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चंबल की बीहड़ों में छिपा था 200 मंदिरों का खजाना, खंडहरों से फिर कैसे जीवित हुआ बटेश्वर मंदिर समूह?

मुरैना के बटेश्वर में पत्थरों के हजारों टुकड़ों को जोड़कर संवारा गया प्राचीन मंदिरों का संसार, कभी डाकुओं का था इलाका,

मध्य प्रदेश के चंबल क्षेत्र की पहचान कभी बीहड़ों, ऊबड़-खाबड़ रास्तों और डाकुओं की कहानियों से होती थी। इन्हीं बीहड़ों के बीच एक ऐसा ऐतिहासिक खजाना छिपा है, जिसे देखकर कोई भी हैरान रह जाता है। यहां एक-दो नहीं, बल्कि लगभग 200 छोटे-बड़े प्राचीन मंदिर एक साथ दिखाई देते हैं। इन मंदिरों की कतारें, पत्थरों पर उकेरी गई कलाकृतियां और ऊंचे शिखर भारतीय स्थापत्य कला की समृद्ध परंपरा की कहानी सुनाते हैं।

यह स्थान है मध्य प्रदेश के मुरैना जिले का बटेश्वर मंदिर समूह। लगभग आठवीं से 11वीं शताब्दी के बीच बने ये मंदिर गुर्जर-प्रतिहार कालीन स्थापत्य कला के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। कभी खंडहरों में तब्दील हो चुका यह मंदिर परिसर आज भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) के संरक्षण और पुनर्निर्माण प्रयासों के कारण फिर से अपनी पहचान बना रहा है।

इस जगह की कहानी केवल मंदिरों के निर्माण और इतिहास तक सीमित नहीं है। इसमें प्राकृतिक आपदा, बीहड़ों में डाकुओं का दौर, पुरातत्वविदों की मेहनत और बिखरे हुए पत्थरों को फिर से जोड़ने का अद्भुत प्रयास भी शामिल है।

कहां स्थित है बटेश्वर मंदिर समूह?

बटेश्वर मंदिर समूह मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में पदावली गांव के निकट स्थित है। यह ग्वालियर से लगभग 35 से 50 किलोमीटर और मुरैना शहर से करीब 30 किलोमीटर की दूरी पर है। चंबल घाटी के पहाड़ी और वन क्षेत्र के बीच बसे इस परिसर का प्राकृतिक वातावरण इसकी सुंदरता को और बढ़ा देता है।

यहां पहुंचने पर दूर-दूर तक फैले छोटे-बड़े पत्थर के मंदिर दिखाई देते हैं। कई मंदिर एक-दूसरे के काफी करीब बने हैं। पहाड़ी की ढलान पर कतारों में खड़े इन मंदिरों को देखकर ऐसा लगता है, जैसे किसी प्राचीन नगर में एक साथ अनेक देवालय बनाए गए हों।

मध्य प्रदेश पर्यटन और मुरैना जिला प्रशासन के अनुसार, यह क्षेत्र मध्यकालीन भारतीय मंदिर स्थापत्य का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।

200 मंदिरों का निर्माण किसने कराया था?

बटेश्वर मंदिर समूह का निर्माण मुख्य रूप से गुर्जर-प्रतिहार राजवंश के शासनकाल में हुआ माना जाता है। इस राजवंश ने लगभग आठवीं से 11वीं शताब्दी के दौरान उत्तर और मध्य भारत के बड़े हिस्से में शासन किया था।

उस समय मंदिर निर्माण केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं था, बल्कि यह कला, संस्कृति, वास्तुकला और राजकीय संरक्षण का भी प्रतीक था।

बटेश्वर में बने मंदिरों की संख्या लगभग 200 मानी जाती है। ये मंदिर मुख्य रूप से भगवान शिव, भगवान विष्णु और देवी शक्ति को समर्पित हैं। इस कारण यहां हिंदू धर्म की तीन प्रमुख उपासना परंपराओं की झलक एक ही परिसर में देखने को मिलती है।

