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रसगुल्ले से आम तक: जब स्वाद, पहचान और कारोबार को लेकर आमने-सामने आए राज्य

कहीं रसगुल्ले की उत्पत्ति पर ओडिशा और बंगाल आमने-सामने आए, कहीं बासमती के GI दायरे पर पंजाब-मध्य प्रदेश में मतभेद हुआ तो अब हापुस आम की पहचान को लेकर महाराष्ट्र और गुजरात के दावे चर्चा में हैं।

भारत में खान-पान सिर्फ स्वाद का मामला नहीं है। किसी शहर की मिठाई, किसी इलाके का चावल या किसी क्षेत्र का फल वहां की पहचान, परंपरा और अर्थव्यवस्था से जुड़ जाता है। यही वजह है कि जब किसी खास खाद्य पदार्थ के नाम या उत्पत्ति पर दूसरा क्षेत्र दावा करता है तो मामला दुकानों और बाजार से निकलकर सरकारी दफ्तरों, अदालतों और GI पंजीकरण तक पहुंच जाता है।

GI यानी Geographical Indication किसी ऐसे उत्पाद की पहचान है जिसकी खास गुणवत्ता, प्रतिष्ठा या विशेषता उसके भौगोलिक क्षेत्र से जुड़ी होती है। भारत में कई खाद्य पदार्थों को GI पहचान मिली है। लेकिन कुछ मामलों में इसी पहचान को लेकर राज्यों या उनके उत्पादकों के बीच विवाद भी सामने आए हैं।

रसगुल्ले से शुरू हुई यह कहानी बासमती चावल, हापुस आम और टोटापुरी आम तक पहुंचती है। वहीं बikaneri bhujia का मामला बताता है कि क्षेत्रीय नाम का इस्तेमाल कितना बड़ा कारोबारी मुद्दा बन सकता है। हालांकि इन सभी मामलों को समान रूप से “राज्य बनाम राज्य” कहना सही नहीं होगा।


1. रसगुल्ला: ओडिशा और पश्चिम बंगाल की सबसे मीठी जंग

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रसगुल्ले को लेकर ओडिशा और पश्चिम बंगाल के बीच चला विवाद इस तरह के मामलों का सबसे चर्चित उदाहरण है।

पश्चिम बंगाल ने Banglar Rasogolla के लिए GI आवेदन किया था। आवेदन 18 सितंबर 2015 को दाखिल हुआ और 14 नवंबर 2017 को इसका GI प्रमाणपत्र जारी हुआ। आधिकारिक GI रिकॉर्ड में इसका भौगोलिक क्षेत्र पश्चिम बंगाल दर्ज है।

दूसरी ओर ओडिशा ने दावा किया कि रसगोला की परंपरा उसके यहां बहुत पुरानी है और इसका संबंध पुरी के भगवान जगन्नाथ मंदिर की परंपरा से है। ओडिशा ने इसके लिए अलग GI आवेदन किया और Odisha Rasagola को 29 जुलाई 2019 को GI पंजीकरण मिला।

विवाद के दौरान ओडिशा ने रसगोला की ऐतिहासिक परंपरा से जुड़े दस्तावेज जुटाने के लिए समितियां बनाई थीं। दूसरी ओर पश्चिम बंगाल ने नबीन चंद्र दास और 19वीं सदी के कोलकाता की मिठाई परंपरा को आधुनिक बंगाली रसगुल्ले के विकास से जोड़ा।

असली दिलचस्पी यहां है

2017 में बंगाल को GI मिलने के बाद ऐसा लगा कि विवाद खत्म हो गया, लेकिन दो साल बाद ओडिशा को भी अपने Odisha Rasagola के लिए अलग GI मिल गया।

इससे एक महत्वपूर्ण बात साफ हुई—GI टैग का मतलब यह नहीं कि पूरी दुनिया में उस नाम की हर मिठाई पर एक राज्य का अधिकार हो गया। GI किसी विशिष्ट क्षेत्रीय उत्पाद की पहचान को संरक्षण देता है।

