नंगे पैर दौड़ती कविता से एवरेस्ट विजेता अरुणिमा तक: मुश्किलों को मात देकर मंजिल पाने वाली भारत की बेटियां
किसी के पास दौड़ने के लिए जूते नहीं थे, किसी ने अपना पैर खो दिया तो किसी ने गरीबी और सामाजिक तानों से लड़कर बनाई पहचान; जानिए उन महिलाओं की कहानियां जिन्होंने हालात के आगे झुकने के बजाय अपनी किस्मत खुद लिखी

कहते हैं कि सपने देखने के लिए परिस्थितियों का अनुकूल होना जरूरी नहीं। जरूरत सिर्फ इतनी है कि इंसान उन सपनों को पूरा करने का हौसला रखता हो। झारखंड के रामगढ़ की कविता महतो इन दिनों इसी जज्बे की नई मिसाल बनकर सामने आई हैं।
कविता की तस्वीर जब सामने आई तो उसमें न कोई महंगा ट्रैक सूट था, न पैरों में दौड़ने वाले जूते। साड़ी पहने और नंगे पैर दौड़ती एक महिला दिखाई दी, लेकिन उस तस्वीर के पीछे छिपी कहानी कहीं ज्यादा बड़ी है। पति की बीमारी से मौत, परिवार पर कर्ज, बच्चों और सास-ससुर की जिम्मेदारी और रोजी-रोटी के लिए ईंट-भट्ठे में मजदूरी—इन सबके बीच कविता ने होमगार्ड की नौकरी का सपना देखा। वह सुबह करीब चार बजे उठकर दौड़ का अभ्यास करती हैं और इसके बाद घर के काम निपटाकर मजदूरी करने जाती हैं।
कविता की कहानी नई है, लेकिन संघर्ष से जीत की ऐसी कहानियां भारत में बहुत पुरानी और बहुत बड़ी हैं। किसी ने पहाड़ की ऊंचाई को चुनौती दी, किसी ने शारीरिक अक्षमता को मात दी, किसी ने गरीबी से लड़कर कारोबार खड़ा किया तो किसी ने समाज की रूढ़ियों के खिलाफ आवाज उठाई।
कविता महतो: नंगे पैर दौड़ता एक सपना
रामगढ़ के दुलमी प्रखंड के सोसो गांव की कविता महतो के सामने जिंदगी ने एक के बाद एक मुश्किलें खड़ी कीं। पति दीपक महतो की बीमारी के कारण मौत हो गई। इलाज में परिवार पर कर्ज चढ़ा। इसके बाद परिवार की दूसरी त्रासदी ने जिम्मेदारियां और बढ़ा दीं।
दो छोटे बच्चों और परिवार की जिम्मेदारी कविता के कंधों पर आ गई। परिवार चलाने के लिए उन्हें ईंट-भट्ठे में मजदूरी करनी पड़ती है। लेकिन उन्होंने अपने लिए एक लक्ष्य चुना—होमगार्ड की वर्दी पहनना।
दौड़ की तैयारी के लिए उनके पास सुविधाएं नहीं थीं। फिर भी वह सुबह चार बजे उठती हैं और अभ्यास करती हैं। घर के काम और मजदूरी के बीच समय निकालकर उन्होंने शारीरिक परीक्षा की तैयारी जारी रखी।
उनका साड़ी में और नंगे पैर 1600 मीटर दौड़ना सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना। स्थानीय स्तर पर लोगों ने उनके जज्बे की सराहना की और मदद के लिए भी हाथ बढ़ाए।
कविता की कहानी का सबसे बड़ा संदेश यही है—सुविधाओं की कमी सपनों को रोक सकती है, लेकिन हौसले को नहीं।
अरुणिमा सिन्हा: एक पैर गया, लेकिन हौसला नहीं

अगर संघर्ष के सामने न झुकने की बात हो तो अरुणिमा सिन्हा की कहानी भारतीय महिलाओं की प्रेरक गाथाओं में सबसे ऊपर आती है।
एक ट्रेन हादसे में उन्होंने अपना पैर गंवा दिया। जिंदगी अचानक बदल गई। लेकिन अस्पताल के बिस्तर पर ही उन्होंने ऐसा लक्ष्य तय किया जिसे सुनकर शायद बहुत से लोग इसे असंभव मानते—माउंट एवरेस्ट पर चढ़ना।
कृत्रिम पैर के सहारे उन्होंने पर्वतारोहण का प्रशिक्षण लिया। फिर 21 मई 2013 को उन्होंने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर तिरंगा फहराया। भारत सरकार के अनुसार वह एवरेस्ट फतह करने वाली पहली महिला amputee बनीं। बाद में उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया।
अरुणिमा ने यह साबित कर दिया कि शरीर की एक सीमा इंसान के सपनों की सीमा नहीं होती।
संघर्ष से मिली सीख
“जो खो गया, उसके बारे में रोने से बेहतर है कि जो बचा है, उससे नई शुरुआत की जाए।”
कल्पना सरोज: गरीबी और प्रताड़ना से कारोबार की दुनिया तक

