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ऐरावतेश्वर मंदिर: पत्थरों में उकेरी गई चोल साम्राज्य की अद्भुत कला, जहां सीढ़ियों से निकलते हैं संगीत के सुर

संगीत सुनाती सीढ़ियां, पत्थरों पर उकेरी गईं हजारों कहानियां; चोलकालीन शिल्पकला का ऐसा अद्भुत नमूना, जिसे देखकर हर कोई रह जाता है हैरान।

तमिलनाडु के दारासुरम में स्थित ऐरावतेश्वर मंदिर भारतीय स्थापत्य कला का ऐसा अनमोल खजाना है, जहां पत्थरों पर देवी-देवताओं, नृत्य, संगीत और पौराणिक कथाओं को जीवंत कर दिया गया है। यूनेस्को की विश्व धरोहर में शामिल यह मंदिर चोल शासकों की कलात्मक सोच, धार्मिक आस्था और इंजीनियरिंग कौशल की अद्भुत मिसाल है।

एक मंदिर, जिसमें बसती है हजार साल पुरानी कला की दुनिया

भारत के दक्षिणी हिस्से में तमिलनाडु की धरती पर बने मंदिर केवल पूजा-पाठ के केंद्र नहीं हैं, बल्कि वे इतिहास, विज्ञान, संगीत, नृत्य और वास्तुकला के जीवंत संग्रहालय भी हैं। ऐसा ही एक अद्भुत मंदिर है ऐरावतेश्वर मंदिर। कुंभकोणम के पास दारासुरम में स्थित यह मंदिर अपनी बारीक नक्काशी, भव्य मंडप, पौराणिक कथाओं और अनूठी बनावट के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है।

करीब 12वीं शताब्दी में बने इस मंदिर को देखने पर ऐसा लगता है, मानो कलाकारों ने पत्थरों में अपनी कल्पना और प्रतिभा को हमेशा के लिए कैद कर दिया हो। मंदिर की दीवारों पर बनी मूर्तियां, खंभों की नक्काशी और पत्थर के रथ जैसी संरचना आज भी लोगों को आश्चर्यचकित करती है।

यह मंदिर केवल चोल राजाओं की धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं है, बल्कि उस दौर की उन्नत निर्माण तकनीक और कलात्मक समृद्धि की कहानी भी सुनाता है।

किसने बनवाया था ऐरावतेश्वर मंदिर?

ऐरावतेश्वर मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में चोल वंश के प्रसिद्ध शासक राजराजा द्वितीय ने करवाया था। उनका शासनकाल लगभग 1146 से 1173 ईस्वी तक माना जाता है। चोल शासकों ने दक्षिण भारत में मंदिर निर्माण और कला को विशेष संरक्षण दिया था।

राजराजा द्वितीय के समय में चोल साम्राज्य की स्थापत्य परंपरा अपने विशिष्ट रूप में विकसित हुई। ऐरावतेश्वर मंदिर इसी परंपरा का उत्कृष्ट उदाहरण है। मंदिर का निर्माण भगवान शिव को समर्पित किया गया था। यहां शिवजी की पूजा ऐरावतेश्वर नाम से होती है।

इस मंदिर का नाम भी एक पौराणिक कथा से जुड़ा हुआ है, जो इसे धार्मिक दृष्टि से खास बनाती है।

ऐरावत हाथी से जुड़ी है मंदिर की दिलचस्प पौराणिक कथा

ऐरावतेश्वर मंदिर का नाम भगवान इंद्र के सफेद हाथी ऐरावत के नाम पर पड़ा है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार ऐरावत को एक ऋषि के श्राप के कारण अपना सफेद रंग खोना पड़ा था। इससे परेशान होकर वह भगवान शिव की शरण में पहुंचा।

कहा जाता है कि ऐरावत ने इसी स्थान पर भगवान शिव की आराधना की और मंदिर के पवित्र कुंड में स्नान किया। शिवजी की कृपा से उसका सफेद रंग वापस आ गया। तभी से यहां विराजमान भगवान शिव ऐरावतेश्वर के नाम से प्रसिद्ध हुए।

यह कथा मंदिर की धार्मिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मंदिर की दीवारों पर भी इस पौराणिक प्रसंग से जुड़ी कलाकृतियां और शिलालेख देखने को मिलते हैं।

