जहाँ से बंधी थी स्वराज्य की पहली डोर: महज़ 16 साल के शिवाजी और ‘तोरणा किले’ के पराक्रम की गाथा
सह्याद्री की सहमी पहाड़ियों में गूंजती शौर्य की पहली गाथा

महाराष्ट्र की सह्याद्री पर्वतमालाएँ सदियों से शूरवीरों और ऐतिहासिक गाथाओं की गवाह रही हैं। इन दुर्गम पहाड़ियों के बीच कई ऐसे अभेद्य किले हैं, जिन्होंने भारत का इतिहास बदलकर रख दिया। इनमें से सबसे पहला और विशेष नाम आता है— तोरणा किले (Torna Fort) का।
यह केवल पत्थरों और दीवारों से बनी कोई संरचना नहीं है, बल्कि यह वह पवित्र रणक्षेत्र है जहाँ से छत्रपति शिवाजी महाराज ने महज़ 16-17 साल की कच्ची उम्र में ‘स्वराज्य’ के उस बड़े सपने की शुरुआत की थी, जिसने आगे चलकर एक विशाल मराठा साम्राज्य का रूप लिया।
प्रचंडगढ़: क्यों कहा जाता है इस किले को?
पुणे जिले से लगभग 50 किलोमीटर दूर वेल्हे तहसील में स्थित यह किला समुद्र तल से करीब 1,405 मीटर की ऊँचाई पर बना हुआ है। इसकी विशालता, भयंकर ढलान और दुर्गम बनावट को देखते हुए छत्रपति शिवाजी महाराज ने इसका नाम बदलकर ‘प्रचंडगढ़’ (Prachandagad) रख दिया था। यहाँ की चढ़ाई इतनी खड़ी है कि अच्छे-अच्छे पर्वतारोहियों के भी पसीने छूट जाते हैं।
साल 1646: जब किशोर शिवाजी ने रचा इतिहास
17वीं शताब्दी के मध्य में इस पूरे इलाके पर बीजापुर के आदिलशाही सुल्तान का दबदबा था। उस दौर में किसी सुल्तान के खिलाफ हथियार उठाना मौत को दावत देने जैसा था।
- लेकिन युवा शिवाजी महाराज के हौसले बुलंद थे। साल 1646 में उन्होंने अपने कुछ वफादार और जांबाज मावल सैनिकों को साथ लिया और अचानक तोरणा किले पर धावा बोल दिया।
- बिना किसी बड़े संघर्ष या रक्तपात के उन्होंने आदिलशाही सेना को मात दी और किले पर कब्जा कर लिया। इसी ऐतिहासिक विजय के साथ ‘हिन्दवी स्वराज्य’ की आधारशिला रखी गई।
खुदाई में मिला वह ‘रहस्यमयी खजाना’
तोरणा जीतने के बाद जब मराठा सेना ने किले की मरम्मत और साफ-सफाई का काम शुरू किया, तो एक बेहद दिलचस्प घटना घटी।
- किले के एक हिस्से की खुदाई के दौरान मजदूरों को सोने के सिक्कों और बहुमूल्य वस्तुओं से भरे कई घड़े मिले।
- उस दौर के जानकारों और इतिहासकारों के अनुसार, इस खजाने को माँ भवानी का आशीर्वाद माना गया। इस धन का एक-एक रुपया सेना को मजबूत करने, हथियार खरीदने और तोरणा के ठीक पास एक और सामरिक दृष्टि से बेहद मजबूत ‘राजगढ़ किले’ के निर्माण में लगाया गया।
मुगलों और आदिलशाही के खिलाफ संघर्ष का केंद्र
अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण तोरणा किला हमेशा रणनीतिक केंद्र रहा।
- साल 1665 में मुगलों के साथ हुई कुख्यात ‘पुरंदर की संधि’ के तहत शिवाजी महाराज को मजबूरी में यह किला मुगलों को सौंपना पड़ा था।
- हालांकि, मराठों की कूटनीति और पराक्रम के आगे मुगलों को ज्यादा दिन तक टिकने का मौका नहीं मिला और जल्द ही यह किला दोबारा स्वराज्य के नक्शे पर आ गया।
आज का तोरणा: इतिहास और रोमांच का संगम
आज जहाँ एक तरफ इतिहास प्रेमी इस जगह पर छत्रपति शिवाजी महाराज की वीरता को नमन करने आते हैं, वहीं दूसरी तरफ यह ट्रेकर्स (Trekker) के लिए सबसे पसंदीदा डेस्टिनेशन है। बादलों को चीरती हुई चोटियाँ और पुराने खंडहर आज भी उस सुनहरे अतीत की दास्तान बयां करते हैं।



