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ग्वालियर किला: पहाड़ों को चीरकर बनाई गईं जैन मूर्तियां, नीली टाइलों से सजा मान मंदिर और शौर्य की अनोखी कहानी

शौर्य, प्रेम, धर्म और कला का संगम है मध्य प्रदेश का ऐतिहासिक ग्वालियर किला

मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर में एक विशाल पहाड़ी पर खड़ा किला केवल पत्थरों से बनी कोई ऐतिहासिक इमारत नहीं है, बल्कि यह भारत के शौर्य, कला, धर्म और स्थापत्य का जीवंत दस्तावेज है। इसकी ऊंची दीवारें, विशाल दरवाजे, महल, मंदिर और पहाड़ों को काटकर बनाई गईं जैन तीर्थंकरों की विशाल प्रतिमाएं हर किसी को हैरान कर देती हैं। इस किले की खास पहचान है राजा मानसिंह तोमर का बनवाया हुआ मान मंदिर महल, जिसकी दीवारों पर नीली और पीली टाइलों की खूबसूरत सजावट आज भी लोगों को आकर्षित करती है।

करीब डेढ़ हजार साल से अधिक पुराने इतिहास को अपने भीतर समेटे ग्वालियर किले ने कई राजवंशों का उत्थान और पतन देखा है। यहां कभी राजाओं का शासन रहा, तो कभी मुगल बादशाहों का कब्जा। इस किले ने युद्ध, कैद, सत्ता संघर्ष और वीरता की अनेक कहानियां देखी हैं। यही वजह है कि इसे भारत के सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक किलों में गिना जाता है। मध्य प्रदेश पर्यटन इसे भारत के प्रमुख दुर्गों में शामिल करता है और यह यूनेस्को की विश्व धरोहर की अस्थायी सूची में भी दर्ज है।

ग्वालियर किले का इतिहास: संत के नाम पर पड़ा शहर का नाम

ग्वालियर किले की शुरुआत को लेकर इतिहास और लोककथाओं में अलग-अलग विवरण मिलते हैं। प्रचलित मान्यता के अनुसार, राजा सूरज सेन एक बार गंभीर बीमारी से परेशान थे। इसी दौरान उनकी मुलाकात ग्वालिपा नाम के संत से हुई। संत ने उन्हें एक पवित्र जलकुंड का पानी पीने की सलाह दी। कहा जाता है कि इससे राजा की बीमारी ठीक हो गई। संत के प्रति आभार जताने के लिए राजा ने पहाड़ी पर किले का निर्माण कराया और उनके नाम पर इस स्थान का नाम ग्वालियर पड़ा।

हालांकि, इस कथा को ऐतिहासिक प्रमाण के बजाय स्थानीय परंपरा के रूप में देखना चाहिए। इतिहासकारों के अनुसार इस पहाड़ी पर छठी शताब्दी से ही निर्माण गतिविधियों के प्रमाण मिलते हैं। आठवीं शताब्दी में यहां किलेबंदी का विकास हुआ। यूनेस्को के विवरण में 773 ईस्वी में राजा सूरज सेन द्वारा पहाड़ी के चारों ओर किलेबंदी पूरी कराने का उल्लेख मिलता है।

समय के साथ इस किले पर अलग-अलग राजवंशों का अधिकार रहा। प्रतिहार, कच्छपघात, तोमर, दिल्ली सल्तनत, मुगल और मराठा शासकों ने यहां अपनी छाप छोड़ी। हर शासक ने इस किले में कुछ नया जोड़ा। इसी कारण यहां अलग-अलग काल की वास्तुकला एक साथ दिखाई देती है।

मान मंदिर महल: नीली टाइलों में छिपी राजा मानसिंह की कला

ग्वालियर किले के सबसे आकर्षक निर्माणों में मान मंदिर महल का नाम सबसे ऊपर आता है। इसका निर्माण तोमर वंश के प्रसिद्ध शासक राजा मानसिंह तोमर ने 1486 से 1516 ईस्वी के बीच कराया था।

महल की बाहरी दीवारों पर नीले, पीले और हरे रंग की चमकदार टाइलों से सुंदर आकृतियां बनाई गई हैं। इनमें हाथी, मोर, बत्तख और अन्य सजावटी चित्र दिखाई देते हैं। दूर से देखने पर ऐसा लगता है जैसे पत्थर की विशाल दीवारों पर रंगों की कोई खूबसूरत चित्रकारी कर दी गई हो।

