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तुगलकाबाद किला: पत्थरों में कैद है दिल्ली के सबसे ताकतवर सुल्तानों में से एक का अधूरा सपना, जानिए क्यों कुछ ही वर्षों में वीरान हो गया विशाल दुर्ग

ऊंची पत्थर की दीवारें, विशाल बुर्ज, गुप्त रास्ते और कभी न जीत पाने का घमंड… गयासुद्दीन तुगलक ने जिस किले को दिल्ली की सुरक्षा के लिए बनवाया था, आज उसके खंडहर एक रहस्यमयी इतिहास की कहानी सुनाते हैं।

दिल्ली का इतिहास केवल लाल किले, कुतुब मीनार और हुमायूं के मकबरे तक सीमित नहीं है। राजधानी के दक्षिणी हिस्से में एक ऐसा विशाल किला भी मौजूद है, जिसकी ऊंची दीवारें और टूटे हुए बुर्ज आज भी मध्यकालीन भारत की सैन्य ताकत की याद दिलाते हैं। यह है तुगलकाबाद किला, जिसे दिल्ली के सबसे विशाल ऐतिहासिक दुर्गों में गिना जाता है।

इस किले का निर्माण तुगलक वंश के संस्थापक सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक ने कराया था। कहा जाता है कि वह दिल्ली को एक ऐसा मजबूत और सुरक्षित शहर देना चाहते थे, जहां दुश्मन की सेना के लिए प्रवेश करना आसान न हो। लेकिन जिस किले को अजेय बनाने का सपना देखा गया, वह कुछ ही समय में वीरान हो गया। आखिर ऐसा क्या हुआ कि विशाल किले में आबादी टिक नहीं सकी?

1321 में रखी गई थी किले की नींव, मंगोलों से बचाव था मकसद

तुगलकाबाद किले का निर्माण वर्ष 1321 में शुरू कराया गया था। उस समय दिल्ली सल्तनत पर गयासुद्दीन तुगलक का शासन था। वह तुगलक वंश के संस्थापक थे। इससे पहले वह खिलजी शासकों के अधीन सेना में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा चुके थे।

मंगोलों के लगातार हमलों का खतरा दिल्ली सल्तनत के लिए बड़ी चुनौती था। ऐसे में गयासुद्दीन ने अरावली की पहाड़ियों के पथरीले इलाके में एक मजबूत किलेबंद शहर बसाने का फैसला किया। इसका उद्देश्य केवल अपनी सत्ता का प्रदर्शन करना नहीं, बल्कि राजधानी को दुश्मनों के हमले से सुरक्षित रखना भी था।

किले का निर्माण इतनी तेजी से कराया गया कि कुछ ही वर्षों में विशाल दीवारें, बुर्ज, महल और अन्य इमारतें तैयार हो गईं। वर्ष 1325 में गयासुद्दीन की मृत्यु के बाद उनके बेटे मुहम्मद बिन तुगलक ने शासन संभाला। धीरे-धीरे इस किले का महत्व कम होता गया।

छह किलोमीटर से अधिक लंबी दीवारें, दुश्मन के लिए मुश्किल था प्रवेश

तुगलकाबाद किले की सबसे बड़ी खासियत इसकी विशाल पत्थर की दीवारें हैं। लगभग 6 से 6.5 किलोमीटर के दायरे में फैले इस दुर्ग को इस तरह बनाया गया था कि दुश्मन की सेना के लिए भीतर पहुंचना आसान न हो।

इसकी दीवारें कई स्थानों पर 10 से 15 मीटर तक ऊंची हैं। दीवारों का निचला हिस्सा चौड़ा और ऊपरी हिस्सा अपेक्षाकृत पतला रखा गया है। बाहर की ओर झुकी हुई दीवारें इसकी पहचान हैं। इन पर मजबूत बुर्ज बनाए गए थे, जहां से सैनिक दूर तक नजर रख सकते थे।

दिल्ली सरकार के पर्यटन संबंधी विवरण के अनुसार, इस विशाल किलेबंद शहर में कभी 52 दरवाजे होने की बात कही जाती है, जिनमें से 13 के अवशेष आज भी मौजूद हैं। किले में बारिश का पानी जमा करने के लिए सात जलाशय भी बनाए गए थे। इससे पता चलता है कि इसे केवल युद्ध के समय सुरक्षा देने वाला दुर्ग नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित शहर बनाने की योजना थी।

