नाग पंचमी पर सजता है सांपों का अनोखा मेला, जहां नदियों की गहराई से जहरीले नागों को नंगे हाथ पकड़ते हैं भगत
नदियों में उतरते हैं भगत, नंगे हाथों से पकड़ते हैं सांप
बिहार के समस्तीपुर जिले के सिंघिया प्रखंड का केवलस्थान गांव नाग पंचमी के दिन एक ऐसी परंपरा का साक्षी बनता है, जिसे देखकर रोमांच और आश्चर्य दोनों का अनुभव होता है। यहां लगने वाला ‘सांपों का मेला’ मिथिलांचल की लोक आस्था, साहस और नाग पूजा की पुरानी परंपरा से जुड़ा माना जाता है।
नाग पंचमी की सुबह स्थानीय भगत और साधक बागमती व करेह नदी तथा आसपास के पोखरों में उतरते हैं। पानी की गहराई में जाकर वे सांपों की तलाश करते हैं और कई बार नंगे हाथों से उन्हें पकड़कर बाहर लाते हैं। स्थानीय परंपरा में गेहूंअन यानी कोबरा, धामन समेत विभिन्न प्रकार के सांपों का उल्लेख मिलता है।
नदी और पोखरों से सांपों को पकड़कर बाहर लाने का यह दृश्य मेले का सबसे रोमांचकारी हिस्सा माना जाता है।
गले में सांप, हाथों में नाग और ढोल की थाप

सांपों को पकड़ने के बाद उन्हें केवलस्थान स्थित ऐतिहासिक भगवती स्थान यानी माँ विषहरी मंदिर ले जाया जाता है। यहां पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं।
इसके बाद भगत सांपों को हाथों में उठाकर, गले में लपेटकर अथवा सिर पर रखकर शोभायात्रा निकालते हैं। ढोल-ढाक की थाप और लोकगीतों के बीच निकलने वाली इस यात्रा को देखने के लिए आसपास के गांवों के अलावा दूर-दराज से भी लोग पहुंचते हैं।
स्थानीय आस्था है कि माँ विषहरी के आशीर्वाद से इस परंपरा में शामिल भगतों और श्रद्धालुओं को सांप नुकसान नहीं पहुंचाते। हालांकि यह धार्मिक मान्यता है, वैज्ञानिक रूप से जहरीले सांपों को नंगे हाथों से पकड़ना अत्यंत जोखिमपूर्ण है।
पूजा के बाद सांपों को फिर प्रकृति की गोद में छोड़ने की परंपरा

इस मेले की एक महत्वपूर्ण विशेषता सांपों को नुकसान न पहुंचाने की परंपरा बताई जाती है। पूजा और अनुष्ठान समाप्त होने के बाद शाम को पकड़े गए सांपों को वापस नदी, जंगल या उनके प्राकृतिक आवास में छोड़ दिया जाता है।
इसी वजह से इस परंपरा को केवल धार्मिक आयोजन के बजाय मानव और वन्यजीव के बीच सह-अस्तित्व की लोकधारणा से जोड़कर भी देखा जाता है।
हालांकि वन्यजीव संरक्षण के आधुनिक नियमों के लिहाज से सांपों को पकड़ना, रखना या प्रदर्शित करना विशेषज्ञों और संबंधित विभाग की निगरानी में ही होना चाहिए। खासकर जहरीले सांपों के साथ किसी भी तरह का प्रत्यक्ष संपर्क गंभीर खतरा पैदा कर सकता है।
कौन हैं माँ विषहरी?
