सोनागाछी की ‘पुण्य माटी’ से कुम्हारटोली की कलाकारी तक, ऐसे आकार लेती हैं मां दुर्गा की प्रतिमाएं
कोलकाता के कुम्हारटोली में महीनों पहले शुरू हो जाती है दुर्गा प्रतिमाओं की तैयारी, देश के कोने-कोने से लेकर विदेशों तक है मांग; सोनागाछी से जुड़ी परंपरा के पीछे आस्था, लोककथा और सामाजिक संदेश की अनोखी कहानी।

शारदीय नवरात्र और दुर्गा पूजा का नाम आते ही मां दुर्गा की भव्य प्रतिमाएं, सजे पूजा पंडाल और ढाक की गूंज मन में उभरने लगती है। लेकिन इन आकर्षक प्रतिमाओं के पीछे कलाकारों की महीनों की मेहनत, पीढ़ियों से चली आ रही शिल्प परंपरा और कुछ ऐसी लोकमान्यताएं भी हैं, जो इस उत्सव को और खास बना देती हैं। पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता का कुम्हारटोली इसी कला और परंपरा का प्रमुख केंद्र है। यहां मिट्टी के साधारण ढेर को कलाकार अपने हाथों से मां दुर्गा के दिव्य स्वरूप में ढालते हैं।
इसी परंपरा के साथ जुड़ा है उत्तर कोलकाता के सोनागाछी का नाम, जहां से मां दुर्गा की प्रतिमा बनाने के लिए ‘पुण्य माटी’ यानी पवित्र मिट्टी लाने की एक चर्चित लोकमान्यता प्रचलित रही है। एक ओर कुम्हारटोली की कलाकारी दुनिया भर में पहुंच रही है, तो दूसरी ओर सोनागाछी से जुड़ी यह परंपरा आस्था, सामाजिक सोच और स्त्रियों के प्रति समाज के नजरिये पर सवाल खड़े करती है।
कुम्हारटोली: जहां मिट्टी में उतरती है मां दुर्गा की छवि
कोलकाता के उत्तर हिस्से में स्थित कुम्हारटोली लंबे समय से मूर्तिकारों और मिट्टी के शिल्पकारों की पहचान रहा है। यहां कई परिवार पीढ़ियों से प्रतिमा निर्माण के काम से जुड़े हैं। उनके लिए यह केवल रोजगार नहीं, बल्कि पारिवारिक विरासत और कला साधना भी है।
दुर्गा पूजा से कई महीने पहले यहां की गलियों और कार्यशालाओं में हलचल बढ़ने लगती है। कहीं बांस और लकड़ी का ढांचा तैयार होता है, तो कहीं मिट्टी की परतें चढ़ाई जाती हैं। कलाकार मां दुर्गा के चेहरे, आंखों, हाथों और आभूषणों को बारीकी से आकार देते हैं। प्रतिमा के साथ गणेश, कार्तिकेय, लक्ष्मी और सरस्वती की मूर्तियां भी तैयार की जाती हैं।
मई 2026 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक, कुम्हारटोली के कारीगरों ने उस वर्ष मार्च के अंतिम सप्ताह से ही दुर्गा प्रतिमाओं का निर्माण शुरू कर दिया था। प्रतिमा के आकार और बारीकियों के अनुसार एक सेट तैयार करने में लगभग एक सप्ताह से लेकर एक महीने तक लग सकता है। यानी पूजा पंडालों में कुछ दिनों के लिए स्थापित होने वाली प्रतिमा के पीछे कलाकारों की कई सप्ताह की मेहनत छिपी रहती है।
बांस के ढांचे से लेकर रंगों तक, ऐसे बनती है प्रतिमा
मां दुर्गा की प्रतिमा तैयार करने की प्रक्रिया कई चरणों से गुजरती है। सबसे पहले बांस, लकड़ी और अन्य सामग्री से प्रतिमा का ढांचा बनाया जाता है। इसके बाद उस पर मिट्टी की परतें चढ़ाकर शरीर का आकार तैयार किया जाता है। मिट्टी सूखने के बाद चेहरे और अंगों को अधिक स्पष्ट रूप दिया जाता है।
