जिस देवता ने नागपुत्र के लिए दे दिए अपने प्राण, उन्हीं के नाम पर माताएं रखती हैं जीवित्पुत्रिका यानी जितिया का निर्जला व्रत; जानिए भारत में कहां-कहां हैं जीमूतवाहन के मंदिर
नागपुत्र को बचाने के लिए खुद गरुड़ के सामने चले गए जीमूतवाहन

Jivitputrika Vrat 2026: जीवित्पुत्रिका यानी जितिया व्रत का नाम सुनते ही माताओं के कठिन निर्जला उपवास की तस्वीर सामने आती है। लेकिन इस व्रत के पीछे सिर्फ संतान की लंबी उम्र की कामना नहीं, बल्कि त्याग और परोपकार की एक ऐसी पौराणिक कथा है, जिसमें जीमूतवाहन ने एक नागपुत्र की जान बचाने के लिए स्वयं को गरुड़ के सामने प्रस्तुत कर दिया था। यही वजह है कि बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में आज भी जितिया के दौरान जीमूतवाहन की पूजा की जाती है। देश में उनके नाम से जुड़े कुछ प्रमुख पूजा स्थल और मंदिर भी हैं।
जितिया और जीमूतवाहन का क्या है संबंध?
जीवित्पुत्रिका व्रत को अलग-अलग क्षेत्रों में जितिया, जिउतिया और जीउतिया के नाम से जाना जाता है। यह मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और मिथिला क्षेत्र में प्रचलित है। इस व्रत में माताएं संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।
इस पर्व के केंद्र में जीमूतवाहन हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार वे ऐसे त्यागी और परोपकारी राजा थे, जिन्होंने किसी दूसरे की संतान को बचाने के लिए अपना जीवन दांव पर लगा दिया था। इसी त्याग की स्मृति में उनकी पूजा की परंपरा जुड़ी मानी जाती है।
भारत सरकार के पर्यटन पोर्टल के अनुसार भी जीवित्पुत्रिका व्रत बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश सहित कई क्षेत्रों में मनाया जाने वाला महत्वपूर्ण पर्व है।
कौन थे जीमूतवाहन?
जीमूतवाहन का उल्लेख पौराणिक कथाओं में मिलता है। उनकी कथा नागों और गरुड़ से जुड़ी है।
कथा के अनुसार एक समय नागों और गरुड़ के बीच ऐसा समझौता था कि गरुड़ को भोजन के लिए नियमित रूप से एक नाग दिया जाएगा। एक दिन नागपुत्र शंखचूड़ की बारी आई। उसकी मां बेटे की मृत्यु की आशंका से विलाप कर रही थी।
जीमूतवाहन ने जब नागमाता को रोते देखा तो उनसे कारण पूछा। पूरी बात जानने के बाद उन्होंने शंखचूड़ को बचाने का निर्णय लिया। उन्होंने स्वयं को गरुड़ के सामने प्रस्तुत कर दिया, ताकि शंखचूड़ की जान बच सके।
कथा के अनुसार जीमूतवाहन के त्याग से गरुड़ प्रभावित हुए। उन्होंने उन्हें जीवनदान दिया और नागों को अपना आहार न बनाने का वचन दिया।
यही कहानी जितिया पर्व के मूल भाव—दूसरे के जीवन की रक्षा के लिए त्याग—को सामने रखती है।
इसलिए माताएं रखती हैं निर्जला व्रत
जीमूतवाहन की इसी कथा को संतान की रक्षा और दीर्घायु की कामना से जोड़ा गया है। व्रती महिलाएं जितिया के दिन निर्जला उपवास करती हैं।
यह सामान्य उपवास से अलग माना जाता है, क्योंकि इसमें निर्धारित अवधि तक पानी तक ग्रहण नहीं किया जाता। व्रत से पहले नहाय-खाय की परंपरा होती है। इसके बाद निर्जला व्रत रखा जाता है और अगले दिन पारण किया जाता है।
क्षेत्र के अनुसार पूजा की विधि और लोक परंपराओं में अंतर जरूर मिलता है, लेकिन जीमूतवाहन की कथा लगभग हर जगह इस पर्व का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
भारत में कहां हैं जीमूतवाहन के प्रमुख मंदिर?
