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समुद्र में समा गए तमिल सभ्यता के शहर! कदलगोलम की कहानियां आज भी खोलती हैं हजारों साल पुराने रहस्य

कभी दक्षिण भारत के तट पर बसे थे समृद्ध नगर, फिर समुद्र बढ़ता गया और पीछे रह गईं सिर्फ कहानियां, पुरातात्विक अवशेष और रहस्य

समुद्र की लहरें जितनी खूबसूरत दिखाई देती हैं, उनका इतिहास उतना ही रहस्यमय है। दुनिया की कई प्राचीन सभ्यताएं नदियों और समुद्र के किनारे विकसित हुईं। समुद्र ने उन्हें व्यापार, समृद्धि और दूसरे देशों से संपर्क का रास्ता दिया, लेकिन कई बार यही समुद्र विनाश का कारण भी बना।

दक्षिण भारत के तमिल क्षेत्र में ऐसी ही कई परंपराएं सदियों से चली आ रही हैं। तमिल साहित्य में समुद्र के अतिक्रमण और नगरों के विनाश से जुड़ी कथाओं को ‘कदलगोलम’ यानी समुद्र द्वारा निगल लिए जाने की परंपरा से जोड़ा जाता है। इनमें कुछ कथाएं धार्मिक और साहित्यिक परंपरा का हिस्सा हैं, जबकि पूम्पुहार के मामले में समुद्र के नीचे मिले पुरातात्विक अवशेष इस कहानी को और दिलचस्प बना देते हैं।

कुमारी कंडम… क्या सचमुच समुद्र में डूब गया था विशाल भूभाग?

पूम्पुहार के तट से लगभग 30 मीटर गहराई में संरचनात्मक अवशेषों की पहचान की गई थी और आसपास के समुद्री क्षेत्र में पत्थर की चिनाई के अवशेष भी मिले हैं। स्रोत-तमिलनाडु पुरातत्व विभाग

तमिल सांस्कृतिक परंपरा में कुमारी कंडम का नाम बेहद महत्वपूर्ण है। इसे कन्याकुमारी के दक्षिण में स्थित एक विशाल भूभाग के रूप में बताया जाता है, जिसके समुद्र में समा जाने की कथा तमिल समाज की सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा बन चुकी है।

कथाओं में इस भूभाग से पहरूली नदी और कुमारी पर्वत का भी संबंध बताया जाता है। कई लोकप्रिय आख्यान इसे तमिल भाषा और सभ्यता की प्राचीन जन्मभूमि के रूप में देखते हैं।

लेकिन यहां इतिहास और परंपरा के बीच अंतर समझना जरूरी है। आधुनिक भूविज्ञान ने कुमारी कंडम को किसी विशाल डूबे हुए महाद्वीप के रूप में प्रमाणित नहीं किया है। समुद्र के नीचे भूभागों के डूबने, समुद्र-स्तर में बदलाव और तटीय परिवर्तन जैसी प्राकृतिक प्रक्रियाएं वास्तविक हैं, लेकिन उनसे कुमारी कंडम की पूरी पारंपरिक कथा को ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित नहीं किया जा सकता। तमिलनाडु की समुद्री पुरातत्व परंपरा भी कुमारी कंडम की कथा को एक ऐसी सांस्कृतिक परंपरा के रूप में देखती है, जिसकी ऐतिहासिक जड़ों को पूरी तरह प्रमाणित करना कठिन है।

डूबती राजधानियों की कहानी और तमिल संगम परंपरा

तमिल साहित्यिक परंपरा में पांड्य राजाओं और प्राचीन तमिल संगमों से जुड़ी ऐसी कथाएं मिलती हैं, जिनमें समुद्र के कारण पुराने नगरों के नष्ट होने का उल्लेख है।

दक्षिण मदुरै (Tenmadurai) को परंपरा में पांड्य राजाओं की प्राचीन राजधानी और प्रथम तमिल संगम का केंद्र बताया जाता है। कहा जाता है कि समुद्री आपदा के बाद यह नगर नष्ट हो गया और इसके साथ उस दौर की साहित्यिक सामग्री भी खो गई।

