पूर्वांचल में ‘तीर्थंकर सर्किट’: जानिए जैन धर्म की उस पवित्र विरासत को, जिससे जुड़ा है बनारस से अयोध्या तक का इतिहास
वाराणसी की भदैनी, चंद्रपुरी और सिंहपुरी से लेकर देवरिया के काकंदी तक फैले हैं जैन तीर्थंकरों की जन्मभूमि के स्थल

बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी को दुनिया शिव और गंगा की नगरी के रूप में जानती है, लेकिन जैन धर्म की परंपरा में भी इसका स्थान बेहद खास है। पूर्वांचल के कई स्थल जैन तीर्थंकरों की जन्मभूमि माने जाते हैं। इन्हीं स्थलों को जोड़ने वाली अवधारणा है तीर्थंकर सर्किट, जो पर्यटन और आस्था, दोनों के लिहाज से पूर्वांचल की नई पहचान बन सकती है।
क्या है तीर्थंकर सर्किट
तीर्थंकर सर्किट जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों से जुड़े पवित्र स्थलों को एक पर्यटन मार्ग के रूप में जोड़ने की अवधारणा है। थीम आधारित पर्यटन सर्किटों के एकीकृत विकास की योजना 2014-15 में शुरू हुई थी, जिसमें चिन्हित 15 विषयगत सर्किटों में तीर्थंकर सर्किट भी शामिल है। लोकसभा में एक उत्तर के दौरान पर्यटन मंत्रालय ने बताया था कि स्वदेश दर्शन योजना के तहत तीर्थंकर परिपथ को देश में विकसित करने के लिए चिन्हित किया गया है। उत्तर प्रदेश सरकार भी राज्य में नए पर्यटन सर्किट विकसित कर रही है। इन 12 सर्किटों में जैन सर्किट भी शामिल है।
काशी में चार तीर्थंकरों की जन्मस्थली
जैन मान्यता के अनुसार वाराणसी क्षेत्र में चार तीर्थंकरों का जन्म हुआ था। ये हैं सुपार्श्वनाथ, चंद्रप्रभु, श्रेयांसनाथ और पार्श्वनाथ।
- भदैनी: सातवें तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ का जन्मस्थान भदैनी में गंगा तट पर माना जाता है, जहां प्रभु घाट और जैन घाट पर उनके मंदिर हैं।
- चंद्रपुरी (चंद्रावती): वाराणसी जिले में गंगा किनारे बसी चंद्रपुरी को आठवें तीर्थंकर चंद्रप्रभ की जन्मभूमि माना जाता है, जहां कई प्राचीन जैन मंदिर हैं।
- सिंहपुरी (सारनाथ): ग्यारहवें तीर्थंकर श्रेयांसनाथ की जन्मभूमि मानी जाती है। जिस सारनाथ में भगवान बुद्ध ने पहला उपदेश दिया था, उसी क्षेत्र में जैन आस्था का यह केंद्र भी है।
- भेलूपुर: तेईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ की जन्मभूमि के रूप में प्रसिद्ध।
अयोध्या: 5 तीर्थंकरों का जन्म स्थान अयोध्या सिर्फ श्रीराम की नगरी ही नहीं, बल्कि जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभनाथ (आदिनाथ) समेत 5 तीर्थंकरों (अजितनाथ, अभिनंदननाथ, सुमतिनाथ और अनंतनाथ) की जन्मभूमि भी है। यहाँ की बड़ी मूर्तियों और प्राचीन जैन मंदिरों का दर्शन हर श्रद्धालु के मन को शांति से भर देता है।
हस्तिनापुर (मेरठ): आस्था और शांति की धुरी हस्तिनापुर का जैन इतिहास बेहद विशाल है। यहाँ स्थित जंबूद्वीप मंदिर और प्राचीन जैन स्थापत्य देखने देश-विदेश से लोग आते हैं। यह स्थल शांति और साधना का एक अनूठा केंद्र माना जाता है।
कौशांबी और श्रावस्ती: प्राचीन अवशेषों और अध्यात्म का संगम कौशांबी में प्राचीन जैन गुफाएं और मंदिरों के अवशेष आज भी पुरातत्व प्रेमियों को आकर्षित करते हैं। वहीं श्रावस्ती में बौद्ध धर्म के साथ-साथ जैन तीर्थंकरों के चरण चिन्ह और प्राचीन मंदिर मौजूद हैं।
देवरिया और अयोध्या भी जुड़ेंगे
पूर्वांचल के दायरे में देवरिया का काकंदी नौवें तीर्थंकर पुष्पदंत (सुविधिनाथ) की जन्मभूमि के रूप में मान्य है। अयोध्या से भी कई तीर्थंकरों का नाम जुड़ा है, जिनमें पहले तीर्थंकर आदिनाथ (ऋषभदेव) प्रमुख हैं। यदि इन स्थलों को वाराणसी के साथ जोड़ा जाए, तो पूर्वांचल में एक मजबूत जैन पर्यटन मार्ग बन सकता है।
पर्यटन को कैसे मिलेगा लाभ
वाराणसी पहले से देश-विदेश के पर्यटकों का बड़ा केंद्र है। यहां सारनाथ का बौद्ध पर्यटन और काशी का शैव-वैष्णव पर्यटन पहले से स्थापित है। जैन तीर्थों को इसी पर्यटन मार्ग से जोड़ने पर श्रद्धालुओं के ठहरने, परिवहन, स्थानीय बाजार और गाइड जैसे क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बन सकते हैं। सड़क, यात्री सुविधाएं, सूचना पट्ट और साफ-सफाई जैसी बुनियादी व्यवस्थाएं इन स्थलों की सबसे बड़ी जरूरत मानी जाती हैं।



