आगरा का पेठा: मुगलकालीन रसोई से देश-दुनिया तक पहुंची मिठास, जानिए कैसे बनता है यह मशहूर पेठा और कितना है सबसे महंगा
सफेद कद्दू से बनता है आगरा का मशहूर पेठा, जानिए कैसे पहुंचा दुनिया भर में

ताजमहल देखने आगरा आने वाले पर्यटक संगमरमर की खूबसूरती के साथ एक खास मिठास भी अपने घर लेकर जाते हैं। सफेद कद्दू से तैयार होने वाला पेठा आज आगरा की पहचान बन चुका है। सादा, केसर, अंगूरी, पान गिलोरी और चॉकलेट जैसे 50 से अधिक स्वादों में मिलने वाली इस मिठाई के पीछे कारीगरों की मेहनत और पीढ़ियों पुरानी परंपरा छिपी है। कभी साधारण मिठाई के रूप में पहचाना जाने वाला पेठा आज देश के बड़े मिठाई बाजारों तक पहुंच चुका है।
ताजमहल की नगरी की सबसे मीठी पहचान है पेठा
भारत में मिठाइयों की अपनी अलग दुनिया है। कहीं बंगाल का रसगुल्ला प्रसिद्ध है तो कहीं मथुरा का पेड़ा, राजस्थान की घेवर और बिहार का खाजा लोगों के बीच लोकप्रिय है। लेकिन उत्तर प्रदेश के आगरा की पहचान जिस मिठाई ने देश-दुनिया में बनाई है, वह है पेठा।
इस मिठाई की खासियत है कि इसे दूध, मावा या खोया से नहीं, बल्कि सफेद कद्दू यानी पेठा कुम्हड़ा से तैयार किया जाता है। चीनी की चाशनी में पकने के बाद इसका रंग पारदर्शी और बनावट हल्की मुलायम हो जाती है। स्वाद के अनुसार इसमें केसर, इलायची, गुलाब, पान, नारियल और सूखे मेवों का इस्तेमाल किया जाता है।
आगरा का पेठा केवल मिठाई की दुकान तक सीमित नहीं है। यह शहर की सांस्कृतिक और कारोबारी पहचान का हिस्सा बन चुका है। उत्तर प्रदेश सरकार ने इसे एक जिला एक उत्पाद (ODOP) कार्यक्रम के तहत भी शामिल किया है। इससे स्थानीय मिठाई निर्माताओं, कारीगरों और कारोबारियों को पहचान मिली है।
शाहजहां के दौर से जुड़ी है पेठे की कहानी, लेकिन इतिहास में कितनी सच्चाई?
आगरा के पेठे की उत्पत्ति को लेकर कई कहानियां प्रचलित हैं। सबसे लोकप्रिय कहानी मुगल बादशाह शाहजहां और ताजमहल के निर्माण से जुड़ी है।
कहा जाता है कि जब शाहजहां ताजमहल बनवा रहे थे, तब उन्होंने अपने शाही रसोइयों से ऐसी मिठाई तैयार करने को कहा, जिसका रंग ताजमहल के सफेद संगमरमर जैसा हो। इसके बाद शाही रसोई में सफेद कद्दू से पेठा बनाया गया। एक अन्य लोककथा के अनुसार ताजमहल के निर्माण में लगे हजारों मजदूरों के लिए पौष्टिक और ऊर्जा देने वाली मिठाई तैयार करने की कोशिश हुई थी।
इन कहानियों ने पेठे को मुगलकालीन विरासत से जोड़ दिया। हालांकि इतिहासकारों के बीच इस बात का पक्का प्रमाण उपलब्ध नहीं है कि शाहजहां ने ही पेठे का आविष्कार कराया था या ताजमहल के निर्माण के समय इसकी शुरुआत हुई थी।
खाद्य इतिहास के जानकारों के अनुसार सफेद कद्दू से मीठा मुरब्बा और संरक्षित खाद्य पदार्थ बनाने की परंपरा भारत के कई क्षेत्रों में पहले से मौजूद रही है। इसलिए पेठे की शुरुआत को केवल मुगलकाल से जोड़कर देखना सही नहीं होगा।
आखिर आगरा के नाम से ही क्यों मशहूर हुआ पेठा?
जब पेठे जैसी मिठाई देश के दूसरे हिस्सों में भी बनाई जाती रही, तो फिर आगरा के नाम से इसकी इतनी बड़ी पहचान कैसे बनी?
