भारत के हर कोने सेभारत दर्शन - Local यात्रा

भगवान विश्वकर्मा के इन मंदिरों की कहानी है खास, कहीं 1930 में बनी प्रतिमा तो कहीं कामाख्या की पहाड़ी के नीचे विराजते हैं देवशिल्पी

काशी में कारीगरों की आस्था से जुड़ा विश्वकर्मा मंदिर

भारत में भगवान विश्वकर्मा को देवताओं का शिल्पकार, वास्तुकार और निर्माण कला का देवता माना जाता है। देशभर में विश्वकर्मा पूजा बड़े स्तर पर मनाई जाती है। कारखानों से लेकर वर्कशॉप, दुकानों और निर्माण स्थलों तक औजारों और मशीनों की पूजा होती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगवान विश्वकर्मा के स्वतंत्र मंदिर देश में बहुत कम हैं? गुवाहाटी से लेकर रांची, वाराणसी, जयपुर और दिल्ली तक ऐसे कई मंदिर हैं, जहां देवशिल्पी की नियमित पूजा होती है। इन मंदिरों का इतिहास और उनसे जुड़ी मान्यताएं काफी दिलचस्प हैं।

देवताओं के शिल्पकार हैं भगवान विश्वकर्मा

हिंदू धार्मिक परंपरा में भगवान विश्वकर्मा को देवताओं का वास्तुकार और शिल्पकार माना गया है। धार्मिक कथाओं में उनके द्वारा दिव्य भवनों, नगरों और अस्त्र-शस्त्रों के निर्माण का उल्लेख मिलता है।

इसी कारण विश्वकर्मा पूजा का संबंध सिर्फ मंदिरों से नहीं बल्कि औजार, मशीन, वाहन, कारखाने और निर्माण कार्य से भी जुड़ गया है।

हर साल विश्वकर्मा जयंती पर लाखों कारीगर और तकनीकी काम से जुड़े लोग अपने काम के साधनों की पूजा करते हैं।

गुवाहाटी का विश्वकर्मा मंदिर सबसे चर्चित

https://images.openai.com/static-rsc-4/jju8bqBem5MlcXayuevth6ZEseSdDKGFA4E3vEnhWN5CmM_UA18o7M0Eq6E1wfPrCR9XOFaMrATsLD7ZAKGpJqPEIxdreeRMswvc4ybhhnqV7ZvjYEG1l3mMPqTRkTdmPl47u1QNlwGmFHQIWkf0MttsH1sinozH3YNGWijRVpdZ65GKpBiOmWaWx5sA0I5x?purpose=fullsize

असम के गुवाहाटी में कामाख्या गेट के पास स्थित भगवान विश्वकर्मा का मंदिर देश के चर्चित विश्वकर्मा मंदिरों में शामिल है। यह नीलाचल पहाड़ी के नीचे स्थित है।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार मंदिर की स्थापना 1965 में कामाख्या मंदिर से जुड़े पुजारी भवकांत शर्मा ने महाबीर प्रसाद धीरासरिया के सहयोग से कराई थी। बाद में मंदिर का पुनर्निर्माण भी कराया गया।

मंदिर से जुड़ी स्थानीय मान्यता में इसके निर्माण के पीछे एक स्वप्न की कहानी भी बताई जाती है। हालांकि इसे ऐतिहासिक तथ्य के बजाय स्थानीय धार्मिक परंपरा के रूप में देखना चाहिए।

रांची में करीब एक सदी पुराना इतिहास

https://images.openai.com/static-rsc-4/mOom21hVCHM9Fy4EWlXigSAKl_bb4ZJeinUKxzCaLynthQT7snitbeLbA68SwpD-1N87AUUweW2VKSDudz6fq818iin3yA64gl9Wum4qABo4UcfciWciQ3lnV3sSdm_Qi1grKrIYjDphhc9i8n6VWEcIKM4DCkOzLFgFRp44QByTrpQbsKgXzCCsRTDRuII1?purpose=fullsize

झारखंड की राजधानी रांची का विश्वकर्मा मंदिर भी खास है। यह विश्वकर्मा लेन क्षेत्र में स्थित है।