इसलिए आज दोनों नाम अलग-अलग दर्ज हैं—Banglar Rasogolla और Odisha Rasagola।


2. बासमती चावल: पंजाब और मध्य प्रदेश का GI विवाद

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रसगुल्ले की लड़ाई जहां स्वाद और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी थी, वहीं बासमती का विवाद कहीं अधिक बड़ा आर्थिक मुद्दा है।

भारत में बासमती के GI पंजीकरण के लिए आवेदन APEDA ने किया था। वर्तमान GI रिकॉर्ड में बासमती का क्षेत्र पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के निर्दिष्ट क्षेत्रों में दर्ज है। पंजीकरण 15 फरवरी 2016 को हुआ।

इसके बाद मध्य प्रदेश ने अपने बासमती उत्पादक जिलों को भी GI क्षेत्र में शामिल करने की मांग की। इस मांग का पंजाब में विरोध हुआ। 2020 में पंजाब और मध्य प्रदेश सरकारें इस मुद्दे पर खुलकर अलग-अलग पक्ष में दिखाई दीं।

मामला सिर्फ नाम का नहीं

बासमती भारत का बड़ा निर्यात उत्पाद है। इसलिए GI क्षेत्र में किसी नए राज्य के शामिल होने का सवाल किसानों, निर्यातकों, मिलरों और व्यापारियों के आर्थिक हितों से भी जुड़ जाता है।

2026 में यह मुद्दा फिर चर्चा में आया। पंजाब के निर्यातकों, चावल मिलरों और किसान संगठनों ने मध्य प्रदेश को बासमती GI क्षेत्र में शामिल करने के प्रस्ताव का विरोध किया। इंडियन एक्सप्रेस की जुलाई 2026 की रिपोर्ट के अनुसार विवाद में बासमती के निर्यात बाजार, किसानों की आजीविका और वैश्विक बाजार में इसकी पहचान जैसे मुद्दे शामिल हैं।

यानी रसगुल्ले में जहां सवाल था—“रसगुल्ला किसका?”, वहीं बासमती में सवाल है—“बासमती GI का भौगोलिक दायरा कहां तक हो?”


3. हापुस आम: महाराष्ट्र और गुजरात के बीच नई खींचतान

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भारत के सबसे चर्चित आमों में शामिल अल्फांसो या हापुस अब एक नए GI विवाद के केंद्र में है।

महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र में पैदा होने वाले अल्फांसो को 2018 में GI पंजीकरण मिला। आधिकारिक GI रिकॉर्ड में Alphonso के लिए महाराष्ट्र का क्षेत्र दर्ज है।

इसके बाद गुजरात के वलसाड क्षेत्र के उत्पादकों ने Valsad Hapus के लिए अलग GI आवेदन किया। आधिकारिक GI रिकॉर्ड के अनुसार यह आवेदन 13 फरवरी 2023 को दाखिल हुआ और वर्तमान स्थिति Opposed दर्ज है। रिकॉर्ड में 24 अगस्त 2026 का एक आदेश भी सूचीबद्ध है।

यहीं से महाराष्ट्र और गुजरात के उत्पादकों के बीच बहस तेज हुई।

महाराष्ट्र के उत्पादकों की आपत्ति क्या है?

कोंकण के उत्पादकों का तर्क है कि हापुस की पहचान लंबे समय से रत्नागिरी, देवगढ़ और आसपास के कोंकण क्षेत्र से जुड़ी है। उन्हें आशंका है कि अलग-अलग क्षेत्रों में “हापुस” नाम के इस्तेमाल से बाजार में असली और दूसरे क्षेत्र के आम की पहचान को लेकर भ्रम पैदा हो सकता है।

दूसरी ओर गुजरात की तरफ से तर्क दिया गया कि अल्फांसो एक फल की किस्म है और इसका उत्पादन केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है।

2026 की एक रिपोर्ट में इस विवाद को GI के जरिए क्षेत्रीय पहचान तय करने के बड़े सवाल से जोड़ा गया है। इसमें यह भी बताया गया कि महाराष्ट्र में कुछ किसान समूह गुजरात के GI आवेदन का विरोध कर रहे हैं, जबकि गुजरात के समर्थक इसे अपने क्षेत्र में लंबे समय से हो रही खेती की मान्यता से जोड़ते हैं।

आम की मिठास में छिपा बड़ा सवाल

क्या “हापुस” सिर्फ एक किस्म का नाम है या किसी खास भौगोलिक क्षेत्र की पहचान भी?

