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भक्ति या जानलेवा जोखिम? भारत के सबसे खतरनाक त्योहार, जहाँ परंपरा के नाम पर दांव पर लगती है जिंदगी

भारत में आस्था, पराक्रम और सदियों पुरानी परंपराओं से जुड़े कई ऐसे त्योहार और धार्मिक अनुष्ठान हैं, जिनमें अत्यधिक जोखिम शामिल होता है। इन उत्सवों में हिस्सा लेने वाले लोग ईश्वर भक्ति और परंपरा को बनाए रखने के लिए अपनी जान दांव पर लगा देते हैं।

यहाँ भारत के सबसे खतरनाक त्योहारों, उनके इतिहास, परंपराओं और उनमें निहित जोखिमों का विस्तृत विवरण दिया गया है:

1. बानी उत्सव (Bani Festival) – आंध्र प्रदेश

बानी उत्सव: स्रोत- इंटरनेट मीडिया

आंध्र प्रदेश के कुरनूल ज़िले में स्थित देवरगट्टू (Devaragattu) के माला मल्लेश्वर स्वामी मंदिर में विजयादशमी (दशहरा) की रात बानी उत्सव मनाया जाता है।

  • जोखिम: मध्य रात्रि में लगभग 10,000 से अधिक लोग हाथों में भारी लाठियाँ (जिनमें कई बार लोहे के छल्ले लगे होते हैं) लेकर मंदिर परिसर में इकट्ठा होते हैं। दो से तीन समूहों में बंटे लोग एक-दूसरे के सिर और शरीर पर लाठियों से तेज़ वार करते हैं। इस उत्सव में हर साल सैकड़ों लोग गंभीर रूप से घायल और खून से लथपथ होते हैं, और कई बार मौते भी हो चुकी हैं।
  • इतिहास और परंपरा: यह परंपरा सदियों पुरानी है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस स्थान पर भगवान शिव (मल्लेश्वर) और माता पार्वती ने ‘मणि’ और ‘मल्ला’ नाम के दो भयंकर असुरों का संहार किया था। मंदिर की उत्सव मूर्तियों को अपने गाँव ले जाने के अधिकार और भगवान के आशीर्वाद की प्राप्ति के लिए ग्रामीण यह लाठी युद्ध करते हैं।

2. जल्लीकट्टू (Jallikattu) – तमिलनाडु

जल्लीकट्टू: स्रोत – विकिपीडिया 

तमिलनाडु में पोंगल उत्सव के दौरान विशेष रूप से मदुरै, अलांगनाल्लूर और तिरुचिरापल्ली में ‘जल्लीकट्टू’ का आयोजन किया जाता है।

  • जोखिम: एक तंग बाड़े (वागु वाडाल) से आक्रामक देसी सांडों को छोड़ा जाता है और मैदान में मौजूद प्रतिभागी सांड की कूबड़ (Hump) को पकड़कर उसे काबू में करने की कोशिश करते हैं। सांडों के सींगों से बिंधने, पेट और सीने में गंभीर चोट लगने तथा कुचले जाने के कारण हर साल कई प्रतिभागियों व दर्शकों की जान चली जाती है।
  • इतिहास और परंपरा: यह खेल लगभग 2,000 वर्ष से भी अधिक पुराना है और इसका उल्लेख प्राचीन संगम साहित्य में ‘येरु तझुवुधल’ (सांड का आलिंगन) के रूप में मिलता है। ‘जल्लीकट्टू’ शब्द ‘जल्ली’ (सिक्के) और ‘कट्टू’ (पोटली) से मिलकर बना है, जहाँ सांड के सींगों पर बंधी सिक्कों की थैली को हासिल करना शौर्य की पहचान माना जाता था। यह कृषि संस्कृति और देसी नस्ल के सांडों के संरक्षण का प्रतीक है।

3. हिंगोट मेला (Hingot Mela) – मध्य प्रदेश

हिंगोट युद्ध – स्रोत – विकिपीडिया 

इंदौर ज़िले के गौतमपुरा गाँव में हर साल दिवाली के अगले दिन (गोवर्धन पूजा) हिंगोट युद्ध का आयोजन किया जाता है।

  • जोखिम: इसमें दो दल – ‘तूर्रा’ (गौतमपुरा निवासी) और ‘कलंगी’ (रणमऊ निवासी) एक-दूसरे के आमने-सामने खड़े होते हैं। दोनों तरफ के लोग ‘हिंगोट’ (एक जंगली फल की सूखी खोल जिसमें बारूद, कंकड़ और सुतली भरी होती है) में आग लगाकर एक-दूसरे पर किसी रॉकेट की तरह फेंकते हैं। ये जलते हुए हिंगोट सीधे लोगों के शरीर, चेहरे और आँखों पर जाकर लगते हैं, जिससे लोग बुरी तरह झुलस जाते हैं।
  • इतिहास और परंपरा: इसकी शुरुआत मुग़ल/मराठा काल के सैन्य इतिहास से मानी जाती है। उस समय इस क्षेत्र की सीमाओं की सुरक्षा करने वाले सैनिक दुश्मनों पर हिंगोट फल में बारूद भरकर हमला करते थे। बाद में यह सैन्य अभ्यास एक पारंपरिक अग्नि-युद्ध के रूप में तब्दील हो गया।

