हाथी गायब, तो बदल गई ‘काशी नरेश’ की सवारी! जानिए काशी से केरल तक धार्मिक उत्सवों में गजों की मौजूदगी का इतिहास और नए नियम
काशी की रामनगर रामलीला में हाथियों के बैन के बाद सदियों पुरानी परंपरा बदल गई। लेकिन क्या आप जानते हैं कि केरल, कर्नाटक और ओडिशा जैसे राज्यों में आज भी धार्मिक उत्सवों में हाथियों की क्या अहमियत है? जानिए देश भर के धार्मिक गजों से जुड़ी पूरी कहानी!

उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी काशी अपनी सदियों पुरानी धार्मिक परंपराओं, लकीर के फकीर कहे जाने वाले उत्सवों और प्राचीन रामलीलाओं के लिए दुनिया भर में मशहूर है। लेकिन वक्त के पहिए के साथ काशी के सबसे प्रतिष्ठित धार्मिक आयोजनों में से एक—विश्व प्रसिद्ध रामनगर की रामलीला—एक बड़े और ऐतिहासिक बदलाव की गवाह बनी है।
हाल ही में रामनगर रामलीला के दौरान एक हाथी के अचानक बेकाबू होने की घटना और वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत कड़े नियमों के चलते वन विभाग ने धार्मिक जुलूसों में हाथियों के प्रवेश पर रोक लगा दी। इस एक फैसले ने न सिर्फ काशी की 200 साल से भी अधिक पुरानी ‘शाही ठाट-बाठ’ की परंपरा की तस्वीर बदल कर रख दी है, बल्कि पूरे देश में धार्मिक उत्सवों में हाथियों के इस्तेमाल को लेकर बहस छेड़ दी है।
जब ‘काशी नरेश’ को हाथी छोड़ कार से पहुंचना पड़ा
रामनगर की रामलीला में ‘काशी नरेश’ (पूर्व महाराजा) की मौजूदगी केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि लीला की आत्मा मानी जाती है। दशकों से परंपरा रही है कि काशी नरेश अनंत नारायण सिंह चमचमाती पोशाक में विशाल हाथी पर सवार होकर रामलीला मैदान पहुंचते थे, जहाँ दर्शक “हर-हर महादेव” के उद्घोष से उनका स्वागत करते थे।
लेकिन हाथियों के इस्तेमाल पर लगी रोक के बाद इतिहास में पहली बार यह नजारा बदल गया। काशी नरेश को हाथी के बजाय आधुनिक कार में सवार होकर लीला स्थल पहुंचना पड़ा। इतना ही नहीं, दशरथ की सवारी और शाही जुलूसों में दिखने वाली हाथियों की लंबी कतारें इस बार पूरी तरह नदारद रहीं।
भारत में कहाँ-कहाँ है धार्मिक उत्सवों में हाथियों को शामिल करने की परंपरा?
भारत में हाथियों को केवल एक जीव नहीं, बल्कि भगवान श्री गणेश के स्वरूप (‘गजराज’) और समृद्धि, राजसी ठाट-बाठ का प्रतीक माना जाता है। काशी के अलावा देश के कई राज्यों में धार्मिक आयोजनों में हाथियों की उपस्थिति अनिवार्य और पवित्र मानी जाती है:
1. केरल (गजों का सबसे बड़ा धार्मिक केंद्र)
धार्मिक कार्यों और मंदिर उत्सवों में हाथियों को शामिल करने के मामले में केरल पूरे देश में सबसे आगे है। केरल में मंदिरों के पास अपने स्वयं के पंजीकृत हाथी होते हैं, जिन्हें विशेष सम्मान दिया जाता है।
- तृश्शूर पूरम (Thrissur Pooram): यह दक्षिण भारत का सबसे भव्य मंदिर उत्सव है, जहाँ 30 से अधिक सजे-धजे हाथियों को आमने-सामने खड़ा करके ‘कुडामट्टम’ (रंग-बिरंगे छाते बदलने की रस्म) निभाई जाती है।
