड़ा है।
हर साल उमड़ते हैं श्रद्धालु
उनाकोटी आज भी धार्मिक आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र है। विशेष अवसरों पर यहां श्रद्धालुओं की भीड़ जुटती है। प्राकृतिक वातावरण और प्राचीन शिलाकृतियां इसे पर्यटन की दृष्टि से भी खास बनाती हैं।
त्रिपुरा पर्यटन के अनुसार राज्य की पहचान प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थलों और चट्टान काटकर बनाई गई प्राचीन मूर्तियों से भी जुड़ी है।
रहस्य आज भी बरकरार
उनाकोटी के बारे में सबसे दिलचस्प बात यह है कि यहां लोककथा, धार्मिक विश्वास और पुरातात्विक इतिहास तीनों एक साथ दिखाई देते हैं।
क्या वास्तव में यहां एक करोड़ से एक कम मूर्तियां थीं?
इसका कोई प्रमाणित आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।
इन विशाल आकृतियों को किसने बनाया?
इसका भी पूरी तरह निश्चित उत्तर नहीं है।
लेकिन एक बात निर्विवाद है—घने जंगलों और पहाड़ियों के बीच चट्टानों पर उकेरी गई यह विशाल कला आज भी लोगों को हैरान करती है। शायद यही वजह है कि उनाकोटी को देखने के बाद भी उसके कई सवाल मन में अनसुलझे रह जाते हैं।