महल के भीतर बने कमरे, गलियारे, नक्काशीदार खंभे और सजावटी दीवारें उस समय की शाही जीवनशैली की झलक दिखाते हैं। इसके निर्माण में सौंदर्य के साथ सुरक्षा का भी ध्यान रखा गया था। महल के कुछ हिस्सों में भूमिगत कमरे और रास्ते भी हैं।

मान मंदिर केवल राजा का निवास स्थान नहीं था, बल्कि यह तोमर शासकों की कला और सांस्कृतिक रुचि का प्रतीक भी था। इसकी वास्तुकला में भारतीय परंपरा और स्थानीय शिल्पकला का शानदार मेल दिखाई देता है।

गोपाचल पर्वत: चट्टानों को काटकर बनाई गईं विशाल जैन प्रतिमाएं

File:Gopachal Parvat – Rock-cut Tirthankar Sculptures, Gwalior.jpg – Wikimedia Commons

Statue of jain tirthankaras in gwalior fort, Madhya Pradesh, India

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ग्वालियर किले की सबसे अद्भुत और विशिष्ट पहचान गोपाचल पर्वत की जैन प्रतिमाएं हैं। यहां पहाड़ की विशाल चट्टानों को काटकर जैन धर्म के तीर्थंकरों की प्रतिमाएं बनाई गई हैं। इन मूर्तियों को देखकर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस समय के शिल्पकार कितने कुशल और कल्पनाशील रहे होंगे।

यहां भगवान आदिनाथ, पार्श्वनाथ, नेमिनाथ सहित जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों की प्रतिमाएं अलग-अलग मुद्राओं में दिखाई देती हैं। कुछ प्रतिमाएं खड़ी ध्यान मुद्रा में हैं, जबकि कुछ पद्मासन में बैठी हुई हैं।

इनमें कई प्रतिमाएं इतनी विशाल हैं कि उनकी ऊंचाई लगभग 17 मीटर तक बताई जाती है। चट्टानों पर की गई बारीक नक्काशी और मूर्तियों के चेहरे पर दिखाई देने वाली शांति इन्हें विशेष बनाती है।

ग्वालियर की पहाड़ी पर जैन धर्म से जुड़ी मूर्तिकला का विकास कई शताब्दियों तक हुआ। यूनेस्को के विवरण में किले के प्रमुख जैन शैलचित्रों और प्रतिमाओं के निर्माण का एक महत्वपूर्ण दौर 1450 से 1480 ईस्वी के बीच बताया गया है। हालांकि, यहां जैन कला के प्रमाण इससे पहले के काल तक भी मिलते हैं।

मुगल आक्रमण में क्षतिग्रस्त हुई थीं जैन प्रतिमाएं

गोपाचल पर्वत की इन प्रतिमाओं का इतिहास केवल कला तक सीमित नहीं है। इनके साथ संघर्ष और नुकसान की कहानी भी जुड़ी है। इतिहासकारों के अनुसार, 1527 में मुगल बादशाह बाबर के आदेश पर यहां की कई जैन प्रतिमाओं को नुकसान पहुंचाया गया था। मूर्तियों के चेहरे और अंगों को क्षतिग्रस्त किया गया। इसके बावजूद अनेक प्रतिमाएं आज भी सुरक्षित हैं और भारतीय शिल्पकला की अद्भुत विरासत के रूप में मौजूद हैं।

इन प्रतिमाओं को देखने के लिए दूर-दूर से जैन धर्म के अनुयायी, इतिहासकार, शोधार्थी और पर्यटक पहुंचते हैं। पहाड़ की ऊंची चट्टानों पर उकेरी गई इन मूर्तियों को देखकर यह समझना मुश्किल नहीं कि उस दौर में बिना आधुनिक मशीनों के इतने विशाल शिल्प तैयार करना कितना चुनौतीपूर्ण रहा होगा।

तेली का मंदिर: उत्तर और दक्षिण भारतीय वास्तुकला का संगम

ग्वालियर किले के भीतर स्थित तेली का मंदिर अपनी अनोखी बनावट के लिए प्रसिद्ध है। लगभग 100 फीट ऊंचा यह मंदिर किले की सबसे खास ऐतिहासिक इमारतों में से एक है।

इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसकी वास्तुकला है। इसमें उत्तर भारत की नागर शैली और दक्षिण भारत की द्रविड़ शैली का सुंदर मेल दिखाई देता है। मंदिर का ऊंचा और अलग आकार का शिखर इसे दूसरे मंदिरों से अलग पहचान देता है।

