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लाखों रुपये किलो तक बिकता है भारत का इत्र, फूलों से लेकर मिट्टी तक से तैयार होती है खुशबू; जानिए कैसे बनता है दुनिया का अनोखा अत्तर

कहीं गुलाब की पंखुड़ियों से निकलती है खुशबू तो कहीं बारिश की पहली बूंद से महकती मिट्टी बन जाती है इत्र। उत्तर प्रदेश का कन्नौज सदियों से इस अनमोल कला का केंद्र रहा है। यहां तांबे की देग, बांस की नली और चंदन के तेल की मदद से तैयार होता है प्राकृतिक अत्तर। इसकी कुछ दुर्लभ किस्मों की कीमत लाखों रुपये प्रति किलो तक पहुंच सकती है।

खुशबू का ऐसा संसार, जहां हर बूंद के पीछे छिपी है सदियों पुरानी कला

इत्र का नाम सुनते ही मन में फूलों की खुशबू और खूबसूरत शीशियों की तस्वीर उभरने लगती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि एक छोटी सी शीशी में बंद खुशबू तैयार करने के लिए कितनी मेहनत करनी पड़ती है? भारत में इत्र बनाने की परंपरा हजारों वर्षों से हमारी संस्कृति और जीवनशैली का हिस्सा रही है। मंदिरों में पूजा, राजदरबारों की शान, शादी-विवाह और त्योहारों से लेकर रोजमर्रा के इस्तेमाल तक इत्र की अपनी खास जगह रही है।

भारत में इत्र का कारोबार केवल सुगंध बेचने का माध्यम नहीं, बल्कि पारंपरिक ज्ञान, कारीगरी और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ा उद्योग है। उत्तर प्रदेश का कन्नौज इस कारोबार का सबसे प्रमुख केंद्र है। इसे देश की इत्र नगरी के नाम से जाना जाता है।

यहां गुलाब, चमेली, बेला, केवड़ा, खस, चंदन, मिट्टी और कई जड़ी-बूटियों से प्राकृतिक अत्तर तैयार किया जाता है। इसकी सबसे खास बात यह है कि खुशबू निकालने के लिए आज भी कई कारीगर सदियों पुरानी देग-भापका तकनीक का इस्तेमाल करते हैं।

रूह गुलाब: फूलों की पंखुड़ियों से तैयार होती है अनमोल खुशबू

कन्नौज में इत्र बनाने की पारंपरिक विधि

प्राकृतिक इत्रों में रूह गुलाब का नाम बेहद खास माना जाता है। इसे गुलाब की ताजी पंखुड़ियों से तैयार किया जाता है। इसकी खुशबू इतनी मनमोहक होती है कि इसका इस्तेमाल इत्र, धार्मिक अनुष्ठानों और महंगे सुगंधित उत्पादों में किया जाता है।

रूह गुलाब तैयार करने के लिए विशेष किस्म के सुगंधित गुलाब चुने जाते हैं। फूलों को आमतौर पर सुबह जल्दी तोड़ा जाता है, क्योंकि इस समय उनमें खुशबू अच्छी बनी रहती है। इसके बाद पंखुड़ियों को पानी के साथ तांबे की देग में डालकर गर्म किया जाता है।

भाप के साथ फूलों की खुशबू बाहर निकलती है। इसे एक खास प्रक्रिया से दूसरे बर्तन में पहुंचाकर ठंडा किया जाता है। इस तरह फूलों की प्राकृतिक सुगंध तेल में समा जाती है।

रूह गुलाब की कीमत उसकी शुद्धता, गुणवत्ता, उत्पादन और बाजार में उपलब्धता पर निर्भर करती है। अच्छी गुणवत्ता का शुद्ध गुलाब तेल बेहद महंगा हो सकता है। कुछ बाजार रिपोर्टों में इसकी कीमत लाखों रुपये प्रति किलो तक बताई गई है। हालांकि इसका कोई एक स्थायी बाजार भाव नहीं है।

ऊद का इत्र: एक दुर्लभ पेड़ की लकड़ी से निकलती है महक

दुनिया की महंगी प्राकृतिक खुशबुओं में ऊद का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। इसे अगरवुड नाम के पेड़ की लकड़ी से तैयार किया जाता है। इस पेड़ का वैज्ञानिक नाम एक्विलेरिया (Aquilaria) है।

