अंतरिक्ष का वो घाव जो बना रहस्यमयी झील: 52 हजार साल पहले गिरे उल्कापिंड से कैसे बनी भारत की सबसे अनोखी लोनार लेक
जब रातों-रात गुलाबी हो गया झील का पानी
क्या आपने कभी ऐसी जगह के बारे में सुना है जहाँ अंतरिक्ष और पृथ्वी का मिलन हुआ हो? जहाँ वैज्ञानिक शोध, प्राचीन पौराणिक कथाएँ और कुदरत के अनोखे नियम एक ही जगह आकर सिमट जाते हैं? महाराष्ट्र के बुलढाणा जिले में स्थित लोनार झील (Lonar Lake) एक ऐसी ही अद्भुत और रहस्यमयी जगह है।
यह कोई साधारण जलधारा नहीं, बल्कि हजारों साल पहले अंतरिक्ष से आई एक खगोलीय घटना की निशानी है। आइए जानते हैं कि आखिर क्यों यह झील पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों के लिए एक पहेली बनी हुई है।
अंतरिक्ष की वो टक्कर जिसने बदला भूगोल

माना जाता है कि लगभग 52,000 साल पहले (कुछ शोधों के अनुसार 5.6 लाख वर्ष पूर्व) 90,000 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से 10 से 20 लाख टन वजनी उल्कापिंड पृथ्वी से टकराया था। इस ज़बरदस्त भिड़ंत ने दक्कन के कठोर बेसाल्ट चट्टानों में 1.8 किलोमीटर व्यास और लगभग 150 मीटर गहरा एक विशाल गड्ढा (Crater) बना दिया। समय के साथ इसमें पानी भर गया और यह लोनार झील बन गई। बेसाल्टिक चट्टानों में बनी यह दुनिया की एकमात्र हाइपर-वेलोसिटी इम्पैक्ट क्रेटर झील है।
एक ही झील में दो तरह का पानी
लोनार झील की सबसे बड़ी खासियत इसका रासायनिक संतुलन है। इस झील का पानी एक ही समय में क्षारीय (Alkaline) और लवणीय (Saline) दोनों है। झील का बाहरी हिस्सा मीठे पानी का स्रोत है, जबकि इसका मुख्य पानी अत्यधिक खारा है। इसी रासायनिक बनावट के कारण यहाँ ऐसे दुर्लभ सूक्ष्मजीव पनपते हैं जो दुनिया में कहीं और नहीं पाए जाते।
जब रातों-रात गुलाबी हो गया झील का पानी
जून 2020 में लोनार झील उस समय पूरी दुनिया की सुर्खियों में आ गई, जब इसका पानी अचानक गहरा गुलाबी (Pink) हो गया। वैज्ञानिक जांच के बाद पता चला कि पानी में लवणता बढ़ने के कारण ‘हलोअर्केया’ (Haloarchaea) नामक सूक्ष्मजीवों और शैवाल की संख्या अचानक बढ़ गई थी, जिसने पानी का रंग बदल दिया था।
नासा, इसरो और मंगल ग्रह का कनेक्शन
लोनार की मिट्टी और पत्थरों की संरचना काफी हद तक चंद्रमा और मंगल ग्रह की चट्टानों से मिलती-जुलती है। उल्कापिंड के टकराने के दौरान पैदा हुए अत्यधिक तापमान और दबाव के कारण यहाँ ‘मास्केलिनाइट’ (Maskelynite) नाम का दुर्लभ कांच जैसा खनिज बना। नासा (NASA) और इसरो (ISRO) के वैज्ञानिक ग्रहों पर होने वाले प्रभावों को समझने के लिए लोनार को एक प्राकृतिक प्रयोगशाला मानते हैं।
पौराणिक कथाएं और प्राचीन स्थापत्य

विज्ञान के साथ-साथ लोनार का अपना एक समृद्ध धार्मिक इतिहास भी है।
- लोनासुर का संहार: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान विष्णु ने इसी स्थान पर ‘लोनासुर’ नामक दैत्य का संहार किया था, जिससे इसका नाम लोनार पड़ा।
- दैत्यसूदन और मारुति मंदिर: झील के किनारे 10वीं से 12वीं शताब्दी के चालुक्य और हेमाडपंथी शैली में बने प्राचीन मंदिर स्थित हैं। इनमें दैत्यसूदन मंदिर और बड़ा मारुति मंदिर प्रमुख आकर्षण हैं।
अंतरिक्षीय घटना, दुर्लभ जैव विविधता, प्राचीन संस्कृति और अनसुलझे रहस्यों का यह अनोखा संगम लोनार को भारत की सबसे खास धरोहरों में शामिल करता है।



