रणकपुर मंदिर के 1444 स्तंभों का रहस्य, कोई भी दो एक जैसे नहीं; संगमरमर के हर खंभे में छिपी है अलग कहानी
80 गुंबद और 29 सभागार बढ़ाते हैं मंदिर की भव्यता, निर्माण में लगे करीब 50 साल, धरणाशाह ने शुरू कराया था काम

राजस्थान की अरावली पहाड़ियों के बीच बना रणकपुर जैन मंदिर अपनी अद्भुत वास्तुकला के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। मंदिर की सबसे बड़ी खासियत इसके 1444 संगमरमर के स्तंभ हैं। कहा जाता है कि इन सभी स्तंभों की नक्काशी एक-दूसरे से अलग है। मंदिर के भीतर पहुंचने पर चारों ओर दिखाई देने वाले खंभे, गुंबद और बारीक नक्काशी इसे पत्थरों से बनी किसी विशाल कला-कृति जैसा रूप देते हैं।
अरावली की गोद में बसा है अनोखा मंदिर
राजस्थान के पाली जिले में अरावली की पहाड़ियों के बीच रणकपुर स्थित है। शांत वातावरण और प्राकृतिक सुंदरता के बीच बना यह मंदिर जैन धर्म के प्रमुख तीर्थस्थलों में शामिल है। इसका मुख्य मंदिर भगवान आदिनाथ को समर्पित है।
मंदिर को देखकर सबसे पहले इसकी विशालता और संगमरमर की चमक ध्यान खींचती है। लेकिन जैसे-जैसे कोई इसके अंदर बढ़ता है, इसकी असली खूबसूरती सामने आती है।
निर्माण में लगे करीब 50 साल, धरणाशाह ने शुरू कराया था काम
रणकपुर जैन मंदिर के निर्माण की कहानी भी इसकी वास्तुकला जितनी ही रोचक है। 15वीं शताब्दी में जैन व्यापारी धरणाशाह ने भगवान आदिनाथ के भव्य मंदिर का निर्माण कराने का संकल्प लिया। मेवाड़ के शासक राणा कुंभा ने इसके लिए संरक्षण और भूमि उपलब्ध कराई। मंदिर की वास्तु योजना तैयार करने का श्रेय वास्तुकार दीपाका को दिया जाता है। मंदिर के निर्माण और बारीक नक्काशी में लंबे समय तक कारीगरों ने काम किया। राजस्थान पर्यटन के अनुसार इसे तैयार होने में करीब 50 वर्ष लगे। मंदिर के निर्माण की कुल लागत का प्रमाणित आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, हालांकि जैन परंपरा में 99 लाख रुपये खर्च होने की मान्यता मिलती है। यही लंबा निर्माण काल बताता है कि 1444 स्तंभों और संगमरमर की महीन नक्काशी के पीछे कितनी बड़ी शिल्प परंपरा रही होगी।
1444 स्तंभों की वजह से दुनिया में अलग पहचान

रणकपुर मंदिर की पहचान सबसे ज्यादा इसके 1444 स्तंभों से जुड़ी है। मंदिर के अलग-अलग हिस्सों में फैले ये स्तंभ केवल भवन को सहारा देने का काम नहीं करते, बल्कि इसकी सजावट का भी महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
इन पर बेहद बारीक नक्काशी की गई है। फूल-पत्तियों से लेकर मानव आकृतियों और अन्य कलात्मक डिजाइनों तक, अलग-अलग रूप देखने को मिलते हैं।
सबसे रोचक बात, कोई दो स्तंभ एक जैसे नहीं
रणकपुर मंदिर से जुड़ा सबसे चर्चित तथ्य यह है कि यहां मौजूद 1444 स्तंभों में कोई भी दो स्तंभ बिल्कुल एक जैसे नहीं हैं।
हर खंभे की बनावट, नक्काशी या सजावटी शैली में कुछ न कुछ अंतर दिखाई देता है। यही वजह है कि मंदिर के स्तंभों को देखने के लिए लोग काफी समय तक परिसर में घूमते रहते हैं।
एक ही मंदिर में इतनी बड़ी संख्या में अलग-अलग डिजाइन वाले स्तंभ होना इसकी वास्तुकला को खास बनाता है।
संगमरमर पर कलाकारों की अद्भुत कारीगरी
मंदिर के निर्माण में सफेद संगमरमर का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ है। पत्थर पर की गई महीन कारीगरी को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि इसे तैयार करने में कलाकारों ने कितनी मेहनत की होगी।
