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देवगढ़ का दशावतार मंदिर: पत्थरों पर उकेरी गई विष्णु की कथाएं, गुप्तकालीन स्थापत्य का अनमोल खजाना

करीब 1500 साल पुराने इस मंदिर में दिखाई देती है भारतीय मंदिर वास्तुकला की शुरुआती भव्यता, जहां भगवान विष्णु के विभिन्न रूपों के साथ रामायण और पुराणों की कहानियां भी पत्थरों पर जीवंत हैं।

उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में स्थित ललितपुर जिले का देवगढ़ इतिहास, कला और धार्मिक विरासत का ऐसा खजाना है, जिसकी अहमियत केवल मंदिरों तक सीमित नहीं है। बेतवा नदी के किनारे बसा यह प्राचीन स्थल गुप्तकालीन मूर्तिकला और मंदिर निर्माण की उस परंपरा का गवाह है, जिसने आगे चलकर उत्तर भारत की मंदिर वास्तुकला को नई पहचान दी। यहां स्थित दशावतार मंदिर को भारतीय मंदिर स्थापत्य के शुरुआती महत्वपूर्ण उदाहरणों में गिना जाता है।

करीब छठी शताब्दी का यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है। आज इसका बड़ा हिस्सा खंडहर के रूप में दिखाई देता है, लेकिन बची हुई दीवारें, नक्काशीदार प्रवेश द्वार और विशाल मूर्तिपट्ट आज भी उस दौर के कलाकारों की कल्पनाशीलता और कारीगरी का परिचय देते हैं। यह मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं था, बल्कि पत्थरों पर उकेरी गई धार्मिक कथाओं और स्थापत्य प्रयोगों का एक अनूठा संसार भी था।

गुप्तकाल की देन है दशावतार मंदिर

इतिहासकारों और कला विशेषज्ञों के अनुसार दशावतार मंदिर का निर्माण गुप्तकाल के अंतिम दौर में, लगभग पांचवीं शताब्दी के अंत या छठी शताब्दी की शुरुआत में हुआ माना जाता है। गुप्तकाल को भारतीय कला, साहित्य, विज्ञान और स्थापत्य के विकास का महत्वपूर्ण दौर माना जाता है। इस समय मंदिर निर्माण की ऐसी शैली विकसित हो रही थी, जिसमें गर्भगृह, ऊंचा चबूतरा, प्रवेश द्वार और शिखर जैसे तत्व धीरे-धीरे व्यवस्थित रूप लेने लगे थे।

देवगढ़ का यह मंदिर इसी बदलाव का महत्वपूर्ण उदाहरण है। इसे उत्तर भारत के सबसे पुराने संरचनात्मक मंदिरों में गिना जाता है। खास बात यह है कि यह उन शुरुआती मंदिरों में शामिल है, जिनमें गर्भगृह के ऊपर शिखर बनाने की परंपरा स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। बाद में यही शिखर उत्तर भारतीय नागर शैली के मंदिरों की पहचान बना।

पांच मंदिरों की योजना पर बना था परिसर

दशावतार मंदिर की सबसे खास विशेषताओं में इसकी निर्माण योजना शामिल है। इसे पंचायतन शैली में बनाया गया था। पंचायतन का अर्थ है पांच मंदिरों का समूह। इस योजना में बीच में मुख्य मंदिर होता है और उसके चारों कोनों पर छोटे मंदिर बनाए जाते हैं।

देवगढ़ के मंदिर में मुख्य गर्भगृह एक ऊंचे वर्गाकार चबूतरे पर बनाया गया था। चबूतरे के चारों ओर सीढ़ियां थीं, जिससे अलग-अलग दिशाओं से मंदिर तक पहुंचा जा सकता था। इसके चारों कोनों पर छोटे मंदिरों के अवशेष मिले हैं। इससे पता चलता है कि पूरा परिसर एक सुविचारित योजना के अनुसार तैयार किया गया था।

