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भारत के 5 रहस्यमयी मंदिर, जहां मूर्तियों का आकार बढ़ने की है मान्यता; कहीं गणेश तो कहीं शिवलिंग से जुड़ी अनोखी कहानी

आस्था, प्राचीन परंपराओं और रहस्यमयी मान्यताओं की दुनिया में ले जाती है इन मंदिरों की कहानी

भारत में कुछ ऐसे अनोखे मंदिर हैं, जहां विराजमान देवी-देवताओं की मूर्तियों का आकार समय के साथ बढ़ने की मान्यता प्रचलित है। कहीं भगवान गणेश की प्रतिमा के बड़ा होने की कहानी सुनाई जाती है, तो कहीं शिवलिंग के हर साल तिल के बराबर बढ़ने की मान्यता भक्तों को आकर्षित करती है। इन मंदिरों से जुड़ी कहानियां इतनी दिलचस्प हैं कि इनके बारे में जानने की उत्सुकता देशभर के श्रद्धालुओं और पर्यटकों में बनी रहती है।

आंध्र प्रदेश से लेकर काशी और तेलंगाना तक फैले इन धार्मिक स्थलों की खासियत यह है कि हर मंदिर की अपनी अलग कथा है। कहीं प्रतिमा के पुराने आभूषण छोटे पड़ने की बात कही जाती है, तो कहीं प्राकृतिक चट्टान पर उभरे देवस्वरूप को लगातार विकसित होता माना जाता है।

1. कनिपाकम विनायक मंदिर: जहां बड़े होते गणेश जी की होती है पूजा

Kanipakam Vinayaka Temple, Chittoor | Timings, Images

स्थान: चित्तूर जिला, आंध्र प्रदेश

भगवान गणेश के प्रसिद्ध मंदिरों में कनिपाकम विनायक मंदिर का विशेष स्थान है। यहां विराजमान स्वयंभू गणेश प्रतिमा के आकार में समय के साथ वृद्धि होने की मान्यता इसे दूसरे मंदिरों से अलग बनाती है। भारत सरकार के पर्यटन पोर्टल Incredible India पर भी इस मान्यता का उल्लेख मिलता है।

कुएं में कैसे प्रकट हुए भगवान गणेश?

स्थानीय पौराणिक कथा के अनुसार, पुराने समय में तीन भाई खेतों की सिंचाई के लिए कुआं खोद रहे थे। बताया जाता है कि उनमें से एक दिव्यांग था। खुदाई के दौरान औजार किसी कठोर वस्तु से टकराया और वहां से रक्त निकलने लगा। इसके बाद तीनों भाइयों के स्वास्थ्य में चमत्कारिक सुधार होने की कथा प्रचलित हुई।

ग्रामीणों ने जब उस स्थान की जांच की, तो उन्हें कुएं के भीतर भगवान गणेश की प्रतिमा दिखाई दी। श्रद्धालु इसे स्वयंभू स्वरूप मानकर पूजा करने लगे। आज भी प्रतिमा कुएं के भीतर जलयुक्त स्थान पर विराजमान है।

पुराने चांदी के कवच से जुड़ी मान्यता

इस मंदिर की सबसे चर्चित विशेषता प्रतिमा के आकार में वृद्धि की मान्यता है। कहा जाता है कि करीब पांच दशक पहले भगवान गणेश को चढ़ाया गया चांदी का कवच बाद में प्रतिमा पर ठीक से फिट नहीं हुआ। भक्त इसे प्रतिमा के बड़ा होने से जोड़ते हैं।

मंदिर में गणेश चतुर्थी के आसपास आयोजित होने वाला वार्षिक ब्रह्मोत्सव भी खास आकर्षण है। इस दौरान कई दिनों तक धार्मिक अनुष्ठान और शोभायात्राएं आयोजित की जाती हैं।

2. तिलभांडेश्वर महादेव मंदिर: हर साल तिल के बराबर बढ़ने वाला शिवलिंग

स्थान: भेलूपुर, वाराणसी, उत्तर प्रदेश

काशी को भगवान शिव की नगरी कहा जाता है। यहां के प्राचीन मंदिरों में तिलभांडेश्वर महादेव मंदिर अपनी एक अनोखी मान्यता के कारण प्रसिद्ध है। मान्यता है कि मंदिर में स्थापित स्वयंभू शिवलिंग हर साल तिल के बराबर बढ़ता है। इसी विशेषता को मंदिर के नाम से भी जोड़ा जाता है।