इसका एक महत्वपूर्ण कारण आगरा का ऐतिहासिक और व्यापारिक महत्व रहा है। मुगलकाल से ही आगरा एक प्रमुख शहर था। बाद में ब्रिटिश शासन के दौरान यहां रेलवे और यातायात का विस्तार हुआ। आगरा एक प्रमुख रेलवे जंक्शन के रूप में विकसित हुआ।
लंबी रेल यात्राओं के दौरान यात्रियों को ऐसी मिठाई की जरूरत होती थी, जिसे कुछ समय तक सुरक्षित रखा जा सके और आसानी से साथ ले जाया जा सके। पेठा इस जरूरत के अनुकूल था। इसमें दूध या खोया नहीं होता था और चीनी की चाशनी के कारण इसकी कुछ किस्मों को अपेक्षाकृत लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता था।
आगरा से गुजरने वाले यात्री पेठा खरीदकर अपने घर ले जाने लगे। धीरे-धीरे यह मिठाई शहर की पहचान बन गई। ताजमहल देखने आने वाले पर्यटकों ने भी इसकी लोकप्रियता बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई।
सफेद कद्दू से कैसे तैयार होता है आगरा का पेठा?

पेठा बनाने की प्रक्रिया देखने में आसान लग सकती है, लेकिन इसकी गुणवत्ता और स्वाद बनाए रखने के लिए कारीगरों को कई चरणों से गुजरना पड़ता है।
पहला चरण: सफेद कद्दू का चुनाव
सबसे पहले अच्छे आकार और परिपक्वता वाला सफेद कद्दू चुना जाता है। इसे पेठा कुम्हड़ा या ऐश गॉर्ड भी कहा जाता है। इसकी बाहरी छिलके और अंदर के बीज वाले हिस्से को हटाया जाता है।
दूसरा चरण: टुकड़े काटना
कद्दू को साफ करके मनचाहे आकार में काटा जाता है। सादा पेठा बनाने के लिए बड़े टुकड़े तैयार किए जाते हैं, जबकि अंगूरी पेठा के लिए छोटे-छोटे टुकड़े काटे जाते हैं।
तीसरा चरण: चूने के पानी में भिगोना
कद्दू के टुकड़ों को खाद्य-योग्य चूने के नियंत्रित घोल में भिगोया जाता है। इससे टुकड़ों को पकने के बाद भी अपना आकार और कुछ हद तक कुरकुरापन बनाए रखने में मदद मिलती है। इसके बाद उन्हें साफ पानी से अच्छी तरह धोना जरूरी होता है, ताकि चूने का अवशेष न रहे।
चौथा चरण: उबालना
इसके बाद कद्दू के टुकड़ों को पानी में पकाया जाता है। इस दौरान उनका रंग और बनावट बदलने लगती है। धीरे-धीरे टुकड़े पारदर्शी दिखाई देने लगते हैं।
पांचवां चरण: चाशनी में पकाना
अब कद्दू के टुकड़ों को चीनी की चाशनी में डाला जाता है। चाशनी की मात्रा और पकाने का समय पेठे की किस्म के अनुसार तय किया जाता है। इसी चरण में केसर, गुलाब, इलायची और अन्य स्वाद मिलाए जा सकते हैं।
छठा चरण: सुखाना और पैकिंग
तैयार पेठे को बाहर निकालकर अतिरिक्त चाशनी हटाई जाती है। कुछ किस्मों को सुखाया जाता है, जबकि रसदार पेठे को चाशनी के साथ ही रखा जाता है। इसके बाद साफ-सुथरे डिब्बों में पैक करके बाजार में भेज दिया जाता है।
इस पूरी प्रक्रिया में कद्दू की गुणवत्ता, चाशनी का सही गाढ़ापन और पकाने का समय बहुत महत्वपूर्ण होता है। इन्हीं बातों से पेठे की पारदर्शिता, मिठास और बनावट तय होती है।
आगरा में मिलते हैं पेठे के 50 से अधिक स्वाद, हर किस्म की अलग पहचान
पहले आगरा में मुख्य रूप से सादा, सूखा और रसीला पेठा ही मिलता था। समय के साथ कारीगरों ने इसमें नए स्वाद और प्रयोग शुरू किए। आज यहां पेठे की कई दर्जन किस्में तैयार की जाती हैं।
1. सादा पेठा: यह सबसे पुरानी और पारंपरिक किस्म मानी जाती है। सफेद रंग और हल्की पारदर्शी बनावट इसकी पहचान है।
2. अंगूरी पेठा: इसे छोटे-छोटे गोल टुकड़ों में बनाया जाता है। देखने में अंगूर जैसा लगता है। बच्चों और युवाओं के बीच इसकी अच्छी मांग रहती है।
3. केसर पेठा: इसमें केसर का इस्तेमाल किया जाता है। इसका रंग हल्का पीला और खुशबू खास होती है।
4. पान गिलोरी पेठा: पान के स्वाद से तैयार यह किस्म देखने में भी आकर्षक होती है। इसमें पान और मीठे मसालों का स्वाद मिलता है।
5. चॉकलेट पेठा: आधुनिक स्वाद पसंद करने वालों के लिए तैयार इस किस्म में चॉकलेट का इस्तेमाल किया जाता है।
