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ऐहोले: पत्थरों में छिपी है मंदिर स्थापत्य के प्रयोगों की अनोखी कहानी, कभी कहा जाता था भारतीय वास्तुकला की प्रयोगशाला

कहीं मंदिर की छत सपाट है, कहीं दीवारें अर्धवृत्ताकार तो कहीं स्तंभों और नक्काशी में झलकती है अद्भुत कल्पनाशीलता... कर्नाटक का ऐहोले सिर्फ मंदिरों का समूह नहीं, बल्कि भारतीय वास्तुकला के विकास की ऐसी कहानी है, जिसने सदियों पहले वास्तुकला को नए आयाम दिए।

कल्पना कीजिए, एक ऐसी जगह की, जहां हर मंदिर का आकार दूसरे से अलग हो। कहीं ऊंचे चबूतरे पर खड़ा भव्य मंदिर दिखाई दे, तो कहीं पत्थरों को तराशकर बनाई गई ऐसी संरचना, जिसे देखकर आज भी वास्तुकला के जानकार हैरान रह जाते हैं। कहीं दीवारों पर देवी-देवताओं की जीवंत आकृतियां उकेरी गई हों, तो कहीं स्तंभों की बनावट में शिल्पकारों की अनोखी सोच झलकती हो।

यह किसी कल्पनालोक का दृश्य नहीं, बल्कि कर्नाटक के ऐहोले की वास्तविक पहचान है। यहां के मंदिर केवल पूजा-अर्चना के केंद्र नहीं थे, बल्कि भारतीय मंदिर स्थापत्य के नए विचारों और प्रयोगों के साक्षी भी रहे हैं। यही वजह है कि ऐहोले को भारतीय मंदिर वास्तुकला की प्रयोगशाला कहा जाता है।

जब पत्थरों पर लिखी जा रही थी वास्तुकला की नई इबारत

कर्नाटक के बागलकोट जिले में स्थित ऐहोले का इतिहास बादामी चालुक्य शासकों के दौर से जुड़ा है। छठी से आठवीं शताब्दी के बीच यह क्षेत्र मंदिर निर्माण और शिल्पकला के एक बड़े केंद्र के रूप में विकसित हुआ।

उस दौर के वास्तुकारों के सामने एक बड़ी चुनौती थी—धार्मिक मान्यताओं को ध्यान में रखते हुए ऐसे मंदिरों का निर्माण करना, जो सुंदर होने के साथ-साथ संरचनात्मक रूप से भी विशिष्ट हों। इसी सोच ने ऐहोले को प्रयोगों की धरती बना दिया।

यहां मंदिरों की बनावट में लगातार नए प्रयोग हुए। कहीं मंडप और गर्भगृह की योजना बदली गई, कहीं छतों के स्वरूप में नवीनता दिखाई दी और कहीं शिखरों के निर्माण में अलग-अलग शैलियों को अपनाया गया। उत्तर भारत की नागर और दक्षिण भारत की द्रविड़ स्थापत्य परंपराओं के लक्षण भी यहां देखने को मिलते हैं।

इन प्रयोगों ने आगे चलकर दक्कन की मंदिर वास्तुकला को एक विशिष्ट पहचान दी।

दुर्गा मंदिर: अर्धवृत्ताकार बनावट ने खींचा सबका ध्यान

ऐहोले पहुंचने वाले पर्यटकों की नजर सबसे पहले जिन स्मारकों पर ठहरती है, उनमें दुर्गा मंदिर प्रमुख है। इसकी बनावट सामान्य मंदिरों से काफी अलग है। ऊंचे चबूतरे पर निर्मित इस मंदिर की अर्धवृत्ताकार पिछली योजना इसे विशिष्ट पहचान देती है।

मंदिर के चारों ओर बना स्तंभयुक्त प्रदक्षिणा पथ इसकी स्थापत्य योजना का खास हिस्सा है। श्रद्धालु यहां मंदिर की परिक्रमा कर सकते थे। स्तंभों पर की गई नक्काशी और दीवारों पर उकेरी गई देवी-देवताओं की आकृतियां शिल्पकारों की कलात्मक दक्षता का परिचय देती हैं।

दिलचस्प बात यह है कि मंदिर का नाम भले ही दुर्गा मंदिर है, लेकिन इसे देवी दुर्गा को समर्पित मानने के पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं। इसके नाम को लेकर यह धारणा भी प्रचलित है कि इसका संबंध ‘दुर्ग’ यानी किले से हो सकता है।

यानी इस मंदिर की खूबसूरती के साथ इसका नाम भी अपने भीतर एक रोचक ऐतिहासिक पहेली समेटे हुए है।

लाड खान मंदिर: जब मंदिर का स्वरूप भी था प्रयोग का हिस्सा

ऐहोले का लाड खान मंदिर स्थापत्य के उन प्रयोगों की कहानी कहता है, जब मंदिरों का स्वरूप आज की तरह पूरी तरह विकसित नहीं हुआ था।

इस मंदिर को देखकर पहली नजर में यह किसी सामान्य धार्मिक भवन या स्तंभयुक्त सभागार जैसा लग सकता है। इसकी सपाट छत, मजबूत स्तंभ और खुली संरचना इसे दूसरे मंदिरों से अलग बनाती है।

मंदिर के भीतर गर्भगृह और उसके आसपास की संरचना को जिस तरह व्यवस्थित किया गया है, वह तत्कालीन वास्तुकारों की सोच को दर्शाता है। यह स्मारक बताता है कि उस समय मंदिर निर्माण की कोई एक निश्चित शैली नहीं थी। शिल्पकार अलग-अलग संरचनाओं को आजमाकर मंदिर वास्तुकला को नया रूप दे रहे थे।

