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सलीमगढ़ किले की कहानी: जहां कैद रहीं मुगल शहजादी जेबुन्निसा, आजाद हिंद फौज के वीरों ने भी झेली कैद

दिल्ली का ऐतिहासिक किला कभी सूरी शासकों की सैन्य ताकत का प्रतीक था, फिर मुगलकालीन कैदगाह बना और अंग्रेजों के दौर में स्वतंत्रता सेनानियों की पीड़ा का गवाह।

दिल्ली में लाल किले की भव्यता देखने हर साल लाखों पर्यटक पहुंचते हैं, लेकिन इसके ठीक उत्तर-पूर्व में मौजूद सलीमगढ़ किले की कहानी भी कम रोमांचक नहीं है। इसकी पुरानी दीवारों ने सत्ता के लिए भाइयों के बीच संघर्ष देखा, एक मुगल शहजादी की लंबी कैद की कहानी अपने भीतर समेटी और आजादी की लड़ाई लड़ने वाले सैनिकों की पीड़ा भी देखी। यह वही किला है, जहां कभी शाही परिवार के सदस्य कैद रहे और बाद में आजाद हिंद फौज के अधिकारियों को भी बंद रखा गया।

1546 में बना सलीमगढ़ किला आज दिल्ली की उन ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल है, जिनकी अहमियत केवल स्थापत्य कला तक सीमित नहीं है। यह किला भारतीय इतिहास के तीन बड़े अध्यायों—सूरी शासन, मुगलकालीन सत्ता संघर्ष और स्वतंत्रता आंदोलन—को एक साथ जोड़ता है।

शेरशाह सूरी के बेटे ने बनवाया था सलीमगढ़ किला

सलीमगढ़ किले का निर्माण 1546 ईस्वी में इस्लाम शाह सूरी ने कराया था। वह शेरशाह सूरी का पुत्र और उत्तराधिकारी था। उस समय उत्तर भारत की सत्ता को लेकर संघर्ष जारी था। मुगल बादशाह हुमायूं अपना खोया हुआ साम्राज्य वापस पाने की कोशिश कर रहे थे। ऐसे समय में दिल्ली और यमुना के आसपास एक मजबूत सैन्य संरचना बनाना रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण था।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से संबंधित ऐतिहासिक विवरण के अनुसार, किले की योजना लगभग त्रिकोणीय है। इसकी मोटी पत्थर की दीवारें और गोल बुर्ज इसे रक्षात्मक स्वरूप प्रदान करते थे।

हालांकि, किला लंबे समय तक सूरी शासकों के नियंत्रण में नहीं रह सका। 1555 में हुमायूं ने दिल्ली पर फिर से अधिकार स्थापित किया और सलीमगढ़ मुगल सत्ता के अधीन आ गया। इस तरह जिस किले का निर्माण सूरी शासन की सुरक्षा के लिए हुआ था, वह जल्द ही मुगलों के नियंत्रण में पहुंच गया।

लाल किले से पहले मौजूद था सलीमगढ़

दिल्ली के इतिहास में सलीमगढ़ की एक खास जगह है। आज यह लाल किले के परिसर के निकट दिखाई देता है, लेकिन इसका निर्माण शाहजहां के लाल किले से लगभग एक सदी पहले हो चुका था।

जब शाहजहां ने 1638 में शाहजहानाबाद को अपनी नई राजधानी के रूप में विकसित करना शुरू किया, तब सलीमगढ़ पहले से मौजूद था। लाल किले का निर्माण 1648 तक पूरा हुआ। बाद में दोनों किलों के बीच संपर्क स्थापित करने के लिए एक पुल बनाया गया।

मुगलकाल के दौरान सलीमगढ़ का उपयोग केवल सैन्य सुरक्षा तक सीमित नहीं रहा। समय के साथ यह राजनीतिक बंदियों को रखने के लिए भी इस्तेमाल किया जाने लगा। राजपरिवार के भीतर उत्तराधिकार का संघर्ष और शासकों के बीच अविश्वास इस किले की कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।