मंदिर का चबूतरा करीब 55.5 फीट वर्गाकार और लगभग नौ फीट ऊंचा बताया गया है। मुख्य मंदिर के ऊपर कभी ऊंचा शिखर रहा होगा, लेकिन समय और प्राकृतिक क्षरण के कारण उसका अधिकांश हिस्सा नष्ट हो चुका है। आज इसके अवशेषों से ही उस प्राचीन निर्माण की भव्यता का अंदाजा लगाया जा सकता है।

दीवारों पर भगवान विष्णु की तीन अद्भुत कथाएं

इस मंदिर की असली खूबसूरती इसकी दीवारों पर बनी विशाल मूर्तियों और कथात्मक दृश्यों में छिपी है। मंदिर की बाहरी तीन दीवारों पर भगवान विष्णु से जुड़ी प्रमुख कथाओं को उकेरा गया है। इन मूर्तियों में धार्मिक आस्था के साथ-साथ गुप्तकालीन कलाकारों की कल्पना और शिल्प कौशल भी दिखाई देता है।

1. शेषशायी विष्णु: मंदिर के एक प्रमुख मूर्तिपट्ट में भगवान विष्णु को शेषनाग की शय्या पर विश्राम करते हुए दिखाया गया है। इस रूप को अनंतशायी विष्णु भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग पर विश्राम करते हैं। उनके नाभि-कमल से ब्रह्मा के प्रकट होने की कल्पना सृष्टि की उत्पत्ति से जुड़ी है। इस दृश्य में देवी लक्ष्मी और अन्य दिव्य आकृतियां भी दिखाई देती हैं।

2. नर-नारायण की तपस्या: दूसरे मूर्तिपट्ट में नर और नारायण ऋषियों को तपस्या करते हुए दिखाया गया है। यह दृश्य साधना, संयम और आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक माना जाता है। मूर्तियों में ऋषियों की शांत मुद्रा और आसपास की आकृतियां उस समय के कलाकारों की बारीक कारीगरी को सामने लाती हैं।

3. गजेंद्र मोक्ष: मंदिर का एक अन्य प्रसिद्ध दृश्य गजेंद्र मोक्ष की कथा को दर्शाता है। पुराणों के अनुसार एक हाथी गजेंद्र तालाब में मगरमच्छ के चंगुल में फंस जाता है। संकट में वह भगवान विष्णु को पुकारता है। भक्त की पुकार सुनकर भगवान विष्णु उसकी रक्षा करते हैं। इस दृश्य में भक्ति, संकट और ईश्वर की कृपा का भाव पत्थरों पर उकेरा गया है।

प्रवेश द्वार पर गंगा-यमुना की सुंदर आकृतियां

मंदिर का प्रवेश द्वार भी अपनी नक्काशी के कारण खास है। इसके चौखट पर कई स्तरों में सजावटी आकृतियां बनाई गई हैं। द्वार के दोनों ओर नदी देवियों गंगा और यमुना की प्रतिमाएं दिखाई देती हैं। भारतीय मंदिर परंपरा में प्रवेश द्वार पर इन दोनों नदियों का अंकन पवित्रता और शुद्धि का प्रतीक माना जाता है।

द्वार पर देवी-देवताओं, द्वारपालों और सजावटी आकृतियों की बारीक नक्काशी भी देखने को मिलती है। पत्थर पर उकेरी गई इन आकृतियों से पता चलता है कि गुप्तकालीन शिल्पकार केवल बड़ी मूर्तियां बनाने में ही निपुण नहीं थे, बल्कि छोटे से छोटे हिस्से को भी कलात्मक रूप देने की क्षमता रखते थे। Sahasa+1

रामायण और कृष्ण कथाओं के भी मिलते हैं दृश्य

दशावतार मंदिर का महत्व केवल भगवान विष्णु की मूर्तियों तक सीमित नहीं है। इसके चबूतरे और आसपास मिले मूर्तिपट्टों में रामायण और कृष्ण से जुड़ी कथाओं के दृश्य भी पहचाने गए हैं। इनमें रामकथा के प्रसंगों के साथ कृष्ण की लीलाओं से जुड़े चित्रण शामिल हैं।

इन मूर्तियों से पता चलता है कि उस समय धार्मिक कथाओं को मंदिरों की दीवारों और आधार भागों पर उकेरने की परंपरा विकसित हो चुकी थी। मंदिर में आने वाले लोग इन दृश्यों के माध्यम से उन कथाओं को देख और समझ सकते थे, जिन्हें वे धार्मिक ग्रंथों और लोक परंपराओं में सुनते आए थे।

दशावतार नाम कैसे पड़ा?