इसके बाद प्रतिमा पर रंग किया जाता है। मां दुर्गा की आंखें बनाने का काम विशेष सावधानी से किया जाता है। बंगाल की परंपरा में आंखें बनाने की रस्म को खास महत्व दिया जाता है और इसे कई जगह ‘चक्षुदान’ के नाम से जाना जाता है। कलाकारों की महीन कूची से प्रतिमा के चेहरे पर भाव उभरते हैं और मां दुर्गा का स्वरूप जीवंत दिखाई देने लगता है।
आभूषण, वस्त्र, मुकुट और अन्य सजावटी तत्व प्रतिमा की भव्यता बढ़ाते हैं। पूजा समितियों की मांग के अनुसार प्रतिमाओं के आकार, रंग, मुद्रा और सजावट में भी अंतर होता है। कहीं पारंपरिक स्वरूप पसंद किया जाता है, तो कहीं आधुनिक शैली और विशेष कलात्मक प्रयोग देखने को मिलते हैं।
केवल दुर्गा ही नहीं, कई देवी-देवताओं की बनती हैं प्रतिमाएं
कुम्हारटोली का काम केवल दुर्गा पूजा तक सीमित नहीं है। यहां वर्ष भर अलग-अलग धार्मिक अवसरों और पूजा आयोजनों के लिए प्रतिमाएं तैयार की जाती हैं। इनमें मां काली, लक्ष्मी, सरस्वती, जगद्धात्री और भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमाएं भी शामिल हैं।
दुर्गा पूजा के समय काम का दबाव सबसे अधिक रहता है। बड़ी पूजा समितियों के लिए विशाल प्रतिमाएं तैयार की जाती हैं, जबकि घरों में होने वाली पूजा के लिए अपेक्षाकृत छोटी प्रतिमाएं भी बनाई जाती हैं। कुछ प्रतिमाएं स्थानीय बाजार में बिकती हैं, तो कुछ पहले से मिले ऑर्डर के आधार पर तैयार की जाती हैं।
कुम्हारटोली के सभी कलाकारों के सालाना उत्पादन का कोई एक समेकित और प्रमाणित आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। इसलिए यहां हर साल कुल कितनी प्रतिमाएं बनती हैं, इसका निश्चित आंकड़ा बताना मुश्किल है। उत्पादन कलाकारों की संख्या, कार्यशाला के आकार, प्रतिमाओं की मांग और पूजा समितियों के ऑर्डर पर निर्भर करता है।
देश ही नहीं, विदेशों तक पहुंचती हैं कुम्हारटोली की प्रतिमाएं
कुम्हारटोली की पहचान अब कोलकाता या पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं है। यहां तैयार की गई प्रतिमाओं की मांग भारत के दूसरे शहरों और विदेशों में भी रहती है। देश के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले बंगाली समुदाय और दुर्गा पूजा समितियां यहां के कलाकारों से प्रतिमाएं मंगवाती हैं।
मई 2026 की एक रिपोर्ट में कुम्हारटोली के कलाकारों के हवाले से बेंगलुरु को प्रमुख घरेलू बाजारों में शामिल बताया गया। इसके अलावा अलग-अलग वर्षों में भोपाल, मुंबई, गोरखपुर और त्रिपुरा जैसे स्थानों तक प्रतिमाएं पहुंचने का उल्लेख भी मिलता रहा है। हालांकि इन सभी स्थानों पर हर वर्ष कितनी प्रतिमाएं भेजी जाती हैं, इसका कोई एक ताजा और समेकित आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।
विदेशों में भी कुम्हारटोली की प्रतिमाओं की मांग बनी हुई है। अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, संयुक्त अरब अमीरात, जापान, जर्मनी, इटली और सिंगापुर सहित कई देशों में दुर्गा पूजा के आयोजन होते हैं। इन आयोजनों के लिए कलाकारों को प्रतिमाओं के ऑर्डर मिलते हैं। कुछ कलाकारों की प्रतिमाएं फ्रांस, पुर्तगाल, बेल्जियम और रूस तक भी भेजी गई हैं।
