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स्टेशन मास्टर की अनोखी पाठशाला: वेतन और पेंशन से बच्चों को पढ़ाया, रेलवे स्टेशन को बना दिया स्कूल

मालगाड़ी के गार्ड की एक बात ने बदल दी जिंदगी, फिर 26 साल तक स्टेशन पर बच्चों को देते रहे मुफ्त शिक्षा

छत्तीसगढ़ के बालोद जिले का लाटाबोड़ रेलवे स्टेशन। यहां कभी ट्रेनों की आवाजाही के बीच एक ऐसी पाठशाला भी लगती थी, जहां न घंटी बजती थी, न कोई बड़ी इमारत थी और न ही बच्चों से फीस ली जाती थी। स्टेशन मास्टर बीपी राणा ने इसी रेलवे स्टेशन को गांव के बच्चों के लिए शिक्षा का केंद्र बना दिया था। उन्होंने बच्चों को गणित और अंग्रेजी पढ़ाई और पढ़ाई का सामान भी अपनी कमाई से उपलब्ध कराया।

पश्चिम बंगाल से छत्तीसगढ़ पहुंचे राणा

बीपी राणा

बीपी राणा मूल रूप से पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले के रहने वाले थे। वर्ष 1978 में रेलवे की नौकरी करते हुए वह छत्तीसगढ़ के बालोद जिले के लाटाबोड़ स्टेशन पहुंचे। रेलवे की नौकरी के सिलसिले में आए राणा धीरे-धीरे इस जगह से ऐसे जुड़े कि स्टेशन ही उनके जीवन के महत्वपूर्ण हिस्से का केंद्र बन गया।

स्टेशन पर उनकी ड्यूटी थी, लेकिन उनके लिए रेलवे की नौकरी केवल ट्रेनों के संचालन और यात्रियों की जिम्मेदारी तक सीमित नहीं रही।

उनके भीतर शिक्षक भी था और समाज के लिए कुछ करने की इच्छा भी।

मालगाड़ी के गार्ड की एक बात ने बदल दी सोच

एक दिन लाटाबोड़ स्टेशन पर एक मालगाड़ी आकर रुकी। ट्रेन के गार्ड ने कुछ समय राणा के साथ बातचीत की। बातचीत के दौरान गार्ड ने उनकी अंग्रेजी सुनी और उनसे कहा कि अगर उन्हें अंग्रेजी आती है तो इसका फायदा ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों को क्यों न दिया जाए।

राणा के लिए यह साधारण सलाह नहीं थी।

उन्होंने इसे गंभीरता से लिया और सोचा कि जिस ज्ञान को उन्होंने हासिल किया है, उसका इस्तेमाल अगर किसी बच्चे का भविष्य बदलने में हो सकता है तो इससे बेहतर काम और क्या होगा।

यही वह क्षण था जब रेलवे स्टेशन पर एक अलग तरह की पाठशाला की शुरुआत हुई।

पहले रेल कर्मचारियों के बच्चे बने विद्यार्थी

राणा ने शुरुआत में रेलवे कर्मचारियों के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। इसके बाद धीरे-धीरे गांव के बच्चे भी उनकी कक्षा में आने लगे।

वह बच्चों को गणित और अंग्रेजी पढ़ाते थे। खास बात यह थी कि इस पढ़ाई के लिए बच्चों से कोई शुल्क नहीं लिया जाता था।

स्टेशन पर ड्यूटी के बीच समय निकालकर बच्चों को पढ़ाना उनके लिए नियमित काम जैसा बन गया।

धीरे-धीरे बच्चों को भी इस कक्षा का फायदा दिखाई देने लगा।

बच्चों के अच्छे परिणाम ने बढ़ाया भरोसा

राणा की कक्षा में पढ़ने वाले बच्चों ने जब अपने स्कूलों में बेहतर परिणाम देना शुरू किया तो आसपास के गांवों में भी इसकी चर्चा होने लगी।

अब दूसरे गांवों के बच्चे भी उनके पास पढ़ने पहुंचने लगे।

इस तरह रेलवे स्टेशन पर शुरू हुई छोटी-सी कक्षा धीरे-धीरे आसपास के बच्चों के लिए उम्मीद की जगह बन गई।