मिथिलांचल और अंग क्षेत्र में नाग पूजा के साथ माँ विषहरी की आराधना की गहरी लोक परंपरा रही है। कई लोकमान्यताओं में उन्हें मनसा देवी के रूप में भी देखा जाता है। ‘विषहरी’ नाम का लोक अर्थ ही विष को हरने वाली देवी से जुड़ा है।
लोककथाओं में माँ विषहरी को नागों और विषैले जीवों से संबंधित देवी माना जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों में उनके स्वरूप, उत्पत्ति और उनसे जुड़ी कथाओं में कुछ भिन्नताएं भी मिलती हैं।
मिथिलांचल की लोकपरंपरा में विषहरी की पूजा के साथ नागकुल, नाग-नागिन और प्रकृति की शक्तियों को सम्मान देने की भावना दिखाई देती है।
बिहुला-लखिंदर की कहानी से जुड़ी है आस्था
माँ विषहरी की पूजा का सबसे लोकप्रिय लोक आख्यान बिहुला-लखिंदर की कथा है। मिथिला और अंग क्षेत्र की लोकसंस्कृति में यह कहानी पीढ़ियों से सुनाई जाती रही है।
लोकगाथा के अनुसार चांद सौदागर भगवान शिव के भक्त थे और माँ विषहरी की पूजा स्वीकार नहीं करते थे। इसी विरोध से कथा में संघर्ष पैदा होता है। उनके पुत्र लखिंदर के विवाह के बाद सर्पदंश की घटना होती है।
कथा के अनुसार नवविवाहिता बिहुला अपने मृत पति लखिंदर के शव को नाव पर लेकर देवताओं की ओर निकल पड़ती हैं। अपनी अटूट निष्ठा, तप और भक्ति से वह देवताओं को प्रसन्न करती हैं और अंततः लखिंदर समेत परिवार के अन्य सदस्यों को जीवन वापस मिलने की लोकमान्यता है।
इसी कथा को कई क्षेत्रों में माँ विषहरी की महिमा और नाग पूजा की स्थापना से जोड़ा जाता है।
मधुश्रावणी में भी दिखती है नाग पूजा की झलक
मिथिलांचल में नाग पूजा केवल नाग पंचमी तक सीमित नहीं है। सावन के महीने में मनाया जाने वाला मधुश्रावणी पर्व भी नाग और विषहरी की लोक आस्था से जुड़ा है।
इस दौरान नवविवाहित महिलाएं कई दिनों तक चलने वाले व्रत और पूजा-अनुष्ठान करती हैं। मिट्टी और गोबर से नाग-नागिन तथा विषहरी की आकृतियां बनाई जाती हैं। इनके सामने पूजा की जाती है और लोककथाएं सुनी जाती हैं।
इससे पता चलता है कि इस क्षेत्र में नाग पूजा धार्मिक आस्था के साथ-साथ महिलाओं की लोक-संस्कृति, पारिवारिक परंपरा और मौखिक कथाओं का भी हिस्सा रही है।
नदियों की धरती ने नागों को दिया विशेष स्थान
मिथिलांचल का भूगोल भी नाग पूजा की इस परंपरा को समझने में महत्वपूर्ण है। बागमती, कमला-बलान, कोसी जैसी नदियों और मानसूनी जलजमाव वाले इलाकों में प्राचीन समय से ही मनुष्य और सर्प का आमना-सामना होता रहा है।
बरसात में जब पानी सांपों के बिलों तक पहुंचता है तो वे सुरक्षित स्थानों की तलाश में बाहर निकलते हैं। ऐसे प्राकृतिक वातावरण में सर्पदंश का खतरा भी रहा होगा। संभवतः इसी सामाजिक और पर्यावरणीय परिस्थिति ने समय के साथ सांपों के प्रति भय के साथ सम्मान और सह-अस्तित्व की भावना को जन्म दिया।
नाग पूजा इसी सांस्कृतिक सोच का धार्मिक रूप भी मानी जाती है।
आस्था, रोमांच और संरक्षण—तीनों का संगम
केवलस्थान का सांपों का मेला आज भी लोक आस्था और रोमांच का अनूठा संगम दिखाई देता है। नदी में उतरकर सांप पकड़ने वाले भगत, मंदिर में होने वाली पूजा, नागों के साथ निकाली जाने वाली शोभायात्रा और अंत में उन्हें प्रकृति में छोड़ने की परंपरा इस आयोजन को विशिष्ट बनाती है।
हालांकि बदलते समय में ऐसी परंपराओं के साथ वन्यजीव संरक्षण और मानव सुरक्षा को जोड़ना भी जरूरी है। सांपों को पकड़ने या उनके साथ प्रदर्शन करने की प्रक्रिया में प्रशिक्षित विशेषज्ञों और वन विभाग के दिशा-निर्देशों का पालन किया जाना चाहिए।
दरअसल, इस मेले की सबसे बड़ी कहानी केवल सांपों को पकड़ने का साहस नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही उस लोकचेतना की है जिसमें इंसान ने प्रकृति के एक खतरनाक जीव को भी देवी और संरक्षक के रूप में सम्मान दिया।
डिस्क्लेमर: माँ विषहरी, बिहुला-लखिंदर और मेले से जुड़ी कई बातें स्थानीय लोकविश्वास और परंपराओं पर आधारित हैं। इनके विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग रूप और कथाएं प्रचलित हैं। जहरीले सांपों को पकड़ना या उनके साथ प्रत्यक्ष प्रदर्शन करना बेहद जोखिमपूर्ण है और इसे विशेषज्ञों की निगरानी तथा लागू वन्यजीव नियमों के अनुरूप ही देखा जाना चाहिए।



