समुद्र से निकलते हैं ये अनोखे भारतीय खाद्य पदार्थ, कुछ के नाम सुनकर चौंक जाएंगे
कक्का यानी क्लैम: समुद्र से निकलकर पहुंचता है मसालों की कड़ाही तक

भारत की पहचान सिर्फ मसालों और शाकाहारी व्यंजनों से नहीं है। देश की लंबी समुद्री पट्टी ने यहां एक ऐसी खाद्य संस्कृति भी विकसित की है, जिसमें मछली, झींगा, केकड़ा, सीप, सूखी मछली और समुद्री शैवाल तक का इस्तेमाल होता है। खास बात यह है कि समुद्र से मिलने वाली एक ही चीज अलग-अलग राज्यों में बिल्कुल अलग स्वाद और अंदाज में पकाई जाती है।
गोवा में नारियल और मसालों का मेल दिखता है, केरल में केले के पत्ते और नारियल का इस्तेमाल होता है, महाराष्ट्र में कोली समुदाय की पारंपरिक शैली नजर आती है तो ओडिशा और बंगाल में सरसों और सूखी मछली का स्वाद प्रमुख है। लक्षद्वीप में टूना मछली स्थानीय खानपान की अहम पहचान है।
1. करिमीन पोल्लिचाथु—केले के पत्ते में पकती है मछली

केरल का करिमीन पोल्लिचाथु समुद्री और तटीय खानपान की अनोखी पहचान है। इसमें करिमीन यानी पर्ल स्पॉट मछली को मसालों में मेरिनेट किया जाता है। इसके बाद इसे केले के पत्ते में लपेटकर पकाया या ग्रिल किया जाता है। केले के पत्ते की खुशबू मछली के स्वाद में अलग रंग जोड़ देती है।
केरल पर्यटन की सूची में भी करिमीन पोल्लिचाथु, करिमीन मप्पास और कई अन्य स्थानीय समुद्री व्यंजन शामिल हैं।
2. बॉम्बिल—नाम में डक, लेकिन है मछली