इनमें अधिकांश मंदिर आकार में छोटे हैं, लेकिन उनकी बनावट और पत्थरों पर की गई नक्काशी बेहद आकर्षक है। मंदिरों के शिखर, प्रवेश द्वार, स्तंभ और दीवारों पर मध्यकालीन शिल्पकारों की कुशलता दिखाई देती है। India+2

शिव, विष्णु और शक्ति के मंदिरों का अनोखा संसार

बटेश्वर मंदिर समूह की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां अलग-अलग देवी-देवताओं को समर्पित मंदिर एक ही स्थान पर बने हुए हैं।

भगवान शिव के मंदिर: परिसर में शिव को समर्पित मंदिरों की संख्या अधिक है। कई मंदिरों के गर्भगृह में शिवलिंग स्थापित हैं। इनकी बनावट और शिखर मध्यकालीन नागर शैली की विशेषताएं दिखाते हैं।

भगवान विष्णु के मंदिर: यहां विष्णु को समर्पित मंदिर भी हैं। इनकी दीवारों और पत्थरों पर की गई नक्काशी में वैष्णव परंपरा की झलक मिलती है।

देवी शक्ति के मंदिर: शक्ति उपासना से जुड़े मंदिर इस परिसर की धार्मिक विविधता को दर्शाते हैं। शिव और शक्ति की आराधना से जुड़ी कलाकृतियां भी यहां देखने को मिलती हैं।

इस तरह बटेश्वर केवल एक देवता का मंदिर परिसर नहीं, बल्कि भारतीय धार्मिक परंपराओं और स्थापत्य कला का साझा केंद्र रहा है।

नागर शैली की वास्तुकला का सुंदर नमूना

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बटेश्वर के मंदिर उत्तर भारतीय नागर शैली की वास्तुकला के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। इस शैली की सबसे प्रमुख पहचान मंदिर के ऊपर बना ऊंचा शिखर होता है, जो ऊपर की ओर संकरा होता जाता है।

इन मंदिरों में कुछ खास स्थापत्य विशेषताएं दिखाई देती हैं।

  • गर्भगृह: मंदिर का सबसे पवित्र हिस्सा, जहां मुख्य देवी-देवता की प्रतिमा या शिवलिंग स्थापित होता है।
  • शिखर: मंदिर के गर्भगृह के ऊपर बना ऊंचा और कलात्मक हिस्सा।
  • मंडप: श्रद्धालुओं के एकत्र होने और पूजा-अर्चना के लिए बनाया गया स्थान।
  • नक्काशी: पत्थरों पर देवी-देवताओं, धार्मिक प्रसंगों और सजावटी आकृतियों का सुंदर चित्रण।
  • पंचरथ योजना: मंदिर की बाहरी दीवारों में पांच प्रमुख उभारों या ऊर्ध्वाधर भागों वाली स्थापत्य योजना।

बटेश्वर के कई मंदिरों की बनावट एक-दूसरे से मिलती-जुलती है, लेकिन उनके आकार और सजावट में अंतर भी दिखाई देता है। पत्थरों को बिना आधुनिक सीमेंट के जोड़कर मंदिर बनाने की पारंपरिक तकनीक यहां की स्थापत्य विशेषताओं में शामिल है।

भूकंप ने कैसे बदल दिया मंदिरों का स्वरूप?