तीन हिस्सों में बंटा था पूरा किला

तुगलकाबाद को सैन्य सुरक्षा और शाही जीवन को ध्यान में रखकर तीन प्रमुख हिस्सों में विकसित किया गया था।

1. आवासीय शहर: किले का बड़ा हिस्सा आम लोगों के रहने के लिए था। यहां घर, गलियां और दूसरी जरूरी सुविधाएं बनाई गई थीं। अलग-अलग दरवाजों से शहर में प्रवेश किया जा सकता था।

2. शाही दुर्ग: यह हिस्सा सुल्तान और उसके परिवार के लिए था। यहां महल, सभागार और अन्य शाही इमारतें थीं। बिजय मंडल नाम का ऊंचा निर्माण भी इसी हिस्से में स्थित है। इसके अवशेष आज भी देखने को मिलते हैं।

3. गढ़ी या सैनिक क्षेत्र: किले के सबसे सुरक्षित हिस्से में सैनिकों और सुरक्षा से जुड़ी व्यवस्थाएं थीं। यहां से आसपास के इलाके पर नजर रखी जा सकती थी।

इन तीनों हिस्सों की बनावट से साफ होता है कि तुगलकाबाद को एक सामान्य किले के बजाय पूरी तरह सुरक्षित राजधानी के रूप में विकसित करने की योजना थी।

निजामुद्दीन औलिया की बद्दुआ से वीरान हुआ किला? इतिहास में मशहूर है यह कहानी

तुगलकाबाद किले के इतिहास में एक ऐसी कहानी भी जुड़ी है, जो आज तक लोगों की उत्सुकता बढ़ाती है। यह कहानी सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया और सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक के बीच कथित विवाद से जुड़ी है।

लोककथाओं के अनुसार, जब सुल्तान ने तुगलकाबाद किले का निर्माण शुरू कराया तो बड़ी संख्या में मजदूरों को काम पर लगा दिया गया। इसी दौरान निजामुद्दीन औलिया अपनी दरगाह के पास एक बावली (सीढ़ियों वाला कुआं) बनवा रहे थे। किले के निर्माण में मजदूरों के व्यस्त हो जाने से बावली का काम प्रभावित होने लगा।

कहा जाता है कि सुल्तान ने मजदूरों को बावली के निर्माण में काम करने से रोक दिया। इससे नाराज होकर संत ने तुगलकाबाद के वीरान हो जाने की बद्दुआ दी।

लोकप्रिय कहावत है- ‘या रहे उजाड़, या बसे गुर्जर।’ यानी यह शहर या तो वीरान रहेगा या फिर यहां गुर्जर आबाद होंगे।

एक दूसरी कथा के अनुसार, गयासुद्दीन तुगलक बंगाल अभियान से लौट रहे थे। संत निजामुद्दीन औलिया ने कथित तौर पर कहा था, ‘हुनूज दिल्ली दूर अस्त’ यानी दिल्ली अभी दूर है। इसके बाद दिल्ली पहुंचने से पहले एक स्वागत मंडप गिरने से सुल्तान की मौत हो गई।

इन कहानियों ने किले को रहस्य और रोमांच से जोड़ दिया है। हालांकि, इतिहासकार इन्हें प्रमाणित ऐतिहासिक घटनाएं नहीं, बल्कि प्रचलित लोककथाएं मानते हैं। किले के वीरान होने के पीछे राजनीतिक और प्रशासनिक कारण भी महत्वपूर्ण रहे होंगे।

किले से कुछ दूरी पर बना है सुल्तान का शानदार मकबरा

तुगलकाबाद किले की यात्रा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा गयासुद्दीन तुगलक का मकबरा भी है। यह किले से कुछ दूरी पर स्थित है। मकबरे तक पहुंचने के लिए एक पुराने पुलनुमा रास्ते से गुजरना पड़ता है, जिसके नीचे कभी कृत्रिम जलाशय हुआ करता था।

मकबरे की बनावट तुगलककालीन स्थापत्य कला का सुंदर उदाहरण है। इसमें लाल बलुआ पत्थर का इस्तेमाल किया गया है। इसके ऊपर सफेद संगमरमर का गुंबद बना है। इसकी दीवारें मोटी और बाहर की तरफ झुकी हुई हैं।

किले की सैन्य बनावट के विपरीत मकबरे में सादगी और मजबूती का अनूठा मेल दिखाई देता है। यहां पहुंचकर उस दौर की स्थापत्य कला और शाही परंपराओं को करीब से समझा जा सकता है।

आखिर क्यों उजड़ गया इतना विशाल किला?

