भारत के हर कोने सेभारत दर्शन - Local यात्रा

चांद बावड़ी: धरती के भीतर उतरती 3500 सीढ़ियां, जिसे देखकर ठहर जाती है नजर!

राजस्थान के आभानेरी में मौजूद है दुनिया की सबसे अद्भुत बावड़ियों में शामिल चांद बावड़ी, 13 मंजिल गहराई और सीढ़ियों की ऐसी ज्यामितीय बनावट कि नजरें हटाना हो जाता है मुश्किल

राजस्थान की धरती अपने किलों, महलों और मंदिरों के लिए दुनियाभर में मशहूर है। लेकिन यहां एक ऐसी ऐतिहासिक इमारत भी है, जिसे देखकर ऐसा लगता है मानो किसी कलाकार ने धरती के भीतर उल्टा पिरामिड बना दिया हो। इसकी हजारों सीढ़ियां एक-दूसरे से इस तरह जुड़ी हैं कि दूर से देखने पर आंखों को यकीन करना मुश्किल हो जाता है कि यह इंसानों के हाथों से बनाई गई संरचना है।

यह अद्भुत इमारत है राजस्थान के दौसा जिले के आभानेरी गांव में स्थित चांद बावड़ी। करीब 3500 सीढ़ियों, 13 मंजिलों और लगभग 19.5 मीटर की गहराई वाली यह बावड़ी केवल वास्तुकला का नमूना नहीं, बल्कि प्राचीन भारत की जल संरक्षण तकनीक और इंजीनियरिंग का शानदार उदाहरण भी है। खास बात यह है कि इसका निर्माण उस दौर में हुआ था, जब आज जैसी आधुनिक मशीनें और तकनीक उपलब्ध नहीं थीं।

1200 साल पुरानी बावड़ी, जिसके निर्माण में छिपा है इतिहास

चांद बावड़ी राजस्थान के दौसा जिले के आभानेरी गांव में स्थित है। इसे भारत की सबसे प्राचीन और विशाल सीढ़ीदार बावड़ियों में गिना जाता है। माना जाता है कि इसका निर्माण निकुंभ वंश के राजा चांद ने नौवीं शताब्दी के आसपास कराया था।

उस समय राजस्थान के कई इलाके पानी की कमी और भीषण गर्मी से जूझते थे। बारिश का पानी सहेजना और जरूरत के समय उसका इस्तेमाल करना बड़ी चुनौती थी। इसी जरूरत को ध्यान में रखकर ऐसी बावड़ियों का निर्माण कराया जाता था, जहां वर्षा का पानी जमा किया जा सके।

चांद बावड़ी भी इसी सोच का परिणाम है। यह केवल पानी जमा करने का स्थान नहीं थी, बल्कि स्थानीय लोगों के लिए पानी प्राप्त करने, गर्मी से राहत पाने और आपस में मिलने-जुलने का एक महत्वपूर्ण केंद्र भी थी।

3500 सीढ़ियां और 13 मंजिलों की अनोखी बनावट

चांद बावड़ी की सबसे बड़ी खासियत इसकी सीढ़ियां हैं। इसमें करीब 3500 संकरी सीढ़ियां बनी हुई हैं, जो 13 मंजिलों में नीचे की ओर उतरती हैं। इन सीढ़ियों को तीन तरफ बेहद सटीक ज्यामितीय क्रम में बनाया गया है।

ऊपर से देखने पर ऐसा लगता है जैसे किसी ने एक विशाल चौकोर आकृति के भीतर अनगिनत त्रिकोण बना दिए हों। सीढ़ियां एक के बाद एक इस तरह व्यवस्थित हैं कि पूरी संरचना में अद्भुत संतुलन दिखाई देता है।

बावड़ी जैसे-जैसे नीचे जाती है, उसका आकार संकरा होता जाता है। यही वजह है कि ऊपर से देखने पर यह किसी उल्टे पिरामिड जैसी दिखाई देती है।

इसकी खासियत केवल सुंदरता नहीं है। सीढ़ियों की बनावट ऐसी थी कि पानी का स्तर घटने-बढ़ने पर भी लोग अलग-अलग स्तरों से नीचे उतरकर पानी तक पहुंच सकते थे।

एक तरफ सीढ़ियां, दूसरी तरफ तीन मंजिला महल जैसा निर्माण

चांद बावड़ी की एक और खासियत इसकी चौथी तरफ बनी इमारत है। जहां तीन तरफ सीढ़ियों का जाल दिखाई देता है, वहीं चौथी तरफ तीन मंजिला मंडप जैसा निर्माण है।

इस हिस्से में सुंदर झरोखे, गलियारे, खंभे और बालकनियां बनाई गई हैं। इनकी नक्काशी और बनावट तत्कालीन स्थापत्य कला की उत्कृष्टता को दर्शाती है।

माना जाता है कि इस हिस्से का इस्तेमाल शाही परिवार के लोग बैठने और आराम करने के लिए करते थे। गर्मियों के मौसम में बावड़ी का निचला हिस्सा आसपास की तुलना में ठंडा रहता था। इस तरह इसका उपयोग पानी के स्रोत के साथ-साथ गर्मी से राहत पाने के स्थान के रूप में भी होता था।

आखिर क्यों बनाई गई थीं इतनी गहरी बावड़ियां?

