हजार दरवाजों का महल: मुर्शिदाबाद का हजारद्वारी, जहाँ असली-नकली दरवाजों में छिपी है नवाबों की कहानी
भागीरथी के किनारे खड़ा यह तीन मंज़िला महल कभी बंगाल, बिहार और उड़ीसा के नवाब का सरकारी आवास था। आज यह ASI का संग्रहालय है, और इसके दरवाज़ों का रहस्य अब भी सवाल छोड़ता है।

भागीरथी नदी के किनारे, पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में एक विशाल महल खड़ा है, जिसकी दीवारों में दरवाज़े ही दरवाज़े दिखते हैं। कुछ खुलते हैं, कुछ केवल दीवार पर बने हैं। इसी वजह से इसे हजारद्वारी कहा जाता है, यानी हज़ार दरवाज़ों वाला महल। कभी बंगाल की राजधानी रहे इस शहर की शान आज भी यही इमारत है।
कहाँ है हजारद्वारी महल?
महल मुर्शिदाबाद के किला निज़ामत परिसर में है। यह अब एक राष्ट्रीय स्मारक और सार्वजनिक संग्रहालय है। पहले इसे बड़ा कोठी कहा जाता था। यह भागीरथी नदी के किनारे है और भारत में भारतीय-यूरोपीय स्थापत्य के सबसे महत्वपूर्ण उदाहरणों में गिना जाता है। पूरा परिसर लगभग 41 एकड़ में फैला है।
मुर्शिदाबाद: जब यह बंगाल की राजधानी था
महल की कहानी समझने के लिए शहर का इतिहास जानना ज़रूरी है। पश्चिम बंगाल पर्यटन के अनुसार अंग्रेज़ों के आने से पहले मुर्शिदाबाद बंगाल की राजधानी था। 1757 में प्लासी की लड़ाई में अंग्रेज़ों ने सिराजुद्दौला को हराया, फिर भी कुछ समय तक यह प्रशासन का केंद्र बना रहा। हजारद्वारी उसी दौर की आख़िरी बड़ी निशानियों में से एक है।
किसने बनवाया और किसने डिज़ाइन किया?
महल का निर्माण नवाब नाज़िम हुमायूँ जाह ने कराया, जो मीर जाफ़र के वंशज थे और बंगाल, बिहार तथा उड़ीसा के शासक थे। उनका शासनकाल 1824 से 1838 तक रहा। महल पुराने निज़ामत क़िले की जगह पर बना।
इसका नक्शा एक अंग्रेज़ इंजीनियर ने बनाया। डिज़ाइन कर्नल डंकन मैकलियोड का था। निर्माण-काल को लेकर स्रोतों में थोड़ा अंतर है। विकिपीडिया के अनुसार यह दिसंबर 1837 में पूरा हुआ, जबकि आउटलुक ट्रैवलर के मुताबिक निर्माण 1829 से 1837 के बीच चला। इतना तय है कि महल 1830 के दशक में बना और 1837 में तैयार हुआ।
यूरोपीय ढाँचा, नवाबी शान
महल 19वीं सदी की नवशास्त्रीय इटैलियनेट शैली में बना है, जिसमें डोरिक स्तंभों का प्रभाव दिखता है। यह तीन मंज़िला इमारत है।
दिलचस्प बात यह है कि यह शैली नवाब को भी पूरी तरह रास नहीं आई थी। नवाब के एक वंशज के हवाले से लाइव हिस्ट्री इंडिया ने लिखा है कि नवाब नाज़िम को इटैलियनेट वास्तुकला कुछ ख़ास पसंद नहीं थी, क्योंकि वह उन्हें एक देशी राजकुमार के लिए अनुपयुक्त लगती थी।
इस भव्यता की क़ीमत भी बड़ी थी। आउटलुक ट्रैवलर के अनुसार महल इतालवी संगमरमर से बना और माना जाता है कि नवाब ने उस ज़माने के हिसाब से अपने इस आवास पर 18 लाख रुपये ख़र्च किए। यह “माना जाता है” वाली जानकारी है, यानी अनुमान।
हज़ार दरवाज़ों का रहस्य
महल की पहचान इसके दरवाज़े हैं। बड़ा कोठी नाम इसलिए पड़ा कि इसमें एक हज़ार दरवाज़े हैं, जिनमें से सौ नक़ली हैं। पश्चिम बंगाल पर्यटन विभाग के मुताबिक 1000 में से 900 दरवाज़े असली हैं और इसके पीछे विचार यह था कि असली-नक़ली दरवाज़ों के भ्रम में घुसपैठिए भटक जाएँ, और तब तक नवाब के पहरेदार उन तक पहुँच जाएँ।
मगर इस पहेली के जवाब सब एक जैसे नहीं हैं। लाइव हिस्ट्री इंडिया का कहना है कि 1000 दरवाज़ों में से केवल 110 असली हैं, बाक़ी वास्तुकला का भ्रम हैं। इस अनोखी बनावट का सही कारण पता नहीं, पर शोधकर्ताओं का अनुमान है कि यह नवाब को हत्यारों और महल के तख़्तापलट से बचाने की सुरक्षा-व्यवस्था रही होगी। आउटलुक ट्रैवलर के मुताबिक फ्रेंच खिड़कियों समेत लगभग 900 “असली” दरवाज़े माने जाते हैं।
सच यह है कि दरवाज़ों की सटीक गिनती और नक़ली दरवाज़ों का असली मक़सद, दोनों पर इतिहासकारों में एक राय नहीं है। शायद यही अनिश्चितता इस महल को और रहस्यमयी बनाती है।
आज का हजारद्वारी संग्रहालय
आज यह महल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संचालित संग्रहालय है। इसे ASI का सबसे बड़ा साइट म्यूज़ियम माना जाता है। एक ट्रैवल गाइड के अनुसार यहाँ 20 दीर्घाएँ हैं और 4,742 पुरावशेष हैं, जिनमें से 1,034 जनता के लिए प्रदर्शित हैं। पर्यटन विभाग के पुराने विवरण में 114 कमरे और 8 दीर्घाओं का ज़िक्र है, इसलिए गैलरी की संख्या छापने से पहले ताज़ा ASI स्रोत से मिलान कर लें।
संग्रह में क्या मिलता है? पर्यटन विभाग के अनुसार कवच-हथियार, शानदार चित्र, नवाबों के विस्तृत पोर्ट्रेट और चीन की हाथीदाँत की सुंदर कलाकृतियाँ यहाँ देखी जा सकती हैं। एक बात और: दुर्लभ संग्रह वाला पुस्तकालय विशेष अनुमति के बिना आम जनता के लिए नहीं खुलता।