इसके बाद कपाटपुरम (Kapatapuram) को दूसरी राजधानी और दूसरे तमिल संगम का केंद्र बताया जाता है। परंपरा के अनुसार यह नगर भी समुद्र की चपेट में आ गया।

हालांकि इन दोनों नगरों और उनसे जुड़े संगमों की कथाओं को आधुनिक इतिहास में उसी तरह प्रमाणित नहीं माना जाता, जिस तरह किसी पुरातात्विक स्थल को माना जाता है। इसलिए इन्हें तमिल साहित्यिक और सांस्कृतिक परंपरा के संदर्भ में देखना ज्यादा उचित है।

पूम्पुहार: जहां साहित्य और समुद्री पुरातत्व एक-दूसरे से जुड़ते हैं

पूम्पुहार का समुद्र तट।

कदलगोलम की कहानियों में सबसे दिलचस्प नाम पूम्पुहार का है। प्राचीन ग्रंथों में इसे कावेरीपूम्पट्टिनम या पुहार के नाम से भी जाना जाता है।

आज पूम्पुहार तमिलनाडु के मयिलादुथुराई जिले में कावेरी नदी के समुद्र में मिलने वाले क्षेत्र के पास स्थित है। तमिलनाडु सरकार के अनुसार यह प्राचीन काल में एक महत्वपूर्ण बंदरगाह नगर और प्रारंभिक चोलों की राजधानी रहा था।

संगम साहित्य और बाद के तमिल महाकाव्यों में पूम्पुहार की समृद्धि, बाजारों, व्यापारियों और समुद्री व्यापार का विस्तृत चित्र मिलता है। समुद्र के किनारे स्थित यह नगर दक्षिण भारत के समुद्री व्यापार नेटवर्क का महत्वपूर्ण केंद्र रहा।

पुरातात्विक और ऐतिहासिक अध्ययनों में भी पूम्पुहार को एक महत्वपूर्ण प्राचीन बंदरगाह के रूप में दर्ज किया गया है। समुद्री पुरातत्व विशेषज्ञों ने तमिलनाडु के तट पर इसके आसपास पानी के भीतर संरचनाओं और अन्य अवशेषों की खोज की है।

मणिमेकलै में दर्ज है समुद्र में डूबने की कहानी

पूम्पुहार की कहानी को रहस्यमयी बनाने वाला सबसे महत्वपूर्ण स्रोत तमिल महाकाव्य ‘मणिमेकलै’ है।

कथा के अनुसार राजा द्वारा इंद्र के सम्मान में होने वाला वार्षिक उत्सव आयोजित नहीं किया गया। इससे समुद्र से जुड़ी देवी मणिमेकला के क्रोध और नगर के समुद्र में समा जाने की कहानी सामने आती है।

यह कहानी धार्मिक-साहित्यिक परंपरा का हिस्सा है। समुद्री पुरातत्व विशेषज्ञों ने भी इस साहित्यिक परंपरा और वास्तविक तटीय बदलाव के बीच संभावित संबंधों पर विचार किया है। शोध में समुद्री कटाव, तटरेखा में बदलाव और समुद्री आपदाओं जैसी प्राकृतिक प्रक्रियाओं को संभावित कारणों के रूप में देखा गया है।

यानी यह कहना अधिक सही होगा कि मणिमेकलै ने एक साहित्यिक कथा दर्ज की, जबकि पुरातत्व ने पूम्पुहार क्षेत्र में समुद्र के नीचे मानव गतिविधियों के प्रमाण तलाशे। दोनों को जोड़कर निश्चित रूप से यह कहना कि किसी एक सुनामी ने पूरा शहर एक ही दिन में निगल लिया।

समुद्र के नीचे मिले प्राचीन अवशेष

पूम्पुहार में समुद्री पुरातत्व का काम इस पूरी कहानी को खास बनाता है। राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान से जुड़े शोधकर्ताओं की समुद्री खोजों में तट के पास पानी के भीतर संरचनाओं और प्राचीन गतिविधियों से जुड़े प्रमाणों का उल्लेख मिलता है। शोध का उद्देश्य यह समझना रहा है कि प्राचीन तटरेखा कहां थी और समय के साथ उसमें कितना बदलाव आया।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से संबंधित पुरातात्विक समीक्षा में भी पूम्पुहार क्षेत्र में तटीय और समुद्री खोजों का उल्लेख है। वहां पत्थर, अर्ध-कीमती पत्थरों के टुकड़े, मृद्भांड और अन्य पुरावशेषों की खोज दर्ज की गई है।