6. नारियल पेठा: इसमें नारियल का स्वाद मिलाया जाता है। इसकी बनावट और स्वाद दूसरी किस्मों से अलग होता है।
7. ड्राई फ्रूट पेठा: इसमें काजू, बादाम, पिस्ता और अन्य सूखे मेवों का इस्तेमाल किया जाता है। यह सामान्य पेठे की तुलना में महंगा हो सकता है।
8. चेरी पेठा: रंगीन चेरी और मीठे स्वाद के कारण यह देखने में आकर्षक लगता है। इसे उपहार के रूप में भी खरीदा जाता है।
9. खस पेठा: इसमें खस के स्वाद और खुशबू का इस्तेमाल किया जाता है।
10. लाल पेठा: यह अपने अलग रंग और स्वाद के कारण लोकप्रिय है।
इसके अलावा आम, संतरा, गुलाब, इलायची, पिस्ता और कई दूसरे स्वादों में भी पेठा तैयार किया जाता है। अलग-अलग दुकानों और निर्माताओं के अनुसार इनकी किस्में बदलती रहती हैं।
सबसे महंगा पेठा कौन सा है और कितनी होती है कीमत?
आगरा में सामान्य पेठे की कीमत और खास किस्मों की कीमत में काफी अंतर होता है। सादा पेठा आमतौर पर अपेक्षाकृत सस्ता मिलता है, जबकि केसर, पिस्ता, काजू-बादाम और दूसरे सूखे मेवों से तैयार पेठा महंगा होता है।
महंगे पेठे में रॉयल पेठा, ड्राई फ्रूट पेठा और खास उपहार पैक शामिल हो सकते हैं। इनमें महंगी सामग्री, आकर्षक पैकिंग और बनाने की अतिरिक्त मेहनत के कारण कीमत बढ़ जाती है।
जून 2022 की एक प्रकाशित बाजार रिपोर्ट में सामान्य पेठे की कीमत लगभग 85 से 120 रुपये प्रति किलो और रॉयल पेठे की कीमत करीब 360 रुपये प्रति किलो बताई गई थी। यह उस समय का भाव है, आज का बाजार भाव नहीं।
वर्तमान में सबसे महंगे पेठे की कोई प्रमाणित राष्ट्रीय मूल्य सूची या आधिकारिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। इसकी कीमत दुकान, सामग्री, गुणवत्ता और पैकिंग के हिसाब से बदलती है। इसलिए किसी एक किस्म को निश्चित रूप से देश का सबसे महंगा पेठा कहना उचित नहीं होगा।
पेठा बनाने वाले कारीगर: जिनके हाथों में छिपी है मिठास की असली पहचान
आगरा के पेठे की लोकप्रियता के पीछे वहां के कारीगरों की बड़ी भूमिका है। कई परिवार पीढ़ियों से इस काम से जुड़े हुए हैं। उनके लिए पेठा बनाना केवल रोजगार नहीं, बल्कि पारिवारिक हुनर और परंपरा है।
पेठा बनाने वाले कारीगर सुबह से ही काम में जुट जाते हैं। सबसे पहले कद्दू की छंटाई और सफाई होती है। फिर उसे काटने, छीलने और तैयार करने का काम शुरू होता है। इसके बाद चाशनी में पकाने और स्वाद के अनुसार अलग-अलग किस्में तैयार करने का काम किया जाता है।
पेठे की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए कारीगरों को अनुभव की जरूरत होती है। कद्दू को कितनी देर भिगोना है, कब उबालना है, चाशनी कितनी गाढ़ी रखनी है और कब पेठे को बाहर निकालना है—इन सभी बातों का ध्यान रखना पड़ता है।
कारीगरों का हुनर ही तय करता है कि पेठा कितना मुलायम, पारदर्शी और स्वादिष्ट बनेगा। यही कारण है कि एक ही सामग्री से तैयार होने के बावजूद अलग-अलग दुकानों के पेठे के स्वाद में अंतर दिखाई देता है।
नूरी दरवाजा से देश-दुनिया तक पहुंचा पेठे का कारोबार
आगरा में नूरी दरवाजा क्षेत्र को पेठा कारोबार का पुराना प्रमुख केंद्र माना जाता रहा है। यहां लंबे समय तक पेठा बनाने वाली इकाइयां और मिठाई की दुकानें सक्रिय रहीं।
समय के साथ पर्यावरण और प्रदूषण से जुड़े नियमों के कारण पेठा बनाने वाली इकाइयों को शहर के अन्य क्षेत्रों में स्थानांतरित करने की प्रक्रिया शुरू हुई। अब आगरा के कई इलाकों में पेठा निर्माण का काम होता है।
कैलिंदी विहार, एत्माद्दौला, रुनकता, खेरागढ़, फतेहाबाद और आसपास के क्षेत्रों में भी पेठा कारोबार से जुड़ी इकाइयां मिलती हैं।
यह उद्योग केवल मिठाई निर्माताओं तक सीमित नहीं है। इसमें कद्दू उगाने वाले किसान, कच्चा माल पहुंचाने वाले व्यापारी, मजदूर, पैकिंग करने वाले कर्मचारी और दुकानदार भी शामिल हैं।
क्या आगरा के अलावा देश के दूसरे हिस्सों में भी बनता है पेठा?