पत्थर का रथ है मंदिर की सबसे बड़ी खासियत

ऐरावतेश्वर मंदिर की सबसे आकर्षक विशेषताओं में इसका रथ के आकार का मंडप शामिल है। मंदिर के सामने बना यह मंडप ऐसा दिखाई देता है, जैसे पत्थर से तैयार कोई विशाल रथ जमीन पर खड़ा हो।

इसमें पत्थर के पहिए, घोड़ों की आकृतियां और बारीक नक्काशी दिखाई देती है। इसकी बनावट उस समय की निर्माण कला और कलाकारों की कल्पनाशीलता का परिचय देती है।

इस मंडप को राजगंभीर मंडपम के नाम से जाना जाता है। इसका नाम चोल शासक राजराजा द्वितीय की उपाधि राजगंभीर से जुड़ा है।

मंडप के खंभों पर देवी-देवताओं, नृत्य करते कलाकारों, पौराणिक पात्रों और अन्य आकृतियों को इतनी बारीकी से उकेरा गया है कि उन्हें देखने पर लगता है कि पत्थर में भी जीवन समा सकता है।

संगीत के सुर निकालती हैं मंदिर की सीढ़ियां

इस मंदिर की एक और खासियत इसकी संगीत से जुड़ी सीढ़ियां हैं। इन्हें मंदिर के सबसे अनोखे आकर्षणों में गिना जाता है। यहां सात पत्थर की सीढ़ियों का उल्लेख मिलता है, जिन्हें छूने या हल्के से थपथपाने पर अलग-अलग संगीत सुर सुनाई देने की बात कही जाती है।

इन सुरों को भारतीय संगीत के सात स्वरों सा, रे, ग, म, प, ध और नि से जोड़ा जाता है।

आज के आधुनिक दौर में भी यह विशेषता लोगों के लिए आश्चर्य का विषय है। सदियों पहले पत्थर को इस तरह तराशना कि उससे अलग-अलग ध्वनियां निकल सकें, उस समय के शिल्पकारों की तकनीकी समझ को दिखाता है।

मूर्तियों में छिपी हैं पौराणिक कथाएं और इतिहास

ऐरावतेश्वर मंदिर की दीवारें और खंभे किसी चित्रकथा की तरह हैं। यहां देवी-देवताओं के साथ-साथ ऋषि-मुनियों, नर्तकों, संगीतकारों और पौराणिक पात्रों की मूर्तियां बनाई गई हैं।

मंदिर की एक खास बात 63 नायनमार संतों से जुड़ी छोटी-छोटी मूर्तियां और चित्रात्मक दृश्य हैं। नायनमार दक्षिण भारत की शैव भक्ति परंपरा के प्रमुख संत माने जाते हैं। इनकी जीवन गाथाओं को पत्थरों पर उकेरकर उस समय के कलाकारों ने भक्ति आंदोलन और धार्मिक परंपराओं को स्थायी रूप दिया।

मंदिर में बनी छोटी आकृतियों को ध्यान से देखने पर कलाकारों की बारीकी का अंदाजा लगाया जा सकता है। कहीं नृत्य की मुद्रा में कलाकार दिखाई देते हैं तो कहीं देवी-देवताओं के अलग-अलग रूप नजर आते हैं।

इन मूर्तियों से उस दौर के पहनावे, आभूषण, संगीत, नृत्य और सामाजिक जीवन के बारे में भी महत्वपूर्ण जानकारियां मिलती हैं।

द्रविड़ स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना

ऐरावतेश्वर मंदिर का निर्माण द्रविड़ स्थापत्य शैली में किया गया है। इसकी सबसे प्रमुख विशेषता इसका लगभग 24 मीटर ऊंचा विमान है। दक्षिण भारतीय मंदिरों में गर्भगृह के ऊपर बने ऊंचे और कलात्मक हिस्से को विमान कहा जाता है।

मंदिर के गर्भगृह में भगवान शिव का शिवलिंग स्थापित है। इसके सामने अलग-अलग मंडप बने हैं, जो मंदिर की पूरी संरचना को विशेष रूप देते हैं।

मंदिर में पत्थरों को जोड़ने, खंभों को तराशने और अलग-अलग हिस्सों को संतुलित ढंग से तैयार करने की कला दिखाई देती है। इसकी बनावट में कहीं भव्यता है तो कहीं इतनी सूक्ष्म नक्काशी कि एक-एक आकृति को देखने में काफी समय लग सकता है।

तंजावुर के बृहदेश्वर मंदिर की तुलना में ऐरावतेश्वर मंदिर आकार में छोटा है, लेकिन इसकी सजावट और मूर्तिकला कहीं अधिक बारीक और अलंकृत मानी जाती है। यही कारण है कि चोल काल की स्थापत्य कला का अध्ययन करने वालों के लिए यह मंदिर विशेष महत्व रखता है।

यूनेस्को की विश्व धरोहर में कैसे मिली जगह?