औरंगजेब का भाई मुराद बख्श भी रहा कैद

सलीमगढ़ किले से जुड़ी चर्चित घटनाओं में मुगल शहजादे मुराद बख्श की कैद का प्रसंग भी शामिल है। मुराद बख्श, शाहजहां के पुत्र और औरंगजेब के भाई थे। 1657 में शाहजहां के बीमार पड़ने के बाद मुगल साम्राज्य में उत्तराधिकार की लड़ाई शुरू हो गई थी।

इस संघर्ष में औरंगजेब ने अपने भाइयों को पराजित कर सत्ता पर अधिकार किया। मुराद बख्श को गिरफ्तार कर सलीमगढ़ की कैद में रखे जाने का उल्लेख ऐतिहासिक विवरणों में मिलता है। बाद में उन्हें ग्वालियर किले में स्थानांतरित किया गया और 1661 में मृत्युदंड दिया गया।

मुराद बख्श की कहानी बताती है कि मुगल साम्राज्य में सत्ता हासिल करने की लड़ाई कितनी कठोर थी। जिन राजकुमारों के पास कभी सेनाएं और विशाल संसाधन थे, वे पराजय के बाद कैदी बन गए। सलीमगढ़ इस राजनीतिक संघर्ष का एक महत्वपूर्ण पड़ाव रहा।

शहजादी जेबुन्निसा की कैद की मार्मिक कहानी

सलीमगढ़ किले का नाम मुगल शहजादी जेबुन्निसा की कहानी से भी जुड़ा है। वह औरंगजेब की बेटी थीं और फारसी कविता तथा साहित्य में उनकी गहरी रुचि थी। उनकी साहित्यिक पहचान के कारण उन्हें मुगलकाल की उल्लेखनीय महिला हस्तियों में गिना जाता है।

भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के आजादी का अमृत महोत्सव पोर्टल पर प्रकाशित विवरण के अनुसार, जेबुन्निसा को सलीमगढ़ किले में कैद रखा गया था। उन्होंने अपने जीवन के अंतिम 21 वर्ष कैद में बिताए और 1702 में उनका निधन हुआ।

उनकी कैद के कारणों को लेकर अलग-अलग विवरण मिलते हैं। कुछ ऐतिहासिक कथन इसे शाही परिवार के राजनीतिक मतभेदों और उनके भाई मुहम्मद अकबर से जुड़े घटनाक्रम से जोड़ते हैं। इसलिए उनकी कैद की एकमात्र निश्चित वजह बताने से बचना चाहिए।

फिर भी जेबुन्निसा की कहानी इतिहास का एक मार्मिक पक्ष सामने लाती है। साहित्य और कविता से जुड़ी एक शहजादी का जीवन शाही राजनीति की जटिलताओं में उलझ गया। सलीमगढ़ की पहचान इसी वजह से एक सैन्य किले के साथ-साथ मुगल परिवार के भीतर के संघर्षों से जुड़े स्थान के रूप में भी बनी।

1857 की क्रांति के बाद अंग्रेजों ने बदल दिया किले का उपयोग

1857 का विद्रोह भारतीय इतिहास का निर्णायक अध्याय था। दिल्ली में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष हुआ और अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को विद्रोह का प्रतीक बनाया गया। विद्रोह के दमन के बाद अंग्रेजों ने दिल्ली के सैन्य और प्रशासनिक ढांचे में व्यापक बदलाव किए।

सलीमगढ़ किले पर भी अंग्रेजों का नियंत्रण हो गया। इसके भीतर सैन्य उपयोग के लिए कई इमारतें और बैरकें बनाई गईं। किले का पुराना रक्षात्मक स्वरूप धीरे-धीरे औपनिवेशिक सैन्य व्यवस्था का हिस्सा बन गया।

इस बदलाव का महत्व केवल इमारतों तक सीमित नहीं था। सलीमगढ़ का इस्तेमाल बदलती सत्ता के साथ बदलता रहा। कभी सूरी शासकों की सुरक्षा के लिए बना यह किला मुगलकाल में कैदगाह बना और ब्रिटिश शासन के दौरान सैन्य ठिकाने तथा कैदियों को रखने के स्थान के रूप में इस्तेमाल हुआ।

आजाद हिंद फौज के वीरों को भी यहां रखा गया कैद

सलीमगढ़ किले की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय भारत के स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ा है। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में आजाद हिंद फौज ने अंग्रेजी शासन से भारत को मुक्त कराने के लिए संघर्ष किया। युद्ध के अंत में इस फौज के अनेक अधिकारियों और सैनिकों को ब्रिटिश सेना ने गिरफ्तार कर लिया।

