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इंसान की जीवित बलि और एक संत का खौफनाक श्राप… मेहरानगढ़ के पत्थरों में दफन हैं ये 8 रोंगटे खड़े करने वाले राज!

किलकिला' और 'शंभू बाण'—दुश्मनों के सीने पर काल बनकर गरजती तोपें

राजस्थान की तपती धूप में जब जोधपुर की तरफ नजर उठाइए, तो अरावली की एक ऊंची पहाड़ी पर सीना ताने खड़ा मेहरानगढ़ किला किसी प्रहरी सा नजर आता है। लाल बलुआ पत्थर से बना यह विशाल किला बाहर से जितना भव्य और खूबसूरत दिखता है, इसके भीतर झांकने पर इतिहास की उतनी ही सिहरन पैदा करने वाली परतें खुलने लगती हैं।

125 मीटर ऊंची ‘चिड़ियाटूक’ पहाड़ी पर बने इस किले को आज तक दुनिया की कोई भी ताकत पूरी तरह जीत नहीं पाई। लेकिन इस अजेय किले की नींव में जो इतिहास दफन है, उसे जानकर अच्छे-अच्छों की रूह कांप जाए। आइए पर्दा उठाते हैं मेहरानगढ़ किले की उन 8 अनसुनी, खौफनाक और हैरान करने वाली कहानियों से, जो इतिहास के पन्नों में दबी हुई हैं।

1. राजाराम मेघवाल की ‘जीवित बलि’—किले को अजेय बनाने का खौफनाक सौदा

सन् 1459 की बात है। मारवाड़ के शासक राव जोधा अपनी नई राजधानी के रूप में इस पहाड़ी पर एक अभेद्य किले का निर्माण करवाना चाहते थे। नींव रखी जा चुकी थी, लेकिन एक अजीब सी रहस्यमयी घटना ने सबको दहशत में डाल दिया—दिनभर में जितना निर्माण होता, रात होते-होते वह रहस्यमयी तरीके से ढह जाता।

परेशान होकर राव जोधा ने उस समय के तांत्रिकों और ज्योतिषियों से सलाह ली। ज्योतिषियों ने जो उपाय बताया, उसे सुनकर राजा के पैरों तले जमीन खिसक गई। उनका कहना था कि जब तक किसी व्यक्ति की स्वेच्छा से ‘जीवित बलि’ देकर उसे नींव में नहीं गाड़ा जाएगा, तब तक यह किला खड़ा नहीं हो सकता और न ही अजेय बनेगा।

ऐसे में राजाराम मेघवाल नाम के एक निडर और वफादार व्यक्ति ने आगे आकर अपनी मातृभूमि और राजा के लिए हँसते-हँसते अपने प्राणों की आहुति देने का फैसला किया। उन्हें जिंदा नींव में चुनवा दिया गया। आज भी इस बलिदान के सम्मान में राजाराम के वंशजों को राठौड़ राजवंश द्वारा विशेष अधिकार और सम्मान दिया जाता है।

2. चिड़ियानाथ बाबा का वो शाप, जो आज भी भुगत रहा है जोधपुर

जिस पहाड़ी पर मेहरानगढ़ खड़ा है, उसे पहले ‘चिड़ियाटूक’ कहा जाता था, क्योंकि वहाँ चिड़ियानाथ नाम के एक तपस्वी संत अपनी कुटिया बनाकर साधना करते थे। जब राव जोधा ने वहाँ किला बनाने का निर्णय लिया, तो संत को वह जगह खाली करने का आदेश दिया गया।

क्रोधित संत ने राजा को शाप दिया—“तू किला तो बना लेगा, पर तेरे इस नगर में कभी पानी नहीं टिकेगा, यहाँ हमेशा सूखा रहेगा!” कहा जाता है कि उस संत के श्राप का असर आज भी मारवाड़ की आबोहवा में महसूस किया जाता है, जहाँ आज भी पानी की भारी किल्लत और सूखे का सामना करना पड़ता है। हालांकि, राजा ने संत के प्रकोप को शांत करने के लिए मंदिर और कुएं का निर्माण भी करवाया था।

3. ‘मेहरानगढ़’ नाम के पीछे छिपा है सूर्यवंश का रहस्य

क्या आप जानते हैं कि इस किले का नाम मेहरानगढ़ क्यों पड़ा? जोधपुर का राठौड़ राजवंश खुद को मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का वंशज यानी ‘सूर्यवंशी’ मानता है। प्राचीन डिंगल और मारवाड़ी भाषा में सूर्य को ‘मिहिर’ कहा जाता है।

समय के साथ ‘मिहिरगढ़’ (यानी सूर्य का किला) शब्द का उच्चारण बदलते-बदले ‘मेहरानगढ़’ बन गया। यानी यह नाम सिर्फ एक पहचान नहीं, बल्कि उनके सूर्यवंशी होने की जीवंत गवाही है।