महाराष्ट्र की कल्पना सरोज की जिंदगी में भी मुश्किलें कम नहीं थीं। बचपन और युवावस्था में उन्हें कठिन सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।
लेकिन उन्होंने परिस्थितियों को अपनी पहचान नहीं बनने दिया। छोटे स्तर से शुरुआत करते हुए उन्होंने कारोबार की दुनिया में अपना मुकाम बनाया और आगे चलकर संकटग्रस्त कमानी ट्यूब्स को संभालकर उसे फिर से खड़ा किया।
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के एक कार्यक्रम में उनके संघर्ष का उल्लेख करते हुए बताया गया कि उन्होंने बेहद कठिन दौर में लंबे समय तक काम किया और धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए कमानी कंपनियों को संभाला और उनका कायाकल्प किया।
कल्पना सरोज की कहानी बताती है कि सफलता हमेशा बड़ी शुरुआत से नहीं, छोटे कदमों से बनती है।
मैरी कॉम: गांव की मिट्टी से विश्व मुक्केबाजी तक

मणिपुर की एमसी मैरी कॉम ने जिस खेल में भारत का नाम दुनिया में रोशन किया, वह लंबे समय तक पुरुषों का क्षेत्र माना जाता था।
सीमित संसाधनों से शुरुआत करने वाली मैरी कॉम ने मुक्केबाजी में अपनी अलग पहचान बनाई। उन्होंने छह बार विश्व महिला मुक्केबाजी चैंपियनशिप जीती और 2012 लंदन ओलंपिक में कांस्य पदक हासिल किया। भारत सरकार ने उन्हें पद्म विभूषण से भी सम्मानित किया।
उनकी कहानी सिर्फ खेल की सफलता नहीं है। यह उस महिला की कहानी है जिसने परिवार, मातृत्व और अंतरराष्ट्रीय खेल करियर के बीच संतुलन बनाते हुए अपनी पहचान कायम रखी।
छुटनी महतो: जिसे समाज ने ठुकराया, उसने समाज बदलने की ठानी

झारखंड की छुटनी महतो की कहानी संघर्ष का एक अलग चेहरा सामने लाती है।
उन्हें डायन बताकर सामाजिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। लेकिन जिस कुप्रथा ने उन्हें तोड़ने की कोशिश की, उसी के खिलाफ उन्होंने आवाज उठाने का फैसला किया।
उन्होंने डायन प्रथा से पीड़ित महिलाओं के लिए काम किया और इस सामाजिक बुराई के खिलाफ अभियान चलाया। उनके काम को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली और उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया।
उनकी कहानी बताती है कि कभी-कभी अपने खिलाफ हुए अन्याय से लड़ते-लड़ते इंसान दूसरों की जिंदगी बदलने की ताकत हासिल कर लेता है।
टेसी थॉमस: मिसाइल तकनीक में बनाई अपनी पहचान

संघर्ष हमेशा गरीबी या शारीरिक कठिनाई का नाम नहीं होता। कभी संघर्ष उस क्षेत्र में जगह बनाने का होता है जहां महिलाओं की संख्या कम हो।
टेसी थॉमस ने रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानी DRDO में काम करते हुए भारत के मिसाइल कार्यक्रम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्हें सार्वजनिक जीवन में अक्सर “मिसाइल वुमन ऑफ इंडिया” के नाम से जाना जाता है।
सरकारी रिकॉर्ड में उन्हें DRDO की महानिदेशक और अग्नि मिसाइल कार्यक्रम से जुड़ी प्रमुख वैज्ञानिकों में गिना गया है।
उनकी उपलब्धि उन लड़कियों के लिए संदेश है जो विज्ञान और तकनीक जैसे क्षेत्रों में अपना भविष्य देखती हैं।
जमुना टुडू: जंगल बचाने के लिए महिलाओं की टोली