सलीमगढ़ किले की बैरकों में आजाद हिंद फौज के कई अधिकारियों को कैद रखा गया। इनमें शाहनवाज खान, प्रेम कुमार सहगल और गुरबख्श सिंह ढिल्लों के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

1945 में इन अधिकारियों पर लाल किले में मुकदमा चलाया गया। इन मुकदमों ने पूरे देश में व्यापक प्रतिक्रिया पैदा की। विभिन्न क्षेत्रों में आजाद हिंद फौज के सैनिकों के समर्थन में प्रदर्शन और जनसभाएं हुईं। स्वतंत्रता आंदोलन के अंतिम दौर में इन घटनाओं ने राष्ट्रवादी भावनाओं को और मजबूत किया।

इस तरह सलीमगढ़ एक बार फिर इतिहास के केंद्र में आया। इस बार यहां की कहानी किसी बादशाह की सत्ता या शाही परिवार के विवाद की नहीं, बल्कि आजादी के लिए संघर्ष करने वाले सैनिकों की थी।

स्वतंत्रता संग्राम संग्रहालय में सुरक्षित हैं यादें

सलीमगढ़ किले की ऐतिहासिक पहचान को सुरक्षित रखने के लिए यहां आजाद हिंद फौज से संबंधित बैरकों के एक हिस्से को संग्रहालय में बदला गया। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने 1995 में यहां स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी प्रदर्शनी विकसित की।

इस संग्रहालय में आजाद हिंद फौज से संबंधित तस्वीरें, वर्दियां, बैज और अन्य ऐतिहासिक सामग्री प्रदर्शित की गई। इन वस्तुओं के माध्यम से पर्यटक स्वतंत्रता संग्राम के उस दौर को समझ सकते हैं, जब सैनिकों ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध हथियार उठाए थे।

सलीमगढ़ का यह हिस्सा किले के पुराने इतिहास को एक नया अर्थ देता है। कभी जहां कैदियों की जिंदगी सीमित कर दी जाती थी, वही स्थान आज देश के स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष और बलिदान की स्मृति से जुड़ा है।

सलीमगढ़ किले की वास्तुकला

सलीमगढ़ किला अपनी मजबूत किलेबंदी और सैन्य स्थापत्य के लिए जाना जाता है। इसकी योजना लगभग त्रिकोणीय है। मोटी पत्थर की दीवारें और गोल बुर्ज इसकी प्रमुख विशेषताएं हैं।

किले की दीवारों को इस तरह बनाया गया था कि वे बाहरी हमलों का सामना कर सकें। गोल बुर्ज निगरानी और रक्षा के लिए उपयोगी थे। इसकी स्थिति भी रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण थी, क्योंकि यह यमुना के निकट और दिल्ली के प्रमुख शाही क्षेत्र के पास स्थित था।

हालांकि, आज दिखाई देने वाली सभी इमारतों को मूल सूरीकालीन निर्माण का हिस्सा नहीं माना जा सकता। मुगलकाल और अंग्रेजी शासन के दौरान यहां कई बदलाव हुए। विशेष रूप से ब्रिटिश काल की बैरकें इस बात का प्रमाण हैं कि किले को अलग-अलग समय में अलग-अलग उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया गया।

जमीन के नीचे भी छिपा है प्राचीन इतिहास

सलीमगढ़ किले की कहानी 1546 से भी पुरानी हो सकती है। यहां 1994-95 में हुए पुरातात्विक उत्खनन में ऐसे प्रमाण मिले, जो लगभग 900 ईसा पूर्व से लेकर आरंभिक ऐतिहासिक काल तक इस स्थान पर मानवीय गतिविधियों की ओर संकेत करते हैं।

इस खोज का महत्व इसलिए है क्योंकि इससे पता चलता है कि इस क्षेत्र का इतिहास केवल मध्यकालीन किले के निर्माण तक सीमित नहीं है। यहां के आसपास के भूभाग में इससे पहले भी लोगों की गतिविधियां रही होंगी।

हालांकि, उत्खनन के प्रमाणों के आधार पर प्राचीन काल में यहां रहने वाले लोगों की पहचान या उनके जीवन के सभी पहलुओं के बारे में निश्चित दावा नहीं किया जा सकता। फिर भी ये प्रमाण दिल्ली के लंबे ऐतिहासिक विकास को समझने में उपयोगी हैं।

क्या सलीमगढ़ किले में आज भी सुनाई देती हैं रहस्यमयी आवाजें?