4. चरक पूजा और गाजन (Charak Puja / Hook Swinging) – पश्चिम बंगाल और ओडिशा

चरक पूजा– स्रोत – विकिपीडिया 

बंगाली नववर्ष की पूर्व संध्या (चैत्र संक्रांति) पर पश्चिम बंगाल, ओडिशा और असम के कुछ हिस्सों में चरक पूजा आयोजित की जाती है।

  • जोखिम: ‘संन्यासी’ कहलाने वाले श्रद्धालु अपनी पीठ और त्वचा के आर-पार लोहे के बड़े और नुकीले हुक चुभोते हैं। फिर इन हुक को रस्सी के सहारे 30-40 फीट ऊंचे बांस या लकड़ी के खंभे (चरक गाछ) से बांधकर उन्हें हवा में गोल-गोल घुमाया जाता है। थोड़ी सी भी चूक होने पर त्वचा फटने या नीचे गिरकर रीढ़ की हड्डी टूटने का जोखिम रहता है।
  • इतिहास और परंपरा: यह 14वीं शताब्दी या उससे भी पुरानी तांत्रिक शिव-उपासना परंपरा है। भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए भक्त शारीरिक कष्ट और कठोर तपस्या का मार्ग चुनते हैं। मान्यता है कि इस कठिन भक्ति से गाँव से बीमारियाँ दूर होती हैं और सुख-समृद्धि आती है।

5. अग्नि केलि / थूतेधारा (Agni Keli) – कर्नाटक

अग्नि केलि-स्रोत – इंटरनेट मीडिया 

दक्षिण कन्नड़ ज़िले (मंगलौर) के प्रसिद्ध कटेइल दुर्गापरमेश्वरी मंदिर में वार्षिक उत्सव के दौरान अग्नि केलि की परंपरा निभाई जाती है।

  • जोखिम: ‘अथातूर’ और ‘मेलातूर’ नामक दो गाँवों के श्रद्धालु आमने-सामने खड़े होकर जलती हुई ताड़ की पत्तियों की मशालें एक-दूसरे पर फेंकते हैं। प्रत्येक व्यक्ति को केवल तीन बार मशाल फेंकने की अनुमति होती है। आग की लपटों और जलते अंगारों से प्रतिभागियों का शरीर झुलसने का निरंतर ख़तरा रहता है।
  • इतिहास और परंपरा: यह अनुष्ठान देवी दुर्गा द्वारा राक्षस अरुणासुर के वध की पौराणिक कथा से जुड़ा है। भक्त मानते हैं कि अग्नि द्वारा इस तरह की पीड़ा सहना देवी के प्रति अटूट निष्ठा का प्रमाण है और इससे शरीर और मन की शुद्धि होती है।

भारत के प्रमुख खतरनाक त्योहारों का सारांश

त्योहार / खेलराज्य / क्षेत्रमुख्य खतरासांस्कृतिक व पौराणिक आधार
बानी उत्सवआंध्र प्रदेश (कुरनूल)सिर पर भारी लाठियों का वारअसुरों पर भगवान शिव-पार्वती की विजय
जल्लीकट्टूतमिलनाडुसांडों के सींगों से बिंधनासंगमकालीन कृषि परंपरा और शौर्य प्रदर्शन
हिंगोट मेलामध्य प्रदेश (इंदौर)जलते बारूदी हिंगोट से झुलसनाप्राचीन सैन्य अभ्यास और सीमा सुरक्षा
चरक पूजापश्चिम बंगाल / ओडिशापीठ में लोहे के हुक चुभोकर झूलनाभगवान शिव की कठोर तांत्रिक साधना
अग्नि केलिकर्नाटक (कटेइल)जलती मशालों से शरीर जलनादेवी दुर्गा द्वारा असुर विनाश का उत्सव

निष्कर्ष: आस्था और आधुनिकता का द्वंद्व

भारत के ये खतरनाक त्योहार सिर्फ़ जोखिम और चोटों की कहानी नहीं हैं, बल्कि ये सदियों पुरानी लोक मान्यताओं, सामुदायिक एकता और अटूट विश्वास का जीवंत प्रमाण हैं। यद्यपि समय-समय पर न्यायालयों और मानवाधिकार संगठनों द्वारा सुरक्षा और प्रतिबंधों को लेकर सवाल उठाए गए हैं, फिर भी श्रद्धालुओं का मानना है कि ईश्वरीय आस्था के आगे शारीरिक कष्ट और भय बौने साबित होते हैं।

जमुना दयाल

जमुना दयाल वाराणसी के निवासी हैं और उन्हें हिंदी समाचार मीडिया में 10 से अधिक वर्षों का गहन रिपोर्टिंग अनुभव है। उन्होंने अमर उजाला और दैनिक जागरण जैसे देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में जिला रिपोर्टर के रूप में कार्य करते हुए खेल, शिक्षा, राजनीति, कृषि तथा सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता से कवर किया है। शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से जनसंचार में परास्नातक (MJMC) की डिग्री प्राप्त की है और यूजीसी नेट (UGC NET) परीक्षा उत्तीर्ण की है।

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