सितंबर 2025 में प्रकाशित पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार, उस वर्ष कुम्हारटोली से मां दुर्गा और उनके परिवार की 300 से अधिक प्रतिमाएं विदेश भेजी गई थीं, जबकि 2024 में यह संख्या लगभग 240 बताई गई थी। यह आंकड़ा विदेश भेजी गई प्रतिमाओं का है, कुम्हारटोली में बनी सभी प्रतिमाओं का नहीं। इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस पारंपरिक कला की मांग का अंदाजा लगाया जा सकता है।
विदेश भेजी जाने वाली कुछ प्रतिमाएं फाइबरग्लास से भी तैयार की जाती हैं। इसका कारण लंबी दूरी तक परिवहन के दौरान प्रतिमा को सुरक्षित रखना है। मिट्टी की प्रतिमाएं पारंपरिक पूजा पद्धति का अहम हिस्सा हैं, लेकिन निर्यात के लिए सामग्री का चयन जरूरत और उपयोग के हिसाब से किया जाता है।
बढ़ती लागत और कलाकारों के सामने नई चुनौतियां
कुम्हारटोली की कला की लोकप्रियता के बावजूद मूर्तिकारों के सामने कई चुनौतियां हैं। कच्चे माल, रंग, सजावटी सामग्री और परिवहन की लागत बढ़ने से प्रतिमाएं तैयार करना महंगा होता जा रहा है। विदेशों तक प्रतिमा भेजने में पैकिंग और माल ढुलाई का खर्च भी जुड़ता है।
इसके साथ ही पूजा पंडालों की बदलती जरूरतों का असर प्रतिमाओं के आकार और डिजाइन पर पड़ता है। कुछ आयोजक बड़ी प्रतिमाओं की जगह अपेक्षाकृत छोटी और आसानी से परिवहन की जा सकने वाली प्रतिमाएं पसंद करते हैं। कलाकारों को परंपरा बनाए रखने के साथ-साथ ग्राहकों की नई मांगों के अनुरूप भी काम करना पड़ता है।
फिर भी कुम्हारटोली के कारीगर अपनी कला को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने में जुटे हैं। उनके हाथों से बनी प्रतिमाएं धार्मिक आस्था के साथ बंगाल की सांस्कृतिक पहचान का भी प्रतिनिधित्व करती हैं।
सोनागाछी का नाम क्यों जुड़ा ‘पुण्य माटी’ से?
कुम्हारटोली की प्रतिमा निर्माण परंपरा के साथ सोनागाछी का नाम एक अलग कारण से जुड़ता है। सोनागाछी उत्तर कोलकाता का एक जाना-पहचाना इलाका है, जो लंबे समय से रेड-लाइट क्षेत्र के रूप में चर्चित रहा है। दुर्गा प्रतिमा निर्माण से जुड़ी लोकमान्यता के अनुसार, पहले कुछ कारीगर प्रतिमा बनाने के लिए आवश्यक मिट्टी में सोनागाछी के दरवाजे की मिट्टी भी मिलाते थे। इसी मिट्टी को ‘पुण्य माटी’ कहा जाने लगा।
इस परंपरा को लेकर कई तरह की व्याख्याएं प्रचलित हैं। एक लोकप्रिय लोककथा के अनुसार, समाज जिन महिलाओं को हाशिये पर रखता है, उनके घर की देहरी की मिट्टी को मां दुर्गा की प्रतिमा में शामिल करने का विचार सामाजिक पाखंड पर सवाल उठाता है। एक अन्य प्रचलित व्याख्या में कहा जाता है कि किसी व्यक्ति के उस देहरी पर पहुंचने के बाद उसकी अच्छाई या पुण्य वहीं छूट जाता है। हालांकि यह कथन लोकव्याख्या है, इसे प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य नहीं माना जा सकता।
इस परंपरा की उत्पत्ति कब हुई, किसने शुरू की और यह सभी मूर्तिकारों के बीच कितनी व्यापक थी—इन सवालों के स्पष्ट और सर्वमान्य ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए इसे बंगाल की चर्चित लोकमान्यता के रूप में समझना अधिक उचित है, न कि दुर्गा प्रतिमा निर्माण का अनिवार्य नियम मानना।
क्या आज भी सोनागाछी से लाई जाती है मिट्टी?