कई स्तंभों पर बेल-बूटे और फूलों की आकृतियां दिखाई देती हैं। कुछ हिस्सों में नृत्य करती महिलाओं और वाद्य यंत्र बजाती आकृतियों जैसी कलात्मक रचनाएं भी देखने को मिलती हैं।
स्तंभों के बीच से दिखाई देता है मुख्य मंदिर
रणकपुर मंदिर की बनावट केवल सजावट तक सीमित नहीं है। इसकी योजना इस तरह बनाई गई है कि अलग-अलग हिस्सों से मंदिर के मुख्य भाग और प्रतिमा के दर्शन किए जा सकें।
स्तंभों की कतारों के बीच से गुजरते हुए मंदिर का दृश्य लगातार बदलता रहता है। एक स्थान से देखने पर जो खंभा सामने दिखाई देता है, कुछ कदम आगे बढ़ने पर वही संरचना बिल्कुल अलग रूप लेने लगती है।
चार दिशाओं की ओर खुला है चौमुखा मंदिर
रणकपुर का मुख्य मंदिर चौमुखा मंदिर के नाम से जाना जाता है। इसकी संरचना चार दिशाओं की ओर केंद्रित है।
मंदिर में भगवान आदिनाथ की प्रतिमा का स्वरूप भी इसी चार दिशाओं वाली अवधारणा से जुड़ा है। इसी कारण मंदिर के वास्तु विन्यास में चारों ओर से प्रवेश और दर्शन की व्यवस्था दिखाई देती है।
80 गुंबद और 29 सभागार
मंदिर की विशाल संरचना में करीब 80 गुंबद और 29 सभागार बताए जाते हैं। इन सभी हिस्सों को स्तंभों और मेहराबों की जटिल संरचना जोड़ती है।
जब ऊपर नजर जाती है तो अलग-अलग आकार के गुंबद और छतों की नक्काशी दिखाई देती है। नीचे संगमरमर के स्तंभ और ऊपर कलात्मक छत मंदिर के अंदर एक अलग ही दृश्य बनाते हैं।
रोशनी भी बन जाती है मंदिर की सजावट
मंदिर की वास्तुकला की एक खास बात प्राकृतिक रोशनी का इस्तेमाल भी है। स्तंभों और खुले हिस्सों से होकर सूर्य की रोशनी अंदर पहुंचती है।
संगमरमर की सतह पर पड़ती रोशनी और स्तंभों से बनती परछाइयां मंदिर के अंदर लगातार बदलता दृश्य पैदा करती हैं। सुबह और दोपहर के समय मंदिर के अलग-अलग हिस्सों में रोशनी का प्रभाव अलग दिखाई दे सकता है।
हर खंभे को देखने में लगता है समय
1444 स्तंभों की वजह से मंदिर को एक नजर में समझ पाना आसान नहीं है। किसी एक हिस्से में फूलों की नक्काशी दिखाई देती है तो दूसरे हिस्से में अलग आकृतियां नजर आती हैं।
इसी विविधता के कारण यहां आने वाले पर्यटकों के लिए हर गलियारा और हर स्तंभ एक नया दृश्य सामने लाता है।
एक मंदिर, हजारों कलात्मक विवरण
रणकपुर मंदिर को केवल धार्मिक स्थल के रूप में देखना इसकी पूरी खूबसूरती को समझना नहीं है। यह वास्तुकला, शिल्प और धार्मिक परंपरा का एक साथ दिखाई देने वाला उदाहरण है।
इसके 1444 स्तंभ इस मंदिर की सबसे बड़ी पहचान हैं। खास बात यह है कि इन स्तंभों की संख्या से ज्यादा आकर्षित करती है उनकी विविधता।
आज भी लोगों को आकर्षित करता है रणकपुर
राजस्थान आने वाले पर्यटकों के लिए रणकपुर एक प्रमुख आकर्षण है। अरावली की प्राकृतिक पृष्ठभूमि, सफेद संगमरमर की विशाल इमारत और बारीक नक्काशी इसे दूसरे मंदिरों से अलग पहचान देती है।
मंदिर में प्रवेश करने के बाद सबसे पहले नजर इसकी विशालता पर जाती है और फिर धीरे-धीरे स्तंभों की नक्काशी पर टिक जाती है।
रणकपुर मंदिर की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि 1444 स्तंभों के बीच घूमते हुए हर बार कोई नया डिजाइन, नई आकृति और नया दृश्य सामने आता है। यही विविधता सदियों पुराने इस मंदिर को आज भी वास्तुकला के अनोखे उदाहरण के रूप में पहचान दिलाती है।