राजस्थान जैसे गर्म और कम बारिश वाले इलाके में पानी का महत्व हमेशा से रहा है। प्राचीन समय में जब पानी को दूर-दराज के इलाकों तक पहुंचाने की आधुनिक व्यवस्था नहीं थी, तब तालाब, कुएं और बावड़ियां ही लोगों की जरूरत पूरी करते थे।

चांद बावड़ी का निर्माण भी इसी उद्देश्य से किया गया था।

इसकी गहराई और सीढ़ियों की बनावट वर्षा के पानी को एक स्थान पर जमा करने और पानी का स्तर नीचे जाने पर भी उस तक पहुंचने में मदद करती थी। बावड़ी के अंदर का वातावरण भी अपेक्षाकृत ठंडा रहता था। यही कारण है कि ऐसी संरचनाएं केवल जल स्रोत नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन का भी हिस्सा हुआ करती थीं।

आज जब जल संरक्षण पूरी दुनिया के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है, तब चांद बावड़ी जैसी ऐतिहासिक संरचनाएं बताती हैं कि सदियों पहले भी पानी बचाने के लिए कितनी दूरदर्शी सोच अपनाई जाती थी।

बावड़ी के पास स्थित है हर्षत माता का प्राचीन मंदिर

चांद बावड़ी की यात्रा पर आने वाले पर्यटकों के लिए पास में स्थित हर्षत माता का मंदिर भी आकर्षण का केंद्र है। यह प्राचीन मंदिर देवी हर्षत माता को समर्पित है, जिन्हें सुख और प्रसन्नता की देवी माना जाता है।

मंदिर की स्थापत्य कला, पत्थरों पर की गई नक्काशी और यहां मौजूद प्राचीन मूर्तियां इतिहास प्रेमियों को आकर्षित करती हैं। मंदिर और बावड़ी का आसपास होना इस स्थान को धार्मिक और ऐतिहासिक पर्यटन के लिहाज से खास बनाता है।

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार हर्षत माता पूरे गांव में खुशहाली और प्रसन्नता का आशीर्वाद देती हैं।

फिल्मों की शूटिंग के लिए भी पसंद की गई चांद बावड़ी

चांद बावड़ी की अनोखी बनावट ने केवल इतिहासकारों और पर्यटकों को ही नहीं, बल्कि फिल्म निर्माताओं को भी आकर्षित किया है। इसकी रहस्यमयी और भव्य सीढ़ियां फिल्मों के लिए शानदार पृष्ठभूमि उपलब्ध कराती हैं।

इस ऐतिहासिक स्थल का इस्तेमाल भारतीय और विदेशी फिल्मों की शूटिंग के लिए भी किया गया है। इसकी वास्तुकला और रोशनी-छाया का अनोखा खेल इसे पर्दे पर भी बेहद आकर्षक बनाता है।

इतिहास, कला और जल संरक्षण का अद्भुत संगम

चांद बावड़ी को केवल एक पुरानी इमारत समझना इसकी असली अहमियत को कम करके आंकना होगा। यह उस दौर की सोच का प्रमाण है, जब पानी बचाने के लिए वास्तुकला और विज्ञान का इस्तेमाल किया जाता था।

करीब 3500 सीढ़ियों से सजी यह बावड़ी बताती है कि प्राचीन भारत में निर्माण कला कितनी विकसित थी। यहां की हर सीढ़ी, हर गलियारा और हर दीवार अपने भीतर एक इतिहास समेटे हुए है।

आज भी जब कोई पर्यटक इसके ऊपरी हिस्से से नीचे झांकता है तो सीढ़ियों का अंत नजरों से ओझल होता दिखाई देता है। यही दृश्य चांद बावड़ी को भारत की सबसे आकर्षक ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल करता है।

जमुना दयाल

जमुना दयाल वाराणसी के निवासी हैं और उन्हें हिंदी समाचार मीडिया में 10 से अधिक वर्षों का गहन रिपोर्टिंग अनुभव है। उन्होंने अमर उजाला और दैनिक जागरण जैसे देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में जिला रिपोर्टर के रूप में कार्य करते हुए खेल, शिक्षा, राजनीति, कृषि तथा सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता से कवर किया है। शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से जनसंचार में परास्नातक (MJMC) की डिग्री प्राप्त की है और यूजीसी नेट (UGC NET) परीक्षा उत्तीर्ण की है।

Related Articles

Back to top button