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देवी को मांस-मछली का भोग क्यों? भारत के इन मंदिरों में आज भी जीवित है सदियों पुरानी अनोखी परंपरा

कामाख्या से कालीघाट और तारापीठ से पुरी तक... कहीं मछली देवी का भोग है तो कहीं बलि के बाद मांस प्रसाद बनता है, जानिए इन परंपराओं के पीछे की कहानी

भारत में मंदिरों की पूजा-पद्धति एक जैसी नहीं है। कहीं भगवान को दूध, फल और मिठाई का भोग लगाया जाता है तो कहीं देवी-देवताओं को मछली, मांस या अन्य मांसाहारी पदार्थ चढ़ाने की परंपरा भी मिलती है। खासकर पूर्वी भारत की शाक्त और तांत्रिक परंपराओं में ऐसे उदाहरण अधिक दिखाई देते हैं।

हाल में पश्चिम बंगाल में दुर्गापूजा के दौरान मांस-मछली खाने को लेकर हुई बहस ने इस पुराने सवाल को फिर चर्चा में ला दिया कि आखिर कुछ देवी मंदिरों में मांसाहारी भोग क्यों लगाया जाता है? क्या इसका संबंध तंत्र साधना से है, स्थानीय संस्कृति से या किसी प्राचीन धार्मिक मान्यता से?

दरअसल, हर मंदिर की कहानी अलग है। कहीं मांसाहारी भोग लगाया जाता है लेकिन पशु बलि नहीं होती, तो कहीं बलि के बाद मांस को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। यही विविधता भारतीय धार्मिक परंपरा को बेहद अनोखा बनाती है।

1. बंगाल से उठी बहस, मंदिरों की पुरानी परंपरा फिर चर्चा में

पश्चिम बंगाल में दुर्गापूजा के दौरान मांस और मछली को लेकर हुई हालिया बहस ने यह सवाल फिर सामने ला दिया कि क्या देवी पूजा के दौरान मांसाहारी भोजन धार्मिक रूप से गलत है।

बंगाल की धार्मिक संस्कृति को देखने पर इसका कोई एक जवाब नहीं मिलता। यहां कई परिवार दुर्गापूजा के दौरान सात्विक भोजन करते हैं, जबकि दूसरी ओर कुछ शक्त परंपराओं में देवी को मछली या मांस का भोग लगाने की परंपरा भी है।

इसलिए बंगाल में मछली केवल भोजन नहीं बल्कि संस्कृति का हिस्सा भी है। यही कारण है कि वहां देवी पूजा और मछली के बीच संबंध को सदियों पुरानी स्थानीय परंपराओं के संदर्भ में देखा जाता है।

2. कालीघाट: मां काली को मांसाहारी भोग की परंपरा

स्रोत-विकिपीडिया

कोलकाता का कालीघाट मंदिर मां काली के प्रमुख मंदिरों में शामिल है। यहां पशु बलि की परंपरा के साथ मांसाहारी भोग का भी उल्लेख मिलता है।

मंदिर की परंपराओं के अनुसार बलि के बाद मांस को पकाकर प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। हालांकि कालीघाट में देवी के भोग से जुड़ी अलग-अलग परंपराएं भी हैं।

यही वजह है कि कालीघाट बंगाल की उस धार्मिक संस्कृति का उदाहरण बन गया है जहां देवी पूजा, मांसाहारी भोजन और शाक्त परंपरा एक-दूसरे से जुड़े दिखाई देते हैं।

3. दक्षिणेश्वर: बिना बलि के देवी को चढ़ती है मछली

कोलकाता का दक्षिणेश्वर काली मंदिर इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प उदाहरण है।

यहां मां भवतारिणी की पूजा होती है और मछली का भोग लगाए जाने की परंपरा का उल्लेख मिलता है। लेकिन कालीघाट की तरह यहां पशु बलि की परंपरा नहीं है।

इससे एक बात साफ होती है कि मछली का भोग और पशु बलि एक ही चीज नहीं हैं।

बंगाल की संस्कृति में मछली का विशेष महत्व होने के कारण इसे कई धार्मिक अनुष्ठानों में शुभ और पारंपरिक भोजन के रूप में भी देखा गया है।

4. तारापीठ: तंत्र साधना और मांस-मछली का भोग

पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले का तारापीठ देवी तारा की उपासना और तांत्रिक साधना के लिए प्रसिद्ध है।

यहां देवी के भोग में मछली और मांस से जुड़े विवरण मिलते हैं। विशेष धार्मिक अवसरों पर मछली तथा बलि के बकरे के मांस से तैयार भोग की परंपरा का भी उल्लेख मिलता है।

तारापीठ की खासियत यह है कि यहां देवी पूजा केवल मंदिर तक सीमित नहीं है। पास का श्मशान और तांत्रिक साधना भी इस स्थान की धार्मिक पहचान का हिस्सा हैं।

