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घड़े जैसा शिवलिंग, 16 भुजाओं वाला नटराज और लंदन तक पहुँची चोरी: बाड़ोली के मंदिरों की अनसुनी कहानी

चित्तौड़गढ़ ज़िले के रावतभाटा के पास चंबल किनारे खड़े घटेश्वर महादेव और प्रतिहार शैली के नौ मंदिर

किसी मंदिर का नाम “घड़े” पर पड़ा हो, ऐसा कम ही सुना होगा। चित्तौड़गढ़ ज़िले के रावतभाटा के पास बाड़ोली में ऐसा ही एक मंदिर है। घटेश्वर महादेव में शिव पाँच लिंगों के रूप में हैं, और इनमें से एक उलटे घड़े (घट) जैसा दिखता है। इसी से मंदिर का नाम “घटेश्वर” पड़ा।

बाड़ोली को बड़ोली और बरौली भी लिखा जाता है। नाम कोई भी हो, यह राजस्थान के सबसे पुराने मंदिर परिसरों में गिना जाता है।

जंगल में बसी पत्थर की बस्ती

यह परिसर कोटा से करीब 45 किमी दूर, चंबल के चट्टानी किनारे के पास है। पीपल, कदंब, आम और जामुन के पेड़ों वाले जंगल में, एक प्राकृतिक जल-स्रोत के आसपास, मंदिर दो हिस्सों में बने हैं।

गिनती दिलचस्प है। आठ मुख्य मंदिर एक घेरे में हैं और नौवाँ करीब एक किलोमीटर दूर। चार शिव के हैं, दो दुर्गा के, और एक-एक शिव-त्रिमूर्ति, विष्णु और गणेश के। यानी बाड़ोली सिर्फ़ “शिव मंदिर समूह” नहीं है। चारदीवारी वाले आठ मंदिर ASI की सूची में राष्ट्रीय महत्व के स्मारक हैं।

घटेश्वर महादेव: जहाँ दीवारें बोलती हैं

घटेश्वर परिसर का सबसे बड़ा और सबसे प्रमुख मंदिर है। इसे 10वीं सदी के आरंभ का और लगभग अखंड बताया जाता है। गर्भगृह की छत खिले हुए कमल की आकृति में है, और ऊपर बारीक नक़्क़ाशी वाला शिखर है। गर्भगृह के आगे नंदी स्थापित हैं।

भीतर की मूर्तिकला इसे ख़ास बनाती है। आलों में अंधकासुर का वध करते शिव, नटराज और देवी चामुंडा की प्रतिमाएँ हैं। मुखमंडप में अर्धवस्त्र पहने, नृत्य करती अप्सराएँ उकेरी गई हैं।

शृंगार चौरी: मंदिर के ठीक बाहर बाद में जोड़ा गया एक बड़ा स्तंभ-युक्त नृत्य-मंडप है। इसके स्तंभों पर गंगा और यमुना द्वारपालों के रूप में, ब्रह्मा-विष्णु-शिव की त्रिमूर्ति और शिव के अलग-अलग रूप उकेरे गए हैं।

बाक़ी मंदिरों की पहचान

  • कुंड के बीच का शिव मंदिर: पंचरथ शैली का यह मंदिर पवित्र कुंड के बीच में है, जहाँ गर्भगृह का शिवलिंग पानी से घिरा है।
  • अष्टमातृका (महिषमर्दिनी) मंदिर: घटेश्वर के दक्षिण में है और इसका दस-स्तरीय नागर शिखर इसकी पहचान है।
  • वामनावतार मंदिर: विष्णु के पाँचवें अवतार वामन की चतुर्भुज प्रतिमा वाला छोटा मंदिर।
  • त्रिमूर्ति मंदिर: आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त है और गर्भगृह की त्रिमुख शिव प्रतिमा खंडित है।
  • गणेश मंदिर: पूर्वमुखी है। इसका शिखर ईंट का है, जबकि मुख्य संरचना पत्थर की है।

जब नटराज गायब हो गए

यहाँ की नटराज प्रतिमाएँ भी ख़ास हैं। एक नटराज की मूर्ति 16 भुजाओं वाली बताई गई है। इसी परिसर से 1998 में नटराज की एक पत्थर की प्रतिमा चोरी हो गई। वह लंदन के एक निजी संग्रहकर्ता तक पहुँची मिली और बाद में बरामद हुई। जंगल के बीच खड़े एक स्मारक की मूर्ति का विदेश पहुँच जाना बताता है कि ऐसी धरोहर की निगरानी कितनी ज़रूरी है।

कितना पुराना है बाड़ोली?

इन्हें गुर्जर-प्रतिहार काल (10वीं-11वीं सदी) का माना जाता है, हालाँकि इसका इतिहास बहुत स्पष्ट नहीं है। कुछ मत इन्हें मालवा के परमारों के काल से भी जोड़ते हैं। यानी बहस पूरी तरह थमी नहीं है, और यही इसे दिलचस्प बनाता है।

समय की मार

सब मंदिर एक जैसी हालत में नहीं हैं। इनकी देखरेख अलग-अलग स्तर की है और कुछ अर्ध-खंडहर अवस्था में हैं। गणेश प्रतिमा के हाथ-पैर खंडित हैं। फिर भी घटेश्वर का लगभग अखंड बचा रहना इस परिसर की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती है।

बिंदुजानकारी
स्थानबाड़ोली, रावतभाटा, चित्तौड़गढ़ (राजस्थान)
मंदिर8 चारदीवारी में, 1 लगभग 1 किमी दूर
मुख्य मंदिरघटेश्वर महादेव
शैली और कालप्रतिहार शैली, लगभग 10वीं-11वीं सदी
संरक्षणASI (राष्ट्रीय महत्व का स्मारक)

जमुना दयाल

जमुना दयाल वाराणसी के निवासी हैं और उन्हें हिंदी समाचार मीडिया में 10 से अधिक वर्षों का गहन रिपोर्टिंग अनुभव है। उन्होंने अमर उजाला और दैनिक जागरण जैसे देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में जिला रिपोर्टर के रूप में कार्य करते हुए खेल, शिक्षा, राजनीति, कृषि तथा सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता से कवर किया है। शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से जनसंचार में परास्नातक (MJMC) की डिग्री प्राप्त की है और यूजीसी नेट (UGC NET) परीक्षा उत्तीर्ण की है।

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