बेबी ताज: नूरजहाँ के पिता की याद में बना ऐसा मकबरा, जिसकी खूबसूरती देखकर दंग रह जाते हैं लोग
आगरा की यमुना किनारे स्थित इस ऐतिहासिक इमारत को कहा जाता है संगमरमर का नगीना, ताजमहल से पहले यहां दिखी थी सफेद संगमरमर और बेशकीमती पत्थरों की अद्भुत कारीगरी

उत्तर प्रदेश के आगरा शहर की पहचान दुनिया के सात अजूबों में शामिल ताजमहल से है। लेकिन इसी शहर में यमुना नदी के किनारे एक ऐसी ऐतिहासिक इमारत भी मौजूद है, जिसकी खूबसूरती और नक्काशी किसी को भी मंत्रमुग्ध कर सकती है। सफेद संगमरमर से बना यह मकबरा अपनी बारीक कारीगरी, रंगीन पत्थरों की पच्चीकारी और खूबसूरत जालियों के लिए मशहूर है। इसे इत्मादुद्दौला का मकबरा कहा जाता है। अपनी छोटी लेकिन बेहद आकर्षक बनावट के कारण यह दुनिया भर में ‘बेबी ताज’ के नाम से जाना जाता है।
इस मकबरे की सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसे किसी बादशाह ने नहीं, बल्कि मुगल बादशाह जहांगीर की पत्नी नूरजहाँ ने अपने पिता की याद में बनवाया था। यह सिर्फ एक मकबरा नहीं, बल्कि एक बेटी की ओर से अपने पिता को दी गई ऐसी श्रद्धांजलि है, जिसने मुगलकालीन वास्तुकला को एक नई दिशा दी।
कौन थे इत्मादुद्दौला, जिनकी याद में बना यह मकबरा?
इत्मादुद्दौला का असली नाम मिर्जा गियास बेग था। वह मूल रूप से फारस (आज का ईरान) के रहने वाले थे। बेहतर भविष्य की तलाश में वह भारत आए और मुगल बादशाह अकबर के दरबार में अपनी जगह बनाई।
अपनी योग्यता, समझदारी और प्रशासनिक क्षमता के दम पर उन्होंने मुगल दरबार में ऊंचा मुकाम हासिल किया। बादशाह जहांगीर के शासनकाल में उन्हें ‘इत्मादुद्दौला’ की उपाधि दी गई। इसका अर्थ होता है ‘साम्राज्य का स्तंभ’।
मिर्जा गियास बेग की बेटी मेहरुन्निसा बाद में मुगल बादशाह जहांगीर से विवाह के बाद नूरजहाँ के नाम से मशहूर हुईं। नूरजहाँ मुगल इतिहास की सबसे प्रभावशाली महिलाओं में गिनी जाती हैं। उनका प्रभाव केवल शाही परिवार तक सीमित नहीं था, बल्कि शासन, कला, संस्कृति और निर्माण कार्यों में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी।
बेटी नूरजहाँ ने पिता की याद में बनवाया मकबरा
मिर्जा गियास बेग की मृत्यु के बाद नूरजहाँ ने उनकी याद में एक भव्य मकबरा बनवाने का फैसला किया। उन्होंने इस निर्माण को केवल एक समाधि तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे मुगल स्थापत्य कला का अनूठा नमूना बनाने की कोशिश की।
इतिहास के अनुसार, इस मकबरे का निर्माण वर्ष 1622 से 1628 के बीच कराया गया। इसमें नूरजहाँ की मां अस्मत बेगम की समाधि भी मौजूद है।
यमुना नदी के किनारे बने इस मकबरे का परिसर चारबाग शैली में तैयार किया गया है। इसमें बगीचे, रास्ते और जलधाराओं को एक खास ज्यामितीय योजना के अनुसार व्यवस्थित किया गया था।
यहां पहुंचने पर ऐसा लगता है जैसे संगमरमर का कोई खूबसूरत डिब्बा हरे-भरे बगीचे के बीच रख दिया गया हो। यही वजह है कि इसे ‘ज्वेल बॉक्स’ यानी रत्नों का डिब्बा भी कहा जाता है।
ताजमहल से पहले सफेद संगमरमर का प्रयोग
इत्मादुद्दौला का मकबरा मुगल वास्तुकला के इतिहास में बेहद खास स्थान रखता है। इससे पहले मुगलकालीन इमारतों में लाल बलुआ पत्थर का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता था। लेकिन इस मकबरे में पहली बार किसी प्रमुख मुगल स्मारक को पूरी तरह सफेद संगमरमर से तैयार किया गया।
इसी कारण इसे मुगल वास्तुकला में एक बड़े बदलाव का प्रतीक माना जाता है। बाद में शाहजहाँ के शासनकाल में सफेद संगमरमर का प्रयोग और अधिक लोकप्रिय हुआ। ताजमहल इसका सबसे शानदार उदाहरण बना।
इतिहासकार इस मकबरे को ताजमहल की वास्तुकला की पूर्वपीठिका मानते हैं। हालांकि इसकी अपनी अलग पहचान और कलात्मक विशेषताएं हैं। India+2
पच्चीकारी की ऐसी कला, जो पत्थरों में भर देती है रंग

