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सफदरजंग का मकबरा: मुगल सल्तनत की आखिरी शाही चमक, 270 साल बाद भी कायम है इसकी खूबसूरती

मुगल साम्राज्य के पतन की गवाही देता है दिल्ली का यह खूबसूरत मकबरा

दिल्ली की ऐतिहासिक इमारतों में सफदरजंग का मकबरा ऐसा स्मारक है, जहां पहुंचकर मुगल सल्तनत के वैभव और उसके पतन की कहानी एक साथ दिखाई देती है। लाल बलुआ पत्थर से बनी विशाल इमारत, सफेद संगमरमर का गुंबद, चारों तरफ फैला हरा-भरा बगीचा और शानदार प्रवेश द्वार इसे बेहद खास बनाते हैं। करीब 270 साल पहले बना यह मकबरा केवल एक नवाब की याद में तैयार की गई इमारत नहीं है, बल्कि मुगल वास्तुकला के बदलते स्वरूप और 18वीं सदी की राजनीतिक परिस्थितियों का भी गवाह है। इसे दिल्ली में मुगल शैली के अंतिम बड़े उद्यान-मकबरों में गिना जाता है।

दिल्ली में हुमायूं का मकबरा और लाल किला देखने के लिए बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं, लेकिन सफदरजंग का मकबरा भी अपनी वास्तुकला और इतिहास के कारण किसी परिचय का मोहताज नहीं है। इसकी खासियत यह है कि यहां शाही भव्यता के साथ एक ढलते साम्राज्य की कहानी भी छिपी हुई है।

जब कमजोर पड़ रही थी मुगल सल्तनत, तब बना यह भव्य मकबरा

सफदरजंग के मकबरे का निर्माण वर्ष 1753 में शुरू हुआ और 1754 में पूरा हुआ। इसे अवध के नवाब सफदरजंग की याद में उनके बेटे शुजा-उद-दौला ने बनवाया था। सफदरजंग का वास्तविक नाम मिर्जा मुकीम अबुल मंसूर खान था। वह 18वीं सदी में मुगल दरबार के सबसे प्रभावशाली व्यक्तियों में शामिल थे।

सफदरजंग ने मुगल बादशाह मुहम्मद शाह के शासनकाल में अपनी राजनीतिक ताकत बढ़ाई थी। वर्ष 1748 में अहमद शाह बहादुर के बादशाह बनने पर उन्हें मुगल साम्राज्य का वजीर बनाया गया। उस समय मुगल सल्तनत की राजनीतिक शक्ति लगातार कमजोर हो रही थी। दिल्ली की सत्ता पर बादशाह की पकड़ ढीली पड़ रही थी और अवध, बंगाल तथा हैदराबाद जैसे क्षेत्रीय राज्य अपनी ताकत बढ़ा रहे थे।

सफदरजंग ने इसी कमजोर होती मुगल व्यवस्था में अपनी मजबूत राजनीतिक पहचान बनाई। वर्ष 1754 में उनकी मृत्यु के बाद उनके बेटे ने दिल्ली में एक विशाल मकबरा बनवाकर उनकी स्मृति को स्थायी रूप देने का प्रयास किया।

इस मकबरे का निर्माण उस दौर में हुआ, जब मुगल शासकों के पास पहले जैसी आर्थिक और राजनीतिक ताकत नहीं रह गई थी। इसके बावजूद इतनी भव्य इमारत का निर्माण कराना यह दिखाता है कि मुगल स्थापत्य की परंपरा और शाही प्रतिष्ठा का महत्व अभी खत्म नहीं हुआ था।

चारबाग शैली में तैयार किया गया मकबरा

सफदरजंग के मकबरे की सबसे बड़ी खासियत इसका चारबाग उद्यान है। फारसी परंपरा से आई इस शैली में बगीचे को चार बराबर हिस्सों में बांटा जाता है। इनके बीच रास्ते और जलधाराएं बनाई जाती हैं। इस व्यवस्था के पीछे स्वर्ग की कल्पना जुड़ी हुई है।