इसी वजह से तारापीठ को भारत के सबसे रहस्यमयी शक्तिस्थलों में गिना जाता है।

5. कामाख्या: शक्ति उपासना में मांस-मछली की परंपरा

असम के गुवाहाटी में स्थित कामाख्या मंदिर भारत के प्रमुख शक्तिपीठों में से एक है।

कामाख्या की पूजा-पद्धति में शाक्त और तांत्रिक परंपराओं का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। यहां मछली और मांस से जुड़े भोग की परंपरा के साथ पशु बलि का भी ऐतिहासिक और धार्मिक उल्लेख मिलता है।

कामाख्या की धार्मिक मान्यता देवी के सृजन और शक्ति स्वरूप से जुड़ी है। यही कारण है कि यहां की पूजा-पद्धति उत्तर भारत के कई सामान्य मंदिरों से अलग दिखाई देती है।

6. पुरी के जगन्नाथ मंदिर परिसर में देवी को मांस का भोग

देवी विमला का मंदिर: स्रोत-विकिपीडिया

ओडिशा का पुरी जगन्नाथ मंदिर आमतौर पर अपने विशाल शाकाहारी महाप्रसाद के लिए जाना जाता है। लेकिन इसी मंदिर परिसर में स्थित देवी विमला का मंदिर एक अलग धार्मिक परंपरा को सामने लाता है।

दुर्गापूजा के दौरान यहां शाक्त परंपरा के अनुसार मांस और मछली से जुड़े भोग का उल्लेख मिलता है।

यानी एक ही मंदिर परिसर में भगवान जगन्नाथ की पूजा-पद्धति और देवी विमला की शाक्त पूजा-पद्धति अलग-अलग रूप में दिखाई देती है।

यह भारतीय धार्मिक परंपराओं की विविधता का अनोखा उदाहरण है।

7. तरकुलहा देवी, गोरखपुर : मनौती पूरी होने पर बलि की परंपरा

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में स्थित तरकुलहा देवी मंदिर भी पशु बलि से जुड़ी परंपराओं के कारण जाना जाता है।

स्थानीय मान्यता के अनुसार श्रद्धालु मनोकामना पूरी होने के बाद देवी को बकरा चढ़ाते हैं। बलि के बाद मांस को पकाकर प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की परंपरा का भी उल्लेख मिलता है।

यहां बलि को मुख्य रूप से मनौती और श्रद्धा से जोड़कर देखा जाता है।

8. केरल का मुथप्पन मंदिर: मछली और ताड़ी का भोग

केरल के परस्सिनिक्कडवु स्थित मुथप्पन मंदिर की परंपरा उत्तर भारत के मंदिरों से बिल्कुल अलग दिखाई देती है।

यहां मुथप्पन को मछली और ताड़ी चढ़ाने की परंपरा प्रसिद्ध है। मुथप्पन की पूजा स्थानीय लोक परंपराओं और आदिवासी-सांस्कृतिक प्रभावों से भी जुड़ी हुई मानी जाती है।

यह उदाहरण बताता है कि मंदिरों का भोग केवल धार्मिक ग्रंथों से ही तय नहीं होता। कई बार स्थानीय समाज और उसकी सदियों पुरानी संस्कृति भी पूजा-पद्धति का हिस्सा बन जाती है।

9. आखिर देवी को मांस-मछली ही क्यों?

इसके पीछे कई कारण बताए जाते हैं।

पहला कारण—शाक्त परंपरा।
देवी को शक्ति और प्रकृति के उग्र स्वरूप में पूजने वाली कुछ परंपराओं में बलि और मांसाहारी भोग का स्थान रहा है।

दूसरा—तांत्रिक साधना।
कुछ तांत्रिक परंपराओं में ऐसे पदार्थों का इस्तेमाल हुआ जिन्हें सामान्य सात्विक पूजा से अलग माना जाता है।

तीसरा—स्थानीय संस्कृति।
जहां मछली और मांस रोजमर्रा के भोजन का हिस्सा रहे, वहां समय के साथ यही खाद्य पदार्थ धार्मिक भोग का हिस्सा भी बन गए।

चौथा—मनौती।
कई जगह श्रद्धालु किसी इच्छा के पूरी होने पर पशु चढ़ाने की प्रतिज्ञा करते हैं।

10. बंगाल में मछली का धार्मिक महत्व क्यों है?

बंगाल की संस्कृति में मछली का स्थान बहुत खास है। विवाह, सामाजिक समारोह और कई पारंपरिक अवसरों पर भी मछली को शुभ माना जाता है।

इसी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में कई देवी मंदिरों में मछली के भोग की परंपरा विकसित हुई।

इसलिए बंगाल में मछली खाने को केवल भोजन के रूप में देखना अधूरा होगा। यह वहां की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान से भी जुड़ा हुआ है।

11. क्या मांसाहारी भोग हिंदू धर्म की सामान्य परंपरा है?