उपलब्ध विवरण के अनुसार 1928 में संत मौनी बाबा यहां भगवान विश्वकर्मा की तस्वीर रखकर पूजा करते थे। इसके बाद 1930 में विश्वकर्मा समाज की ओर से मंदिर का निर्माण कराया गया और प्रतिमा स्थापित की गई।

विश्वकर्मा पूजा के दौरान यहां कारीगरों और व्यवसायियों की विशेष भीड़ होती है। वाहन और मशीनों की पूजा भी की जाती है।

यानी इस मंदिर का इतिहास केवल धार्मिक आस्था से नहीं, बल्कि स्थानीय कारीगर समुदाय के सामाजिक जुड़ाव से भी जुड़ा है।

वाराणसी के मंदिरों में दिखती है कारीगरी की परंपरा

काशी सदियों से शिल्प और कारीगरी का बड़ा केंद्र रही है। बनारसी साड़ी, लकड़ी का काम, धातु शिल्प और दूसरी हस्तकलाओं के कारण यहां विश्वकर्मा आराधना का विशेष महत्व दिखाई देता है।

वाराणसी के बुरापुर में बाबा विश्वकर्मा मंदिर का उल्लेख मिलता है। इसके अलावा गोसाईपुर मोहांव में भी प्राचीन विश्वकर्मा मंदिर है।

गोसाईपुर मोहांव मंदिर के विकास और सुंदरीकरण के लिए पर्यटन विभाग की ओर से करीब 89 लाख रुपये की परियोजना है।

जयपुर में स्थापत्य परंपरा से जुड़ा मंदिर

राजस्थान की राजधानी जयपुर अपनी स्थापत्य कला और नियोजित नगर संरचना के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। इसी शहर के घाट की गूणी क्षेत्र में भगवान विश्वकर्मा का मंदिर है।

मंदिर और इसके आसपास की पुरानी संरचनाएं जयपुर की शिल्प परंपरा से जुड़ी मानी जाती हैं।

यहां भगवान विश्वकर्मा की पूजा उस परंपरा की याद दिलाती है जिसमें भवन निर्माण और शिल्प को केवल रोजगार नहीं बल्कि एक कला माना जाता था।

दिल्ली के पहाड़गंज में भी विराजते हैं देवशिल्पी

https://images.openai.com/static-rsc-4/WAYSM7vvDmApVupN41ffHIvgyWxGMcqQXtoukm4807-IwO3Dvq-S7BncXuHzSmsP8VXIaQpGKahJ4uNsKxOXBqgtWNQIAK7kQFBnS06WzQFSYs4_enNjD1SkSkWn9akDCubP1xrGY9PuZrWb8cIGUabbxjVzluF6Ovxvq8BVroMlTk-66L0x8fmNMtaNXKmJ?purpose=fullsize

राजधानी दिल्ली के पहाड़गंज में भी भगवान विश्वकर्मा का मंदिर है। यहां विश्वकर्मा जयंती विशेष उत्साह के साथ मनाई जाती है।

मंदिर से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं में विश्वकर्मा के वास्तु कौशल और पौराणिक नगरों के निर्माण की कथाएं सुनाई जाती हैं।

यह मंदिर खास तौर पर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दिल्ली जैसे महानगर में अलग-अलग राज्यों से आए कारीगर और तकनीकी कामगार भी विश्वकर्मा पूजा से जुड़े हुए हैं।

बिहार के मेहदार में शिव और विश्वकर्मा का साथ

बिहार के सिवान जिले के मेहदार गांव में भगवान शिव और विश्वकर्मा से जुड़ा मंदिर है। जिला प्रशासन की पर्यटन जानकारी में भी इस धार्मिक स्थल का उल्लेख मिलता है।

यहां शिवरात्रि के साथ विश्वकर्मा पूजा का भी महत्व है।

इस तरह के मंदिर इस बात की ओर संकेत करते हैं कि कई जगह विश्वकर्मा आराधना किसी एक अलग मंदिर तक सीमित न रहकर दूसरे प्रमुख धार्मिक स्थलों की परंपरा में भी शामिल हो गई।