तुगलकाबाद के वीरान होने के पीछे केवल संत की बद्दुआ को जिम्मेदार मानना सही नहीं होगा। इसके कई ऐतिहासिक कारण बताए जाते हैं।

गयासुद्दीन तुगलक की मृत्यु के बाद उनके बेटे मुहम्मद बिन तुगलक ने सत्ता संभाली। उनके शासनकाल में राजधानी को दिल्ली से देवगिरि (दौलताबाद) ले जाने का फैसला किया गया। इससे दिल्ली के कई इलाकों की आबादी और प्रशासनिक व्यवस्था प्रभावित हुई।

बाद में राजधानी वापस दिल्ली लाई गई, लेकिन तुगलकाबाद को पहले जैसा महत्व नहीं मिल सका। शाही सत्ता की प्राथमिकताएं बदलने, नए शहरों के विकास और प्रशासनिक फैसलों के कारण यह दुर्ग धीरे-धीरे उजड़ता चला गया।

इतिहासकारों के अनुसार, किले का निर्माण और उसका उपयोग बहुत कम समय तक प्रभावी रहा। आज इसके बचे हुए हिस्से उस महत्वाकांक्षी योजना की याद दिलाते हैं, जिसे लंबे समय तक कायम नहीं रखा जा सका।

आज भी इतिहास और रोमांच के शौकीनों को आकर्षित करता है किला

आज तुगलकाबाद किला दिल्ली की ऐतिहासिक धरोहरों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यहां आने वाले पर्यटक विशाल पत्थर की दीवारों, पुराने दरवाजों, बुर्जों, महलों के अवशेषों और मकबरे को देख सकते हैं।

इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए यह जगह किसी खुली किताब से कम नहीं है। यहां की वास्तुकला बताती है कि मध्यकाल में सुरक्षा को ध्यान में रखकर शहरों का निर्माण किस तरह किया जाता था।

किले की ऊंची दीवारों और खंडहरों के बीच घूमते हुए यह कल्पना करना मुश्किल नहीं कि कभी यहां सैनिकों की आवाजाही, शाही गतिविधियां और आम लोगों की जिंदगी किस तरह चलती होगी।

हालांकि, किले के कई हिस्से खंडहर में बदल चुके हैं। इसलिए भ्रमण के दौरान सुरक्षा का ध्यान रखना और संरक्षित दीवारों पर चढ़ने से बचना जरूरी है।

कैसे पहुंचें तुगलकाबाद किला?

तुगलकाबाद किला दक्षिणी दिल्ली में स्थित है। यहां सड़क और दिल्ली मेट्रो के माध्यम से पहुंचा जा सकता है। आसपास के प्रमुख ऐतिहासिक स्थलों में गयासुद्दीन तुगलक का मकबरा और आदिलाबाद किला शामिल हैं।

दिल्ली घूमने आने वाले पर्यटक इसे अपनी ऐतिहासिक यात्रा में शामिल कर सकते हैं। बेहतर होगा कि किले और आसपास के स्मारकों को देखने के लिए पर्याप्त समय लेकर जाएं।

निष्कर्ष: तुगलकाबाद किला केवल पत्थरों से बना एक पुराना दुर्ग नहीं है। यह एक ऐसे शासक की महत्वाकांक्षा, मध्यकालीन सैन्य वास्तुकला और इतिहास में दर्ज एक उजड़े शहर की कहानी है। इसकी दीवारें आज भी सवाल करती हैं कि आखिर जिस शहर को इतना मजबूत बनाने का सपना देखा गया था, वह समय के साथ वीरान क्यों हो गया?

जमुना दयाल

जमुना दयाल वाराणसी के निवासी हैं और उन्हें हिंदी समाचार मीडिया में 10 से अधिक वर्षों का गहन रिपोर्टिंग अनुभव है। उन्होंने अमर उजाला और दैनिक जागरण जैसे देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में जिला रिपोर्टर के रूप में कार्य करते हुए खेल, शिक्षा, राजनीति, कृषि तथा सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता से कवर किया है। शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से जनसंचार में परास्नातक (MJMC) की डिग्री प्राप्त की है और यूजीसी नेट (UGC NET) परीक्षा उत्तीर्ण की है।

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