जीमूतवाहन की पूजा पूरे देश में अलग-अलग तरीके से होती है। लेकिन शिव, विष्णु या कृष्ण की तरह जीमूतवाहन का कोई एक ऐसा अखिल भारतीय प्रमुख मंदिर नहीं है, जिसे उनका केंद्रीय तीर्थ माना जाए।
कई स्थानों पर स्थायी मंदिर हैं, तो अनेक जगहों पर जितिया के अवसर पर अस्थायी पूजा स्थल बनाए जाते हैं।
दाउदनगर में हैं जीमूतवाहन के चार पूजा स्थल
बिहार के औरंगाबाद जिले का दाउदनगर जितिया और जीमूतवाहन पूजा के प्रमुख केंद्रों में गिना जाता है।
यहां जीमूतवाहन की पूजा के लिए चार प्रमुख स्थान बताए जाते हैं—
- पटवाटोली इमली तर
- कसेरा टोली
- मुख्य चौक
- पुराना शहर चौक
दाउदनगर की खासियत यह है कि यहां जितिया सिर्फ एक दिन का धार्मिक व्रत नहीं रह जाता, बल्कि इससे जुड़ी लोक परंपराएं और सामुदायिक आयोजन भी होते हैं।
स्थानीय इतिहास के अनुसार यहां जितिया पूजा की परंपरा करीब 160 वर्ष से अधिक पुरानी बताई जाती है। विशेष रूप से कसेरा टोली की पूजा परंपरा को पुरानी परंपराओं में गिना जाता है।
मधुबनी के सुक्की गांव में भी होती है विशेष पूजा
बिहार के मधुबनी जिले के सुक्की गांव में भी जीमूतवाहन पूजा की परंपरा देखने को मिलती है।
जितिया के अवसर पर यहां धार्मिक आयोजन होते हैं। कई बार कलश यात्रा और नदी से जल लाने जैसी परंपराएं भी कार्यक्रम का हिस्सा बनती हैं। इसके बाद मंदिर या पूजा स्थल पर जीमूतवाहन की पूजा की जाती है।
मिथिला क्षेत्र में लोक परंपराओं की अपनी विशिष्ट शैली है। इसलिए यहां जितिया की पूजा में स्थानीय संस्कृति की झलक भी दिखाई देती है।
सीतामढ़ी के पुनौरा धाम में भी जुटती हैं महिलाएं
सीतामढ़ी के पुनौरा धाम में भी जितिया के अवसर पर महिलाओं के पूजा करने की परंपरा का उल्लेख मिलता है।
जानकी मंदिर और सीता कुंड से जुड़े इस धार्मिक क्षेत्र में महिलाएं संतान के मंगल की कामना के साथ व्रत करती हैं और कथा सुनती हैं।
यहां जितिया की परंपरा स्थानीय धार्मिक आस्था के साथ जुड़ जाती है।
पूर्वी उत्तर प्रदेश में घाटों और कुंडों पर पूजा
जितिया का प्रभाव पूर्वी उत्तर प्रदेश में भी व्यापक है। वाराणसी और आसपास के क्षेत्रों में महिलाएं घरों के अलावा गंगा घाट, तालाब और कुंडों के किनारे भी पूजा करती हैं।
कई जगह जीमूतवाहन की प्रतिमा या प्रतीकात्मक आकृति बनाई जाती है। कुछ स्थानों पर कुश से जीमूतवाहन की आकृति तैयार करने की परंपरा है।
यही कारण है कि उत्तर प्रदेश में जीमूतवाहन के मंदिरों की तलाश केवल स्थायी मंदिरों तक सीमित नहीं की जा सकती। कई स्थानीय पूजा स्थल साल में मुख्य रूप से जितिया के दौरान ही सक्रिय दिखाई देते हैं।
चील और सियारिन की कथा भी है महत्वपूर्ण
जितिया की पूजा में जीमूतवाहन की कथा के साथ चील और सियारिन की लोककथा भी सुनाई जाती है।
कई क्षेत्रों में पूजा के दौरान चील और सियारिन की आकृतियां बनाई जाती हैं। यह कथा व्रत के नियम, संयम और उसके पालन से जुड़ी मानी जाती है।
इस तरह जितिया की परंपरा में पौराणिक कथा और लोककथा दोनों साथ-साथ चलती हैं।
क्या जीमूतवाहन वास्तव में ऐतिहासिक राजा थे?
