पानी की वो इमारतें, जो ज़मीन के भीतर बसी हैं: भारत की बावलियों की अनसुनी दास्तान
पानी की वो इमारतें: भारत की सबसे सुंदर बावलियों की कहानी

दिल्ली के कनॉट प्लेस की भागती-दौड़ती सड़कों से बस कुछ क़दम की दूरी पर हैली रोड की एक संकरी गली में समय ठहरा हुआ मिलता है। ऊँची इमारतों के बीच छिपी अग्रसेन की बावली में उतरते ही बाहर का शोर पीछे छूट जाता है और हवा अचानक ठंडी हो जाती है। लगभग 60 मीटर लंबी और 15 मीटर चौड़ी इस बावली की 103 सीढ़ियाँ नीचे अँधेरे की ओर ले जाती हैं। परंपरा इसे महाराजा अग्रसेन से जोड़ती है, और माना जाता है कि 14वीं सदी में अग्रवाल समुदाय ने इसका पुनर्निर्माण करवाया था। आज यह ASI का संरक्षित स्मारक है।
लेकिन यह भारत की अकेली बावली नहीं है। देश के कोने-कोने में ऐसे सीढ़ीदार कुएँ बिखरे हैं, जिन्हें कभी जल-संरक्षण की सबसे समझदार तकनीक माना जाता था।
क्या होती है बावली?
बावली, यानी सीढ़ीदार कुआँ, ऐसी संरचना है जिसमें सीढ़ियों से उतरकर पानी तक पहुँचा जाता है। अलग-अलग इलाक़ों में इसके अलग नाम हैं: उत्तर भारत में बावली या बावड़ी, गुजरात में वाव, राजस्थान में झालरा, दक्षिण भारत में पुष्करणी या कल्याणी और महाराष्ट्र में बारव।
भारत में बावलियों की कुल संख्या का कोई एक प्रामाणिक आँकड़ा नहीं है। अनुमान सैकड़ों से हज़ारों तक के हैं, क्योंकि बहुत-सी उपेक्षा, अतिक्रमण या मिट्टी में दबकर लुप्त हो चुकी हैं। सबसे ज़्यादा बावलियाँ गुजरात और राजस्थान में मिलती हैं।
गुजरात: जहाँ पानी के नीचे मंदिर बसते हैं
रानी की वाव, पाटन को बावलियों की रानी कहा जाए तो ग़लत नहीं होगा। 11वीं सदी में रानी उदयमती ने सोलंकी राजा भीमदेव प्रथम की याद में इसे बनवाया। सैकड़ों उत्कीर्ण मूर्तियाँ, ख़ासकर भगवान विष्णु के अवतार, इसकी दीवारों को सजाती हैं। यह उल्टे मंदिर जैसी दिखती है। 2014 में इसे यूनेस्को विश्व धरोहर का दर्जा मिला और यह 100 के नोट पर भी छपी है।
गांधीनगर की अडालज की वाव पाँच मंज़िला है। 1498 में वाघेला राजा वीर सिंह ने इसे शुरू करवाया, और उनकी मृत्यु के बाद रानी रुदाबाई और सुल्तान महमूद बेगड़ा के काल में यह पूरी हुई। इसमें हिंदू-इस्लामी स्थापत्य का सुंदर मेल दिखता है।
अहमदाबाद की दादा हरिर नी वाव 1499 में सुल्तान बेगड़ा के हरम की सेविका धाय हरिर ने बनवाई थी, और इसकी जालीदार नक्काशी बेहद प्रसिद्ध है। जूनागढ़ के उपरकोट किले में अडी-कडी वाव और नवघन कुआँ भी अपनी प्राचीन बनावट के लिए जाने जाते हैं।
राजस्थान: ज्यामिति का जादू
दौसा के आभानेरी की चाँद बावड़ी 9वीं सदी की है और निकुंभ वंश के राजा चाँद से जुड़ी बताई जाती है। लगभग 3,500 सीढ़ियों और 13 मंज़िलों वाली यह बावड़ी भारत की सबसे गहरी और सबसे सुंदर ज्यामितीय बावलियों में गिनी जाती है। पास में हर्षद माता मंदिर भी है।
जोधपुर का तूरजी का झालरा 18वीं सदी में महाराजा अभय सिंह की रानी ने बनवाया था, जिसका हाल में जीर्णोद्धार हुआ है। जयपुर के आमेर किले के पास पन्ना मीणा का कुंड अपनी सममित सीढ़ियों के लिए मशहूर है। बूँदी को तो “बावलियों का शहर” ही कहा जाता है, जहाँ 50 से अधिक बावड़ियाँ बताई जाती हैं। इनमें 1699 में रानी नाथावती की बनवाई रानी जी की बावड़ी सबसे चर्चित है। अलवर के नीमराणा में 18वीं सदी की नौ-मंज़िला बावड़ी भी देखने लायक़ है।
दिल्ली: एक शहर, कई बावलियाँ
अग्रसेन की बावली के अलावा महरौली में राजों की बावली है, जिसे 1506 में लोदी काल में दौलत खान ने बनवाया। राजमिस्त्रियों के इस्तेमाल के कारण यह नाम पड़ा। पास ही इल्तुतमिश के काल (13वीं सदी) की गंधक की बावली है, जिसे पानी में गंधक की गंध के कारण यह नाम मिला। फ़िरोज़ शाह कोटला और पुराना क़िला में भी सल्तनत और मुग़ल काल की बावलियाँ हैं।
उत्तर प्रदेश, मध्य भारत और दक्षिण
लखनऊ के बड़ा इमामबाड़ा परिसर की शाही बावली लगभग 1784 में नवाब आसफ़ुद्दौला के समय बनी। इसकी ख़ासियत यह है कि ऊपर बैठकर आने-जाने वालों को बिना देखे देखा जा सकता है। फ़तेहपुर सीकरी की बावली और मांडू (मध्य प्रदेश) की चंपा बावड़ी भी उल्लेखनीय हैं।
दक्षिण में हम्पी की पुष्करणी विजयनगर काल का सीढ़ीदार जलाशय है, जबकि हैदराबाद की बंसीलालपेट की बावड़ी 19वीं सदी की है और हाल में इसका पुनरुद्धार हुआ।
बावलियाँ सिर्फ़ पानी के लिए नहीं थीं
- जल-संरक्षण: वर्षा का जल जमा करने और भूजल-स्तर बनाए रखने के लिए बनीं।
- शीतलता: गर्मियों में यहाँ का तापमान बाहर से कई डिग्री कम रहता था, इसलिए यात्रियों और व्यापारियों के लिए यह विश्राम स्थल थीं।
- सामाजिक केंद्र: पूजा, मेले और सामूहिक मिलन के स्थान भी रहीं।
- स्थापत्य: इनमें मूर्तिकला और ज्यामितीय डिज़ाइन का उत्कृष्ट मेल मिलता है।
आज के लिए सबक़
जब शहर पानी के संकट से जूझ रहे हैं, तब ये बावलियाँ हमें याद दिलाती हैं कि हमारे पूर्वजों ने बारिश को सहेजने की कला सदियों पहले साध ली थी। इन्हें बचाना सिर्फ़ विरासत का सवाल नहीं, भविष्य के पानी का सवाल भी है। अगली बार किसी शहर में जाएँ तो एक बावली ज़रूर देखें, क्योंकि सीढ़ियाँ उतरते हुए आप इतिहास में भी उतर रहे होते हैं।