मंदिर को आज दशावतार मंदिर के नाम से जाना जाता है। यह नाम भगवान विष्णु के दस अवतारों से जुड़ा है। हालांकि, इतिहासकारों के बीच इस नाम को लेकर चर्चा रही है। पुरातत्वविदों को मंदिर और उसके आसपास विष्णु के अलग-अलग रूपों से संबंधित मूर्तियां और अवशेष मिले हैं। मंदिर के सभी दस अवतारों का एक साथ स्पष्ट चित्रण मिलना जरूरी नहीं है। इसलिए इसका प्रचलित नाम मंदिर की धार्मिक पहचान से जुड़ा है, न कि इस बात का प्रमाण कि इसकी हर दीवार पर दसों अवतार बने हुए थे।

पुरातत्वविदों के अध्ययन से यह भी सामने आया है कि मंदिर में विष्णु के विभिन्न रूपों के साथ अन्य धार्मिक और पौराणिक प्रसंगों का भी चित्रण था।

देवगढ़ में जैन मंदिरों की भी अनूठी विरासत

दशावतार मंदिर देखने आने वाले पर्यटकों के लिए देवगढ़ में एक और महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहर मौजूद है। पास की पहाड़ी पर स्थित किले के भीतर बड़ी संख्या में प्राचीन जैन मंदिर और मूर्तियां हैं। यहां जैन तीर्थंकरों की प्रतिमाएं, शिलालेख और प्राचीन कला के अनेक नमूने मिलते हैं।

इस तरह देवगढ़ एक ही स्थान पर हिंदू और जैन धर्म से जुड़ी ऐतिहासिक विरासत को देखने का अवसर देता है। बेतवा नदी के किनारे स्थित घाट और पहाड़ी पर बने प्राचीन स्मारक इस पूरे क्षेत्र को पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाते हैं।

इतिहास और कला प्रेमियों के लिए क्यों खास है देवगढ़?

दशावतार मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह भारतीय मंदिर वास्तुकला के विकास की शुरुआती कड़ी को समझने का अवसर देता है। यहां एक ओर गुप्तकालीन मूर्तिकला की सुंदरता दिखाई देती है, तो दूसरी ओर पंचायतन योजना और शिखर निर्माण जैसे स्थापत्य प्रयोग भी देखने को मिलते हैं।

मंदिर का अधिकांश हिस्सा भले ही समय के साथ नष्ट हो गया हो, लेकिन इसके बचे हुए अवशेष आज भी इतिहास के कई सवालों के जवाब देते हैं। यही वजह है कि कला इतिहास के अध्येताओं, पुरातत्वविदों और देश की प्राचीन विरासत में रुचि रखने वाले लोगों के लिए देवगढ़ का विशेष महत्व है।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण इस स्मारक का संरक्षण करता है। देवगढ़ में पुरातात्विक संग्रहालय भी है, जहां क्षेत्र से प्राप्त कई महत्वपूर्ण मूर्तियां और अवशेष रखे गए हैं।

जमुना दयाल

जमुना दयाल वाराणसी के निवासी हैं और उन्हें हिंदी समाचार मीडिया में 10 से अधिक वर्षों का गहन रिपोर्टिंग अनुभव है। उन्होंने अमर उजाला और दैनिक जागरण जैसे देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में जिला रिपोर्टर के रूप में कार्य करते हुए खेल, शिक्षा, राजनीति, कृषि तथा सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता से कवर किया है। शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से जनसंचार में परास्नातक (MJMC) की डिग्री प्राप्त की है और यूजीसी नेट (UGC NET) परीक्षा उत्तीर्ण की है।

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