इस मकबरे की सबसे बड़ी खूबी इसकी पच्चीकारी है। इसमें संगमरमर की सतह पर अलग-अलग रंगों के बेशकीमती और अर्द्धकीमती पत्थरों को इस तरह जड़ा गया है कि उनसे फूल-पत्तियां, पेड़, फूलदान और अन्य खूबसूरत आकृतियां बन गई हैं।
इस तकनीक को ‘पिएत्रा ड्यूरा’ कहा जाता है। इसमें पत्थरों को बेहद बारीकी से काटकर संगमरमर में फिट किया जाता है।
मकबरे में इस्तेमाल किए गए रंगीन पत्थर इसकी खूबसूरती को अलग ही रूप देते हैं। दीवारों और फर्श पर बनी आकृतियां मुगलकालीन कारीगरों की दक्षता का परिचय देती हैं।
कई जगह फूलदान, फल, पेड़ और सजावटी आकृतियां दिखाई देती हैं। इन्हें देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस दौर में पत्थरों पर काम करने वाले कारीगर कितने कुशल रहे होंगे।
इस स्मारक की पच्चीकारी को मुगलकालीन कला के विकास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। बाद में यही कला ताजमहल की सजावट में भी बेहद शानदार रूप में दिखाई देती है।
संगमरमर की जालियां हैं इसकी सबसे बड़ी खूबसूरती

मकबरे की खिड़कियों और दीवारों पर बनी संगमरमर की जालियां देखने लायक हैं। इन जालियों को इतनी बारीकी से तराशा गया है कि संगमरमर के ठोस पत्थर में भी महीन डिजाइन उभर आए हैं।
जब सूरज की रोशनी इन जालियों से होकर अंदर पहुंचती है तो दीवारों और फर्श पर खूबसूरत आकृतियां बनती हैं। यही दृश्य इस मकबरे को और भी आकर्षक बना देता है।
इसकी चारों कोनों पर बनी छोटी मीनारें और उनके ऊपर बने छतरीनुमा हिस्से भी वास्तुकला की खास पहचान हैं। मुख्य इमारत में विशाल गुंबद की जगह छतरीनुमा संरचना दिखाई देती है, जो इसे दूसरे मुगल मकबरों से अलग बनाती है।
मुगल परिवार से भी जुड़ा है इस मकबरे का रिश्ता
इस ऐतिहासिक मकबरे की एक और दिलचस्प बात है। मिर्जा गियास बेग केवल नूरजहाँ के पिता ही नहीं थे, बल्कि वह मुमताज महल के नाना भी थे।
मुमताज महल वही थीं, जिनकी याद में शाहजहाँ ने ताजमहल बनवाया था। इस तरह इत्मादुद्दौला का मकबरा और ताजमहल एक ही परिवार की दो पीढ़ियों की यादों से जुड़े हुए हैं।
एक ओर नूरजहाँ ने अपने पिता के लिए संगमरमर का खूबसूरत मकबरा बनवाया, तो दूसरी ओर उनकी नातिन मुमताज महल की याद में शाहजहाँ ने दुनिया का प्रसिद्ध ताजमहल बनवाया।
इस पारिवारिक रिश्ते के कारण भी इत्मादुद्दौला का मकबरा इतिहास प्रेमियों के लिए विशेष महत्व रखता है।
कहां स्थित है यह ऐतिहासिक मकबरा?
इत्मादुद्दौला का मकबरा उत्तर प्रदेश के आगरा शहर में यमुना नदी के बाएं किनारे स्थित है। यह आगरा किले से लगभग चार किलोमीटर की दूरी पर है। यहां सड़क मार्ग से ऑटो, टैक्सी और निजी वाहन के जरिए पहुंचा जा सकता है।
आगरा आने वाले पर्यटक ताजमहल और आगरा किले के साथ इस मकबरे को भी अपनी यात्रा में शामिल कर सकते हैं। इसके आसपास चीनी का रौजा और रामबाग जैसे अन्य ऐतिहासिक स्थल भी हैं।