झारखंड की जमुना टुडू ने अपने क्षेत्र में जंगलों की रक्षा के लिए महिलाओं को संगठित किया। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार उन्होंने महिला कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर अपने गांव के आसपास लगभग 50 हेक्टेयर वन क्षेत्र के संरक्षण के लिए काम किया और अतिक्रमणकारियों का सामना किया।
यह कहानी बताती है कि किसी महिला की लड़ाई सिर्फ अपने घर और परिवार तक सीमित नहीं होती। वह अपने समाज, जंगल और आने वाली पीढ़ियों के लिए भी लड़ सकती है।
कामाल कुंभार: गरीबी से महिलाओं के रोजगार तक
महाराष्ट्र की कमल कुंभार ने गरीबी और कठिन वैवाहिक परिस्थितियों से बाहर निकलकर माइक्रो-एंटरप्राइज का नेटवर्क खड़ा किया। उनकी कहानी को नीति आयोग के Women Transforming India Awards में जगह मिली।
उन्होंने खुद आगे बढ़ने के साथ अन्य महिलाओं को भी रोजगार और आर्थिक अवसरों से जोड़ने का काम किया।
यानी उनकी सफलता सिर्फ व्यक्तिगत नहीं थी। उन्होंने अपनी राह बनाते हुए दूसरी महिलाओं के लिए भी रास्ता खोला।
सुभासिनी मिस्त्री: पति की मौत के बाद अस्पताल का सपना

पश्चिम बंगाल की सुभासिनी मिस्त्री के पति की कम उम्र में मृत्यु हो गई। बेहद कठिन आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने गरीबों के लिए अस्पताल बनाने का सपना देखा।
सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार उन्होंने करीब दो दशक तक बचत की और अंततः जरूरतमंदों के लिए अस्पताल बनाने में सफलता हासिल की। उन्हें Women Transforming India Awards में सम्मानित किया गया।
एक महिला की छोटी-छोटी बचत से शुरू हुआ सपना आगे चलकर गरीबों के लिए स्वास्थ्य सेवा का माध्यम बना।
अनीता कुंडू: एवरेस्ट के रास्ते में बार-बार चुनौती

हरियाणा की अनीता कुंडू ने पर्वतारोहण के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई। वह भारत और चीन दोनों तरफ से माउंट एवरेस्ट फतह करने वाली भारतीय महिला के रूप में जानी जाती हैं।
भारत सरकार ने उन्हें उन सफल महिलाओं में शामिल किया है जिन्होंने कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपने क्षेत्र में असाधारण उपलब्धियां हासिल कीं।
पर्वतारोहण में हर कदम जोखिम से भरा होता है। लेकिन उनके लिए पहाड़ सिर्फ चढ़ाई नहीं था—वह अपनी सीमाओं को चुनौती देने का माध्यम था।
ये महिलाएं अलग हैं, लेकिन कहानी एक है
इन महिलाओं के जीवन की परिस्थितियां अलग-अलग हैं।
कविता महतो के पास जूते नहीं थे।
अरुणिमा सिन्हा के पास एक पैर नहीं था।
कल्पना सरोज ने सामाजिक और आर्थिक मुश्किलों से लड़कर कारोबार खड़ा किया।
मैरी कॉम ने सीमित संसाधनों से विश्व मुक्केबाजी में पहचान बनाई।
छुटनी महतो ने सामाजिक कुप्रथा के खिलाफ आवाज उठाई।
टेसी थॉमस ने रक्षा विज्ञान में अपनी जगह बनाई।
जमुना टुडू ने जंगलों की रक्षा का बीड़ा उठाया।
सुभासिनी मिस्त्री ने गरीबों के लिए अस्पताल का सपना पूरा किया।
लेकिन इन सभी में एक बात समान है—
देश की असली प्रेरणा शायद यहीं है
भारत में ऐसी महिलाओं की कोई आधिकारिक संख्या नहीं है जिन्होंने कठिन परिस्थितियों से निकलकर सफलता हासिल की हो। दरअसल ऐसी कहानियां हजारों में हैं और बहुत सी महिलाएं अपने गांव, कस्बे या परिवार की सीमाओं में रहकर ही संघर्ष करती रहती हैं।
हर कविता की कहानी अखबार की सुर्खी नहीं बनती।
हर अरुणिमा की कहानी दुनिया तक नहीं पहुंचती।
हर कमल कुंभार को पुरस्कार नहीं मिलता।
लेकिन उनकी कोशिशें समाज को धीरे-धीरे बदलती रहती हैं।
किसी मां की सुबह चार बजे की दौड़, किसी लड़की की किताबों के लिए संघर्ष, किसी महिला की छोटी दुकान, किसी मजदूर बेटी की प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी—ये सभी उसी बड़े बदलाव की कहानियां हैं।
और शायद इसी वजह से कविता महतो की नंगे पैर दौड़ती तस्वीर हमें सिर्फ एक महिला का संघर्ष नहीं दिखाती, बल्कि उन लाखों भारतीय महिलाओं की तस्वीर दिखाती है जो आज भी कह रही हैं।