इस्लामी परंपरा में जन्नत को चार नदियों और खूबसूरत बगीचों वाला स्थान बताया गया है। मुगल शासकों ने इसी कल्पना को अपनी इमारतों और उद्यानों में उतारने की कोशिश की। सफदरजंग के मकबरे में भी चारों दिशाओं में फैले रास्ते और बगीचे इसी सोच को दर्शाते हैं।

इसका पूरा परिसर ऊंची चारदीवारी से घिरा हुआ है। बीच में विशाल मकबरा बनाया गया है, जबकि चारों तरफ हरियाली, पेड़-पौधे और रास्ते दिखाई देते हैं। बगीचे की सममित बनावट पर्यटकों को आकर्षित करती है। मुख्य प्रवेश द्वार से अंदर आते ही सामने मकबरे का भव्य दृश्य दिखाई देता है।

यहां कुछ देर बैठकर देखने पर समझ आता है कि मुगल वास्तुकार केवल इमारत नहीं बनाते थे, बल्कि उसके आसपास के पूरे वातावरण को भी वास्तुकला का हिस्सा मानते थे।

लाल पत्थर और सफेद संगमरमर का खूबसूरत संगम

सफदरजंग का मकबरा लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर के शानदार मेल के लिए जाना जाता है। मुख्य इमारत का बड़ा हिस्सा लाल और हल्के पीले रंग के पत्थरों से बनाया गया है। वहीं गुंबद और सजावट के कुछ हिस्सों में सफेद संगमरमर का इस्तेमाल किया गया है।

इमारत को ऊंचे चबूतरे पर खड़ा किया गया है। इसके चारों तरफ मेहराबदार गलियारे हैं। मुख्य भवन के बीच में विशाल गुंबद है, जबकि चारों कोनों पर छोटी छतरियां इसकी सुंदरता बढ़ाती हैं।

इसकी बाहरी दीवारों पर बनी मेहराबें, सजावटी आकृतियां और पत्थरों की नक्काशी उस समय के स्थापत्य कौशल को दर्शाती हैं। इमारत की बनावट में हुमायूं के मकबरे जैसी पुरानी मुगल परंपरा की झलक मिलती है, लेकिन इसकी अपनी अलग पहचान भी है।

सूरज की रोशनी में लाल पत्थर और सफेद संगमरमर का रंग बदलता हुआ दिखाई देता है। सुबह और शाम के समय इसकी खूबसूरती देखने लायक होती है।

तीन खास महल, जिनके नाम में छिपा है इतिहास

मकबरे के परिसर में केवल मुख्य इमारत ही आकर्षण का केंद्र नहीं है। इसके चारों ओर बने तीन खूबसूरत मंडप भी इसकी वास्तुकला को खास बनाते हैं। इनके नाम हैं मोती महल, बादशाह पसंद और जंगली महल।

मोती महल: इसका अर्थ है मोतियों का महल। यह मकबरे की दक्षिणी दीवार के मध्य में बना है। इसकी बनावट में मेहराबों और खुले गलियारों का सुंदर इस्तेमाल किया गया है।

बादशाह पसंद: इसका अर्थ है बादशाह की पसंद। यह परिसर की उत्तरी दीवार के मध्य में स्थित है। इसके नाम से ही उस समय की शाही पसंद और दरबारी संस्कृति का अंदाजा लगाया जा सकता है।

जंगली महल: इसका अर्थ है जंगल या वन से जुड़ा महल। यह पश्चिमी दीवार के मध्य में बना हुआ है। इसकी बनावट परिसर की दूसरी संरचनाओं के साथ मिलकर पूरे बगीचे को संतुलित रूप देती है।

