जब हुनर ने दिव्यांगता को पीछे छोड़ दिया: मोबाइल कैमरे से दुनिया तक पहुंची इन कलाकारों की कला
किसी ने पैरों से कैनवास रंगा तो किसी ने व्हीलचेयर को बना लिया डांस का साथी, किसी की आवाज ने जीते लाखों दिल; इन कलाकारों ने साबित किया कि प्रतिभा शरीर की सीमाओं की मोहताज नहीं होती
किसी कलाकार के लिए सबसे बड़ी जरूरत मंच होती है। लेकिन अगर मंच तक पहुंचने का रास्ता ही मुश्किल हो तो क्या प्रतिभा खत्म हो जाती है? भारत के कई दिव्यांग कलाकारों की कहानियां इसका जवाब देती हैं—नहीं।
इन कलाकारों ने कभी पैरों से चित्र बनाए, कभी व्हीलचेयर पर नृत्य किया, कभी हाथों के सहारे ब्रेकडांस किया तो किसी ने अपनी आवाज को दुनिया तक पहुंचाने के लिए डिजिटल मंच का सहारा लिया। सोशल मीडिया ने इन प्रतिभाओं के लिए वह रास्ता खोल दिया, जहां दर्शक सीधे कलाकार तक पहुंच सकते हैं।
आज इंटरनेट सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं है। यह उन कलाकारों के लिए भी बड़ा मंच बन चुका है, जिन्हें कभी मुख्यधारा के मंचों तक पहुंचने में मुश्किल होती थी।
प्रांजल बिस्वास: आवाज़ जिसने दिलों को छुआ
दृष्टिहीन गायक प्रांजल बिस्वास की गायकी में शास्त्रीय संगीत की गहराई और लोकधुनों की मिठास है। सोशल मीडिया पर उनके गीतों ने लाखों लोगों को प्रभावित किया। उनकी आवाज़ यह संदेश देती है कि संगीत देखने से नहीं, महसूस करने से जन्म लेता है।
कमलकांत शर्मा: पैरों से बनाई रंगों की दुनिया
एक दुर्घटना में दोनों हाथ गंवाने के बाद भी कमलकांत शर्मा ने हार नहीं मानी। उन्होंने पैरों से ब्रश पकड़कर चित्र बनाना शुरू किया और देखते ही देखते उनकी पेंटिंग्स सोशल मीडिया पर लोकप्रिय हो गईं। उनकी कला यह साबित करती है कि सृजन की शक्ति किसी सीमा में बंधी नहीं होती।
कमलेश पटेल: डांस की नई परिभाषा
पोलियो के कारण दोनों पैरों से असक्षम कमलेश पटेल ने अपने हाथों के सहारे ऐसा नृत्य प्रस्तुत किया, जिसने दुनिया को चौंका दिया। उनके वीडियो करोड़ों बार देखे जा चुके हैं। उनकी कहानी यह बताती है कि जुनून और मेहनत किसी भी बाधा को छोटा बना सकते हैं।
स्वाति सिंह: सुरों से रोशन दुनिया
दृष्टिबाधित गायिका स्वाति सिंह अपनी मधुर आवाज़ और हारमोनियम वादन के लिए जानी जाती हैं। उनके गीत सोशल मीडिया पर खूब पसंद किए जाते हैं। उनकी कला यह संदेश देती है कि असली रोशनी इंसान के भीतर होती है।
विनोद ठाकुर ने हाथों को बना लिया डांस का सहारा

विनोद ठाकुर का नाम दिव्यांग डांसर्स की प्रेरक कहानियों में प्रमुखता से लिया जाता है। बिहार में जन्मे विनोद के दोनों पैर नहीं हैं। इसके बावजूद उन्होंने डांस को अपना जुनून बनाया।
2010 में इंडियाज गॉट टैलेंट के मंच पर उन्होंने हाथों और शरीर के ऊपरी हिस्से की ताकत से ऐसे डांस मूव्स दिखाए कि दर्शक हैरान रह गए। इसके बाद उन्हें राष्ट्रीय पहचान मिली। आज वे डांस, फिटनेस और मोटिवेशन से जुड़े कामों के जरिए लोगों को प्रेरित करते हैं।
उनकी कहानी का सबसे बड़ा संदेश यही है कि शरीर की कोई कमी हुनर के रास्ते की आखिरी दीवार नहीं होती।
पुलकित शर्मा ने व्हीलचेयर को बना लिया डांस पार्टनर
दिल्ली के पुलकित शर्मा सेरेब्रल पाल्सी के साथ पैदा हुए। उनके शरीर की गतिविधियां सीमित थीं। लेकिन डांस के प्रति उनका लगाव कम नहीं हुआ।
कोरोना काल में उन्होंने इंस्टाग्राम पर अपने डांस वीडियो साझा करना शुरू किया। देखते ही देखते उनके व्हीलचेयर डांस के वीडियो लोगों तक पहुंचने लगे। भांगड़ा से लेकर फिल्मी गीतों तक उन्होंने अलग-अलग अंदाज में प्रस्तुति दी।
उनके वीडियो को फिल्म और मनोरंजन जगत की हस्तियों ने भी देखा। पुलकित कहते हैं कि डांस ने उनके आत्मविश्वास को नई ताकत दी।
सोनू वर्मा: पोलियो के बाद भी नहीं रुका नृत्य
