असम का ‘अमर गांव’: जहां कद नहीं, हुनर बनता है पहचान

भारत विविधताओं से भरा एक ऐसा देश है, जहां समय-समय पर ऐसे सामाजिक प्रयोग देखने को मिलते हैं जो समाज की बनी-बनाई सोच और रूढ़ियों पर करारा प्रहार करते हैं। ऐसा ही एक प्रेरणादायक और अनोखा प्रयास देखने को मिलता है उत्तर-पूर्वी राज्य असम में। असम के उदलगुड़ी जिले में तंगला के पास जलाह गांव में बसा ‘अमर गांव’ (Amar Gaon) आज देश ही नहीं, बल्कि दुनिया के लिए एक मिसाल बन चुका है। यह कोई साधारण गांव नहीं है, बल्कि उन लोगों का आशियाना है, जिन्हें समाज में उनके छोटे कद के कारण हमेशा उपहास और तिरस्कार का सामना करना पड़ता था।
जब उपहास की जगह मिला सम्मान का मंच
छोटे कद (Dwarfism) वाले लोगों को अक्सर समाज में दया का पात्र समझा जाता है या फिर हंसी का पात्र बनाकर उपेक्षित कर दिया जाता है। इस कड़वे सच और सामाजिक समस्या की गहराई को समझा नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) के पूर्व छात्र और प्रसिद्ध असमिया रंगमंच कलाकार पवित्र राभा ने।
राभा ने इन लोगों को केवल सांत्वना देने के बजाय उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने और सम्मानजनक जीवन देने का संकल्प लिया। उन्होंने असम के कोने-कोने में जाकर प्रतिभाशाली छोटे कद के लोगों की खोज की। शुरुआत में परिवारों को अपने बच्चों को भेजने के लिए राजी करना एक बड़ी चुनौती थी, लेकिन राभा के अटूट प्रयास रंग लाए। साल 2011 में 45 दिनों का पहला विशेष प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया गया, जिसमें 30 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। यहीं से एक नए अध्याय की शुरुआत हुई।
‘दापोन’: बदलाव का सांस्कृतिक आईना
पवित्र राभा ने इन कलाकारों को एक साथ लाकर ‘दापोन – द मिरर’ (Dapon – The Mirror) नाम से एक विशेष थिएटर ग्रुप का गठन किया। असमिया भाषा में ‘दापोन’ का अर्थ होता है—’आईना’। नाम के मुताबिक ही इस समूह ने नाटकों के जरिए समाज को उसकी ही सोच का आईना दिखाना शुरू किया।
- मंच पर वास्तविक चुनौतियां: दापोन के कलाकारों ने ‘किनु कौ’ (Kinu Kou) जैसे चर्चित नाटकों के माध्यम से अपने रोजमर्रा के संघर्षों, सामाजिक उपेक्षा और सम्मान की अपनी तलाश को बयां किया।
- देशभर में पहचान: इस रंगमंच समूह के कलाकारों ने केवल असम में ही नहीं, बल्कि देश के विभिन्न राज्यों में अपनी कला की छाप छोड़ी और दर्शकों की तालियां बटोरीं।
रंगमंच से खेती तक: आत्मनिर्भरता का अनूठा मॉडल
अमर गांव की पहचान सिर्फ अभिनय तक सीमित नहीं है। पवित्र राभा और उनकी टीम ने यह सुनिश्चित किया कि ये कलाकार आर्थिक रूप से भी किसी पर निर्भर न रहें। अमर गांव के निवासी खेती-बाड़ी करने के साथ-साथ हस्तशिल्प (Handicrafts) और अन्य कुटीर उद्योगों से जुड़े हुए हैं।
यह पहल केवल एक सांस्कृतिक समूह बनाने तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने सामाजिक पुनर्वास और आर्थिक सशक्तिकरण का एक सफल व्यावहारिक मॉडल प्रस्तुत किया।
बदलते रवैये और बड़े सपनों की कहानी
अमर गांव का सबसे खूबसूरत पहलू यहां के लोगों की जिंदगी में आया मानसिक और सामाजिक बदलाव है। जो लोग कभी सार्वजनिक स्थानों पर जाने से कतराते थे और लोगों की तंज कसती नजरों से परेशान रहते थे, आज वे गर्व के साथ अपना सिर ऊंचा करके जीते हैं।
“पहले लोग हमें देखकर हंसते थे, सम्मान से बात तक नहीं करते थे। लेकिन जब हमने मंच पर अपनी कला दिखाई, तो लोगों का नजरिया बदल गया। अब लोग हमारा अभिवादन करते हैं।”
— दापोन समूह से जुड़े एक कलाकार का अनुभव
अलगाव नहीं, समावेशी समाज का संदेश
अक्सर मीडिया में इसे ‘बौनों का गांव’ कहकर प्रचारित किया जाता है, लेकिन इसके पीछे की सोच इससे कहीं अधिक व्यापक और प्रगतिशील है। पवित्र राभा का मानना है कि छोटे कद के लोगों को समाज से काटकर किसी अलग द्वीप पर नहीं रखना है, बल्कि उन्हें बराबरी के अवसर देने हैं। वे चाहते हैं कि समाज इस पूर्वाग्रह से बाहर निकले और ऐसे लोगों को पत्रकार, प्रशासनिक अधिकारी, शिक्षक या अपनी पसंद के किसी भी पेशे में आगे बढ़ते हुए देखे।
असम का अमर गांव हमें यह सिखाता है कि किसी भी इंसान की क्षमता और प्रतिभा का आकलन उसकी शारीरिक बनावट से नहीं किया जा सकता। रंगमंच की ताकत, खेती का सहारा और एक-दूसरे के प्रति अपनापन—इन तीनों के संगम से Amar Gaon ने साबित कर दिया है कि कद भले ही छोटा हो, लेकिन अगर हुनर और हौसला हो तो सपने बहुत बड़े पूरे किए जा सकते हैं।



