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मितावली का चौंसठ योगिनी मंदिर: पहाड़ी पर पत्थर का वो गोल रहस्य, जिसे लोग संसद भवन का ‘पूर्वज’ कहते हैं

मुरैना के चंबल अंचल में खड़ा यह ASI संरक्षित मंदिर आज भी वास्तुकला, तंत्र-परंपरा और लोककथाओं का अनोखा संगम है

पहाड़ी पर एक गोल घेरा

ग्वालियर से चंबल की ओर बढ़ते हुए जब मितावली गाँव की पहाड़ी पर नज़र जाती है, तो एक अजीब सी आकृति ध्यान खींचती है। यह कोई आम मंदिर का शिखर नहीं, बल्कि पत्थर का एक विशाल गोल घेरा है। लगभग 200 सीढ़ियाँ चढ़ने के बाद यह घेरा पूरा खुलता है और समझ आता है कि लोग इसे देखने इतनी दूर क्यों आते हैं।

यह चौंसठ योगिनी मंदिर है, जिसे स्थानीय लोग एकट्टसो महादेव मंदिर भी कहते हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) इसका संरक्षण करता है।

बनावट जो पहली नज़र में चौंकाती है

बलुआ पत्थर से बना यह मंदिर पूरी तरह गोलाकार है और इसका व्यास करीब 170 फ़ीट बताया जाता है। इसकी बनावट को तीन हिस्सों में समझा जा सकता है:

  • बाहरी घेरा: 64 छोटे कक्ष, जिनमें कभी एक-एक योगिनी की प्रतिमा रही होगी और ऊपर शिवलिंग स्थापित था।
  • स्तंभों वाला गलियारा: कक्षों के सामने गोलाई में चलता परिक्रमा-पथ, जिसकी छत पत्थर की पट्टियों से बनी है।
  • केंद्र: खुले प्रांगण के बीच में मुख्य शिव मंदिर। इसकी स्थिति को सूर्य की गति और छाया से जोड़कर भी देखा जाता है।

प्रवेश पूर्व दिशा से है। ऊपर से देखने पर पूरी संरचना एक चक्र जैसी दिखती है, जिसके केंद्र में शिव हैं और चारों ओर शक्ति के 64 रूप।

इतिहास: तारीख़ पर सहमति नहीं

मंदिर से मिले शिलालेख में कच्छपघात (कछवाहा) वंश के राजा देवपाल का नाम आता है। इसी आधार पर इसे 14वीं सदी की शुरुआत, यानी लगभग 1323 ई. का माना जाता है। हालाँकि कुछ विद्वान इसे और पुरानी परंपरा की इमारत मानते हैं, इसलिए निर्माण-काल पर पूरी सहमति नहीं है।

इतिहासकार बताते हैं कि 9वीं से 12वीं सदी के बीच भारत में कई योगिनी मंदिर बने, जो तांत्रिक साधना के केंद्र थे। इनका खुला और गोलाकार रूप अनुष्ठान और खगोलीय गणना से जुड़ा माना जाता है। मितावली इसी परंपरा का एक प्रमुख उदाहरण है। मध्य प्रदेश और ओडिशा सहित देश के कुछ अन्य हिस्सों में भी ऐसे मंदिर मिलते हैं।

संसद भवन वाली मान्यता: कितना सच, कितनी कहानी

मितावली की चर्चा अक्सर एक दावे के साथ होती है कि दिल्ली के पुराने संसद भवन की गोलाकार रूपरेखा इसी मंदिर से प्रेरित है।

तथ्य इतने हैं कि संसद भवन (तब का काउंसिल हाउस) का डिज़ाइन एडविन लुटियंस और हर्बर्ट बेकर ने तैयार किया था और यह 1927 में बनकर तैयार हुआ। दोनों इमारतों में गोलाकार ढाँचे और स्तंभों वाली परिक्रमा की समानता साफ़ दिखती है। पर लुटियंस या बेकर के किसी अभिलेख में मितावली से प्रेरणा लेने का स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इसलिए इसे स्थानीय मान्यता के रूप में ही पढ़ा जाना चाहिए, स्थापित इतिहास के रूप में नहीं।

यह भी सच है कि इसी दावे ने मितावली को आम लोगों की जुबान पर पहुँचाया है।

“प्राचीन विश्वविद्यालय” की कथा

गाँव में बुज़ुर्ग बताते हैं कि यहाँ कभी तंत्र, ज्योतिष और गणित की शिक्षा दी जाती थी। यह परंपरा पीढ़ियों से सुनाई जा रही है, लेकिन इसके पक्ष में ठोस अभिलेखीय प्रमाण नहीं मिलते। इतिहास की दृष्टि से इसे लोककथा मानना ही उचित है, जो मंदिर के रहस्य को और गहरा करती है।

ख़ाली कक्षों की कहानी

मंदिर की सबसे बड़ी पीड़ा इसके ख़ाली कक्ष हैं। अधिकांश योगिनी प्रतिमाएँ अब यहाँ नहीं हैं। कई चोरी हुईं या अन्यत्र चली गईं, इसलिए 64 में से ज़्यादातर कक्षों में अब केवल ख़ाली पत्थर दिखता है। विरासत-प्रेमियों के लिए यह इस बात की याद दिलाता है कि संरक्षण की ज़रूरत केवल इमारत की ही नहीं, उसके भीतर की धरोहर की भी होती है।

एक यात्रा में तीन पड़ाव

मितावली अकेला पड़ाव नहीं है। पास में पड़ावली की गढ़ी और बटेश्वर मंदिर समूह भी हैं, इसलिए इतिहास और वास्तुकला में रुचि रखने वाले एक ही दिन में तीनों जगह घूम सकते हैं।

अंत में

मितावली का मंदिर इस बात का उदाहरण है कि इतिहास केवल किताबों में नहीं, पहाड़ियों पर खड़े पत्थरों में भी लिखा होता है। संसद भवन से रिश्ता साबित हो या न हो, यह मंदिर अपने आप में भारतीय वास्तुकला का एक अद्भुत अध्याय है, जिसे देखने के लिए किसी दावे की ज़रूरत नहीं।

जमुना दयाल

जमुना दयाल वाराणसी के निवासी हैं और उन्हें हिंदी समाचार मीडिया में 10 से अधिक वर्षों का गहन रिपोर्टिंग अनुभव है। उन्होंने अमर उजाला और दैनिक जागरण जैसे देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में जिला रिपोर्टर के रूप में कार्य करते हुए खेल, शिक्षा, राजनीति, कृषि तथा सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता से कवर किया है। शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से जनसंचार में परास्नातक (MJMC) की डिग्री प्राप्त की है और यूजीसी नेट (UGC NET) परीक्षा उत्तीर्ण की है।

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