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असम के पिरामिड: चराइदेव के मोइदम, जहां अहोम राजाओं की विरासत आज भी सांस लेती है

600 साल तक असम पर राज करने वाले अहोम राजवंश की टीला-समाधियां अब यूनेस्को की विश्व धरोहर हैं

शिवसागर के हरे-भरे खेतों और चाय बागानों के बीच मिट्टी के गोल टीले दिखते हैं। पहली नजर में ये साधारण पहाड़ियां लगती हैं, पर हर टीले के नीचे इतिहास दफन है। ये मोइदम हैं, यानी अहोम राजवंश के राजाओं और राजपरिवार की समाधियां। इनकी बनावट और भव्यता को देखकर लोग इन्हें “असम के पिरामिड” कहते हैं।

13वीं सदी की एक यात्रा से शुरू हुई कहानी

अहोम राजवंश की नींव 1228 ई. में चाओलुंग सुकफा ने रखी। वे पटकाई पर्वत पार करके ब्रह्मपुत्र घाटी पहुंचे थे। 1253 ई. में उन्होंने चराइदेव को अपनी पहली राजधानी बनाया। अहोम इस जगह को इतना पवित्र मानते थे कि बाद में राजधानी बदलने पर भी राजपरिवार के सदस्यों की अंत्येष्टि यहीं होती रही।

अहोमों ने लगभग 600 साल (1228 से 1826 ई.) तक असम पर शासन किया। इस दौरान उन्होंने मुगलों के कई हमलों का सामना किया और अपना राज्य बचाए रखा।

मोइदम की बनावट

मोइदम की संरचना की खास बातें ये हैं:

  • भीतर का कक्ष: ईंट और पत्थर से बना भूमिगत या अर्ध-भूमिगत कक्ष, जिसमें शव और उसके साथ रखी वस्तुएं रखी जाती थीं।
  • मिट्टी का टीला: कक्ष के ऊपर मिट्टी डालकर अर्धगोलाकार टीला बनाया जाता था। टीले की ऊंचाई मृतक के पद पर निर्भर करती थी। राजाओं के मोइदम बड़े और भव्य होते थे।
  • बाहरी दीवार और द्वार: कई मोइदम के चारों ओर दीवार और मेहराबदार प्रवेश द्वार बनाया गया है।

परलोक में भी जीवन

अहोम मान्यता थी कि मृत्यु के बाद व्यक्ति दूसरे लोक में जीवन जारी रखता है। इसलिए राजा के साथ उसके उपयोग की चीजें, जैसे हथियार, आभूषण और बर्तन, दफनाई जाती थीं। ऐतिहासिक वृत्तांतों में प्रारंभिक काल में सेवकों को साथ दफनाने का भी जिक्र मिलता है, हालांकि इस पर इतिहासकारों में मतभेद हैं। बाद के दौर में हिंदू धर्म का प्रभाव बढ़ने पर दाह संस्कार की परंपरा भी आई और अस्थियां मोइदम में रखी जाने लगीं।

लूट, उपेक्षा और संघर्ष

कीमती वस्तुओं के कारण मोइदम पर खजाने की तलाश में हमले होते रहे। मुगल सेनापति मीर जुमला के 1660 के दशक के आक्रमण में चराइदेव के मोइदम को नुकसान पहुंचने का जिक्र इतिहास में मिलता है। सदियों तक अतिक्रमण, खेती, बाढ़ और उपेक्षा ने भी इन्हें क्षति पहुंचाई।

जब मिला विश्व धरोहर का दर्जा

26 जुलाई 2024 को नई दिल्ली में हुई विश्व धरोहर समिति की बैठक में “चराइदेव के मोइदम” को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया।

  • यह पूर्वोत्तर भारत की पहली सांस्कृतिक धरोहर है जिसे यह दर्जा मिला।
  • यह भारत की 43वीं विश्व धरोहर है।
  • इससे पहले असम के काजीरंगा और मानस राष्ट्रीय उद्यान प्राकृतिक श्रेणी में सूचीबद्ध थे।

इस घोषणा से असम की ऐतिहासिक पहचान को वैश्विक मंच मिला और पर्यटन की संभावनाएं भी बढ़ीं।

परंपरा आज भी जीवित

मोइदम केवल इतिहास के अवशेष नहीं हैं। अहोम समुदाय हर साल 31 जनवरी को “मे-डैम-मे-फी” मनाता है, जिसमें पूर्वजों की पूजा की जाती है। इस दिन लोग चराइदेव में जुटकर अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि देते हैं।

आगे की चुनौती

विश्व धरोहर बनने के बाद सबसे बड़ी जिम्मेदारी संरक्षण की है।

  • बारिश, बाढ़ और नमी से टीलों का क्षरण
  • पेड़ों की जड़ों से कक्षों को नुकसान
  • आसपास की बस्तियों और खेती का दबाव
  • बढ़ते पर्यटकों के बीच संतुलित प्रबंधन

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और राज्य सरकार के साथ स्थानीय लोगों की भागीदारी ही इस विरासत को सुरक्षित रख सकती है।

कैसे पहुंचें

चराइदेव असम के शिवसागर जिले में है। निकटतम बड़े शहर शिवसागर और डिब्रूगढ़ हैं। यात्रा के लिए अक्टूबर से मार्च का मौसम सबसे अच्छा रहता है।

जमुना दयाल

जमुना दयाल वाराणसी के निवासी हैं और उन्हें हिंदी समाचार मीडिया में 10 से अधिक वर्षों का गहन रिपोर्टिंग अनुभव है। उन्होंने अमर उजाला और दैनिक जागरण जैसे देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में जिला रिपोर्टर के रूप में कार्य करते हुए खेल, शिक्षा, राजनीति, कृषि तथा सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता से कवर किया है। शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से जनसंचार में परास्नातक (MJMC) की डिग्री प्राप्त की है और यूजीसी नेट (UGC NET) परीक्षा उत्तीर्ण की है।

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