ऋषि विभांड की तपस्या से जुड़ी कथा

स्थानीय धार्मिक परंपरा के अनुसार, ऋषि विभांड ने इस स्थान पर भगवान शिव की आराधना की थी। कथा में बताया जाता है कि शिवलिंग के आकार में धीरे-धीरे वृद्धि होती थी। इसी कारण यह स्थान श्रद्धालुओं के बीच विशेष पहचान बनाने लगा।

कहा जाता है कि शिवलिंग की वृद्धि मकर संक्रांति के अवसर से जुड़ी है। हालांकि, हर साल इसके आकार में होने वाले बदलाव को प्रमाणित करने वाला कोई व्यवस्थित वैज्ञानिक माप उपलब्ध नहीं है। यह मान्यता पीढ़ियों से चली आ रही धार्मिक परंपरा का हिस्सा है।

काशी आने वाले श्रद्धालुओं के लिए खास स्थान

तिलभांडेश्वर महादेव मंदिर उन लोगों के लिए खास है, जो काशी के प्रसिद्ध मंदिरों के अलावा यहां की पुरानी धार्मिक परंपराओं को भी जानना चाहते हैं। मंदिर की कहानी में आस्था, लोकविश्वास और शिवभक्ति का अनूठा मेल दिखाई देता है।

3. यागंती मंदिर: नंदी की विशाल प्रतिमा और उससे जुड़ा रहस्य

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स्थान: नंद्याल जिला, आंध्र प्रदेश

आंध्र प्रदेश के यागंती स्थित उमा महेश्वर मंदिर में भगवान शिव के साथ विशाल नंदी की प्रतिमा भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र है। यह मंदिर प्राकृतिक पहाड़ियों, गुफाओं और झरनों से घिरे क्षेत्र में स्थित है। नंद्याल जिले के आधिकारिक पर्यटन विवरण में भी यहां की विशाल नंदी प्रतिमा का उल्लेख मिलता है।

स्थानीय मान्यता है कि मंदिर में स्थापित पत्थर के नंदी का आकार लगातार बढ़ रहा है। इससे जुड़ी लोककथा के अनुसार, भविष्य में नंदी के खड़े होने और आगे बढ़ने की बात भी कही जाती है। हालांकि, इसे धार्मिक भविष्यवाणी और लोकविश्वास के रूप में ही देखा जाना चाहिए; इसके सच होने का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।

इस मंदिर की एक और विशेषता यह है कि आसपास प्राकृतिक गुफाएं और पहाड़ी संरचनाएं हैं। इससे धार्मिक यात्रा के साथ प्रकृति और इतिहास में रुचि रखने वाले लोगों को भी यहां आकर्षण मिलता है।

महाशिवरात्रि पर उमड़ते हैं श्रद्धालु

यागंती मंदिर में महाशिवरात्रि प्रमुख पर्व है। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु भगवान उमा महेश्वर के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। नंदी की विशाल प्रतिमा मंदिर की पहचान का अहम हिस्सा बन चुकी है।

4. येंडाला मल्लिकार्जुन स्वामी मंदिर: विशाल शिवलिंग से जुड़ी अनोखी मान्यता

स्थान: रविवलसा, श्रीकाकुलम जिला, आंध्र प्रदेश

आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम जिले में स्थित येंडाला मल्लिकार्जुन स्वामी मंदिर अपने विशाल शिवलिंग के लिए प्रसिद्ध है। यहां शिवलिंग के आकार में लगातार वृद्धि होने की मान्यता है। वर्ष 2016 में द टाइम्स ऑफ इंडिया ने भी महाशिवरात्रि के अवसर पर इस मंदिर और इससे जुड़ी मान्यता पर रिपोर्ट प्रकाशित की थी।

रामायण काल से जोड़ी जाती है मंदिर की कथा

स्थानीय मान्यता के अनुसार, इस शिवलिंग का संबंध रामायण काल से है। कथा में भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण के यहां आने का उल्लेख मिलता है। धार्मिक लोककथा के अनुसार, इस स्थान पर शिवलिंग प्रकट हुआ और धीरे-धीरे इसका आकार बढ़ता गया।