आज जिन मंदिरों को देखकर पर्यटक आश्चर्यचकित होते हैं, उनका अतीत इतना सुंदर नहीं था। कभी यह पूरा परिसर खंडहरों में बदल चुका था। मंदिरों के शिखर टूट गए थे, दीवारें गिर चुकी थीं और हजारों पत्थर आसपास बिखरे पड़े थे।

पुरातात्विक विवरणों के अनुसार, 13वीं शताब्दी के बाद किसी समय यह परिसर बड़े पैमाने पर क्षतिग्रस्त हुआ। इसके पीछे भूकंप को एक संभावित कारण माना जाता है। हालांकि, मंदिरों के नष्ट होने की सटीक वजह पूरी तरह प्रमाणित नहीं है।

1882 में ब्रिटिश पुरातत्वविद् अलेक्जेंडर कनिंघम ने इस क्षेत्र का उल्लेख किया था। उन्होंने यहां छोटे-बड़े सौ से अधिक मंदिरों के खंडहर होने की जानकारी दर्ज की थी।

इसके बाद भी लंबे समय तक यह स्थान आम लोगों और पर्यटकों की नजरों से दूर रहा। Incredible India+1

जब चंबल के डाकुओं के बीच शुरू हुआ मंदिरों को बचाने का अभियान

बटेश्वर मंदिर समूह की कहानी का सबसे रोमांचक हिस्सा इसके पुनर्निर्माण से जुड़ा है। जिस इलाके में कभी डाकुओं का प्रभाव था, वहां प्राचीन मंदिरों को फिर से खड़ा करना आसान काम नहीं था।

2005 के आसपास भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पुरातत्वविद् केके मुहम्मद ने इन मंदिरों के संरक्षण और पुनर्निर्माण का अभियान शुरू किया। उस समय चंबल के बीहड़ों में डाकुओं की गतिविधियां एक बड़ी चुनौती थीं।

बताया जाता है कि इलाके में सक्रिय डाकू सरगना निर्भय सिंह गुर्जर से बातचीत और सहमति के बाद पुरातत्व विभाग की टीम को काम करने का रास्ता मिला। इस अभियान में स्थानीय लोगों और कुछ आत्मसमर्पण कर चुके डाकुओं की मदद भी ली गई।

केके मुहम्मद के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि मंदिरों के हजारों पत्थर अलग-अलग जगहों पर बिखरे पड़े थे। कई पत्थरों की पहचान करना और उन्हें सही स्थान पर लगाना बेहद कठिन था।

उन्होंने इस काम को एक विशाल पहेली सुलझाने जैसा बताया। जिस तरह किसी पहेली के अलग-अलग टुकड़ों को जोड़कर पूरी तस्वीर तैयार की जाती है, उसी तरह मंदिरों के पुराने पत्थरों को पहचानकर उनकी मूल बनावट के अनुसार दोबारा जोड़ा गया।

यह अभियान भारतीय विरासत संरक्षण के महत्वपूर्ण उदाहरणों में शामिल हो गया।

हजारों पत्थर जोड़कर फिर खड़े किए गए मंदिर

मंदिरों के पुनर्निर्माण में पुरातत्वविदों और कारीगरों ने पुराने पत्थरों को ही प्राथमिकता दी। पहले बिखरे हुए पत्थरों को इकट्ठा किया गया। फिर उनकी बनावट, आकार और नक्काशी के आधार पर यह समझने की कोशिश की गई कि कौन-सा पत्थर किस मंदिर का हिस्सा रहा होगा।

इसके बाद पारंपरिक निर्माण तकनीक और स्थापत्य नियमों के अनुसार मंदिरों को दोबारा खड़ा किया गया।

केके मुहम्मद के नेतृत्व में 2005 से 2012 के बीच लगभग 80 मंदिरों का पुनर्निर्माण किया गया। अलग-अलग विवरणों में पुनर्निर्मित मंदिरों की संख्या 80 से 85 तक बताई गई है।

इस काम ने यह साबित किया कि पुरानी विरासत को बचाने के लिए केवल नई इमारतें बनाना जरूरी नहीं है। कई बार इतिहास के बिखरे हुए हिस्सों को पहचानकर उन्हें फिर से जोड़ना ही सबसे बड़ी उपलब्धि होती है।