ऐरावतेश्वर मंदिर को वर्ष 2004 में यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया। यह अकेला मंदिर नहीं, बल्कि ग्रेट लिविंग चोल टेंपल्स यानी महान जीवंत चोल मंदिर समूह का हिस्सा है।

इस समूह में तीन प्रमुख मंदिर शामिल हैं।

  1. बृहदेश्वर मंदिर, तंजावुर: इसका निर्माण चोल शासक राजराजा प्रथम ने कराया था।
  2. बृहदीश्वर मंदिर, गंगैकोंडचोलपुरम: इसे राजेंद्र प्रथम ने बनवाया था।
  3. ऐरावतेश्वर मंदिर, दारासुरम: इसका निर्माण राजराजा द्वितीय ने कराया था।

इन तीनों मंदिरों में चोल साम्राज्य की स्थापत्य कला, मूर्तिकला और धार्मिक परंपराओं के विकास को देखा जा सकता है।

यूनेस्को के अनुसार ये मंदिर चोल शासकों की वास्तुकला, मूर्तिकला, चित्रकला और कांस्य प्रतिमा निर्माण की उत्कृष्ट उपलब्धियों के प्रमाण हैं। इनकी खास बात यह भी है कि ये केवल ऐतिहासिक स्मारक नहीं हैं, बल्कि आज भी यहां पूजा और धार्मिक परंपराएं जारी हैं।

मंदिर की देखरेख कौन करता है?

ऐरावतेश्वर मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) के संरक्षण में है। वर्ष 1954 से यह संस्था मंदिर के संरक्षण और देखरेख से जुड़ी है।

मंदिर की प्राचीन संरचना, मूर्तियों, शिलालेखों और अन्य ऐतिहासिक अवशेषों को सुरक्षित रखने के लिए विशेष ध्यान दिया जाता है। सदियों पुराने पत्थरों पर मौसम और समय का असर पड़ना स्वाभाविक है। इसलिए इनके संरक्षण में सावधानी बरतना जरूरी है।

मंदिर के शिलालेखों में राजाओं के शासन, दान, मंदिर की व्यवस्था और उस समय के सामाजिक-धार्मिक जीवन से संबंधित जानकारियां भी मिलती हैं। ये अभिलेख इतिहासकारों के लिए महत्वपूर्ण स्रोत हैं।

पत्थरों में आज भी जिंदा है चोल साम्राज्य की विरासत

ऐरावतेश्वर मंदिर केवल भगवान शिव का पवित्र धाम नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की उस समृद्ध परंपरा का प्रतीक है, जिसमें कला और विज्ञान का अद्भुत मेल दिखाई देता है। यहां की नक्काशी, पत्थर का रथ, संगीत वाली सीढ़ियां और पौराणिक कथाओं को दर्शाती मूर्तियां बताती हैं कि हमारे पूर्वजों की कल्पनाशक्ति कितनी विकसित थी।

आज जब आधुनिक तकनीक से बड़ी-बड़ी इमारतें तैयार की जा रही हैं, तब भी सदियों पुराने इस मंदिर की बनावट और कलात्मक बारीकी लोगों को चकित करती है। यही वजह है कि ऐरावतेश्वर मंदिर भारत की उन ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल है, जिन्हें हर भारतीय को एक बार जरूर देखना चाहिए।

यह मंदिर हमें याद दिलाता है कि समय बदल सकता है, साम्राज्य समाप्त हो सकते हैं, लेकिन पत्थरों पर उकेरी गई कला और संस्कृति सदियों तक अपनी कहानी सुनाती रहती है।

जमुना दयाल

जमुना दयाल वाराणसी के निवासी हैं और उन्हें हिंदी समाचार मीडिया में 10 से अधिक वर्षों का गहन रिपोर्टिंग अनुभव है। उन्होंने अमर उजाला और दैनिक जागरण जैसे देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में जिला रिपोर्टर के रूप में कार्य करते हुए खेल, शिक्षा, राजनीति, कृषि तथा सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता से कवर किया है। शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से जनसंचार में परास्नातक (MJMC) की डिग्री प्राप्त की है और यूजीसी नेट (UGC NET) परीक्षा उत्तीर्ण की है।

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