इन मंडपों में कई कमरे और बरामदे बनाए गए हैं। ये उस दौर में मकबरे के परिसर को केवल अंतिम विश्राम स्थल के बजाय एक व्यवस्थित शाही उद्यान का रूप देते थे।

मुख्य प्रवेश द्वार देखकर रह जाएंगे हैरान

सफदरजंग के मकबरे का पूर्वी प्रवेश द्वार भी इसकी प्रमुख विशेषताओं में शामिल है। यह दो मंजिला विशाल इमारत है। इसके भीतर कमरे, बरामदे और एक आंगन मौजूद हैं। प्रवेश द्वार की ऊंची मेहराबें और सजावटी बनावट उस समय के वास्तुकारों की कल्पनाशीलता को दर्शाती हैं।

इस द्वार की खासियत यह है कि यहां से परिसर में प्रवेश करते ही सामने दूर तक फैला बगीचा और उसके बीच खड़ा विशाल मकबरा दिखाई देता है। यह दृश्य पर्यटकों को कुछ पल के लिए ठहरने पर मजबूर कर देता है।

प्रवेश द्वार के ऊपर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की ओर से पुस्तकालय भी संचालित किया जाता है। परिसर में मदरसा भी मौजूद है। इस तरह यह स्मारक इतिहास, शिक्षा और स्थापत्य कला का अनूठा संगम प्रस्तुत करता है।

मकबरे के भीतर भी छिपी है खास वास्तुकला

बाहर से देखने पर मकबरे की विशालता जितनी आकर्षित करती है, भीतर की बनावट भी उतनी ही रोचक है। मुख्य कक्ष में सफदरजंग की प्रतीकात्मक कब्र यानी समाधि बनी हुई है। इसके नीचे भूमिगत कक्ष में वास्तविक कब्रें मौजूद हैं।

मुख्य कक्ष के चारों ओर छोटे-छोटे कमरे बनाए गए हैं। दीवारों और छतों पर प्लास्टर से सजावटी आकृतियां तैयार की गई हैं। यहां की मेहराबें, छत की बनावट और आंतरिक सजावट उस समय की निर्माण तकनीक का परिचय देती हैं।

मकबरे की चारों कोनों पर बनी मीनारनुमा संरचनाएं भी इसकी पहचान हैं। इनके ऊपर छतरियां बनाई गई हैं। मुख्य गुंबद के साथ इनका तालमेल पूरी इमारत को एक अलग दृश्यात्मक पहचान देता है।

क्या वजह है कि इसे मुगल वास्तुकला की आखिरी बड़ी चमक कहा जाता है?

मुगल वास्तुकला के इतिहास में हुमायूं का मकबरा, अकबर का मकबरा और ताजमहल जैसे स्मारकों का विशेष स्थान है। इन इमारतों ने भारतीय स्थापत्य कला को नई पहचान दी। सफदरजंग का मकबरा इसी परंपरा की अंतिम बड़ी कड़ियों में से एक है।

हुमायूं के मकबरे में जिस चारबाग शैली और विशाल गुंबद वाली संरचना का विकास दिखाई देता है, उसका प्रभाव सफदरजंग के मकबरे में भी नजर आता है। हालांकि दोनों इमारतों के निर्माण के बीच लगभग दो शताब्दियों का अंतर है।

सफदरजंग का मकबरा आकार और निर्माण की बारीकियों में हुमायूं के मकबरे या ताजमहल की बराबरी नहीं करता। इसकी कुछ बनावट में अनुपात और संतुलन की कमी भी दिखाई देती है। लेकिन यही विशेषता इसे इतिहास की दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाती है। यह बताता है कि मुगल साम्राज्य के कमजोर होने के साथ उसकी स्थापत्य कला में भी किस तरह बदलाव आया।

भारतीय विरासत से जुड़े कई ऐतिहासिक विवरण इसे दिल्ली में मुगल मकबरा निर्माण परंपरा का अंतिम उदाहरण बताते हैं। इसे अक्सर मुगल वास्तुकला के बुझते दीपक की आखिरी चमक के रूप में भी वर्णित किया जाता है।