बटेश्वर के आसपास भी हैं ऐतिहासिक धरोहरें

बटेश्वर की यात्रा को और खास बनाने के लिए आसपास स्थित दूसरे ऐतिहासिक मंदिरों को भी देखा जा सकता है। मुरैना क्षेत्र में मंदिर स्थापत्य की कई ऐसी धरोहरें हैं, जो अपने अनोखे निर्माण और इतिहास के लिए प्रसिद्ध हैं।

1. पदावली मंदिर

यहां प्राचीन शिव मंदिर की दीवारों और प्रवेश द्वार पर बेहद बारीक नक्काशी देखने को मिलती है। धार्मिक और पौराणिक दृश्य इसकी खास पहचान हैं।

2. चौसठ योगिनी मंदिर, मितावली

पहाड़ी पर बना यह मंदिर अपने गोलाकार स्वरूप के लिए प्रसिद्ध है। इसके चारों ओर छोटे-छोटे मंदिर बने हैं। इसकी वास्तुकला बेहद अनोखी है।

3. ककनमठ मंदिर, सिहोनिया

भगवान शिव को समर्पित यह प्राचीन मंदिर अपनी ऊंची और प्रभावशाली संरचना के लिए जाना जाता है।India+2

कैसे पहुंचें बटेश्वर मंदिर?

बटेश्वर मंदिर समूह मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में स्थित है। यहां सड़क मार्ग से आसानी से पहुंचा जा सकता है।

  • हवाई मार्ग: ग्वालियर हवाई अड्डा निकटतम प्रमुख हवाई अड्डा है।
  • रेल मार्ग: मुरैना और ग्वालियर रेलवे स्टेशन से सड़क मार्ग द्वारा यहां पहुंचा जा सकता है।
  • सड़क मार्ग: ग्वालियर से टैक्सी या निजी वाहन लेकर बटेश्वर पहुंचा जा सकता है।

घूमने का सही समय: अक्टूबर से मार्च तक का समय यात्रा के लिए सुविधाजनक रहता है। इस दौरान मौसम अपेक्षाकृत सुहावना रहता है।

परिसर पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है, इसलिए वहां के स्मारकों को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों से बचना चाहिए। पूजा-अर्चना की व्यवस्था और प्रवेश संबंधी नियमों की जानकारी यात्रा से पहले स्थानीय प्रशासन या संबंधित विभाग से प्राप्त कर लेना उचित होगा।

इतिहास को दोबारा खड़ा करने की मिसाल है बटेश्वर

बटेश्वर मंदिर समूह केवल पत्थरों से बने लगभग 200 मंदिरों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह भारत की प्राचीन स्थापत्य कला, धार्मिक विविधता और विरासत संरक्षण की इच्छाशक्ति का प्रतीक है।

कभी जिन मंदिरों के पत्थर जमीन पर बिखरे पड़े थे, आज वे फिर से अपनी पुरानी पहचान हासिल कर रहे हैं। चंबल के जिन बीहड़ों को कभी डाकुओं के कारण जाना जाता था, वहां आज इतिहास और संस्कृति की तलाश में पर्यटक पहुंच रहे हैं।

बटेश्वर की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि यहां हर मंदिर एक कहानी कहता है। कोई कहानी गुर्जर-प्रतिहार शासकों के वैभव की है, कोई प्राचीन शिल्पकारों की कला की और कोई उन लोगों के साहस की, जिन्होंने टूटे हुए इतिहास को फिर से जोड़ने का सपना देखा।

जमुना दयाल

जमुना दयाल वाराणसी के निवासी हैं और उन्हें हिंदी समाचार मीडिया में 10 से अधिक वर्षों का गहन रिपोर्टिंग अनुभव है। उन्होंने अमर उजाला और दैनिक जागरण जैसे देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में जिला रिपोर्टर के रूप में कार्य करते हुए खेल, शिक्षा, राजनीति, कृषि तथा सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता से कवर किया है। शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से जनसंचार में परास्नातक (MJMC) की डिग्री प्राप्त की है और यूजीसी नेट (UGC NET) परीक्षा उत्तीर्ण की है।

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