इस पेड़ की लकड़ी में जब विशेष प्रकार के सूक्ष्मजीवों के कारण प्राकृतिक बदलाव होता है तो उसमें सुगंधित रेजिन बनने लगता है। यही रेजिन लकड़ी को खास खुशबू देता है।

इस लकड़ी को छोटे टुकड़ों में काटकर पानी में भिगोया जाता है। इसके बाद आसवन प्रक्रिया से सुगंधित तेल निकाला जाता है। ऊद की खुशबू सामान्य फूलों के इत्र से अलग होती है। इसमें लकड़ी, धुएं, मिट्टी और हल्की मिठास जैसी मिली-जुली सुगंध महसूस हो सकती है।

हर अगरवुड का पेड़ समान गुणवत्ता का ऊद नहीं देता। अच्छी गुणवत्ता वाली सुगंधित लकड़ी दुर्लभ होने के कारण इसका तेल काफी महंगा होता है। असम और पूर्वोत्तर भारत के कुछ हिस्सों में अगरवुड से जुड़ी खेती और कारोबार होता है।

मिट्टी का इत्र: बारिश की पहली बूंद की खुशबू को शीशी में कैद करने की कला

मिट्टी का अत्तर तैयार करने की प्रक्रिया

भारत के प्राकृतिक इत्रों में मिट्टी का अत्तर सबसे अनोखा माना जाता है। इसकी खुशबू बारिश की पहली बूंद पड़ने के बाद धरती से उठने वाली सोंधी महक की याद दिलाती है।

इसे बनाने के लिए मिट्टी को विशेष आकार की छोटी-छोटी टिकियों में ढाला जाता है। इन्हें सुखाकर भट्ठी में पकाया जाता है। इसके बाद इन टुकड़ों को तांबे की देग में पानी के साथ डालकर गर्म किया जाता है।

गर्म होने पर मिट्टी से उठने वाली सुगंधित भाप को बांस की नली के माध्यम से दूसरे बर्तन तक पहुंचाया जाता है। इस बर्तन में चंदन का तेल रखा जाता है। ठंडा होने पर भाप की सुगंध चंदन के तेल में समा जाती है।

इस तरह तैयार होता है मिट्टी का अत्तर। इसकी खासियत यह है कि इसमें किसी फूल की जरूरत नहीं पड़ती। मिट्टी की प्राकृतिक खुशबू ही इसकी पहचान बन जाती है।

कन्नौज की देग-भापका तकनीक: तांबे के बर्तनों में तैयार होती है खुशबू

भारत में प्राकृतिक इत्र बनाने की सबसे प्रसिद्ध पारंपरिक विधियों में देग-भापका तकनीक शामिल है। उत्तर प्रदेश के कन्नौज में आज भी कई पारंपरिक इत्र निर्माता इस विधि का इस्तेमाल करते हैं।

इस प्रक्रिया में मुख्य रूप से तीन चीजें होती हैं—देग, भापका और चोंगा।

देग तांबे का बड़ा बर्तन होता है, जिसमें फूलों और पानी को रखा जाता है। भापका दूसरा बर्तन होता है, जिसमें चंदन का तेल या अन्य आधार तेल रखा जाता है। चोंगा बांस की बनी नली होती है, जो दोनों बर्तनों को जोड़ती है।

सबसे पहले फूलों और पानी को देग में भरकर उसका मुंह बंद कर दिया जाता है। फिर उसे धीमी आंच पर गर्म किया जाता है। गर्म होने पर फूलों की सुगंध भाप के साथ निकलने लगती है।

यह भाप चोंगा के रास्ते भापका तक पहुंचती है। वहां ठंडा होने पर भाप तरल में बदल जाती है और उसकी सुगंध चंदन के तेल में समा जाती है।

इत्र की गुणवत्ता और खुशबू के अनुसार इस प्रक्रिया को कई बार दोहराया जा सकता है। तैयार अत्तर को छानकर सुरक्षित रखा जाता है। कुछ इत्रों को परिपक्व होने के लिए अतिरिक्त समय भी दिया जाता है।

इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें कारीगर का अनुभव बहुत मायने रखता है। फूलों की मात्रा, पानी, तापमान और आसवन का समय सही रखना पड़ता है।

इत्र बनाने में सिर्फ फूल नहीं, इन चीजों का भी होता है इस्तेमाल

आमतौर पर लोगों को लगता है कि इत्र केवल गुलाब या चमेली के फूलों से बनता है, लेकिन इसकी दुनिया इससे कहीं बड़ी है। प्राकृतिक सुगंध निकालने के लिए पौधों के अलग-अलग हिस्सों का इस्तेमाल किया जाता है।

गुलाब: गुलाब की पंखुड़ियों से रूह गुलाब और गुलाब जल तैयार किया जाता है।

चमेली और बेला: इन फूलों से मीठी और मनमोहक खुशबू वाला अत्तर बनाया जाता है।

खस: इसकी जड़ों से ठंडी और मिट्टी जैसी खुशबू वाला खस अत्तर तैयार होता है।

केवड़ा: केवड़ा के फूलों से सुगंधित तेल और जल बनाया जाता है। इसका इस्तेमाल मिठाइयों और इत्र में भी होता है।

चंदन: इसकी लकड़ी से प्राप्त तेल कई पारंपरिक अत्तरों में आधार के रूप में इस्तेमाल होता है।

मेहंदी: इसकी पत्तियों से विशेष प्रकार का हीना अत्तर बनाया जाता है।

केसर: केसर की विशिष्ट सुगंध का इस्तेमाल महंगे सुगंधित मिश्रणों में किया जाता है।

अगरवुड: इसकी सुगंधित लकड़ी से ऊद का तेल निकाला जाता है।

इनके अलावा दालचीनी, लौंग, इलायची, जटामांसी और कई जड़ी-बूटियों से भी विशेष सुगंधित मिश्रण तैयार किए जाते हैं।

शमामा अत्तर: कई जड़ी-बूटियों और मसालों का अनोखा संगम

कन्नौज के प्रसिद्ध अत्तरों में शमामा का नाम भी खास है। यह किसी एक फूल से तैयार नहीं होता, बल्कि कई तरह की जड़ी-बूटियों, मसालों, फूलों और सुगंधित पदार्थों को मिलाकर बनाया जाता है।

इसमें इस्तेमाल होने वाली सामग्री निर्माता की परंपरा और नुस्खे के अनुसार बदलती रहती है। कुछ मिश्रणों में केसर, दालचीनी, लौंग, इलायची, खस और मेहंदी जैसी सामग्री का इस्तेमाल होता है।

शमामा की खुशबू गहरी, गर्म और मसालेदार होती है। इसे बनाने में कई चरणों से गुजरना पड़ता है। इसकी अलग-अलग किस्मों की खुशबू और कीमत भी अलग होती है।

भारत में कहां-कहां बनता है इत्र?

भारत में इत्र निर्माण का सबसे बड़ा पारंपरिक केंद्र उत्तर प्रदेश का कन्नौज है। हालांकि देश के कई अन्य राज्यों में भी फूलों और सुगंधित पौधों से जुड़े कारोबार का विकास हुआ है।

कन्नौज, उत्तर प्रदेश: इसे भारत की इत्र नगरी कहा जाता है। यहां गुलाब, चमेली, बेला, खस, केवड़ा, मिट्टी, शमामा और हीना अत्तर तैयार किए जाते हैं। यहां कई परिवार पीढ़ियों से इस काम में लगे हुए हैं।

लखनऊ, उत्तर प्रदेश: नवाबी संस्कृति के कारण यहां इत्र और सुगंधित उत्पादों की पुरानी परंपरा रही है। यहां पारंपरिक अत्तर का बाजार भी मिलता है।

असम: यहां अगरवुड यानी ऊद से जुड़ी खेती, लकड़ी और सुगंधित तेल का कारोबार होता है।

ओडिशा: यहां केवड़ा फूल और उससे बनने वाले सुगंधित उत्पादों की खास पहचान है।

तमिलनाडु और कर्नाटक: इन राज्यों में चमेली, मोगरा और अन्य सुगंधित फूलों की खेती होती है। इन फूलों का इस्तेमाल सुगंधित तेल और अन्य उत्पाद बनाने में किया जाता है।

इन केंद्रों की अपनी-अपनी विशेषताएं हैं। कहीं फूलों से इत्र बनाया जाता है तो कहीं सुगंधित लकड़ी और जड़ों से खुशबू निकाली जाती है।

प्राकृतिक इत्र और सामान्य परफ्यूम में क्या है अंतर?

