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पत्थरों पर उकेरी गई सजीव कथाएं: कर्नाटक के ‘होयसलेश्वर मंदिर’ की जादुई नक्काशी के वे रहस्य, जो होश उड़ा दें

2,000 से अधिक हाथी और हर एक की मुद्रा बिल्कुल अलग!

भारत की प्राचीन भूमि पर ऐसे कई अजूबे बिखरे पड़े हैं, जिनकी वास्तुकला देखकर आज के आधुनिक इंजीनियर और वैज्ञानिक भी दांतों तले उंगली दबा लेते हैं। कर्नाटक के हासन जिले में स्थित होयसलेश्वर मंदिर (Hoysaleswara Temple) ऐसा ही एक पाषाण-शिल्प का जीवंत चमत्कार है।

12वीं शताब्दी में होयसल साम्राज्य के दौरान बने इस मंदिर की दीवारों पर की गई नक्काशी सिर्फ वास्तुकला नहीं है, बल्कि ऐसा लगता है मानो कठोर पत्थरों में जान फूंक दी गई हो। आइए जानते हैं इस अद्वितीय मंदिर की कला और इसकी खासियतों के बारे में विस्तार से।

1. क्या है होयसलेश्वर मंदिर का इतिहास?

हलेबीडु (जिसे पहले ‘द्वारसमुद्र’ कहा जाता था) होयसल साम्राज्य की राजधानी हुआ करती थी। राजा विष्णुवर्धन के शासनकाल में 12वीं सदी (लगभग 1121 ईस्वी) में इस भव्य भगवान शिव के मंदिर का निर्माण शुरू हुआ था। इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहाँ दो मुख्य मंदिर (जुड़वां मंदिर) बने हैं— एक होयसलेश्वर और दूसरा शांतलेश्वर (जो राजा और रानी के नाम पर आधारित हैं)।

2. सोपस्टोन (Soapstone) का जादू और सूक्ष्म कारीगरी

इस मंदिर की नक्काशी इतनी बारीक और सजीव है कि इसे देखकर आँखें चौंधिया जाती हैं।

  • पत्थर का रहस्य: इस मंदिर को बनाने के लिए सोपस्टोन (Soapstone / क्लोरिटिक शिस्ट) का इस्तेमाल किया गया था। जब यह पत्थर खान से निकाला जाता है, तो बेहद मुलायम होता है, जिस पर आसानी से हथौड़ी और छैनी से महीन काम किया जा सकता है। लेकिन हवा के संपर्क में आने के बाद यह पत्थर लोहे जितना मजबूत हो जाता है।
  • शिल्पकारों ने इस खूबी का फायदा उठाते हुए यहाँ पत्थरों पर ऐसी जालीदार और बारीक नक्काशी की है, जैसी दुनिया में शायद ही कहीं और देखने को मिले।

3. दीवारों पर उकेरी गई रामायण, महाभारत और महाकाव्य

होयसलेश्वर मंदिर के बाहरी हिस्से में कुल कई क्षैतिज परतें (Friezes) बनाई गई हैं, जो अपने आप में एक खुली किताब जैसी हैं।

  • हाथियों की क्रेडिबिलिटी: मंदिर के सबसे निचले हिस्से में लगभग 2,000 से अधिक हाथियों की कतारें गढ़ी गई हैं, और मजे की बात यह है कि किन्हीं भी दो हाथियों की मुद्रा या डिजाइन एक जैसी नहीं है।
  • पौराणिक कथाएं: इसके ऊपर शेरों की पट्टियाँ, घोड़ों के चित्र, और उसके बाद रामायण, महाभारत तथा भागवत पुराण की कथाओं को पत्थरों पर ऐसे उकेरा गया है कि पूरी कहानी दीवारों पर जीवंत हो उठती है।

4. बेजोड़ मूर्तियां और ‘मदिकाल्स’ (Madikaals)

मंदिर के बाहर और अंदर भगवान शिव के विभिन्न रूपों, नटराज, गणेश, और देवी महालक्ष्मी की सैकड़ों मूर्तियां स्थापित हैं।

  • यहाँ की कई मूर्तियों के आभूषण इतने बारीक तराशे गए हैं कि उन्हें उंगली से अलग किया हुआ महसूस किया जा सकता है (यानी वे पत्थर से पूरी तरह अलग, हवा में लटके हुए प्रतीत होते हैं)।
  • मंदिर के भीतर पॉलिश किए गए काले ग्रेनाइट के खंभे इस तरह चमकते हैं कि उनमें आज भी शीशे की तरह चेहरा देखा जा सकता है।

यूनेस्को की धरोहर और हमारी सांस्कृतिक शान

अपनी इसी बेजोड़ और अद्वितीय वास्तुकला के कारण होयसलेश्वर मंदिर को UNESCO की विश्व धरोहर स्थलों (World Heritage Sites) की सूची में शामिल किया गया है। अगर आप भारतीय इतिहास, कला और संस्कृति के सच्चे प्रेमी हैं, तो हलेबीडु के इस पाषाण मंदिर की यात्रा आपके जीवन के सबसे यादगार अनुभवों में से एक होगी।

जमुना दयाल

जमुना दयाल वाराणसी के निवासी हैं और उन्हें हिंदी समाचार मीडिया में 10 से अधिक वर्षों का गहन रिपोर्टिंग अनुभव है। उन्होंने अमर उजाला और दैनिक जागरण जैसे देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में जिला रिपोर्टर के रूप में कार्य करते हुए खेल, शिक्षा, राजनीति, कृषि तथा सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता से कवर किया है। शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से जनसंचार में परास्नातक (MJMC) की डिग्री प्राप्त की है और यूजीसी नेट (UGC NET) परीक्षा उत्तीर्ण की है।

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