फीस नहीं ली, अपनी कमाई से किताबें दीं

राणा की कहानी का सबसे भावुक पहलू यही है।

उन्होंने बच्चों से पढ़ाने के बदले पैसा नहीं लिया। उलटे अपनी कमाई से बच्चों के लिए स्लेट, पेंसिल और किताबें उपलब्ध कराईं। समय-समय पर बच्चों के खाने का भी इंतजाम किया।

यानी जिस व्यक्ति की रोजी-रोटी रेलवे की नौकरी से चलती थी, उसने अपनी कमाई का एक हिस्सा उन बच्चों के भविष्य पर खर्च करना शुरू कर दिया जिनसे उसका कोई आर्थिक संबंध नहीं था।

नौकरी खत्म हुई, लेकिन सेवा नहीं

समय बीतता गया। रेलवे की नौकरी के साथ-साथ बच्चों को पढ़ाने का सिलसिला भी चलता रहा।

रिपोर्ट के अनुसार, राणा ने लगभग 26 वर्षों तक रेलवे स्टेशन पर बच्चों को पढ़ाने का काम किया। नौकरी के दौरान जो कमाया, उसका बड़ा हिस्सा बच्चों की शिक्षा में लगाया और बाद में पेंशन के पैसे से भी इस काम को जारी रखा।

यहां उनकी कहानी केवल एक स्टेशन मास्टर की कहानी नहीं रह जाती।

यह उस सोच की कहानी बन जाती है जिसमें व्यक्ति अपनी नौकरी को जीवनयापन का साधन मानने के साथ-साथ अपने ज्ञान को समाज के लिए इस्तेमाल करने का रास्ता भी खोजता है।

स्टेशन की आवाजों के बीच गूंजती थी पढ़ाई

कल्पना कीजिए—एक तरफ रेलवे स्टेशन पर ट्रेन आने की घोषणा हो रही है, दूसरी तरफ रेल की पटरियों पर आवाजाही है और उसी माहौल में कुछ बच्चे किताब और कॉपी लेकर पढ़ रहे हैं।

यह किसी आधुनिक स्कूल की तस्वीर नहीं थी।

लेकिन बच्चों के लिए वह जगह महत्वपूर्ण थी क्योंकि वहां उन्हें एक ऐसा शिक्षक मिला था जो उनसे फीस नहीं मांगता था, बल्कि उन्हें आगे बढ़ते देखना चाहता था।

असली शिक्षा क्या है?

बीपी राणा की कहानी का सबसे बड़ा संदेश यही है कि शिक्षक बनने के लिए केवल स्कूल की चारदीवारी जरूरी नहीं है।

एक व्यक्ति जहां है, वहीं से बदलाव शुरू कर सकता है।

राणा रेलवे स्टेशन पर थे। उनके पास स्कूल की बड़ी इमारत नहीं थी। लेकिन उनके पास ज्ञान था, समय था और बच्चों के भविष्य के लिए चिंता थी।

एक छोटी पहल, बड़ा संदेश

आज शिक्षा को लेकर बड़े-बड़े संस्थान, स्मार्ट क्लास और आधुनिक तकनीक की बात होती है। लेकिन राणा की कहानी याद दिलाती है कि शिक्षा की पहली जरूरत इच्छा और समर्पण है।

एक मालगाड़ी के गार्ड की छोटी-सी सलाह से शुरू हुआ यह प्रयास कई बच्चों तक पहुंचा।

इस कहानी की सबसे खूबसूरत बात यह है कि राणा ने बच्चों को केवल पढ़ाया नहीं, बल्कि यह संदेश भी दिया कि ज्ञान तभी सार्थक है जब वह किसी और के जीवन में रोशनी पैदा करे।

जमुना दयाल

जमुना दयाल वाराणसी के निवासी हैं और उन्हें हिंदी समाचार मीडिया में 10 से अधिक वर्षों का गहन रिपोर्टिंग अनुभव है। उन्होंने अमर उजाला और दैनिक जागरण जैसे देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में जिला रिपोर्टर के रूप में कार्य करते हुए खेल, शिक्षा, राजनीति, कृषि तथा सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता से कवर किया है। शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से जनसंचार में परास्नातक (MJMC) की डिग्री प्राप्त की है और यूजीसी नेट (UGC NET) परीक्षा उत्तीर्ण की है।

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