मेगुति जैन मंदिर: एक शिलालेख जिसने खोल दिए इतिहास के पन्ने

ऐहोले की ऐतिहासिक महत्ता केवल मंदिरों की बनावट तक सीमित नहीं है। यहां का मेगुति जैन मंदिर इतिहास के एक ऐसे दस्तावेज को अपने भीतर समेटे हुए है, जिसने चालुक्यकालीन इतिहास को समझने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

इस मंदिर में 634-35 ईस्वी का प्रसिद्ध ऐहोले अभिलेख मिलता है। संस्कृत भाषा में रचित इस अभिलेख को चालुक्य शासक पुलकेशिन द्वितीय के दरबारी कवि रविकीर्ति ने लिखा था।

इसमें पुलकेशिन द्वितीय की उपलब्धियों और तत्कालीन राजनीतिक घटनाओं का उल्लेख मिलता है। विशेष रूप से उत्तर भारत के शासक हर्षवर्धन के साथ उनके संघर्ष का विवरण इतिहासकारों के लिए काफी महत्त्वपूर्ण है।

सोचने वाली बात है कि जिस मंदिर को देखने के लिए आज पर्यटक दूर-दूर से आते हैं, उसकी दीवारों पर सदियों पुराना ऐसा अभिलेख भी मौजूद है, जो तत्कालीन राजनीति और सत्ता की कहानी सुनाता है।

एक ही जगह पर दिखती हैं स्थापत्य की कई शैलियां

ऐहोले की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यहां घूमते हुए ऐसा लगता है मानो भारतीय मंदिर वास्तुकला के अलग-अलग दौर एक साथ सामने आ गए हों।

कहीं उत्तर भारतीय नागर शैली की झलक मिलती है, तो कहीं दक्षिण भारतीय द्रविड़ शैली के लक्षण दिखाई देते हैं। कुछ मंदिरों में इन दोनों परंपराओं का मेल भी देखने को मिलता है।

मंदिरों के शिखर, स्तंभ, प्रवेश द्वार, मंडप और गर्भगृह की संरचना में विविधता इस बात का प्रमाण है कि ऐहोले के शिल्पकार केवल परंपराओं को दोहरा नहीं रहे थे, बल्कि नए विचारों के साथ स्थापत्य को विकसित भी कर रहे थे।

यही प्रयोग आगे चलकर भारतीय मंदिर वास्तुकला की समृद्ध परंपरा का आधार बने।

ऐहोले, बादामी और पट्टदकल: एक ही विरासत की तीन कहानियां

ऐहोले की कहानी बादामी और पट्टदकल के बिना अधूरी है। ये तीनों स्थल कर्नाटक की मालप्रभा घाटी में चालुक्यकालीन कला और स्थापत्य की समृद्ध परंपरा को दर्शाते हैं।

ऐहोले में मंदिर निर्माण के शुरुआती प्रयोग देखने को मिलते हैं। बादामी अपनी शैलकृत गुफाओं और मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है, जबकि पट्टदकल में मंदिर स्थापत्य की विकसित शैलियों का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।

इन तीनों स्थलों को एक साथ देखने पर समझ आता है कि भारतीय मंदिर वास्तुकला ने किस तरह प्रयोगों से परिपक्वता तक का सफर तय किया।

आज भी शिल्पकारों की कल्पनाशीलता का जीवंत दस्तावेज है ऐहोले

समय बदला, राजवंश बदले और मंदिर निर्माण की तकनीकें भी विकसित हुईं, लेकिन ऐहोले के पत्थरों में दर्ज शिल्पकारों की कल्पनाशीलता आज भी जीवित है।

यहां आने वाला व्यक्ति केवल प्राचीन मंदिरों को नहीं देखता, बल्कि उस दौर की सोच, तकनीक और कलात्मक दृष्टि को भी महसूस करता है। इतिहासकारों के लिए यह शोध का केंद्र है, वास्तुकला के विद्यार्थियों के लिए अध्ययनशाला और पर्यटकों के लिए भारतीय विरासत का अनमोल खजाना।

ऐहोले हमें याद दिलाता है कि भारतीय स्थापत्य कला की भव्यता अचानक विकसित नहीं हुई थी। इसके पीछे सदियों के प्रयोग, अनुभव और रचनात्मक सोच की लंबी यात्रा रही है।

शायद यही ऐहोले की सबसे बड़ी खूबी है—यहां पत्थर सिर्फ मंदिरों का आकार नहीं लेते, बल्कि इतिहास के उन प्रयोगों की कहानी भी सुनाते हैं, जिन्होंने भारतीय वास्तुकला को दुनिया में एक अलग पहचान दिलाई।

जमुना दयाल

जमुना दयाल वाराणसी के निवासी हैं और उन्हें हिंदी समाचार मीडिया में 10 से अधिक वर्षों का गहन रिपोर्टिंग अनुभव है। उन्होंने अमर उजाला और दैनिक जागरण जैसे देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में जिला रिपोर्टर के रूप में कार्य करते हुए खेल, शिक्षा, राजनीति, कृषि तथा सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता से कवर किया है। शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से जनसंचार में परास्नातक (MJMC) की डिग्री प्राप्त की है और यूजीसी नेट (UGC NET) परीक्षा उत्तीर्ण की है।

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