दिल्ली के सोनू वर्मा को बचपन में पोलियो हुआ। उनके शरीर का काफी हिस्सा प्रभावित हुआ, लेकिन नृत्य के प्रति उनका जुनून बना रहा।
उन्होंने भरतनाट्यम और सूफी नृत्य सीखा। 2010 में उन्होंने ‘रामायण ऑन व्हील्स’ में भगवान राम की भूमिका निभाकर मंच पर अपनी अलग पहचान बनाई। उनके लिए नृत्य केवल प्रस्तुति नहीं, बल्कि खुद को व्यक्त करने का माध्यम बन गया।
सोनू गुप्ता: जब पहियों को बना लिया पैर
कानपुर से जुड़े सोनू गुप्ता की कहानी भी कम प्रेरक नहीं है। पोलियो के कारण उनके पैरों पर असर पड़ा। इसके बाद उन्होंने नृत्य सीखा और व्हीलचेयर को अपनी कला का हिस्सा बना लिया।
वे शास्त्रीय नृत्य के साथ मार्शल आर्ट में भी दक्ष हैं। राष्ट्रीय स्तर पर टेबल टेनिस खेल चुके सोनू का कहना है कि उन्होंने लोगों की हैरानी को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। उनके लिए व्हीलचेयर के पहिए ही उनके पैर बन गए।
उत्तम कुमार: पैरों से रंगों की दुनिया
जम्मू-कश्मीर के कलाकार उत्तम कुमार के दोनों हाथ काम नहीं करते और उनका एक पैर भी प्रभावित है। लेकिन उन्होंने अपने पैरों को ही ब्रश पकड़ने का माध्यम बनाया।
वे पैरों से कैनवास और डिजिटल कला बनाते हैं। कला के साथ वे दिव्यांग बच्चों के लिए भी काम करते हैं। उनकी कहानी यह बताती है कि हाथों से चित्र बनाना संभव न हो तो कलाकार रास्ता बदल सकता है, कला नहीं।
सुनीता थ्रिप्पनक्करा: मुंह से बनाई प्रकृति की तस्वीरें

केरल की सुनीता थ्रिप्पनक्करा को बचपन से पोलियो था। बाद में उनके हाथों की ताकत भी कम होती गई। लेकिन चित्रकारी के प्रति उनका प्रेम नहीं बदला।
उन्होंने मुंह से ब्रश पकड़कर चित्र बनाना शुरू किया। प्रकृति से जुड़े उनके चित्रों ने लोगों का ध्यान खींचा। एक समय उन्हें लगा था कि हाथों की कमजोरी के कारण वे अब चित्र नहीं बना पाएंगी, लेकिन उन्होंने चित्रकारी का तरीका बदल दिया।
नूर जलीला: गायन से पेंटिंग तक

केरल की नूर जलीला का जन्म बिना अग्रबाहुओं और पैरों के हुआ। लेकिन उन्होंने अपनी शारीरिक चुनौतियों को अपने सपनों पर हावी नहीं होने दिया।
वे गायिका, वायलिन वादक, चित्रकार और मोटिवेशनल स्पीकर के रूप में काम कर रही हैं। उनकी कहानी कला के कई रूपों को एक साथ जोड़ती है।
दृष्टिबाधित कलाकारों के लिए संगीत बना पहचान
भारत में दृष्टिबाधित कलाकारों की भी बड़ी दुनिया है। समार्थनम ट्रस्ट के ‘सुनाधा’ मंच पर दृष्टिबाधित और अन्य दिव्यांग संगीतकारों को मंच दिया जा रहा है। इसमें कर्नाटक के दृष्टिबाधित संगीतकार अशोक एच., असम के गिटारिस्ट नमचांगबुइंग जेमे और दृष्टिबाधित नृत्यांगना रेणुका राजपूत जैसे कलाकार शामिल हैं।
यह उदाहरण दिखाता है कि डिजिटल और संस्थागत मंच मिलकर कलाकारों को आगे बढ़ने का अवसर दे सकते हैं।
सुनील लोढ़ी: बिना औपचारिक प्रशिक्षण के आवाज ने बनाई पहचान
हाल में दृष्टिबाधित गायक सुनील लोढ़ी भी चर्चा में आए। उन्होंने बिना औपचारिक संगीत प्रशिक्षण के भक्ति गीत ‘मोरे संकट के कटैया’ में अपनी आवाज दी। उनकी प्रस्तुति को सराहना मिली और इससे उन्हें संगीत की दुनिया में नई पहचान मिलने लगी।
यह कहानी बताती है कि कभी-कभी एक अवसर वर्षों से छिपी प्रतिभा को दुनिया के सामने ला सकता है।
सिर्फ डांस और संगीत नहीं, कला के दूसरे रास्ते भी खुले
दिव्यांग कलाकारों की दुनिया केवल गायन और नृत्य तक सीमित नहीं है। मुंबई में पैरों से चित्रकारी करने वाले नदिम शेख और बंदेनवाज नदाफ जैसे कलाकार भी सक्रिय हैं। नदिम शेख लंबे समय से फुट पेंटिंग कर रहे हैं और उनकी कला प्रदर्शित हो चुकी है।
इसी तरह देश में ऐसे कलाकार भी सामने आए हैं, जिन्होंने पेंटिंग के लिए हाथों की जगह पैर या मुंह का इस्तेमाल किया। इन कलाकारों की कला यह सवाल खड़ा करती है कि आखिर कलाकार की पहचान उसके हाथ से होती है या उसकी कल्पना से?