सलीमगढ़ किले से जुड़ी कुछ लोकप्रिय कहानियों में रात के समय रहस्यमयी आवाजें सुनाई देने और शहजादी जेबुन्निसा की आत्मा दिखाई देने जैसे दावे किए जाते हैं। ऐसी कहानियां पुराने किलों और ऐतिहासिक कैदगाहों को लेकर लोगों की कल्पना का हिस्सा बन गई हैं।

लेकिन इन दावों के समर्थन में विश्वसनीय वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए इन्हें ऐतिहासिक तथ्य के बजाय लोककथा और लोकप्रिय मान्यता के रूप में ही देखना उचित होगा।

किले की वास्तविक ऐतिहासिक घटनाएं अपने आप में इतनी महत्वपूर्ण हैं कि उसके महत्व को रहस्य या भूत-प्रेत की कहानियों पर निर्भर करने की जरूरत नहीं है। इसकी दीवारें भारतीय इतिहास के उन संघर्षों की गवाह हैं, जिनके प्रमाण सरकारी दस्तावेजों और पुरातात्विक अभिलेखों में मिलते हैं।

लाल किले के पास कैसे पहुंचें सलीमगढ़?

सलीमगढ़ किला दिल्ली में लाल किले के उत्तर-पूर्वी हिस्से में स्थित है। यहां तक पहुंचने के लिए पुरानी दिल्ली और लाल किला क्षेत्र प्रमुख संदर्भ बिंदु हैं। दिल्ली के विभिन्न हिस्सों से सड़क मार्ग और मेट्रो के जरिए इस इलाके तक पहुंचा जा सकता है।

हालांकि, किले के सभी हिस्सों और संग्रहालय तक पहुंच की व्यवस्था समय के साथ बदल सकती है। यात्रा की योजना बनाने से पहले भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से प्रवेश, खुलने के समय और उपलब्ध सुविधाओं की जानकारी ले लेना उचित होगा।

किले को देखने के साथ लाल किला और आसपास के ऐतिहासिक स्थलों को भी देखा जा सकता है। इससे दिल्ली के मध्यकालीन और औपनिवेशिक इतिहास को एक साथ समझने का अवसर मिलता है।

कैदगाह से आजादी की स्मृति तक

सलीमगढ़ किले की कहानी किसी एक शासक या कालखंड तक सीमित नहीं है। 1546 में इस्लाम शाह सूरी के समय बना यह किला मुगल सत्ता के संघर्ष, जेबुन्निसा की कैद, अंग्रेजी सैन्य शासन और आजाद हिंद फौज के सैनिकों के संघर्ष का साक्षी रहा है।

आज इसकी पुरानी दीवारें और बैरकें हमें याद दिलाती हैं कि इतिहास केवल राजाओं की जीत और हार का लेखा-जोखा नहीं होता। उसमें कैदियों की पीड़ा, सैनिकों का साहस और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने वालों का बलिदान भी शामिल होता है।

लाल किले के पास स्थित सलीमगढ़ का महत्व इसी बहुस्तरीय इतिहास में छिपा है। यह किला आज भी बताता है कि सत्ता बदलती रहती है, लेकिन इतिहास की स्मृतियां इमारतों और दस्तावेजों में लंबे समय तक सुरक्षित रह सकती हैं।

जमुना दयाल

जमुना दयाल वाराणसी के निवासी हैं और उन्हें हिंदी समाचार मीडिया में 10 से अधिक वर्षों का गहन रिपोर्टिंग अनुभव है। उन्होंने अमर उजाला और दैनिक जागरण जैसे देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में जिला रिपोर्टर के रूप में कार्य करते हुए खेल, शिक्षा, राजनीति, कृषि तथा सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता से कवर किया है। शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से जनसंचार में परास्नातक (MJMC) की डिग्री प्राप्त की है और यूजीसी नेट (UGC NET) परीक्षा उत्तीर्ण की है।

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