समय के साथ इस परंपरा के पालन में बदलाव आया है। अक्टूबर 2026 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, सोनागाछी से मिट्टी लाने की प्रथा पहले की तरह व्यापक रूप से नहीं निभाई जा रही है। कुछ कारीगर अब हुगली नदी के किनारे से मिट्टी एकत्र करते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि लोकपरंपराएं समय, सामाजिक परिस्थितियों और कारीगरों की अपनी प्रथाओं के अनुसार बदलती रहती हैं।
यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि सोनागाछी का संबंध प्रतिमाओं के निर्माण स्थल के रूप में नहीं, बल्कि ‘पुण्य माटी’ की मान्यता के कारण चर्चा में आता है। मां दुर्गा की प्रतिमाएं बनाने का प्रमुख केंद्र कुम्हारटोली ही है। सोनागाछी की मिट्टी को लेकर प्रचलित कहानी को पूरे बंगाल के सभी मूर्तिकारों की समान परंपरा बताना सही नहीं होगा।
इस लोककथा में छिपा है सामाजिक सम्मान का सवाल
‘पुण्य माटी’ की मान्यता को केवल रहस्य या कौतूहल की नजर से देखना इसकी पूरी व्याख्या नहीं है। इस कहानी के केंद्र में समाज के दोहरे मानदंडों पर सवाल भी दिखाई देता है। जिस समाज में कुछ महिलाओं को हाशिये पर रखा जाता है, उसी समाज की धार्मिक परंपरा से जुड़ी एक लोककथा उनकी देहरी की मिट्टी को प्रतीकात्मक महत्व देती है।
हालांकि इस कथा के पीछे की वास्तविक ऐतिहासिक वजह को लेकर निश्चित प्रमाण नहीं हैं, फिर भी यह परंपरा सामाजिक सम्मान, मानवीय गरिमा और भेदभाव पर चर्चा का अवसर देती है। किसी महिला के पेशे या सामाजिक परिस्थिति के आधार पर उसके सम्मान को कम नहीं आंका जाना चाहिए।
मां दुर्गा की पूजा शक्ति, साहस और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का प्रतीक मानी जाती है। ऐसे में ‘पुण्य माटी’ की लोककथा को मानवीय गरिमा और सामाजिक संवेदनशीलता के संदर्भ में समझना इसे महज एक रहस्यमयी कहानी से आगे ले जाता है।
मिट्टी की प्रतिमा में कला, आस्था और परंपरा का संगम
कोलकाता का कुम्हारटोली केवल प्रतिमाएं बनाने की जगह नहीं, बल्कि बंगाल की सांस्कृतिक स्मृति और कलाकारों की मेहनत का जीवंत केंद्र है। यहां की कार्यशालाओं में मिट्टी, रंग और कारीगरी के माध्यम से मां दुर्गा के स्वरूप को आकार दिया जाता है। इन प्रतिमाओं की मांग भारत के विभिन्न शहरों से लेकर विदेशों तक फैली है।
दूसरी ओर, सोनागाछी से जुड़ी ‘पुण्य माटी’ की लोकमान्यता यह याद दिलाती है कि धार्मिक परंपराओं के साथ समाज की सोच और मानवीय मूल्यों की कहानियां भी जुड़ी रहती हैं। इस परंपरा के ऐतिहासिक आधार पर अभी और शोध की गुंजाइश है, लेकिन इसका सांस्कृतिक महत्व चर्चा का विषय बना हुआ है।
इस तरह कुम्हारटोली की कला और सोनागाछी की लोककथा मिलकर दुर्गा पूजा के एक ऐसे पहलू को सामने लाती हैं, जहां मिट्टी केवल प्रतिमा का आधार नहीं रहती, बल्कि कला, आस्था, आजीविका और सामाजिक विमर्श की वाहक भी बन जाती है।