नहीं।

भारत में हिंदू मंदिरों की पूजा-पद्धति बेहद विविध है। अधिकांश मंदिरों में सात्विक भोग लगाया जाता है। वहीं कुछ खास शाक्त, तांत्रिक और क्षेत्रीय परंपराओं में मांस-मछली का भोग मिलता है।

इसलिए किसी एक मंदिर की परंपरा को पूरे हिंदू धर्म की परंपरा मानना सही नहीं होगा।

12. बलि और भोग की परंपरा के पीछे क्या सोच थी?

प्राचीन समाज में देवी-देवताओं को प्रसन्न करने, संकट दूर करने, मनोकामना पूरी होने और सामुदायिक कल्याण के लिए अलग-अलग प्रकार के अनुष्ठान किए जाते थे।

पशु बलि भी कुछ धार्मिक परंपराओं में इसी सोच से जुड़ी रही।

समय के साथ कई जगह बलि बंद हुई, कहीं प्रतीकात्मक बलि शुरू हुई और कहीं पुरानी परंपरा सीमित रूप में जारी रही।

13. एक ही देवी, लेकिन अलग-अलग मंदिरों में अलग भोग

भारतीय धर्म परंपरा की सबसे बड़ी खासियत यही है।

एक जगह देवी को खीर और फल चढ़ते हैं तो दूसरी जगह मछली। कहीं बकरे की बलि की परंपरा है तो कहीं बिना बलि के मछली का भोग लगाया जाता है।

इसका कारण अलग-अलग संप्रदाय, स्थानीय मान्यता, इतिहास और सामाजिक संस्कृति है।

यानी भारत में देवी पूजा का कोई एक रंग नहीं है। कहीं सात्विक भोग है तो कहीं शाक्त परंपरा का मांसाहारी भोग।

14. मंदिरों का मांसाहारी भोग आज भी क्यों चर्चा में है?

आधुनिक समय में पशु अधिकार, कानून, स्वास्थ्य और धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर समाज की सोच बदली है।

इसी वजह से कई जगह पशु बलि को लेकर विवाद और कानूनी लड़ाइयां भी हुई हैं। दूसरी ओर मंदिरों से जुड़े श्रद्धालु इसे सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा बताते हैं।

यही टकराव इस विषय को आज भी चर्चा में रखता है।

15. असली कहानी परंपरा की विविधता है

कामाख्या से तारापीठ तक, कालीघाट से पुरी तक और दक्षिणेश्वर से केरल के मुथप्पन मंदिर तक एक बात समान दिखाई देती है—भारत की धार्मिक परंपराएं एक जैसी नहीं हैं।

कहीं मछली देवी का भोग है, कहीं मांस प्रसाद है, कहीं पशु बलि है और कहीं इन सबकी जगह पूरी तरह सात्विक पूजा होती है।

इसलिए हालिया बंगाल विवाद को केवल मांस खाने या न खाने के सवाल तक सीमित करके देखना सही नहीं होगा। इसके पीछे भारत की सदियों पुरानी स्थानीय संस्कृति, शाक्त उपासना, तांत्रिक परंपराएं और धार्मिक विविधता की लंबी कहानी छिपी है।

भारत के प्रमुख मंदिर और मांसाहारी भोग की परंपरा

मंदिरराज्यप्रमुख परंपरा
कालीघाटपश्चिम बंगालमांसाहारी भोग और पशु बलि से जुड़ी परंपरा
दक्षिणेश्वरपश्चिम बंगालमछली का भोग, पशु बलि नहीं
तारापीठपश्चिम बंगालमछली-मांस का भोग
कामाख्याअसममांस-मछली का भोग और बलि परंपरा
विमला मंदिरओडिशाशाक्त परंपरा में मांस-मछली का भोग
तरकुलहा देवीउत्तर प्रदेशबलि के बाद मांस प्रसाद
मुथप्पन मंदिरकेरलमछली और ताड़ी का भोग

भारत के मंदिरों की दुनिया में भोग केवल भोजन नहीं, बल्कि स्थानीय संस्कृति और धार्मिक परंपरा का हिस्सा है। मांस-मछली का भोग लगाने वाले मंदिरों की परंपरा को समझने के लिए उनके पीछे मौजूद शाक्त उपासना, तंत्र, स्थानीय खानपान और ऐतिहासिक परिस्थितियों को समझना जरूरी है।

भारत के मंदिरों का इतिहास बताता है कि आस्था का स्वरूप क्षेत्र के साथ बदलता रहा है। कहीं देवी को खीर चढ़ती है, कहीं मछली और कहीं मांस। यही विविधता भारतीय धार्मिक संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक है।

जमुना दयाल

जमुना दयाल वाराणसी के निवासी हैं और उन्हें हिंदी समाचार मीडिया में 10 से अधिक वर्षों का गहन रिपोर्टिंग अनुभव है। उन्होंने अमर उजाला और दैनिक जागरण जैसे देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में जिला रिपोर्टर के रूप में कार्य करते हुए खेल, शिक्षा, राजनीति, कृषि तथा सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता से कवर किया है। शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से जनसंचार में परास्नातक (MJMC) की डिग्री प्राप्त की है और यूजीसी नेट (UGC NET) परीक्षा उत्तीर्ण की है।

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