यही सवाल इस विवाद के केंद्र में है।


4. टोटापुरी आम: आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के बीच बाजार की खींचतान

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2025 में आम को लेकर एक अलग तरह का अंतरराज्यीय विवाद सामने आया। इस बार मामला GI टैग का नहीं बल्कि एक राज्य से दूसरे राज्य में आम की आवाजाही का था।

7 जून 2025 को चित्तूर के जिला कलेक्टर के आदेश से दूसरे राज्यों से आने वाले टोटापुरी आमों की चित्तूर जिले में एंट्री पर रोक लगाई गई। इसके बाद कर्नाटक ने इसका विरोध किया। कर्नाटक के किसानों और व्यापारियों का कहना था कि वहां भी बड़ी मात्रा में टोटापुरी आम पैदा होता है।

कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू को पत्र लिखकर प्रतिबंध हटाने की मांग की। इस विवाद में कर्नाटक के किसानों पर पड़ने वाले आर्थिक असर की बात सामने आई।

टोटापुरी इतना महत्वपूर्ण क्यों?

टोटापुरी आम को ताजा फल के साथ-साथ जूस और पल्प उद्योग में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता है।

इसलिए बाजार में आम की आवाजाही पर रोक का असर केवल फल बेचने वाले किसानों तक नहीं रहता। इससे आढ़तियों, परिवहन कारोबारियों, पल्प उद्योग और दूसरे व्यापारियों पर भी असर पड़ सकता है।

यह मामला दिखाता है कि कभी-कभी राज्यों के बीच विवाद किसी ऐतिहासिक दावे से नहीं, बल्कि मंडी, सीमा और बाजार से भी पैदा हो सकता है।


5. बीकानेरी भुजिया: जब नाम बना अदालत का मामला

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अब बात उस मामले की, जिसे पूरी तरह “राज्य बनाम राज्य” कहना उचित नहीं होगा, लेकिन यह बताता है कि किसी शहर के नाम से जुड़ा खाद्य उत्पाद कितना बड़ा कारोबारी अधिकार बन सकता है।

Bikaneri Bhujia को 2010 में GI पंजीकरण मिला। आधिकारिक रिकॉर्ड में इसका क्षेत्र राजस्थान और आवेदक Bikaner Bhujia Udhyog Sangh दर्ज है। इसका GI पंजीकरण 28 मई 2010 को हुआ था।

2023 में दिल्ली हाई कोर्ट के सामने Bikaneri Bhujia नाम के इस्तेमाल से जुड़ा व्यावसायिक विवाद पहुंचा। अदालत के रिकॉर्ड में Bikaner Bhujia Udyog Sangh ने GI संख्या 142 का अधिकार होने का दावा किया था और एक उत्पाद के नाम में “Bikaneri Bhujia” के इस्तेमाल को चुनौती दी थी।

2026 में दिल्ली हाई कोर्ट के एक आदेश में समझौते के तहत संबंधित पक्ष ने GI Bikaneri Bhujia के अधिकार को चुनौती न देने की बात स्वीकार की।

यह मामला राज्यों के बीच विवाद नहीं था, लेकिन इससे एक बड़ा सवाल सामने आता है—क्या किसी क्षेत्र के नाम से मशहूर उत्पाद का नाम कोई भी कारोबारी इस्तेमाल कर सकता है?

GI कानून का उद्देश्य इसी तरह की भौगोलिक पहचान को संरक्षण देना है।


पांचों मामलों में क्या है समानता?

इन पांचों मामलों की प्रकृति अलग है।

मामलाजुड़े क्षेत्रविवाद का मुख्य मुद्दा
रसगुल्लाओडिशा–पश्चिम बंगालइतिहास, परंपरा और क्षेत्रीय पहचान
बासमतीपंजाब–मध्य प्रदेशGI क्षेत्र का विस्तार
हापुसमहाराष्ट्र–गुजरातकिस क्षेत्र की हापुस पहचान और GI
टोटापुरीआंध्र प्रदेश–कर्नाटकदूसरे राज्य से आम की आवाजाही
बीकानेरी भुजियाराजस्थान/व्यावसायिक पक्षGI नाम के इस्तेमाल का अधिकार