- गुरुवायूर मंदिर (Guruvayur Temple): यहाँ हाथियों की दौड़ (आनयोट्टम) का आयोजन होता है, और जीतने वाला हाथी भगवान गुरुवायूरप्पन की थिडंबू (मूर्ति) ले जाने का सम्मान पाता है।
2. ओडिशा (पुरी जगन्नाथ यात्रा और गज पूजा)
ओडिशा में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा और विभिन्न ‘गजपति’ परंपराओं में हाथियों की मुख्य भूमिका होती है। भाद्रपद की गणेश चतुर्थी और दशहरा पर यहाँ हाथियों का विशेष श्रृंगार करके ‘गज पूजा’ की जाती है।
3. कर्नाटक और तमिलनाडु
- मैसूर दशहरा (Mysuru Dasara): कर्नाटक के मैसूर में 400 साल पुराने प्रसिद्ध दशहरा उत्सव में ‘कैप्टन’ यानी मुख्य हाथी (जम्बो सवारी) 750 किलो का सोने का हौदा (Golden Howdah) पीठ पर लादकर देवी चामुंडेश्वरी की मूर्ति के साथ शहर में जुलूस निकालता है।
- तमिलनाडु के मंदिर: मीनाक्षी अम्मन (मदुरै) और श्रीरंगम मंदिर जैसे ऐतिहासिक स्थानों पर रोज सुबह गज-पूजा की जाती है और हाथी भक्तों को आशीर्वाद देते हैं।
4. राजस्थान (शाही सवारियां और गणगौर)
जयपुर के गोविंद देव जी मंदिर, गणगौर उत्सव और तीज की शाही सवारियों में हाथियों का विशेष श्रृंगार करके जुलूस के सबसे आगे चलाना सदियों पुरानी परंपरा है।
बेकाबू हाथी की घटना और प्रशासन का सख्त रुख
काशी में यह पूरा मामला तब गरमाया जब रामलीला परिसर में भीड़ के बीच एक हाथी बिदक गया। गनीमत रही कि कोई बड़ा हादसा नहीं हुआ, लेकिन इस घटना ने स्थानीय प्रशासन और वन विभाग के कान खड़े कर दिए।
जांच में पाया गया कि आयोजनों में इस्तेमाल होने वाले हाथियों के पास आवश्यक कागजात, हेल्थ सर्टिफिकेट और एनिमल वेलफेयर बोर्ड की अनुमति नहीं थी। सुरक्षा और पशु क्रूरता निवारण कानून को देखते हुए प्रशासन ने स्पष्ट कर दिया कि बिना कड़े सुरक्षा मानकों और कानूनी कागजी कार्रवाई के किसी भी वन्यजीव का प्रयोग बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
परंपरा, भव्यता और जन-सुरक्षा की नई चुनौती
रामनगर की रामलीला अपनी ‘मुक्ताकाश’ (ओपन-एयर) शैली और बिना लाउडस्पीकर/माइक के प्राकृतिक मंचन के लिए यूनेस्को (UNESCO) तक में पहचानी जाती है। आयोजकों और पुराने काशीवासियों के लिए हाथी केवल एक जानवर नहीं, बल्कि ‘शाही वैभव’ और धार्मिक अनुष्ठानों की पौराणिक भव्यता का प्रतीक थे।
- वैकल्पिक इंतजामों पर मंथन: हाथियों की गैर-मौजूदगी के बाद अब आयोजक रथों, घोड़ों और अन्य पारंपरिक साधनों के जरिए इन दृश्यों को भव्यता देने की कोशिश कर रहे हैं।
- बदलाव को स्वीकारती काशी: भले ही इस बदलाव से पुराने श्रद्धालुओं के मन में थोड़ी टीस जरूर है, लेकिन आम जनता का मानना है कि संकरी गलियों और लाखों की भीड़ में जन-सुरक्षा और पशु क्रूरता पर नियंत्रण सबसे ऊपर है।
काशी का इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि परंपराएं समय के साथ ढलती हैं। हाथियों की गर्जना भले ही अब रामनगर के लीला मैदानों में न सुनाई दे, लेकिन काशीवासियों की आस्था और रामलीला का रोमांच आज भी वैसा ही अटूट बना हुआ है।