मंदिर की एक विशेषता इसका खुला स्वरूप भी है। यहां शिवलिंग को किसी सामान्य बंद गर्भगृह में स्थापित प्रतिमा की तरह नहीं देखा जाता। श्रद्धालुओं के लिए यह स्थान भगवान शिव के स्वयंभू स्वरूप की उपासना का केंद्र है।

हालांकि, रामायण काल से जुड़ी घटनाओं और शिवलिंग के लगातार बढ़ने की बात को ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित तथ्य के बजाय धार्मिक मान्यता के रूप में ही प्रस्तुत करना उचित है।

5. तेलंगाना का आदि वराह स्वामी मंदिर: चट्टान पर उभरा भगवान विष्णु का स्वरूप

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स्थान: कमानपुर, पेद्दापल्ली जिला, तेलंगाना

तेलंगाना के कमानपुर में स्थित आदि वराह स्वामी मंदिर इस सूची का एक और अनोखा धार्मिक स्थल है। यहां भगवान विष्णु के वराह अवतार का स्वरूप प्राकृतिक चट्टान पर उकेरा हुआ है। दूसरे मंदिरों की तरह यहां देवता की प्रतिमा किसी बंद गर्भगृह में नहीं, बल्कि खुले वातावरण में पूजी जाती है।

मंदिर से जुड़ी स्थानीय मान्यता है कि भगवान वराह की प्रतिमा पहले बहुत छोटी थी और धीरे-धीरे बढ़कर वर्तमान स्वरूप में आई है। श्रद्धालु इसे दिव्य उपस्थिति का संकेत मानते हैं। इस मंदिर और यहां की बढ़ती प्रतिमा की मान्यता का उल्लेख द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की 21 जनवरी 2025 की रिपोर्ट में भी किया गया है।

खुले आसमान के नीचे होती है पूजा

इस मंदिर की खासियत यह है कि प्रतिमा प्राकृतिक चट्टान से जुड़ी हुई है। आसपास के श्रद्धालु नियमित रूप से पूजा-अर्चना करने आते हैं। सावन के महीने में यहां विशेष धार्मिक गतिविधियां होती हैं।

भगवान विष्णु के वराह अवतार का धार्मिक महत्व पृथ्वी की रक्षा और बुराई पर विजय से जुड़ा है। ऐसे में इस चट्टानी स्वरूप के प्रति श्रद्धालुओं की आस्था और इससे जुड़ी लोककथा मंदिर को विशेष पहचान देती है।

आखिर क्यों प्रसिद्ध हैं बढ़ती मूर्तियों वाले ये मंदिर?

इन पांचों मंदिरों की कहानियां अलग-अलग हैं, लेकिन इनमें कुछ समानताएं दिखाई देती हैं।

  • स्वयंभू स्वरूप की मान्यता: कुछ मंदिरों में प्रतिमा को मनुष्य द्वारा निर्मित नहीं, बल्कि स्वयं प्रकट हुआ माना जाता है।
  • पीढ़ियों से चली आ रही कथाएं: प्रतिमा के आकार में वृद्धि की बात स्थानीय धार्मिक परंपराओं के जरिए आगे बढ़ी है।
  • आस्था और जिज्ञासा का मेल: श्रद्धालुओं के साथ-साथ इतिहास, संस्कृति और धार्मिक परंपराओं में रुचि रखने वाले लोग भी इन मंदिरों के बारे में जानना चाहते हैं।
  • स्थानीय पहचान: इन मंदिरों से जुड़ी मान्यताएं संबंधित क्षेत्रों की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान का हिस्सा बन चुकी हैं।

जमुना दयाल

जमुना दयाल वाराणसी के निवासी हैं और उन्हें हिंदी समाचार मीडिया में 10 से अधिक वर्षों का गहन रिपोर्टिंग अनुभव है। उन्होंने अमर उजाला और दैनिक जागरण जैसे देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में जिला रिपोर्टर के रूप में कार्य करते हुए खेल, शिक्षा, राजनीति, कृषि तथा सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता से कवर किया है। शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से जनसंचार में परास्नातक (MJMC) की डिग्री प्राप्त की है और यूजीसी नेट (UGC NET) परीक्षा उत्तीर्ण की है।

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