यह सवाल इतिहास और धार्मिक परंपरा के बीच अंतर को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
जीमूतवाहन का वर्णन पौराणिक और धार्मिक साहित्य में मिलता है। उनकी कथा को प्राचीन परंपरा से जोड़ा जाता है, लेकिन आधुनिक इतिहास के उपलब्ध प्रमाणों से उन्हें किसी निश्चित ऐतिहासिक राजा के रूप में प्रमाणित करना अलग विषय है।
इसलिए शोधपरक लेख में “पौराणिक मान्यता के अनुसार जीमूतवाहन” कहना अधिक उचित है।
उनसे जुड़ी कथा का धार्मिक महत्व अलग है और उनके ऐतिहासिक अस्तित्व के प्रमाण का प्रश्न अलग।
हजारों साल पुरानी कथा, लेकिन मंदिरों का इतिहास अलग
जितिया की कथा को प्राचीन धार्मिक परंपरा से जोड़ा जाता है। लेकिन आज मौजूद किसी जीमूतवाहन मंदिर को सीधे हजारों साल पुराना बताना उचित नहीं होगा।
उदाहरण के लिए दाउदनगर में जीमूतवाहन पूजा की स्थानीय परंपरा को करीब 160 वर्ष से अधिक पुराना बताया जाता है।
इससे एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है—कथा प्राचीन हो सकती है, लेकिन किसी स्थान पर मंदिर या पूजा परंपरा के शुरू होने का इतिहास अलग हो सकता है।
क्यों खास है जीमूतवाहन की पूजा?
जीमूतवाहन की कथा का सबसे महत्वपूर्ण संदेश त्याग और परोपकार है।
उन्होंने अपने लिए कुछ नहीं मांगा। किसी दूसरे परिवार के बेटे को बचाने के लिए स्वयं संकट में गए। यही कारण है कि जितिया में संतान की सुरक्षा की कामना के साथ जीमूतवाहन की कथा सुनना एक भावनात्मक और धार्मिक परंपरा बन गई।
व्रत रखने वाली महिलाएं अपने बच्चों के स्वस्थ और लंबे जीवन की कामना करती हैं, जबकि पूजा की कथा जीमूतवाहन के त्याग को याद करती है।
जीमूतवाहन का कोई एक राष्ट्रीय तीर्थ क्यों नहीं?
यह जितिया परंपरा की सबसे दिलचस्प विशेषताओं में से एक है।
भारत में अनेक देवी-देवताओं के बड़े तीर्थ विकसित हुए हैं, लेकिन जीमूतवाहन के मामले में ऐसा कोई एक केंद्रीय तीर्थ विकसित नहीं हुआ। उनकी पूजा स्थानीय समुदायों में अधिक मजबूत रही।
कहीं मंदिर में पूजा होती है, कहीं नदी किनारे, कहीं तालाब पर और कहीं घर में ही प्रतिमा या प्रतीक बनाकर अनुष्ठान किया जाता है।
इसका एक परिणाम यह भी है कि जितिया की परंपरा का स्वरूप जगह बदलने के साथ बदल जाता है, लेकिन जीमूतवाहन की कथा उसका साझा आधार बनी रहती है।
व्रत से ज्यादा बड़ी है त्याग की कहानी
जीवित्पुत्रिका व्रत को केवल संतान के लिए रखा जाने वाला कठिन उपवास मानना इसकी पूरी तस्वीर नहीं बताता।
इसके पीछे जीमूतवाहन की वह कथा है, जिसमें एक व्यक्ति दूसरे की संतान को बचाने के लिए अपना जीवन संकट में डाल देता है।
शायद यही वजह है कि सदियों से चली आ रही यह कथा आज भी जितिया के लोकाचार में जीवित है। बिहार के दाउदनगर से लेकर मिथिला और पूर्वी उत्तर प्रदेश तक इसके रूप अलग हो सकते हैं, लेकिन पूजा के केंद्र में वही सवाल रहता है—संतान की रक्षा और उसके लंबे जीवन की कामना।