मंदिर की दीवारों पर देवी-देवताओं, पौराणिक आकृतियों और सजावटी नक्काशी के नमूने दिखाई देते हैं। मंदिर के निर्माण का समय सामान्यतः आठवीं से नौवीं शताब्दी के आसपास माना जाता है। इसके धार्मिक स्वरूप को लेकर अलग-अलग मत मिलते हैं और यहां वैष्णव, शैव तथा मातृका परंपराओं से जुड़े प्रमाण भी बताए जाते हैं। Incredible India+2

सास-बहू मंदिर: नाम के पीछे छिपी है अलग कहानी

ग्वालियर किले में स्थित सास-बहू मंदिर पर्यटकों और स्थापत्य कला के प्रेमियों के लिए खास आकर्षण है। इन मंदिरों का निर्माण 11वीं शताब्दी में हुआ था। यहां दो मंदिर एक-दूसरे के पास बने हैं। बड़े मंदिर को सास और छोटे मंदिर को बहू मंदिर कहा जाता है।

हालांकि, इनके नाम को लेकर एक दिलचस्प बात है। कई इतिहासकारों के अनुसार सास-बहू नाम वास्तव में सहस्रबाहु शब्द से जुड़ा है। बड़ा मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है। मंदिर की दीवारों, स्तंभों और छतों पर बेहद बारीक नक्काशी की गई है।

मंदिर की छतों पर बने ज्यामितीय डिजाइन और पत्थरों पर उकेरी गई आकृतियां उस दौर के शिल्पकारों की प्रतिभा का परिचय देती हैं। यहां पहुंचकर ऐसा लगता है मानो पत्थरों में किसी कलाकार ने अपनी पूरी कल्पना उतार दी हो।

चतुर्भुज मंदिर: पत्थर पर दर्ज शून्य का इतिहास

ग्वालियर किले का चतुर्भुज मंदिर भारतीय गणित के इतिहास में भी विशेष स्थान रखता है। यह मंदिर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां 875 और 876 ईस्वी के आसपास का एक शिलालेख मिलता है, जिसमें शून्य का उल्लेख दर्ज है।

इस मंदिर में संस्कृत में लिखा गया शिलालेख गणित के इतिहास से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रमाण माना जाता है। इसमें मंदिर को दिए गए दान और उससे संबंधित गणना में शून्य का उपयोग दिखाई देता है।

यहां आने वाले पर्यटक केवल मंदिर की धार्मिक और स्थापत्य विशेषताओं को ही नहीं देखते, बल्कि भारतीय गणित की प्राचीन परंपरा से भी परिचित होते हैं। यह प्रमाण बताता है कि भारत में शून्य का उपयोग सदियों पहले गणितीय गणनाओं में किया जा रहा था।

गुजरी महल: राजा मानसिंह और मृगनयनी की प्रेम कहानी

ग्वालियर किले के प्रमुख आकर्षणों में गुजरी महल भी शामिल है। इसका निर्माण राजा मानसिंह तोमर ने अपनी प्रिय रानी मृगनयनी के लिए कराया था। मृगनयनी गुर्जर समुदाय से थीं। राजा मानसिंह और मृगनयनी की प्रेम कहानी आज भी ग्वालियर के इतिहास में चर्चित है।

कहा जाता है कि मृगनयनी ने विवाह के बाद भी अपनी कुछ शर्तें रखी थीं। वह चाहती थीं कि उन्हें ऐसा महल मिले जहां वे स्वतंत्र रूप से रह सकें और उनके लिए पानी की विशेष व्यवस्था हो। इसी के बाद गुजरी महल का निर्माण कराया गया।

आज यह महल पुरातत्व संग्रहालय के रूप में जाना जाता है। यहां प्राचीन मूर्तियां, दुर्लभ कलाकृतियां और ऐतिहासिक वस्तुएं रखी गई हैं। इनमें पहली शताब्दी ईस्वी तक की कुछ पुरातात्विक सामग्री भी शामिल है। संग्रहालय की प्रसिद्ध शालभंजिका प्रतिमा विशेष आकर्षण का केंद्र है।

किले में मौजूद है सिख इतिहास की भी महत्वपूर्ण निशानी

ग्वालियर किला केवल राजाओं और मंदिरों के इतिहास तक सीमित नहीं है। यहां सिख धर्म के इतिहास से जुड़ा गुरुद्वारा दाता बंदी छोड़ साहिब भी स्थित है।