पेठा केवल आगरा तक सीमित नहीं है। सफेद कद्दू से मीठा मुरब्बा और संरक्षित मिठाई बनाने की परंपरा देश के कई क्षेत्रों में रही है।
उत्तर प्रदेश: आगरा के अलावा प्रदेश के दूसरे शहरों में भी पेठे की बिक्री और निर्माण होता है। लखनऊ, कानपुर, मथुरा, वाराणसी और प्रयागराज जैसे शहरों के मिठाई बाजारों में पेठा मिलता है। हालांकि इन सभी को आगरा जितना बड़ा पारंपरिक उत्पादन केंद्र नहीं माना जा सकता।
बिहार और झारखंड: यहां सफेद कद्दू से मुरब्बा और मीठे संरक्षित खाद्य पदार्थ बनाने की परंपरा मिलती है। कुछ क्षेत्रों में इसे स्थानीय नामों से जाना जाता है।
उत्तराखंड: यहां मेलों और त्योहारों में पेठे जैसी संरक्षित मिठाइयों का इस्तेमाल पुरानी परंपरा का हिस्सा रहा है।
छत्तीसगढ़: यहां भी सफेद कद्दू से तैयार मीठे मुरब्बे और स्थानीय खाद्य पदार्थों की परंपरा देखने को मिलती है।
इस तरह पेठे की मूल सामग्री और उसे तैयार करने का विचार भारत के कई क्षेत्रों में मिलता है। लेकिन आगरा ने अपनी खास बनावट, स्वाद, किस्मों और व्यापार के कारण इस मिठाई को अलग पहचान दिलाई है।
पेठा उद्योग के सामने पर्यावरण की चुनौती
आगरा का पेठा उद्योग जहां हजारों लोगों की आजीविका से जुड़ा है, वहीं इसके निर्माण से निकलने वाला कचरा भी एक बड़ी चुनौती है।
कद्दू को छीलने, काटने और बीज निकालने के दौरान काफी मात्रा में जैविक कचरा निकलता है। इसके अलावा पेठा बनाने वाली इकाइयों में इस्तेमाल होने वाले पानी और ईंधन का सही प्रबंधन भी जरूरी है।
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की एक रिपोर्ट में आगरा के पेठा उद्योग से निकलने वाले कचरे और उसके निस्तारण की समस्या पर चर्चा की गई है। रिपोर्ट के अनुसार कद्दू से पेठा बनाने में बड़ी मात्रा में छिलका, बीज और अन्य अवशेष निकलते हैं।
यदि इस कचरे का सही प्रबंधन किया जाए तो इससे खाद और दूसरे उपयोगी उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। इससे उद्योग को पर्यावरण के अनुकूल बनाने में मदद मिल सकती है।
एक साधारण कद्दू ने बना दी पूरे शहर की पहचान
आगरा का पेठा इस बात का उदाहरण है कि किसी साधारण कृषि उत्पाद को स्थानीय कारीगरी और व्यापार के सहारे बड़ी पहचान दिलाई जा सकती है। जिस सफेद कद्दू को सामान्य सब्जी के रूप में देखा जाता है, उसी से तैयार मिठाई आज देश-दुनिया में मशहूर है।
इसके पीछे कारीगरों की पीढ़ियों की मेहनत, स्वाद में किए गए प्रयोग और शहर की ऐतिहासिक पहचान का योगदान है।
ताजमहल की खूबसूरती देखने आगरा आने वाले पर्यटकों के लिए पेठा आज भी खरीदारी की खास चीज है। कोई सादा पेठा पसंद करता है तो कोई केसर, अंगूरी या ड्राई फ्रूट वाला। स्वाद भले अलग-अलग हों, लेकिन हर किस्म में आगरा की उस परंपरा की मिठास जरूर मौजूद है, जिसने एक साधारण कद्दू को शहर की पहचान बना दिया।