4. लोहा पोल की दीवार पर आज भी कैद हैं 31 रानियों के खूनी हाथ

किले के मुख्य प्रवेश द्वारों में से एक ‘लोहा पोल’ से जैसे ही आप अंदर कदम रखते हैं, दाईं ओर की दीवार पर लाल रंग के छोटे-छोटे 31 हाथों के निशान आपका स्वागत करते हैं। ये कोई साधारण कलाकारी नहीं है, बल्कि सदियों पुराने उस दर्द का दस्तावेज हैं जब राजवंश की रानियां सती हुई थीं।

साल 1843 में जब महाराजा मान सिंह का निधन हुआ, तो उनके साथ उनकी रानियां और दासियाँ अपने सुहाग की निशानी के साथ अंतिम विदाई लेने निकली थीं। इन दीवारों पर छोड़ी गई हथेलियों की छाप आज भी उन नारियों के अदम्य साहस और उस दौर की क्रूर परंपरा की कहानी बयां करती हैं।

5. ‘किलकिला’ और ‘शंभू बाण’—दुश्मनों के सीने पर मूंग दलने वाली तोपें

मेहरानगढ़ की विशाल प्राचीर पर आज भी कई ऐसी ऐतिहासिक और खूंखार तोपें तैनात हैं, जो युद्ध के मैदान में काल बनकर गरजती थीं। इनमें सबसे प्रमुख ‘किलकिला तोप’ है, जिसे महाराजा गज सिंह ने अहमदाबाद के शासक से युद्ध में जीता था।

कहा जाता है कि जब यह तोप चलती थी, तो इसकी कान फाड़ देने वाली गर्जना से कई किलोमीटर तक के इलाके में भूकंप जैसा अहसास होता था और दुश्मन थर-थर कांप उठते थे।

6. जयपुर की सेना के गोलों के जख्म आज भी सीने पर लिए खड़ा है किला

मेहरानगढ़ की दीवारें महज़ दीवारें नहीं हैं, बल्कि यह इस बात का सबूत हैं कि दुनिया की कोई भी सेना इसे कभी भेद नहीं पाई। इतिहास में जयपुर और बीकानेर की संयुक्त विशाल सेना ने मिलकर इस पर भीषण आक्रमण किया था।

दिन-रात तोपों के गोले बरसाए गए, लेकिन इसकी 120 फीट ऊंची और 21 फीट चौड़ी चट्टानी दीवारों का बाल भी बांका नहीं हुआ। जयपुर की सेना द्वारा दागे गए गोलों के गहरे निशान आज भी किले के ‘जय पोल’ पर गर्व के साथ देखे जा सकते हैं।

7. 1965 का युद्ध और मां चामुंडा का अलौकिक चमत्कार

किले के सबसे ऊपरी हिस्से में जोधपुर के शासकों की कुलदेवी मां चामुंडा का भव्य मंदिर स्थित है। 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान जब दुश्मन देश ने जोधपुर शहर और इस सामरिक किले को नेस्तनाबूद करने के लिए ताबड़तोड़ हवाई हमले किए, तब एक बड़ा चमत्कार हुआ।

स्थानीय लोग आज भी इस बात की गवाही देते हैं कि पाकिस्तानी वायुसेना द्वारा गिराए गए बम या तो हवा में ही दिशा भटक गए या फिर किले की रेत में गिरकर अपने आप फुस (निष्क्रिय) हो गए। किसी को खरोंच तक नहीं आई। इसे आज भी माता की असीम कृपा माना जाता है।

8. जब जोधपुर का किला बन गया हॉलीवुड की खूंखार ‘जेल’

इस किले की भव्यता और इसका रहस्यमयी भूगोल सिर्फ भारत तक ही सीमित नहीं है, बल्कि सात समंदर पार हॉलीवुड के निर्देशकों को भी खींच लाता है।

क्रिस्टोफर नोलन की दुनिया भर में मशहूर सुपरहीरो फिल्म ‘द डार्क नाईट राइज़ेस’ (Batman: The Dark Knight Rises) में जिस खौफनाक और अंधेरी भूमिगत जेल (The Pit) के दृश्य को दिखाया गया है, जहाँ से निकलना नामुमकिन माना जाता है—उसका बाहरी और रहस्यमयी हिस्सा असल में मेहरानगढ़ किले के भीतर का ही है!

जमुना दयाल

जमुना दयाल वाराणसी के निवासी हैं और उन्हें हिंदी समाचार मीडिया में 10 से अधिक वर्षों का गहन रिपोर्टिंग अनुभव है। उन्होंने अमर उजाला और दैनिक जागरण जैसे देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में जिला रिपोर्टर के रूप में कार्य करते हुए खेल, शिक्षा, राजनीति, कृषि तथा सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता से कवर किया है। शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से जनसंचार में परास्नातक (MJMC) की डिग्री प्राप्त की है और यूजीसी नेट (UGC NET) परीक्षा उत्तीर्ण की है।

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