नाम दशावतार, पर दीवारों पर लिखी है कोई और कहानी: बेतवा किनारे खड़ा 1500 साल पुराना देवगढ़ का मंदिर
ललितपुर के देवगढ़ में छिपा है 1500 साल पुराना गुप्तकालीन मंदिर

उत्तर प्रदेश के ललितपुर ज़िले में बेतवा नदी के किनारे, विंध्य की पहाड़ियों की तलहटी में एक ऐसा मंदिर खड़ा है, जिसके नाम और उसकी दीवारों के बीच एक दिलचस्प पहेली छिपी है। इसे कहा जाता है दशावतार मंदिर, यानी विष्णु के दस अवतारों का मंदिर। मगर इसकी दीवारों पर दस अवतारों की कोई श्रृंखला नहीं मिलती।
तो फिर यहाँ क्या है? और क्यों इतिहासकार इसे भारतीय मंदिर-स्थापत्य की एक मील का पत्थर इमारत मानते हैं?
छठी सदी की शुरुआत का मंदिर
देवगढ़ का यह मंदिर आमतौर पर छठी सदी के आरंभ (लगभग 500-525 ई.) का माना जाता है, यानी गुप्तकाल के अंतिम दौर का। इसकी तारीख़ को लेकर विद्वानों में कुछ मतभेद ज़रूर हैं, पर इसकी गिनती गुप्तकालीन मंदिर-स्थापत्य के सबसे अहम नमूनों में होती है। आज यह ASI का संरक्षित स्मारक है।
जहाँ से शिखर की कहानी शुरू होती है
इस मंदिर को ख़ास बनाती है इसकी बनावट। उत्तर भारत में शिखर वाले मंदिरों के सबसे पुराने उदाहरणों में इसकी गिनती होती है। यही शिखर आगे चलकर विकसित हुई नागर शैली की पहचान बना। हालाँकि समय की मार से इसके शिखर का ऊपरी हिस्सा अब नष्ट हो चुका है।
मंदिर एक चौकोर ऊँचे चबूतरे (जगती) पर बना है, जिस पर चढ़ने के लिए सीढ़ियाँ हैं। माना जाता है कि चबूतरे के चारों कोनों पर छोटे उप-मंदिर थे, यानी यह पंचायतन योजना का मंदिर रहा होगा। आज वे अवशेष रूप में ही बचे हैं। पूरा निर्माण बलुआ पत्थर का है, जिसकी नक्काशी में गुप्तकालीन कला का संयम और सुघड़ता झलकती है।
गर्भगृह का द्वार: पत्थर पर उकेरी कविता
गर्भगृह का प्रवेश द्वार इस मंदिर का सबसे सुंदर हिस्सा माना जाता है। चौखट पर गंगा और यमुना की आकृतियाँ और विष्णु से जुड़ा अलंकरण है। इसे गुप्तकालीन मूर्तिकला के बेहतरीन उदाहरणों में गिना जाता है।
तीन कहानियाँ, जो दीवारें सुनाती हैं
मंदिर की बाहरी दीवारों पर बड़े आकार के तीन मूर्तिपट्ट सबसे ज़्यादा चर्चित हैं:
- शेषशायी विष्णु: शेषनाग की शय्या पर विश्राम करते विष्णु, जिनके पास लक्ष्मी और अन्य देवता दिखाए गए हैं। यह इस मंदिर का सबसे प्रसिद्ध दृश्य है।
- नर-नारायण: बदरिकाश्रम में तपस्या करते दो ऋषि।
- गजेंद्र मोक्ष: संकट में पड़े हाथी को विष्णु द्वारा बचाने की कथा।
इनके अलावा छोटे पट्टों में रामायण और कृष्ण कथा के दृश्य भी बताए जाते हैं। यानी यह मंदिर अवतारों की सूची नहीं, विष्णु से जुड़ी कथाओं का पत्थर पर लिखा संग्रह है। कई मूल मूर्तियाँ अब राष्ट्रीय संग्रहालय, दिल्ली और देवगढ़ के पुरातात्विक संग्रहालय में रखी हैं।
फिर “दशावतार” नाम कहाँ से आया?
माना जाता है कि यह नाम बाद में प्रचलित हुआ। मंदिर का मूल नाम क्या था, इस पर विद्वान एकमत नहीं हैं। और यही अनिश्चितता इस स्मारक की कहानी को और रोचक बना देती है।
सिर्फ़ एक मंदिर नहीं, पूरा खज़ाना
देवगढ़ का आकर्षण इसी मंदिर तक सीमित नहीं। यहाँ 9वीं-10वीं सदी के जैन मंदिरों का विशाल समूह, पहाड़ी पर प्राचीन अभिलेख और बेतवा का शांत तट भी है। इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए यह एक ही जगह पर कई सदियों की यात्रा है। नज़दीकी रेलवे स्टेशन ललितपुर है।
आख़िर में
जब हम भारत के मंदिरों की बात करते हैं, तो अक्सर खजुराहो, कोणार्क या मदुरै का नाम पहले आता है। मगर उन भव्य शिखरों की जड़ें कहीं न कहीं देवगढ़ जैसी शुरुआती इमारतों में हैं। बेतवा के किनारे खड़ा यह मंदिर याद दिलाता है कि हर महान परंपरा की शुरुआत एक सादे, पर साहसी प्रयोग से होती है।