इतिहास के उतार-चढ़ाव का गवाह रहा मकबरा

18वीं सदी के बाद दिल्ली में कई बड़े राजनीतिक बदलाव हुए। मुगल सत्ता लगातार कमजोर होती गई और अंततः अंग्रेजों का शासन स्थापित हो गया। इन बदलावों का असर दिल्ली की ऐतिहासिक इमारतों पर भी पड़ा।

समय के साथ सफदरजंग के मकबरे का स्वरूप और आसपास का वातावरण भी बदलता रहा। कभी शाही परिवार की स्मृति से जुड़ा यह परिसर बाद के दौर में शहर के ऐतिहासिक उद्यानों में शामिल हो गया।

वर्ष 1913 में इस स्मारक को संरक्षित स्मारक के रूप में अधिसूचित किया गया। आज इसकी देखरेख भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण करता है। परिसर में बने पुराने बगीचे, प्रवेश द्वार, मंडप और मकबरे की मुख्य इमारत को ऐतिहासिक धरोहर के रूप में सुरक्षित रखने का प्रयास किया जा रहा है।

रात में रोशनी से और बढ़ जाती है खूबसूरती

दिन में सफदरजंग का मकबरा लाल और सफेद रंगों के सुंदर मेल के कारण आकर्षित करता है, लेकिन रात में रोशनी के बीच इसकी खूबसूरती अलग ही दिखाई देती है। इमारत की मेहराबों, गुंबद और छतरियों पर पड़ती रोशनी इसे किसी शाही महल जैसा रूप देती है।

वर्ष 2019 में यहां विशेष रोशनी व्यवस्था शुरू की गई थी। इसका उद्देश्य मकबरे की स्थापत्य विशेषताओं को अधिक आकर्षक तरीके से सामने लाना था। रात में इसकी तस्वीरें लेने वाले पर्यटकों और फोटोग्राफी के शौकीनों के लिए यह जगह खास आकर्षण रखती है।

एक इमारत में समाया है मुगल साम्राज्य का पूरा दौर

सफदरजंग का मकबरा आज भी दिल्ली की ऐतिहासिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह उस समय की याद दिलाता है, जब मुगल साम्राज्य की राजनीतिक शक्ति कमजोर हो रही थी, लेकिन शाही परिवार अपनी प्रतिष्ठा और विरासत को स्थापत्य कला के माध्यम से जीवित रखना चाहता था।

यह मकबरा हमें बताता है कि किसी साम्राज्य का पतन केवल उसकी सत्ता के खत्म होने की कहानी नहीं होता, बल्कि उसके साथ कला, संस्कृति और वास्तुकला में आने वाले बदलावों की कहानी भी जुड़ी होती है।

करीब 270 साल बाद भी यह स्मारक अपनी खूबसूरती और ऐतिहासिक महत्व के कारण लोगों को आकर्षित कर रहा है। सच कहा जाए तो सफदरजंग का मकबरा मुगल सल्तनत के उस दौर की आखिरी शाही झलक है, जिसकी चमक आज भी दिल्ली की धरती पर दिखाई देती है।

जमुना दयाल

जमुना दयाल वाराणसी के निवासी हैं और उन्हें हिंदी समाचार मीडिया में 10 से अधिक वर्षों का गहन रिपोर्टिंग अनुभव है। उन्होंने अमर उजाला और दैनिक जागरण जैसे देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में जिला रिपोर्टर के रूप में कार्य करते हुए खेल, शिक्षा, राजनीति, कृषि तथा सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता से कवर किया है। शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से जनसंचार में परास्नातक (MJMC) की डिग्री प्राप्त की है और यूजीसी नेट (UGC NET) परीक्षा उत्तीर्ण की है।

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