इस सूची में एक महत्वपूर्ण अंतर है। रसगुल्ला, बासमती और हापुस के मामले GI और क्षेत्रीय पहचान से सीधे जुड़े हैं। टोटापुरी का विवाद मुख्यतः अंतरराज्यीय व्यापार और आवाजाही से जुड़ा था, जबकि बीकानेरी भुजिया का मामला कारोबारी GI अधिकार का था।


GI टैग आखिर इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

किसी उत्पाद को GI मिलने के बाद उसका नाम उस विशेष भौगोलिक क्षेत्र की पहचान बन जाता है। इससे उत्पाद की प्रतिष्ठा, बाजार पहचान और पारंपरिक उत्पादन पद्धति को कानूनी संरक्षण मिल सकता है।

किसान और स्थानीय उत्पादक इससे अपने उत्पाद को सामान्य बाजार की वस्तु के बजाय क्षेत्रीय पहचान वाले उत्पाद के रूप में स्थापित कर सकते हैं।

लेकिन GI टैग अपने आप किसी पुराने विवाद का अंतिम ऐतिहासिक फैसला नहीं होता। रसगुल्ले के मामले में इसका सबसे अच्छा उदाहरण सामने है—दो अलग क्षेत्रीय उत्पादों को अलग-अलग GI पहचान मिली।


स्वाद से शुरू होती है पहचान की कहानी

भारत की खाद्य संस्कृति में किसी चीज का नाम केवल नाम नहीं होता। उसके पीछे भूगोल, मिट्टी, मौसम, स्थानीय कारीगरी, खेती, व्यापार और पीढ़ियों की परंपरा जुड़ी होती है।

रसगुल्ला ओडिशा में धार्मिक परंपरा से जुड़ा है तो बंगाल में मिठाई संस्कृति से। बासमती उत्तर भारत के कई क्षेत्रों की कृषि और निर्यात अर्थव्यवस्था से जुड़ा है। हापुस कोंकण और गुजरात के बागों में अलग-अलग स्थानीय पहचान रखता है। टोटापुरी ने दक्षिण भारत के फल और पल्प बाजार को जोड़ रखा है। बीकानेरी भुजिया ने एक पूरे शहर के नाम को देशभर में पहचान दिलाई।

यही वजह है कि इन उत्पादों पर विवाद सिर्फ स्वाद का विवाद नहीं रह जाता।


जब ‘नाम’ बन जाता है करोड़ों का सवाल

आज किसी प्रसिद्ध खाद्य उत्पाद की पहचान उसके बाजार मूल्य को सीधे प्रभावित कर सकती है। ग्राहक “असली” क्षेत्रीय उत्पाद खरीदना चाहता है। व्यापारी उस नाम की प्रतिष्ठा से लाभ कमाना चाहता है और किसान अपने क्षेत्र की पहचान बनाए रखना चाहता है।

इसीलिए GI टैग की लड़ाई कई बार इतिहास, संस्कृति और अर्थव्यवस्था—तीनों का मिश्रण बन जाती है।

रसगुल्ले की मीठी बहस से लेकर हापुस की मौजूदा खींचतान तक कहानी यही बताती है कि भारत में खाना केवल पेट भरने की चीज नहीं है। यह जमीन से जुड़ी पहचान है।

और जब किसी मिठाई, फल या अनाज के साथ किसी शहर या राज्य का नाम जुड़ जाता है, तो उस नाम की कीमत सिर्फ बाजार में नहीं, लोगों की भावनाओं में भी तय होने लगती है।

जमुना दयाल

जमुना दयाल वाराणसी के निवासी हैं और उन्हें हिंदी समाचार मीडिया में 10 से अधिक वर्षों का गहन रिपोर्टिंग अनुभव है। उन्होंने अमर उजाला और दैनिक जागरण जैसे देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में जिला रिपोर्टर के रूप में कार्य करते हुए खेल, शिक्षा, राजनीति, कृषि तथा सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता से कवर किया है। शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से जनसंचार में परास्नातक (MJMC) की डिग्री प्राप्त की है और यूजीसी नेट (UGC NET) परीक्षा उत्तीर्ण की है।

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