महाराष्ट्र के गोंदिया में कारीगरों की आस्था

महाराष्ट्र के गोंदिया में भी भगवान विश्वकर्मा का मंदिर है। यहां विश्वकर्मा को दिव्य शिल्पकार और वास्तुकार के रूप में पूजा जाता है।

मंदिर की परंपरा विशेष रूप से बढ़ई और लकड़ी के काम से जुड़े कारीगरों की आस्था से जुड़ी बताई जाती है।

विश्वकर्मा पूजा के दौरान औजारों की सफाई और उनकी पूजा इस परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा होती है।

जोधपुर में भी है विश्वकर्मा मंदिर

जोधपुर के पाल रोड और कुड़ी भगतासनी हाउसिंग बोर्ड क्षेत्र में भगवान विश्वकर्मा मंदिर का उल्लेख मिलता है।

हालांकि इस मंदिर की प्राचीनता और स्थापना से जुड़े विस्तृत ऐतिहासिक दस्तावेज आसानी से उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए इसे बहुत प्राचीन मंदिर बताने के बजाय स्थानीय विश्वकर्मा आराधना का प्रमुख केंद्र कहना ज्यादा उचित होगा।

मंदिर कम, कार्यस्थल ज्यादा बने पूजा के केंद्र

भगवान विश्वकर्मा की पूजा की सबसे बड़ी खासियत यही है कि उनके लिए मंदिर बनना जरूरी नहीं माना जाता।

देश के हजारों कारखानों, वर्कशॉप और दुकानों में विश्वकर्मा जयंती पर मशीनों और औजारों की पूजा की जाती है। कहीं मोटर, मशीन और वाहन सजाए जाते हैं तो कहीं हथौड़ा, आरी, ड्रिल और दूसरे उपकरणों को पूजा जाता है।

यानी कारीगर का कार्यस्थल ही कई बार विश्वकर्मा का मंदिर बन जाता है।

आखिर विश्वकर्मा पूजा इतनी खास क्यों?

विश्वकर्मा पूजा भारत में धर्म और श्रम के बीच एक अनोड़ा संबंध दिखाती है। इसमें काम करने वाले हाथों और काम के औजारों दोनों को सम्मान दिया जाता है।

एक तरफ भगवान विश्वकर्मा को दिव्य निर्माणकर्ता माना जाता है, तो दूसरी तरफ आज का कारीगर अपने औजारों को उनकी कृपा का माध्यम मानकर पूजा करता है।

इसी वजह से विश्वकर्मा पूजा सिर्फ धार्मिक पर्व नहीं बल्कि श्रम, हुनर, तकनीक और निर्माण की संस्कृति का पर्व भी बन गई है।

सबसे रोचक तथ्य

भारत में भगवान विश्वकर्मा को मानने वालों की संख्या बहुत बड़ी है, लेकिन उनके स्वतंत्र मंदिर तुलनात्मक रूप से कम हैं। इसकी वजह यह भी है कि विश्वकर्मा आराधना लंबे समय से घर, दुकान, कारखाने और कार्यस्थल तक फैली रही है।

इसलिए यदि भारत के विश्वकर्मा मंदिरों की तलाश की जाए तो उनकी कहानी केवल मंदिरों की सूची नहीं, बल्कि देश की कारीगरी और निर्माण परंपरा की कहानी भी बन जाती है।


जमुना दयाल

जमुना दयाल वाराणसी के निवासी हैं और उन्हें हिंदी समाचार मीडिया में 10 से अधिक वर्षों का गहन रिपोर्टिंग अनुभव है। उन्होंने अमर उजाला और दैनिक जागरण जैसे देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में जिला रिपोर्टर के रूप में कार्य करते हुए खेल, शिक्षा, राजनीति, कृषि तथा सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता से कवर किया है। शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से जनसंचार में परास्नातक (MJMC) की डिग्री प्राप्त की है और यूजीसी नेट (UGC NET) परीक्षा उत्तीर्ण की है।

Related Articles

Back to top button