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फीचर स्टोरी: बिना चूने के बना स्थापत्य का अजूबा: जानिए मोढेरा सूर्य मंदिर के 52 खंभों, हीरा जड़ित गर्भगृह और खगोलीय विज्ञान का रहस्य

भारत की प्राचीन वास्तुकला केवल पत्थरों की तराशने की कला नहीं थी, बल्कि यह खगोल विज्ञान, गणित और वास्तुकला का एक अद्भुत संगम थी। इसका सबसे बड़ा प्रमाण गुजरात के मेहसाणा जिले में पुष्पावती नदी के तट पर स्थित मोढेरा का सूर्य मंदिर (Modhera Sun Temple) है। 11वीं शताब्दी में निर्मित यह मंदिर न केवल अपनी बारीक नक्काशी के लिए जाना जाता है, बल्कि सूर्य की गति और किरणों के साथ इसके सटीक वैज्ञानिक तालमेल के कारण पूरी दुनिया में अद्वितीय माना जाता है।

आइए, जानते हैं सोलंकी वास्तुकला के इस शिखर, इसके निर्माण रहस्य और इतिहास के थपेड़ों को सहने वाली इस महान धरोहर की पूरी कहानी।

21 मार्च और 23 सितंबर का वो ‘खगोलीय करिश्मा’

सभा मंडप का शानदार दृश्य (Photo: Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0)

मोढेरा सूर्य मंदिर का निर्माण इस तरह किया गया है कि वर्ष के दो विशेष दिनों—21 मार्च और 23 सितंबर (विषुव / Equinoxes), जब दिन और रात बराबर होते हैं—सूर्योदय की सबसे पहली किरण मंदिर के मुख्य द्वार से प्रवेश करती हुई सीधे गर्भगृह के अंतिम छोर तक पहुँचती थी।

  • हीरे की चमक से जगमगाता गर्भगृह: प्राचीन काल में गर्भगृह में स्थापित भगवान सूर्य की मूर्ति के मस्तक पर एक अमूल्य हीरा जड़ा हुआ था। जैसे ही सुबह की पहली किरण उस हीरे पर पड़ती थी, पूरा मंदिर परिसर एक अलौकिक और दिव्य रोशनी से चमक उठता था।
  • 52 खंभे और साल के 52 सप्ताह: मंदिर के विशाल ‘सभा मंडप’ को थामने वाले 52 नक्काशीदार स्तंभ वर्ष के 52 सप्ताहों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन स्तंभों पर उकेरी गई आकृतियाँ दिन-रात के चक्र और ऋतुओं के बदलाव को दर्शाती हैं।
  • 12 आदित्यों का रूप: मंदिर की दीवारों पर भगवान सूर्य के 12 अलग-अलग रूपों (जो साल के 12 महीनों के सूर्य का प्रतिनिधित्व करते हैं) को बेहद सूक्ष्मता से तराशा गया है।
मंदिर की नक्काशी और मूर्तिकला (Photo: Jesic Patadiya / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0)

बिना चूने-गारे के बना ‘भूकंपरोधी’ ढांचा

  • संस्थापक और निर्माण काल: इस ऐतिहासिक मंदिर का निर्माण सोलंकी (चालुक्य) राजवंश के प्रतापी राजा भीमदेव प्रथम ने 1026-1027 ईस्वी में करवाया था।
  • मारू-गुर्जर शैली: यह मंदिर उत्तर भारतीय हिंदू वास्तुकला की भव्य मारू-गुर्जर शैली का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है।
  • इंटर लॉकिंग तकनीक: इस विशाल मंदिर के निर्माण में चूने या गारे का उपयोग बिल्कुल नहीं किया गया। पत्थरों को ‘इंटर लॉकिंग सिस्टम’ (कट-एंड-फिट विधि) से जोड़ा गया था। यही वजह है कि सदियों पुराने कई भूकंपों के बाद भी यह ढांचा मजबूती से खड़ा रहा।