दिव्यांग कलाकारों की नई पीढ़ी
2026 में भी ऐसे कई कलाकार सामने आ रहे हैं। हालिया रिपोर्टों में गायिका क्रिस्टीन रोज तोजो, वायलिन वादक रुखसाना अनवर, डांसर एल्डो कुरियाकोस और जादूगर विष्णु आर जैसे कलाकारों का उल्लेख हुआ है। ये कलाकार संगीत, नृत्य और मनोरंजन के अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी पहचान बना रहे हैं।
इससे साफ है कि यह केवल कुछ चर्चित नामों की कहानी नहीं है। देशभर में दिव्यांग कलाकारों की एक नई पीढ़ी तैयार हो रही है।
सोशल मीडिया बना सबसे बड़ा खुला मंच
इन कहानियों में एक चीज समान दिखाई देती है—डिजिटल मंच।
पहले किसी कलाकार को पहचान बनाने के लिए बड़े आयोजक, टीवी शो या किसी संस्था की जरूरत पड़ती थी। अब एक मोबाइल फोन से बनाई गई छोटी-सी वीडियो भी लाखों लोगों तक पहुंच सकती है।
इंस्टाग्राम रील, यूट्यूब वीडियो और फेसबुक पोस्ट ने कलाकार और दर्शक के बीच की दूरी कम कर दी है। यही कारण है कि छोटे शहरों और सामान्य परिवारों से आने वाले कलाकार भी राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना पा रहे हैं।
लेकिन वायरल होना ही मंजिल नहीं
सोशल मीडिया ने अवसर जरूर बढ़ाए हैं, लेकिन चुनौतियां अभी खत्म नहीं हुई हैं। कई कलाकारों को प्रशिक्षण, आर्थिक मदद, बेहतर उपकरण, यात्रा और मंच की सुविधा की जरूरत होती है।
दिव्यांग कलाकारों को केवल ‘प्रेरणा’ की तरह देखने के बजाय उनकी कला को पेशेवर अवसर देना भी जरूरी है। उन्हें कार्यक्रमों में काम, कला की उचित कीमत और सम्मानजनक व्यवहार मिलना चाहिए।
समाज को भी बदल रही हैं ये कहानियां
इन कलाकारों की सफलता का असर सिर्फ उनके जीवन तक सीमित नहीं है। उनकी प्रस्तुतियां समाज की पुरानी सोच को भी चुनौती देती हैं।
जब कोई व्यक्ति व्हीलचेयर पर नृत्य करता है, पैरों से पेंटिंग बनाता है या दृष्टिबाधित होकर संगीत की प्रस्तुति देता है, तो सवाल उसकी कमी का नहीं, उसकी कला का होना चाहिए।
यही बदलाव इन कहानियों की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
शरीर की सीमा से बड़ी होती है प्रतिभा
मानसी से लेकर विनोद ठाकुर, पुलकित शर्मा, सोनू वर्मा, सोनू गुप्ता, उत्तम कुमार, सुनीता थ्रिप्पनक्करा और नूर जलीला तक की कहानियां एक बात साफ करती हैं—प्रतिभा को शरीर की सीमाओं में कैद नहीं किया जा सकता।
किसी ने हाथों को पैर बनाया, किसी ने पैरों को ब्रश, किसी ने व्हीलचेयर को नृत्य का साथी और किसी ने अपनी आवाज को पहचान का माध्यम।
डिजिटल दुनिया ने इनके लिए एक नया दरवाजा जरूर खोला है, लेकिन असली बदलाव तब होगा जब समाज इन्हें केवल ‘दिव्यांग कलाकार’ के रूप में नहीं, बल्कि कलाकार के रूप में देखेगा।
क्योंकि कला की कोई व्हीलचेयर नहीं होती, कोई अंधेरा नहीं होता और कोई सीमा नहीं होती। कला सिर्फ रास्ता खोजती है—और फिर दुनिया तक पहुंच जाती है।