एक पुरातात्विक समीक्षा में यह भी दर्ज है कि समुद्री कटाव के कारण आधुनिक पूम्पुहार क्षेत्र की तटरेखा में बदलाव हुआ और समुद्र ने तटीय भूभाग को नुकसान पहुंचाया।

समुद्र के नीचे छिपा है व्यापारिक तमिलनाडु का इतिहास

पूम्पुहार की सबसे बड़ी खासियत सिर्फ उसकी डूबने की कहानी नहीं है। यह स्थल उस दौर की समुद्री दुनिया की तस्वीर भी सामने लाता है।

संगम साहित्य में दक्षिण भारत के समुद्री व्यापार, विदेशी व्यापारियों और बंदरगाहों का उल्लेख मिलता है। शोधकर्ताओं के अनुसार कावेरीपूम्पट्टिनम का समुद्री व्यापार दक्षिण-पूर्व एशिया तक संपर्क रखने वाले नेटवर्क का हिस्सा था।

यानी समुद्र के नीचे दबे अवशेष सिर्फ किसी खोए हुए शहर की कहानी नहीं कहते, बल्कि वे यह भी बताते हैं कि प्राचीन तमिल समाज समुद्री व्यापार, शिल्प और अंतरराष्ट्रीय संपर्कों से कितना जुड़ा हुआ था।

महाबलीपुरम की ‘सात पैगोडा’ वाली परंपरा भी रहस्य बढ़ाती है

महाबलीपुरम का समुद्र तट।

तमिलनाडु के तट पर एक और लोकप्रिय परंपरा महाबलीपुरम के ‘सेवन पैगोडाज’ यानी सात मंदिरों की है। यूरोपीय यात्रियों के पुराने विवरणों में भी समुद्र में मंदिरों के डूबने की स्थानीय परंपरा का उल्लेख मिलता है।

हालांकि इसके बारे में भी सावधानी जरूरी है। समुद्र में कई मंदिरों के पूरी तरह डूब जाने की लोकप्रिय कहानी को प्रमाणित पुरातात्विक तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा। समुद्री पुरातत्व ने महाबलीपुरम क्षेत्र में भी तटीय और जलमग्न संरचनाओं से जुड़े अध्ययन किए हैं, लेकिन लोककथा और प्रमाणित इतिहास के बीच अंतर बना रहता है।

शायद यही वजह है कि कदलगोलम की कहानियां आज भी लोगों को आकर्षित करती हैं। समुद्र ने कितना निगला, कब निगला और किस कारण निगला—इन सवालों के सभी जवाब अभी हमारे पास नहीं हैं। लेकिन समुद्र के नीचे मिले अवशेष इतना जरूर बताते हैं कि दक्षिण भारत का तट कभी एक बेहद सक्रिय और समृद्ध समुद्री दुनिया का हिस्सा था।

आज जब पूम्पुहार के किनारे लहरें आती-जाती हैं, तो वे सिर्फ वर्तमान का समुद्र नहीं हैं। उनके नीचे कहीं प्राचीन व्यापार, नगर, लोगों की जिंदगी और हजारों साल पुरानी तमिल सभ्यता की स्मृतियां भी छिपी हैं।

जमुना दयाल

जमुना दयाल वाराणसी के निवासी हैं और उन्हें हिंदी समाचार मीडिया में 10 से अधिक वर्षों का गहन रिपोर्टिंग अनुभव है। उन्होंने अमर उजाला और दैनिक जागरण जैसे देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में जिला रिपोर्टर के रूप में कार्य करते हुए खेल, शिक्षा, राजनीति, कृषि तथा सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता से कवर किया है। शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से जनसंचार में परास्नातक (MJMC) की डिग्री प्राप्त की है और यूजीसी नेट (UGC NET) परीक्षा उत्तीर्ण की है।

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