मुंबई और महाराष्ट्र के तटीय इलाकों में मिलने वाली बॉम्बिल को अंग्रेजी में Bombay Duck कहा जाता है। नाम सुनकर लगता है कि यह किसी पक्षी का मांस होगा, लेकिन वास्तव में यह समुद्री मछली है।
इसे मसाले और बेसन के घोल में लपेटकर तला जाता है। बाहर से कुरकुरा और अंदर से नरम बॉम्बिल फ्राई मुंबई की कोली खाद्य परंपरा का हिस्सा है। महाराष्ट्र पर्यटन भी बॉम्बिल फ्राई को स्थानीय समुद्री खानपान की खासियतों में गिनता है।
3. नेथिली—छोटी मछली, बड़ा स्वाद
तमिलनाडु और केरल के तटीय इलाकों में नेथिली यानी एंकोवी का इस्तेमाल कई तरह से होता है। इसे मसालों में मिलाकर तला जाता है। इसका एक लोकप्रिय रूप नेथिली 65 है।
छोटी समुद्री मछली होने के कारण इसे कुरकुरा बनाकर स्नैक की तरह भी खाया जाता है। दक्षिण भारतीय खानपान में छोटी मछलियों का इस्तेमाल सिर्फ स्वाद के लिए नहीं, बल्कि पारंपरिक भोजन का हिस्सा होने के कारण भी महत्वपूर्ण है।
4. गोवा का किल्मुर और सूखी मछली का स्वाद
गोवा में समुद्री भोजन केवल ताजी मछली तक सीमित नहीं है। यहां सूखी मछली और सूखे झींगे से भी कई पारंपरिक व्यंजन बनते हैं। किल्मुर यानी किल्मुर/किस्मूर जैसी तैयारियों में सूखी मछली या झींगे के साथ नारियल और मसालों का इस्तेमाल किया जाता है।
गोवा में सूखी मैकेरल से बनने वाली करी में नारियल, सूखी लाल मिर्च, इमली और स्थानीय मसालों का इस्तेमाल भी मिलता है।
5. क्रैब जकुती—केकड़े में गोवा के मसालों का स्वाद
क्रैब जकुती गोवा की उन तैयारियों में शामिल है जिसमें समुद्री भोजन और स्थानीय मसालों का जबरदस्त मेल दिखाई देता है। केकड़े को भुने मसालों के साथ पकाया जाता है। नारियल और मसालों की खुशबू इसे अलग पहचान देती है।
गोवा पर्यटन की आधिकारिक वेबसाइट भी क्रैब जकुती को पारंपरिक गोअन व्यंजनों में शामिल करती है। देश के अलग-अलग तटीय इलाकों में केकड़े की करी का स्वाद भी अलग मिलता है।
6. झींगे का बालचाओ—लंबे समय तक सुरक्षित रखने की परंपरा
गोवा का प्रॉन बालचाओ झींगे से बनने वाली एक खास तैयारी है। इसमें झींगे को मसालों और सिरके के साथ पकाया जाता है। इसका स्वाद खट्टा, तीखा और मसालेदार होता है।
इस तरह की तैयारियां उस दौर की खाद्य परंपराओं को भी दिखाती हैं, जब समुद्री भोजन को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए नमक, मसाले और सिरके जैसे साधनों का इस्तेमाल किया जाता था। गोवा के खानपान में समुद्र और मसालों के व्यापार का प्रभाव भी दिखाई देता है।
7. केरल की सूखी झींगा चटनी
केरल में सूखे झींगे को नारियल, लाल मिर्च, छोटे प्याज, अदरक, करी पत्ते और इमली के साथ पीसकर चटनी या चटनी पाउडर जैसा रूप दिया जाता है। इसे चावल के साथ खाया जाता है।
इस व्यंजन की खासियत यह है कि ताजा समुद्री भोजन उपलब्ध न होने पर सूखे झींगे का इस्तेमाल लंबे समय तक किया जा सकता है। केरल के पारंपरिक व्यंजनों में ड्राई प्रॉन्स और ड्राई फिश की कई तैयारियां दर्ज हैं।
8. ओडिशा का सुखुआ—धूप में सूखी मछली का अलग संसार
ओडिशा में सुखुआ यानी सूखी मछली लंबे समय से स्थानीय खानपान का हिस्सा है। छोटी मछलियों को सुखाकर बाद में अलग-अलग तरीकों से पकाया जाता है।
सुखुआ भजा में सूखी मछली को तलकर सरसों के पेस्ट, लहसुन, प्याज और मिर्च के साथ तैयार किया जाता है। इसे पखाला जैसे पारंपरिक भोजन के साथ भी खाया जाता है। सुखुआ की तेज खुशबू और अलग स्वाद इसे दूसरे समुद्री खाद्य से अलग बनाता है।
9. लक्षद्वीप का टूना—समुद्र पर टिकी पूरी खाद्य संस्कृति
लक्षद्वीप में टूना मछली स्थानीय भोजन की महत्वपूर्ण पहचान है। नारियल और समुद्री भोजन यहां के पारंपरिक खानपान में प्रमुख हैं।
लक्षद्वीप से जुड़े सरकारी दस्तावेज में मास रिहा को नारियल और स्थानीय मसालों से बनने वाली टूना करी के रूप में दर्ज किया गया है। मुस कवाब भी द्वीप की समुद्री खाद्य परंपरा का हिस्सा है।
टूना को सुखाकर भी सुरक्षित रखने की परंपरा मिलती है। इससे समुद्र से मिलने वाली मछली को बाद के दिनों के लिए बचाकर रखने में मदद मिलती थी।
10. क्लैम यानी सीप जैसा समुद्री भोजन
केरल में कक्का यानी क्लैम को भी भोजन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। इसे नारियल, करी पत्ते और मसालों के साथ पकाया जाता है।
केरल पर्यटन की पारंपरिक खाद्य सूची में कक्का उलर्थियाथु का उल्लेख मिलता है। यह बताता है कि तटीय भोजन में सिर्फ मछली और झींगे ही नहीं, बल्कि समुद्र और तटीय जलक्षेत्रों से मिलने वाले दूसरे जीव भी लंबे समय से भोजन का हिस्सा रहे हैं।
11. बंगाल की चिंगड़ी मलाई करी
बंगाल की चिंगड़ी मलाई करी झींगे और नारियल के दूध से बनने वाला प्रसिद्ध व्यंजन है। इसमें मसालों के साथ झींगे को पकाया जाता है और तैयार करी को आमतौर पर चावल के साथ खाया जाता है।
यह व्यंजन इस बात का अच्छा उदाहरण है कि समुद्री खाद्य को स्थानीय मसालों और उपलब्ध सामग्री के साथ जोड़कर किस तरह अलग क्षेत्रीय पहचान दी गई। बंगाल से लेकर गोवा और केरल तक झींगे की तैयारी का तरीका लगातार बदलता जाता है।
12. समुद्री शैवाल—अब भोजन की नई संभावनाएं
समुद्र से मिलने वाली खाद्य चीजों में समुद्री शैवाल यानी सीवीड सबसे अलग है। भारत में समुद्री शैवाल की कई प्रजातियां पाई जाती हैं और इनके खाद्य तथा पोषण संबंधी इस्तेमाल पर शोध हो रहा है।
एक वैज्ञानिक समीक्षा के अनुसार भारत में समुद्री शैवाल की लगभग 700 प्रजातियों की विविधता दर्ज की गई है, हालांकि सभी प्रजातियां खाद्य उपयोग के लिए उपयुक्त नहीं हैं और भारत में इनका व्यावसायिक खाद्य इस्तेमाल अभी सीमित है।
भारत सरकार ने भी समुद्री शैवाल को पोषण और समुद्री अर्थव्यवस्था की संभावनाओं से जोड़ते हुए इसके उत्पादन को बढ़ावा देने की बात कही है। इसलिए आने वाले समय में समुद्री शैवाल भारतीय भोजन में और अधिक दिखाई दे सकता है।
समुद्र से थाली तक पहुंचती है एक पूरी परंपरा
भारत के समुद्री खाद्य पदार्थों की सबसे दिलचस्प बात उनकी विविधता है। एक तरफ केरल में केले के पत्ते में मछली पकती है तो दूसरी तरफ ओडिशा में मछली को सुखाकर महीनों तक इस्तेमाल करने की परंपरा है। मुंबई में बॉम्बिल की अपनी पहचान है तो गोवा में केकड़े, झींगे और सूखी मछली मसालों के साथ अलग रूप लेते हैं। लक्षद्वीप में टूना स्थानीय जीवन का अहम हिस्सा है।
इन व्यंजनों की कहानी केवल स्वाद की नहीं है। इनके पीछे समुद्र, मौसम, मछली पकड़ने की परंपरा, स्थानीय मसाले और सदियों पुरानी खाद्य आदतें जुड़ी हैं। यही कारण है कि भारत का समुद्री भोजन एक जैसा नहीं, बल्कि हर तट पर अपनी अलग पहचान वाला दिखाई देता है।
नोट: समुद्री खाद्य पदार्थों की उपलब्धता मौसम, स्थानीय नियमों और संरक्षण संबंधी प्रावधानों पर निर्भर कर सकती है। सभी समुद्री जीव खाद्य नहीं होते और स्थानीय रूप से संरक्षित प्रजातियों के सेवन से बचना चाहिए।