इसका संबंध सिखों के छठे गुरु, गुरु हरगोबिंद साहिब से है। प्रचलित ऐतिहासिक परंपरा के अनुसार, मुगल बादशाह जहांगीर के शासनकाल में गुरु हरगोबिंद साहिब को ग्वालियर किले में कैद रखा गया था। उस समय यहां कई अन्य राजा भी बंदी थे।

कहा जाता है कि गुरु हरगोबिंद साहिब की रिहाई के समय उन्होंने अपने साथ कैद 52 राजाओं को भी मुक्त कराने की मांग रखी। गुरु साहिब की इस उदारता के कारण उन्हें बंदी छोड़ कहा गया। इसी घटना की स्मृति में यहां गुरुद्वारा स्थापित है। यह स्थान सिख श्रद्धालुओं के लिए आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र है। Incredible India+2

किले के विशाल दरवाजे और मजबूत सुरक्षा व्यवस्था

ग्वालियर किले की मजबूती का अंदाजा इसकी विशाल दीवारों और प्रवेश द्वारों से लगाया जा सकता है। किले तक पहुंचने के लिए पहाड़ी पर घुमावदार रास्ता बनाया गया है। रास्ते में कई बड़े दरवाजे पड़ते हैं, जिन्हें सुरक्षा की दृष्टि से तैयार किया गया था।

किले की बाहरी दीवारें लगभग दो मील लंबी बताई जाती हैं। इसकी ऊंची चट्टानें और मजबूत दीवारें दुश्मनों के लिए इसे जीतना बेहद मुश्किल बनाती थीं।

इस किले की मजबूती देखकर मुगल बादशाह बाबर भी प्रभावित हुए थे। उनके द्वारा ग्वालियर किले को भारत के दुर्गों का मोती कहे जाने का उल्लेख प्रचलित है।

किले में घूमते समय इन स्थानों को जरूर देखें:

  • मान मंदिर महल
  • गोपाचल पर्वत की जैन प्रतिमाएं
  • तेली का मंदिर
  • सास-बहू मंदिर
  • चतुर्भुज मंदिर
  • गुजरी महल संग्रहालय
  • गुरुद्वारा दाता बंदी छोड़ साहिब
  • किले के विशाल प्रवेश द्वार और प्राचीर

किले को अच्छी तरह देखने के लिए कम से कम आधा दिन रखना उपयोगी रहेगा। पहाड़ी पर पैदल घूमना पड़ सकता है, इसलिए आरामदायक जूते पहनकर जाना बेहतर है। यात्रा से पहले प्रवेश शुल्क, संग्रहालय के समय और अन्य सुविधाओं की जानकारी आधिकारिक पर्यटन स्रोत से जरूर जांच लें।

ग्वालियर शहर पहुंचने के बाद स्थानीय टैक्सी, ऑटो या अन्य साधनों से किले तक पहुंचा जा सकता है।

क्यों खास है ग्वालियर का किला?

ग्वालियर किला भारत की उस ऐतिहासिक विरासत का उदाहरण है, जहां एक ही परिसर में अलग-अलग धर्मों, राजवंशों और स्थापत्य शैलियों की झलक मिलती है। यहां जैन तीर्थंकरों की विशाल प्रतिमाएं हैं, तो दूसरी ओर हिंदू मंदिरों की अद्भुत नक्काशी भी देखने को मिलती है। मान मंदिर महल राजसी वैभव की कहानी सुनाता है, जबकि गुजरी महल प्रेम और समर्पण की याद दिलाता है।

इस किले की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यहां इतिहास केवल किताबों में पढ़ने की चीज नहीं रह जाता, बल्कि हर दीवार, हर दरवाजे और हर मूर्ति में दिखाई देता है। यही कारण है कि ग्वालियर किला केवल मध्य प्रदेश ही नहीं, बल्कि पूरे भारत की अमूल्य ऐतिहासिक धरोहर है।

जमुना दयाल

जमुना दयाल वाराणसी के निवासी हैं और उन्हें हिंदी समाचार मीडिया में 10 से अधिक वर्षों का गहन रिपोर्टिंग अनुभव है। उन्होंने अमर उजाला और दैनिक जागरण जैसे देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में जिला रिपोर्टर के रूप में कार्य करते हुए खेल, शिक्षा, राजनीति, कृषि तथा सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता से कवर किया है। शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से जनसंचार में परास्नातक (MJMC) की डिग्री प्राप्त की है और यूजीसी नेट (UGC NET) परीक्षा उत्तीर्ण की है।
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