प्राकृतिक अत्तर और बाजार में मिलने वाले सामान्य परफ्यूम में निर्माण प्रक्रिया का अंतर होता है।

पारंपरिक प्राकृतिक अत्तर आमतौर पर फूलों, जड़ों, लकड़ियों और अन्य प्राकृतिक सामग्री से आसवन के माध्यम से तैयार किया जाता है। इसमें चंदन या दूसरे आधार तेल का इस्तेमाल हो सकता है।

दूसरी तरफ आधुनिक परफ्यूम में प्राकृतिक और कृत्रिम दोनों तरह के सुगंधित पदार्थों का इस्तेमाल किया जाता है। इनमें अल्कोहल, सुगंधित तेल और दूसरे घटक मिलाए जा सकते हैं।

हालांकि यह जरूरी नहीं कि हर प्राकृतिक इत्र महंगा हो और हर आधुनिक परफ्यूम सस्ता। दोनों की कीमत गुणवत्ता, सामग्री, ब्रांड और निर्माण प्रक्रिया के आधार पर तय होती है।

सदियों पुरानी कला से हजारों लोगों को मिलता है रोजगार

कन्नौज का इत्र उद्योग केवल खुशबू तक सीमित नहीं है। यह किसानों, फूल उत्पादकों, कारीगरों, व्यापारियों और छोटे उद्यमियों की आजीविका से भी जुड़ा है।

फूलों की खेती करने वाले किसानों से लेकर इत्र तैयार करने वाले कारीगरों और शीशियां बनाने वाले कारोबारियों तक, इस उद्योग में कई लोगों की भागीदारी होती है।

आज प्राकृतिक उत्पादों और पारंपरिक खुशबुओं के प्रति बढ़ती दिलचस्पी ने इस कारोबार को नए अवसर दिए हैं। ऑनलाइन बाजार और विदेशों में मांग के कारण कन्नौज के इत्र निर्माताओं के सामने भी विस्तार की संभावनाएं हैं।

कन्नौज की पारंपरिक इत्र निर्माण कला को भौगोलिक संकेतक (GI) पहचान भी मिली है। यह पहचान इस क्षेत्र की विशिष्ट कारीगरी और परंपरा को राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में मदद करती है।

खुशबू की एक बूंद में छिपी है भारत की विरासत

भारत में इत्र बनाना केवल फूलों से सुगंध निकालने की प्रक्रिया नहीं है। यह प्रकृति, विज्ञान, अनुभव और पीढ़ियों से चले आ रहे हुनर का संगम है। गुलाब की पंखुड़ियों से तैयार रूह गुलाब हो, जंगल की दुर्लभ लकड़ी से निकला ऊद या बारिश की पहली बूंद की याद दिलाने वाला मिट्टी का अत्तर—हर खुशबू की अपनी कहानी है।

आज जब बाजार में तरह-तरह के आधुनिक परफ्यूम उपलब्ध हैं, तब भी कन्नौज के कारीगर तांबे की देग और बांस की नली से प्राकृतिक इत्र तैयार कर रहे हैं। यही इस कला की सबसे बड़ी खूबसूरती है कि आधुनिक दौर में भी सदियों पुरानी खुशबू ने अपनी पहचान बनाए रखी है।

जमुना दयाल

जमुना दयाल वाराणसी के निवासी हैं और उन्हें हिंदी समाचार मीडिया में 10 से अधिक वर्षों का गहन रिपोर्टिंग अनुभव है। उन्होंने अमर उजाला और दैनिक जागरण जैसे देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में जिला रिपोर्टर के रूप में कार्य करते हुए खेल, शिक्षा, राजनीति, कृषि तथा सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता से कवर किया है। शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से जनसंचार में परास्नातक (MJMC) की डिग्री प्राप्त की है और यूजीसी नेट (UGC NET) परीक्षा उत्तीर्ण की है।

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