तीन भागों में बँटा अद्भुत मंदिर परिसर

यह मंदिर परिसर मुख्य रूप से तीन भागों में विभाजित है:

(क) सूर्य कुंड (रामकुंड):

मंदिर में प्रवेश करते ही एक भव्य आयताकार जलाशय दिखाई देता है, जिसे ‘सूर्य कुंड’ या ‘रामकुंड’ कहा जाता है। इसमें नीचे उतरने के लिए आकर्षक ज्यामितीय (Geometric) सीढ़ियाँ बनी हैं। इस कुंड की सीढ़ियों पर 108 छोटे-बड़े मंदिर/देवरियाँ स्थित हैं, जो गणेश, शिव, विष्णु और शीतला माता को समर्पित हैं।

(ख) सभा मंडप (नृत्य मंडप):

सूर्य कुंड से ऊपर उठने पर भव्य सभा मंडप आता है, जिसका उपयोग धार्मिक उत्सवों, संगीत और शास्त्रीय नृत्य के लिए होता था। इसके 52 खंभों पर रामायण, महाभारत और कृष्ण लीला के प्रसंगों को उकेरा गया है। इसकी छत पर की गई बारीक फूल-पत्तियों की नक्काशी सोलंकी कारीगरी का चरम प्रस्तुत करती है।

(ग) गूढ़ मंडप (गर्भगृह):

सभा मंडप के ठीक पीछे मुख्य मंदिर संरचना ‘गूढ़ मंडप’ है, जिसके अंदर ‘गर्भगृह’ स्थित था। यहाँ भगवान सूर्य की मुख्य प्रतिमा स्थापित थी। गर्भगृह के नीचे एक गहरा परिक्रमा पथ (तहखाना) भी बनाया गया था।

आक्रमण की त्रासदी और पूजा का रुकना

13वीं और 14वीं शताब्दी के दौरान अलाउद्दीन खिलजी के सैन्य अभियानों में इस मंदिर पर हमला हुआ। आक्रमणकारियों ने मंदिर के मुख्य हिस्से को नुकसान पहुँचाया और गर्भगृह में स्थापित सूर्य देव की मुख्य स्वर्ण/धातु प्रतिमा को खंडित कर दिया।

सनातन धर्म की परंपरा के अनुसार खंडित मूर्तियों की पूजा नहीं की जाती, इसलिए उसी समय से यहाँ दैनिक पूजा-अर्चना हमेशा के लिए बंद हो गई। आज गर्भगृह बिना किसी मूर्ति के शांत खड़ा है।

आज का मोढेरा: राष्ट्रीय धरोहर और ‘उत्तरार्ध महोत्सव’

सूर्य कुंड का विस्तृत दृश्य. Photo: Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0

वर्तमान में यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा एक संरक्षित राष्ट्रीय स्मारक के रूप में प्रबंधित किया जाता है।

हर साल जनवरी के तीसरे सप्ताह में गुजरात पर्यटन विभाग यहाँ तीन दिवसीय ‘उत्तरार्ध शास्त्रीय नृत्य महोत्सव’ (Modhera Dance Festival) आयोजित करता है। इस दौरान जब देश-विदेश के दिग्गज कलाकार प्राचीन मंदिर की जगमगाती पृष्ठभूमि में नृत्य और संगीत की प्रस्तुति देते हैं, तो मोढेरा का अतीत एक बार फिर जीवित हो उठता है।

जमुना दयाल

जमुना दयाल वाराणसी के निवासी हैं और उन्हें हिंदी समाचार मीडिया में 10 से अधिक वर्षों का गहन रिपोर्टिंग अनुभव है। उन्होंने अमर उजाला और दैनिक जागरण जैसे देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में जिला रिपोर्टर के रूप में कार्य करते हुए खेल, शिक्षा, राजनीति, कृषि तथा सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता से कवर किया है। शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से जनसंचार में परास्नातक (MJMC) की डिग्री प्राप्त की है और यूजीसी नेट (UGC NET) परीक्षा उत्तीर्ण की है।

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